तुलसीदासजी ने जिस संदर्भ में भी यह पंक्ति लिखी हो, जो लिखने जा रही हूँ,
उस संदर्भ में मुझे यह एकदम सटीक लगती है-
सुनहु तात यह अकथ कहानी
समुझत बनत, न जाय बखानी।
अभी कुछ ही दिन पूर्व मेरी एक प्रशंसिका पाठिका ने मुझसे अनुरोध किया था
कि मैं अपनी आत्मकथा लिखूँ, ‘समय आ गया है शिवानी जी, कि आप
अपने
सुदीर्घ जीवन के अनुभवों का निचोड़ हमें भी दें, जिससे हम कुछ सीख
सकें।’
पर यह क्या इतना सहज है ? जीवन के कटु अनुभवों को निचोड़ने लगी, तो न जाने
कितने दबे नासूर फिर से रिसने लगेगें; और फिर एक बात और भी है। मेरी यह
दृढ़ धारणा है कि कोई भी व्यक्ति भले ही वह अपने अंर्तमन के लौह कपाट
औदार्य से खोल अपनी आत्म कथा लिखने में पूरी ईमानदारी उड़ेल दे, एक-न-एक
ऐसा कक्ष अपने लिए बचा ही लेता है, जिसकी चिलमन उठा ताँक-झाँक करने की
धृष्टता कोई न कर सके। सड़ी रूढ़ियों और विशाक्त परंपराओं से जूझते-जूझते
जर्जर आसन्न मृत्यु के भय से इतना क्लांत हो जाता है कि अतीत को एक बार
फिर खींच दूसरों को दिखाने की न इच्छा ही शेष रह जाती है, न अवकाश।
जिनके दौर्बल्य को बहुत निकट से देखा है, जिनके सहसा बदल गए व्यवहार ने
जीवन के अंतिम पड़ाव में कई बार आहत किया है, उनके विषय में कुछ लिखने का
अर्थ ही है रिसते घावों को कुरेद स्वयं दुखी होना। इतना अवश्य है कि नारी
बनाकर विधाता ने नारी के अनेक रूपों को देखने परखने का प्रचुर अवसर दिया
है; उसकी महानता, उसकी क्षुद्रता देख कभी-कभी दंग रह गई हूं, क्या नारी भी
ऐसी नीचता पर उतर सकती है ? नारी-क्षूद्रता का अहंकार जितना ही प्रचंड
होता है, उतना ही प्रचंड होता है उसका दिया आघात।
मैंने इस सुदीर्घ जीवन में क्षणिक जय-पराजय का स्वाद भी चखा है, निर्लज्ज,
मिथ्याचारिता का रहस्य भी कुछ-कुछ समझने लगी हूँ। इसी क्षूद्रता,
मिथ्याचारिता के प्रतिरोध का उद्दाम संकल्प मुझे एक नित्य नवीन
प्राणदायिनी शक्ति भी प्रदान कर जाता है। न अब मुझे किसी आत्मघाती मूढ़ता
का भय रह गया है, न सत्य को उजागर करने में संकोच।
वर्षों पूर्व पन्ना के राजज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर कहा था,
‘‘तुम एक दिन राजमाता बनोगी, यदि नहीं बनी तो मैं
समझूँगा, सब
शास्त्र मिथ्या हैं। तुम्हारे वामहस्त की रेखा दुर्लभ है, किंतु अंत तक,
तुम्हारे भाग्य को अदृष्ट का कंटक-व्याल डँसता रहेगा। जिस पर भी अपना
सर्वस्व लुटाने को तत्पर रहोगी, उसी की प्रवंचना तुम्हें एक न एक दिन अवश
कर देगी।’’ तब उस भविष्यवाणी को हँसकर ही उड़ा दिया
था। उस
अदृष्ट व्याल की फुत्कार को भी कभी भुला नहीं पाई। न जाने कब डँस ले ?
