यह एक निर्विवाद सत्य है कि खुशवंत सिंह अंग्रेजी में लिखने वाले अकेले
ऐसे भारतीय लेखक-पत्रकार हैं जिनको चाहने वाले पाठकों की संख्या असंख्य
है। कारण उनकी सरलता सहजता और पाठकों से उन्हीं से पाठकों से उन्हीं के
स्तर पर आकर संवाद कर पाने की योग्यता। लेकिन सच यह भी है कि
पाठक उनको सिर्फ उतना ही जानते हैं जितना उनके स्तंभों, लेखों अथवा पुस्तकों के
जरिए उनको जाना जा सकता हो।
बहरहाल, खुशवंत सिंह की शख्सियत उससे कहीं ज्यादा व्यापक और इतर हैं, जैसे
वे अपनी रचनाओं के जरिए प्रकट होते हैं। एक आम पाठक के मन में उनकी छवि
ऐसे व्यक्ति की है, जो सुविधा-संपन्न है, शराब-कबाब और औरतों का दीवाना
हैं, विदेशों में रहा है और देश की समस्याओं पर लिखता है, स्वभाव से
हँसोड़ है और ‘जोक्स’ का विशेषज्ञ है।
आइए, अब असलियत में देखें। वर्ष 2000 में इन्हें ‘आनेस्ट मैन आफ
द
ईयर अवार्ड’ से सम्मानित करने वाले जूरी के फैसले के मुताबिक
‘खुशवंत सिंह को उनके अविस्मरीण और रोचक लेखक के जरिए, सच कहने के
नैतिक साहस और ईमानदारी के लिये चुना गया है।’ कम ही लोग जानते
होंगे कि हँसोड़ और जीवन को हलके-फुलके लेने वाले समझे जाने वाले खुशवंत
जी असल में कितने विद्वान कलापारखी, सज्जन, अपने सिद्धान्तों को गंभीरता
से लेने वाले और कितने दरियादिल इंसान हैं। पेड़-पौधों, पक्षियों और
प्रकृति पर उनक ‘नेचर वाच’ जैसी पुस्तकें हैं। नृत्य-संगीत के
समालोचक ही नहीं। स्वयं युवावस्था में शांतिनिकेतन में सितार और चित्रकला
सीखते रहे हैं।
भूमिका
उषा महाजन मेरे जीवन में लगभग 23 वर्ष पहले आई। हमारा नाता एक दूसरे के
लिये काफी लाभकारी सिद्ध हुआ। मैंने उसे कहानियाँ लिखने के लिये उकसाया
उनमें से कुछ का मैंने अनुवाद किया और उन्हें अंग्रेजी की पत्रिकाओं में
छपवाया। उसने मेरी कहानियों, उपन्यासों और लेखों को अंग्रेजी से हिन्दी
में अनूदित कर प्रकाशित करवाया। हमारी दोस्ती बहुत फूली-फली और हमारे
परिवार भी आपस में करीबी बन गए हम अक्सर एक दूसरे के घरों में आने-जाने
लगे मैंने उनकी बेटियों को नन्हीं- मुन्हीं बच्चियों से नौकरी याफ्ता,
शादीशुदा युवतियों में तब्दील होते देखा। महाजन परिवार हमारे घर का एक
हिस्सा ही बन गया इन वर्षों में उषा ने अनेक अवसरों पर, विभिन्न विषयों को
लेकर मेरे साक्षात्कार लिये मेरी राजनीति विचारधाराओं पर, मेरी स्वीकृति
नास्तिकता पर और आलोचकों के प्रति मेरी प्रतिक्रियाओं पर। मुझे खुशी हैं
कि वे अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रहे हैं।
भूमिका
यह जिम्मा भी मेरा ही
खुशवंत सिंह को जानते वर्षों हो गये। आज से ठीक 23 साल पहले उनसे
पहली मुलाकात हुई थी। सन् 1984 की 7 जुलाई को दोपहर तीन बजे। दिल्ली के
सुजान सिंह पार्क के उनके ‘ई’ ब्लाक के फ्लैट में। उन
दिनों वे राज्य सभा के सदस्य थे। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का तीन
बरसों तक कुशल संपादन करने के बाद, अवकाश प्राप्त कर चुके थे, लेकिन अब भी
उनके लिये अपना साप्ताहिक स्तंभ ‘विद मैलिस टुवर्ड्स वन एंड
आल’ लिख रहे थे, जो ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के के अलावा
भी अनेक अंग्रेजी, हिन्दी और भाषाई अखबारों में छपता था और आज भी जारी है।
इसके अतिरिक्त मैं भी जानती थी कि वे नई दिल्ली को बनाने वाले मशहूर
