‘‘Yoga Psychology’’ स्वामी
अभेदानन्द महाराज की
एक असाधारण रचना है। श्रीरामकृष्ण वेदान्त मठ के प्रकाशन विभाग द्वारा
इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। स्वामी संशुद्धानन्द महाराज
ने हिन्दी अनुवाद किया है।
अध्यात्म पथ के पथिकों को विभिन्न तरह के दुरूह और जटिल अवरोधों के
सम्मुखीन होना पड़ता है। इन अवरोधों को पार करने के लिए राजयोग
के
साधकों को जिन वैज्ञानिक उपायों या पद्धतियों का सहारा लेना पड़ता है, वे
सारे उपाय पतंजलि के ‘‘’योग
दर्शन’’ नामक
ग्रन्थ में सूत्र रूप में लिपिबद्ध हैं। लेकिन जीवन में अनुशीलन के लिए
उनके विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या की आवश्यकता है, जो व्यास भाष्य में
मिलता है।
फिर भी, मन के विभिन्न स्तर पर अवस्थित अनेक साधकों के साधनाकाल
में, खास तौर पर वर्तमान युग के बुद्धिजीवियों के मामले में वह बिल्कुल
पर्याप्त नहीं है इसलिए सिद्ध-साधकों के अपने जीवन के अनुभव के आधार पर
प्राप्त प्रकाश में उनके नवीनतम विश्लेषण और व्याख्या की आवश्यकता को
अस्वीकार नहीं किया जा सकता। स्वामी अभेदानन्द महाराज ने पाश्चात्य देशों
में ‘Yoga Psychology’ शीर्षक पर अपनी व्याख्यानमाला
के
द्वारा पातंजल-योगदर्शन के सूत्रों का सहारा लेकर यही कार्य किया है। 1924
में अमेरिका में अंग्रेजी में प्रदत्त लगातार सोलह व्याख्यानों के माध्यम
से स्वामी अभेदानन्द महाराज ने आम लोगों के लिए यह अनमोल संपदा सुलभ कराई
है। हिन्दी भाषा में इसकी अतीव आवश्यकता महसूस की जा रही थी। अब तक इस कमी
को दूर करने में हम असमर्थ रहे, इसके लिए खेद है। साथ-साथ हमें इस बात की
खुशी हो रही है कि ‘योगदर्शन और योग-साधना’ ग्रन्थ
हिन्दी के
पाठकों द्वारा विविध कारणों से विशेष रूप से समादृत होगा।
इस संस्करण के लिए स्वामी प्रज्ञानानन्द महाराज ने एक बहुमूल्य भूमिका
लिखी है।
प्रकाशक
भूमिका
यह ग्रन्थ ‘योगदर्शन एवं योगसाधना’ श्रीरामकृष्णदेव
के अभिन्न
अन्तरंग पार्षद स्वामी अभेदानन्द महाराज लिखित है एवं योग से संबंधित नाना
महत्वपूर्ण ग्रन्थों में एक है। स्वामी अभेदानन्द महाराज विश्वविश्रुत
स्वामी विवेकानन्द के आह्वान पर 1896 ई. में पहले लन्दन एवं बाद में
अमरीका में पच्चीस वर्ष की लम्बी अवधि तक प्रचारक के रूप में रहे थे। वे
1922 ई. में भारत वापस आये थे। उन्होंने अमरीका में विभिन्न संस्थाओं में
योग के सम्बन्ध में चार सुदीर्घ भाषण दिये थे, जो बाद में ‘How
To
Be A Yogi, Yoga Psychology, Yoga Its Theory And Practice, True
Psychology’. नाम से ग्रन्थाकार में प्रकाशित हुए। ये चारों
ग्रन्थ
भारत में ही नहीं विश्व में सर्वत्र समादृत हैं।
Yoga Psychology अंग्रेजी ग्रन्थ का हिन्दी नाम योगदर्शन रखना उचित था,
किन्तु उसकी समग्र विवेचना की विषयवस्तु का अनुशीलन कर हिन्दी नाम रखा गया
है ‘योगदर्शन एवं योग साधना’, क्योंकि योग की विचित्र