डँसा उसने कई बार, न जाने कितनी बार आहत हुई, किंतु अभी तक वह निष्प्राण
नहीं कर पाई। प्रत्येक बार इसी कलम का जहर-मोहरा उसके घातक विष को चूसकर
व्यर्थ कर गया। वामहस्त की दुर्लभ रेखा भी व्यर्थ नहीं गई। विधाता ने
राजमाता भी बना दिया, किंतु वर्षों पूर्व पितामाह की दी गई सीख को गाँठ से
बांधकर चली हूं, इसी से शायद प्रभुता का मद मदालस नहीं बना पाया-
कबिरा इतना मोहि दे, जामें कुटुम्ब समाय
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।
अहिंसा और मैत्री के सिद्धांत आज हम भले ही भूल गये हों, भले ही किसी
विराट परिकल्पना के पीछे भागना हमारे लिए स्वप्नवत बन गया हो, हमारे
संस्कार अभी पूर्णतया विलुप्त नहीं हुए हैं। प्रत्येक ग्रहस्थी को सुखी
बनाने के लिए ग्रह के एक न एक सदस्य को त्याग करना ही पड़ता है, ऐसा त्याग
जो पीढ़ी दर पीढ़ी किसी विराट वट-वृक्ष की उदार छाया की भाँति, नवीन पीढ़ी
का पथ शीतल करता रहे, उसे अपनी शीतल बयार का प्रकाश अपनी शाखा-प्रशाखाओं
से झर-झर कर झरता प्रकाश देता रहे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय वर्तमान समाज अपना स्वाधीन चिंतन बहुत
पहले खो चुका है। आज की हमारी नवीन संस्कृति हो, या नवीन चिंतन, उसका लगभग
सब कुछ पश्चिम से उधार ली गई संपत्ति है। वह कर्ज चुकाने में एक दिन हम
स्वयं कंगाल हो जायेंगे, यह हम अभी नहीं समझ पा रहे हैं, जब समझेंगे तो
बहुत देर हो चुकी होगी। जिस ह्रदयहीन निर्ममता से हमने अपनी भाषा को भुला
दिया है, उसी निर्ममता से हम एक दिन अपनी जन्मदायिनी जननी को भी भुला
बैठें, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। रिश्ते महज एक औपचारिकता की डोर से बंधे
रह जाएँगे। उस विकट भविष्य की कल्पना मात्र से रोम-रोम सिहर उठता है, जब न
जनक-जननी की मृत्यु का अशौच हमें त्रस्त कर पाएगा, न पुत्रों के सिर
मुंडाने या चिंता की परिक्रमा करने का ही अवकाश मिलेगा। वह दिन भी दूर
नहीं, जब ‘बाई डैड, ‘बाई मौम’ कहकर ही
संतान,
महाप्रस्थान के उन अभागे यात्रियों को विदा देगी।
फिर भी उनका, जिन्होंने सम्मिलित परिवार के सुख भोगे हैं, कठिन धार्मिक
अनुष्ठानों का सहर्ष निर्वाह किया है, कठिन परिस्थितियों से समझौता कर
संतान को सुयोग्य बनाने की चेष्ठा की है और सफल भी रहे हैं, कुछ कर्तव्य
अवश्य हैं। पहली शिक्षा, जो परिवार में रहकर हमने सीखी और बच्चों को
सिखाई, वह है, पैसे का मूल्य, या अँग्रेजी में कहें तो वैल्यू ऑफ मनी।
बच्चे कभी पिता से चवन्नी भी मांगते, तो किसी कृपण महाजन की भांति पिता
अवश्य पूछते हैं, क्यों चाहिए ? यह ‘क्यों’ अब हमारे
जीवन के
शब्द-कोष में नहीं रहा।
न उस जीवन में कपड़ों की ही ऐसी चमक-दमक थी, न फरमाइश। बड़े भाई बहनों की
उतरन पहन कर ही बच्चे बड़े होते थे; और मेरी यह दृढ़ धारणा है कि जो
भाई-बहनों की उतरन पहन कर बड़े होते हैं, वह सिक्के कभी खोटे नहीं निकलते।
न हमारी पीठ पर कभी दस-दस सेर का ठँसा-फँसा बस्ता रहा, न ऐसा होमवर्क, जो
अब कभी-कभी बच्चों का मेरुदंड बचपन से ही झुका कर रख देता है।
लेखनी वही सार्थक है, जो जीवन की जटिलताओं को स्वचक्षुओं से देख, स्तुति
निंदा के भय से मुक्त हो, सत्य को लिपिबद्ध कर सके। उसका यह प्रयास कभी
व्यर्थ नहीं जा सकता। इसी से जब आज जीवन की उन्हीं जटिलताओं के जंग लगे
लौह कपाटों की कुंडी खोलने से खड़ी होती हूं तो किसी प्रकार का भय या
ग्लानि मुझे त्रस्त नहीं करती। भले ही यह जीर्ण दस्तावेज हमें इस यांत्रिक
युग में बेमानी लगे, किंतु हमें अभी भी बहुत कुछ सिखा सकता है।
यह तो संसार का चिरकाल से चला आया एक अद्भुत नियम है कि जो कल था, वह आज
नहीं है और जो आज है, वह कल नहीं होगा। युग ने बड़ी बेरहमी से करवट बदली
है। अतीत में क्या होता था और क्या नहीं, यह सोचने का समय ही किसे है ?