ठेकेदार सर सोभा सिंह के पुत्र हैं, जिन्हें अपने जमाने में आधी दिल्ली का
मालिक कहा जाता था।
मन में एक भय था, मिलने जाने से पहले, कि पता नहीं कैसे पेश आएँ। लेकिन जब
मिली तो जाना कि दुनिया में अब भी ऐसे लोग बाकी हैं, जिनमें
बड़प्पन के साथ इंसानियत की भावना भी कूट-कूटकर भरी है। उनकी हैसियत के व्यक्ति से वैसे आदर-सत्कार, स्नेह और सहानुभूति की मैंने कल्पना भी नहीं की थी जो मुझे उस पहली ही मुलाकात में मिली।
पते की बात तो यह है कि जैसा उस दिन उन्हें पाया था, वे आज तेईस बरस के
बाद भी, स्वभाव से ठीक वैसे ही है। न कोई मुखौटा न कोई छल-छदम। वैसे ही
सरल, निश्चल, सहानुभूति से लबालब, वैसे ही दिल के सच्चे। आज 93 साल की आयु में भी दिन-रात काम में लगे, अपना फोन खुद उठाते हैं, चिट्ठियों का जवाब
अपने हाथों देते हैं। लोगों से मिलते-जुलते हैं। उनकी वैसी ही रस से
सराबोर बातें, वैसे ही ठहाके।
बहरहाल, इस बीच उनके जीवन में बहुत कुछ बदलता रहा। 28 दिसंबर, 2001 की
सुबह उनकी 62 साल की सहधर्मिणी, सरदारनी जी उन्हें अकेला छो़ड़
इस दुनिया से चल बसीं। इसके साथ ही खुशवंत जी के जीवन में, एकदम ही जैसे सब कुछ बदल गया। खुशवंत जी के ठहाके बेशक बरकारार रहे, लेकिन उनमें
वह जोश वह निश्चिंतता नहीं रही जो सरदारनी जी के रहते हुआ करती थी।
वे लोगों से मिलते अब भी हैं लेकिन जल्दी ही थक जाते हैं। सरदारनी जी के
जाने के बाद उसका घर से निकलना भी लगभग बंद ही हो गया। अपनी पुस्तकों के
विमोचनों पर ही निकलें तो निकलें। पिछले-वर्ष उन पर एक और वज्रपात हुआ। घर
के ठीक सामने रहने वाली उनकी इकलौती बेटी माला दयाल के प्रकाशक पति रवि
दयाल का 3 जून, 2006 को फेफड़ों के कैंसर से निधन हो गया।
‘सुखे-दुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ....’,
को चरितार्थ करते खुशवंत जी आज भी अपने लेखन में रत हैं। दुखों और आघातों से
अपने धैर्य और जीवंतता को बचाते, मैंने उन्हें पल-पल देखा। हफ्ता दर हफ्ता
साल-दर साल देखा। और देखा कि अपने आपको ‘मुफ्तखोर’
कहते हुए भी कैसे वे दुनिया-भर के प्रलोभनों के बीच, किसी संन्यासी की तरह
मोह-माया, रुपये पैसे, यश-नाम के संचयमन से विरक्त रहे। न उन्हें कीमती
कपड़ों-जूतों का शौक, न महँगी रुचियाँ उनकी। चीजों को सँभालकर रखते उन्हें
कभी नहीं देखा।
किताबघर प्रकाशन के सत्यव्रत शर्मा जी के अनुरोध को बताया उन्हें, कि वे
‘मेरे साक्षात्कार’ श्रृंखला के लिए उनके साक्षात्कारों का भी मैंने तो अपना कोई इंटरव्यू सँभालकर रखा ही नहीं। पढ़ा और छोड़
दिया। मैंने तो अपना खुद के लिये इंटरव्यूज़ का भी कोई हिसाब नहीं
रखा।’’
‘‘हाँ, आपने तो जुल्फिकार अली भुट्टो, इंदिरा गांधी,
जान.एफ. कैनेडी-जैसी शख्सियतों के इंटरव्यू लिये जो इलस्ट्रेटेड वीकली में छपते
रहे। जानती हूँ। आपने उन्हें सम्भालकर नहीं रखा..... ?’’
हैरान होते हुए पूछा।
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं। ‘वीकली’
के तो सभी अंक
मेरी किताबों के शेल्फ में हैं। होंगे उन्हीं
में.....’’
‘‘तो फिर अब मैं क्या जवाब दूँ किताब घर प्रकाशन को ?
जबसे
आपको जानने लगी, तबसे तो आपके बारे में जो कुछ भी छपता रहा है, सब है मेरे
पास। अंग्रेजी में छपे आपके इंटरव्यू भी मैंने सँभालकर रखे हैं। पर आप समय
निकाल पाएँगे, उन्हें संकलित करने का .......?’’