विषयवस्तु के उपादान जीवन में साधना या प्रयोग और उनका वास्तविक प्रतिफल
छोड़कर योगानुशीलन की कोई सार्थकता ही नहीं रह जाती। वास्तव में शास्त्रों
में उल्लिखित विधि और पद्धति जब तक अनुष्ठानमूलक नहीं होती तब तक उनका
प्रत्यक्ष परिचय पाना असम्भव है।
स्वामी अभेदानन्द महाराज ने ऋषि पतंजलि प्रणीत पातंजल योगदर्शन के सामस्त
सूत्र, साधन एवं तत्वमूलक विषयों की विवेचना केवल पाश्चात्य देशों के लिये
ही नहीं बल्कि समस्त देशों एवं समाजों के जिज्ञासु एवं साधनशील लोगों के
लिये की है। उन्होंने ‘योग’ सम्बन्धी शिक्षा एवं
साधना की
विषयवस्तु का दार्शनिक एवं वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण सहज सरल भाषा में किया
है। कहने का तात्पर्य यह है कि योगदर्शन एवं योगशिक्षा के संपूर्ण विषयों
की विवेचना विचक्षण विज्ञानसम्मत विचारशैली और अपनी अनुभूति के
परिप्रेक्ष्य में की है।
स्वामी अभेदानन्द महाराज ने योगशिक्षा संबंधी सभी तत्वमूलक विचार एवं
विवेचना का अन्तर्निवेशकर इस ‘योगदर्शन एवं योगसाधना’
को सोलह
भागों में विभक्त किया है।
(1) सर्वप्रथम उन्होंने योगशिक्षा और साधना
के क्रमबद्ध
चरण का परिचय सोपान के रूप में दिया है। भारत के आध्यात्मशास्त्रों में
साधना में पूर्णता की प्राप्ति के लिये साधन पथ के क्रमिक स्वरूप का परिचय
देते समय ‘सोपानवत्’ शब्द कहा गया है अर्थात् क्रम से
एक-एक
स्तर पर साधना के पथ में अग्रसर होना पड़ता है जैसे सीढ़ी से छत पर उठते
हैं। इसीलिये उन्होंने पातंजल दर्शन में यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अष्टांग साधनों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
से विस्तृत परिचय दिया है।
योग का अर्थ पद्धति एवं धारा को जोड़ना है। योगसाधना के दो विषय, जीवात्मा
और परमात्मा, जीवन एवं ईश्वर, जीव और ब्रह्म—इनको संयुक्त करना
ही
योग है। योगसाधना में साधनशील मनुष्य को जीव रूप में ग्रहण किया गया है।
संसार में संघर्षशील मनुष्यमात्र ही जीव व जीवात्मा हैं। जीव अथवा
जीवात्मा में जो चैतन्य रूप में अधिष्ठित हैं एवं जिनकी सत्ता या अस्तित्व
से जीवात्मा की सत्ता एवं अस्तित्व सार्थक है वही परमात्मा (परम वा
श्रेष्ठआत्मा) हैं। अतः, साधारण रूप में योगसाधना का अर्थ एवं सार्थकता
यही जानने में है कि जीवात्मा का स्वरूप परमात्मा, चैतन्य, ज्ञानस्वरूप
ब्रह्म एवं विश्वव्यापी विराट चैतन्य है, एवं इसी तत्व की अनुभूति करनी
है। वासना-कामना-भोग के संसार में मनुष्य अपनी वास्तविक सत्ता एवं स्वरूप
के सम्बन्ध को विस्मृत हो गया है। योगसाधना उसी विस्मृति को दूर कर जीवन
के यथार्थ स्वरूप और महिमामय-शाश्वत-सत्ता से अवगत करा देती है। स्वामी
अभेदानन्द महाराज ने इस उपादान पूर्ण ग्रन्थ में यही कहा है।
(2) द्वितीय अध्याय की विवेचना में स्वामी अभेदानन्द महाराज ने योगसाधना
के मार्ग में आनेवाली विभिन्न बाधाओं एवं साधक द्वारा इन बाधा-विपत्तियों