किन्तु कभी-कभी अतीत का सिंहावलोकन भी हमारे लिए आवश्यक है। वह अतीत, जहाँ
विलासिता में भी आभिजात्य का स्पर्श था। मेरा बचपन, कैशोर्य रियासतों में
बीता है और इतना दावे के साथ कह सकती हूँ कि वे राजा, आज के नए-नए बने
नृपतियों से कहीं अधिक उदार थे, कहीं अधिक सह्रदय। ऐसी बात नहीं थी कि वे
सब दूध के धुले हों। अगाध संपत्ति हो, तो खान-पान, रहन-सहन में तामसिक पुट
का आ जाना स्वाभाविक है, किंतु वे अपने अटूट वैभव के अकेले कृपण भोक्ता
नहीं रहे। कलाकारों का पोषक, गुरु का अनन्य भक्त-रानी हों या
रक्षिता-दोनों को समान दृष्टि से देखने वाली वह पीढ़ी प्रीवीपर्स के साथ
ही चूक गई।
मेरे पिता के शिष्य जसदण के आलाखाचर ने अंत तक मेरी मां को पेंशन दी, ओरछा
महाराज बीरसिंह जू देव को मेरे पिता ने कभी गायत्री मंत्र दिया था। पिता
की मृत्यु हुई तो उन्होंने बड़े सम्मान से हमें बुला भेजा, मेरे भाई को
अपना सेक्रेटरी बनाया, मेरा कन्यादान किया, हमें वे ही सुविधाएँ दीं, जो
हमारे पिता को प्राप्त थीं। शायद यही कारण है कि अभी भी बुंदेलखण्ड मुझे
अपना मायका ही लगता है। यह जन्मजात रईसी, तब तक सर्वत्र-एक-सी थी।
कुमाऊं का अतीत भी, वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध था। गरुण
ज्ञानचंद्र जैसे राजा, जब नजराना लेकर मुगल दरबार गए तो कहते हैं कि सोने
के चंवर से लेकर भोट देश के घोड़े, कालीन, सोने की ईंटें देख, मुगलों की
आँखें चौंधियां गई थीं, किन्तु धीरे-धीरे क्रूर गोरखा शासन से ही कुमाऊं
की समृद्धि का विनाश आरम्भ हो गया।
कहा यह भी जाता है कि यहाँ कभी सोने की खानें थीं। पता नहीं वे कहां और कब
विलीन हो गईं। फिर भी कुछ इने-गिने रईस रह गए थे। हमारे ही एक परिचित
परिवार की रईसी के बारे में बहुत कहानियाँ सुनी थीं कि उनके घर में आग
लगने पर पीढ़ियों से संचित सोने के ठोस नीबू, पिघल-पिघल कर बहने लगे थे
(तब पहाड़ के समृद्ध ग्रहों में सोने के बड़े-बड़े नीबू ही संचित किये
जाते थे, जैसे इस युग में सोने की बिस्किट दुबई और कुवैत से लाकर संचित
किये जाते हैं), किंतु सोने की ईंटे प्रत्येक ग्रह में भले ही न हों, कुल
की मर्यादा को सदा अक्षुण्ण रखा जाता था। कुलगोत्र देख-रेख परख कर ही
कन्या या पुत्र का विवाह संबंध स्थिर किया जाता था। कितना ही सुयोग्य
पात्र क्यों न हो, यदि कन्या के कुल के योग्य न हो तो कन्या के पिता को
उसे अमान्य घोषित करने में न क्षण-भर का विलम्ब होता था, न रिश्ता फेरने
का दुख। ऐसे ही कन्या की कुंडली में यदि लग्न से अष्टम भाव में मंगल
स्थिति हो तो कुंडली खोटे सिक्के-सी ही लौटा दी जाती।
यह निश्चित वैधव्य
योग फिर आजीवन उसे डंसता रहता। यद्यपि यहां भी उत्कोच ग्रहों में उलटफेर
कर सकता था और खोटे सिक्के को भी चलाया जा सकता था, किंतु ललाट लिपि को,
भला चतुर-से-चतुर पंडित भी कैसे मिटा सकता है ? मैंने अपनी ससुराल में यह
सब होते देखा है। मेरी एक चचेरी ननद की कुंडली में अष्टम मंगल देख, उनके
पिता के प्राण कंठागत हो गये थे। तब क्या उनकी लाडली पुत्री को आजीवन
कौमार्य व्रत धारण करना होगा ? उनके कुलपुरोहित, उनके परममित्र भी थे।
उनके इसी मिथ्या भाषण के लिए उनके यजमानों ने उनका नाम धर दिया था
‘फसका ज्यू’ अर्थात परले सिरे का गप्पी।
‘‘पंत जी, क्यों दुखी होते हो ? मैं सब ठीक कर दूँगा,
अब उसकी
नई कुंडली ही रिश्ते के लिए भेजना।’’ उन्होंने कुंडली
नई
बनाई, ‘क्रूरे अष्टमे विधवता निधनेश्वरोशे’ को बदल
लग्नगत बुध
शुक्र से कुंडली मंडित कर दी, अर्थात कन्या सुंदरी, सौभाग्यशालिनी और अनेक
कला-ज्ञानादि से संपन्न होगी। उस ग्रह स्थिति ने कन्या के सौभाग्य द्वार
तो खोल दिये, पर अष्टम मंगल ने उनके क्षणिक सौभाग्य पर अपनी घातक मोहर
लगाने में विलंब नहीं किया। वैधव्य उसकी कटु नियति बन गया।
बाल वैधव्य ! बाल विवाह कर कन्यादायग्रस्त माता-पिता, तब भले ही गंगा नहा
लें, उस समय की बाल विधवाओं का जीवन देख प्रियजनों को लगने लगता था कि
क्या कभी कुमाऊं की ये निर्दोष भोली बालिकाएँ, अपने अभिशप्त जीवन से मुक्त
होंगी ?