‘‘तू खुद क्यों नहीं कर लेती ! कितने तो इंटरव्यू तो
तूने ही
लिये हैं मेरे बाकी, तू कहती है मेरे दूसरे इंटरव्यू की कटिंग्स भी तेरे
पास है ही।’’
इस तरह यह जिम्मा भी मेरे ऊपर ही आन पड़ा। यह सच है कि इन 23 वर्षों के
दौरान कितने ही इंटरव्यू मैंने लिए खुशवंत जी के, अनेक अवसरों
पर, विभिन्न विषयों पर। कुछ उन्हें जानने-समझने की
प्रक्रिया
में, और कुछ सामायिक घटनाओं पर उनके विचार के लिये, विभिन्न
पत्र-पत्रिकाओं के अनुरोधों पर।
साक्षात्कारों को उनके छपने के काल-क्रमानुसार रखा गया है। अंग्रेजी की
पत्र-पत्रिकाओं में छपे साक्षात्कार को खुशवंत जी की सहमति एवं अनुमति से
मैंने हिंदी में अनूदित कर पुस्तक में संकलित किया है, जिसके लिये मैं
उनकी आभारी हूँ। खुशवंत सिंह को समग्रता से समझने का दावा करता एक बड़ा
साक्षात्कार पवन कुमार वर्मा का है और उनकी पापुलर छवि के विपरीत, जैसे वो
सचमुच हैं- वैसा ही उन्हें पाने जानने का दावा करता एक लेख डा. बिंदेश्वर
पाठक का भी इसमें सम्मिलित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ। मधु
जैन, रश्मि सहगल, सारा अधिकारी, राहुल सिंह, रूमा नागपाल, हेमा, ए.यू,
आसिफ और सरदार साजिद के साक्षात्कारों को अंग्रेजी से अनुदित कर इस संकलन
में सम्मिलित करने के पीछे मेरा तर्क यही है कि यह उसकी शख्शियत पर अपनी
ही तरह से प्रकाश डालता है- विभिन्नता की दृष्टि जो खासा महत्त्वपूर्ण है।
एक लेख इसी श्रेणी का खुशवंत सिंह के पुत्र राहुल सिंह का भी इसमें है-
‘माई डर्टी, ओल्डमैन-मेरे पिता खुशवंत सिंह।’ यह भी
साक्षात्कार के प्रारूप में नहीं है। और फिर भी इसको सम्मिलित करने बिना
मैं नहीं रह सकी, क्योंकि यही एक लेख है जो बताता है कि अपनी छवि से भिन्न
असली खुशवंत सिंह कैसे हैं ! अपने लेखन के प्रति खुशवंतजी के मन में तनिक
भी ‘अहम भाव’ नहीं है-यह बात वरिष्ठ
पत्रकार ओम गुप्ता
के साक्षात्कार से सहज समझ आ जाती है।
एक साक्षात्कार उन पर शोध कर रही सुश्री किरण बाला का भी इसमें सम्मिलित
है।
खुशवंत सिंह ‘साक्षात्कार’ शख्शियत हैं। उनसे
इंटरव्यू लेने
का लोभ-संवरण तो फिल्म-नायिकाएँ भी नहीं कर पातीं। इसमें एक साक्षात्कार
फिल्म तारिका सोनाली बेंद्रे का लिया हुआ भी है- नवभारत टाइम्स में
प्रकाशित-‘प्यार तो हर वक्त जारी रहता है।’
अंग्रेजी में छपे साक्षात्कार ज्यादातर उनकी छवि को लेकर हैं। एक
उनके अच्छे स्वास्थ्य के रहस्य को लेकर और एक साक्षात्कार
‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ के संपादक के रूप में उनकी अपार
सफलता के
मद्देनजर है।
बहरहाल, कुल मिलाकर खुशवंत सिंह की छवि समग्रता के साथ आप तक पहुँचे, इसी
आशा और विश्वास के साथ।
उषा महाजन
उग्र पंजाब की अंदरूनी समस्या है।
उषा महाजन से बातचीत
आप ‘वुड्रो विल्सन सेंटर, वाशिंगटन’ की
तीसरी महीने की
छात्रवृत्ति पर अपनी किताब ‘द हिस्ट्री आफ द
सिख्स’ का
तीसरा खंड लिखकर अमेरिका से लौटे हैं। आपने इस किताब में किन-किन मुद्दों
को छुआ है ?
‘द हिस्ट्री आफ द सिख्स’ के पहले दो खंड आक्सफोर्ड
तथा
प्रिंस्टन विश्वविद्यालयों में छप चुके हैं। मैं इस किताब को अपडेट
(नवीनीकरण) करने यहाँ आया था। इसमें मैंने पंजाब में पिछले पंद्रह सालों
के दौरान हुई घटनाओं का उल्लेख किया है जैसे पंजाब पर रहित-क्रान्ति का
प्रभाव, फंडामेंटलिज्म का जन्म, भिंडराँवाले का उदय, आपरेशन-ब्लू स्टार,
श्रीमती गाँधी की हत्या तथा उसके बाद सिखों के खिलाफ हुई हिंसक घटनाएँ,
लोगों के साथ हुआ समझौता तथा समझौते का टूटना आदि।