को कैसे अतिक्रम कर अभिप्रेत लक्ष्य की प्राप्ति की जाय—इन सभी
के
सम्बन्ध में विस्तृत, सहज, सरल एवं सुबोध व्याख्या की है। इस अध्याय में
उन्होंने मन की वैचित्र्यपूर्ण प्रवृत्तियों एवं उन प्रवृत्तियों के निरोध
के उपायों की भी व्याख्या की है, इन प्रवृतियों का तात्पर्य मन के असंख्य
कर्म एवं चांचल्य से है। मन चंचल रहने पर मन योगतत्व की लक्ष्य वस्तु नहीं
जान पाता। इसलिये concentration or concentrated attention— मन
की
स्थिर और प्रशान्त अवस्था का प्रयोजन है। जिस प्रकार नदी का जल स्वच्छ न
होने पर नदी का तल नहीं देखा जा सकता, वैसे ही मन स्थिर न होने पर शरीर
में जो परमदेवता महाप्राणचैतन्य निवास करते हैं, उनकी सत्ता एवं स्वरूप के
सम्बन्ध में स्वच्छ धारणा एवं ज्ञान नहीं हो पाता। इसीलिए मन की शान्त
अवस्था लाभ करने के लिये परमात्मा या ईश्वर की चिन्ता को छोड़कर अन्य
समस्त विषयों की चिन्ता एवं ज्ञान का त्याग करना होगा।
इस विषय में स्वामी
अभेदानन्द महाराज ने, मन की अवस्थाओं—जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति
और
साथ ही साथ सुषुप्ति की प्रायः समान अवस्था समाधि का विश्लेषण दोनों
अवस्थाओं की तुलना एवं विचार के द्वारा किया है। यद्यपि समाधि जीवन का
लक्ष्य है तो भी विभिन्न सांसारिक वासनाओं के प्रलोभन में मनुष्य इस
लक्ष्य को भूल जाता है। इस प्रलोभन में मनु्ष्य को उसकी वासना-कामना ही
पागल कर देती है। योग साधना इसी वासना-कामना के कारण स्वरूप मन का दमन
करती है, इसे संयत करती है और अन्त में संकल्प-विकल्प रूप मन को चैतन्य
में परिवर्तित कर शान्ति प्राप्त कराती है। ऋषि पतंजलि ने पातंजल योगदर्शन
के द्वितीय सूत्र में योगसाधना की सार कथा कही है,
‘‘योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः’’।
भाष्यकार व्यास ने
‘‘निरोधः’’ का समाधि अर्थात्
समाधि में सकल
प्रवृत्ति वा चांचल्य दूर होकर मन को शान्ति मिलती है, ऐसा अर्थ किया है।
शान्ति इसी अवस्था में परमात्मा के स्वरूप की प्राप्ति होती है।
(3) तृतीय अध्याय की विषयवस्तु है योग
साधना में
बाधाविपत्ति तथा उनसे छुटकारा का उपाय योगाभ्यास। यहां स्वामी अभेदानन्द
महाराज ने मन या मन के स्वरूप को जानकर योगाभ्यास एवं सिद्धिलाभ के उपायों
की विवेचना की है। उन्होंने घृणा को जीतने के लिये दया और करुणा के भाव की
साधना, शरीर की अपेक्षा आत्मा ही प्रधान है, इसलिए इसी आत्मा के ज्ञान लाभ
के पथ में अनुकूल एवं प्रतिकूल अवस्थाओं को ग्रहण एवं वर्जन करने के
उपायों की व्याख्या एवं विश्लेषण किया है। ऋषि पातंजलि ने कहा है :
‘‘मैत्री करुणामुदिता उपेक्षाणां सुख, दुःख, पुण्य
पाप’’ प्रभृति, अर्थात् विरोधी भाव को अतिक्रम करके
किस
प्रकार समग्र प्राणियों को अपने समान प्रेम किया जाये एवं उसी प्रेम के
स्वच्छ आलोक में परमात्मा का दर्शन कर जीवन को कृतार्थ किया जाये, इन सभी
के सम्बन्ध में स्वामी अभेदानन्द महाराज ने विस्तृत विवेचना की है।
(4) चतुर्थ अध्याय में स्वामी अभेदानन्द
महाराज ने
प्राणविज्ञान अर्थात् प्राणायम के बारे में चर्चा की है। प्राणायाम माने
प्राणआयाम; आयाम का अर्थ है प्राणवायु संयमन और प्राण का अर्थ है
प्राणसक्ति वा जीवनशक्ति। स्वास-प्रश्वास की गति नियन्त्रित होने पर मन
संयत, शान्त और स्थिर होता है और यह स्थिर मन ध्यान और समाधि में सहायक
होता है।
(5) पंचम अध्याय में उन्होंने वैज्ञानिक
विश्लेषण की
धारा का अनुसरण कर प्राण वा जीवनीशक्ति की है। हमारी इड़ा और पिंगला नाड़ी
के मध्यस्थल में सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहमान है—जिसके मध्य
प्राणायाम
की सहायता से प्राणवायु को संचालित करके, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, अनाहत,
मणिपुर, विशुद्ध और आज्ञाचक्र का द्वार उनमुक्त होता है एवं प्राणशक्ति
सहस्रार चक्र में परम शिव परमात्मा के साथ एकीभूत होती है। इसी एकीभूत
होने को शिव और शक्ति का सामरस्यसाधन करते हैं। सामरस्य वा समरस का अर्थ
है एक ही सत्ता। इसी योग को योग एवं तन्त्र में जीवात्मा के साथ परमात्मा
का मिलन कहते है। इसी मिलन में जीव के साथ शिव रूप परमात्मा का बेदकारकृ
अज्ञान वा अविद्या का नाश होता है। इसी नाश का असल नाम है रूपान्तर
(Transformation)। तब अज्ञान ज्ञान में, बन्धन मुक्ति में एवं भेद अभेद
ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है।
(6) षष्ठ अध्याय में धारणा (concentration)
की विवेचना
की गई है। धारणा का अर्थ चंचल मन को बारबार एक लक्ष्य पर धारण या स्थिर
करना है। मन स्थिर होने पर ध्यान सिद्ध होता है। स्वामी अभेदानन्द महाराज
ने इस अध्याय में विवेचना में मन और श्वास-प्रश्वास के बीच सम्पर्क की बात
की है। उन्होंने कहा है कि मन से तात्पर्य मन की इति एवं नेति है। इसी
बिखरे मन को केन्द्र (आत्मा) में स्थिर करने के लिए बार-बार अभ्यास नाम
धारणा है। इस अभ्यास को हम प्रत्याहार भी कह सकते हैं। प्रत्याहार सार्थक
होने पर धारणा सार्थक होने पर ध्यान और ध्यान सार्थक होने पर ही समाधि
होती है। यहां उन्होंने प्रेम, निष्ठा एवं अभ्यास योग की कथा विशेष रूप से
कही है।
(7) सप्तम अध्याय में ध्यान की व्याख्या
है। ध्यान का
अर्थ है चंचल मन की स्थिरता या शान्त अवस्था। एकाग्र मन ध्यान एवं समाधि
की ओर प्रस्तुत बोता है। योगी गुरु की शिक्षा के अनुसार योगसाधनक
योगाभ्यास से शान्त मन की स्थापना करते हैं तब धीरे-धीरे मन ध्यान की
गहराई में प्रवेश करता है।
(8) अष्टम अध्याय में उन्होंने समाधि की व्याख्या की है। सम्प्रज्ञात,
असम्प्रज्ञात, सजीव, निर्जीव, सविकल्प, निर्विकल्प पभृति समाधि भेदों का
विश्लेषण किया गया है। असल में समाधि दो भेद हैं—सम्प्रज्ञात
एवं
असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात ही सविकल्प एवं असम्प्रज्ञात ही निर्विकल्प नाम
से परिचित हैं।