देश आजादी की स्वर्ण जयंती मनाकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है, पर
भारत नारी आज भी पितृसत्ता के किले में कैद पुरातन परंपराओं की कालकोठरी
में घुट रही है। स्त्री को हजारों साल से गुलाम बनाए रखने वाली पितृसत्ता
द्वारा उद्भूत हजारों साल से गुलाम बनाए रखने वाली पितृसत्ता द्वारा
उद्भूत तथाकथित ‘महान संस्कृति’ के खिलाफ रणभेरी गुंजाती
प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी की सुप्रतिष्ठित कथाकार मैत्रेयी पुष्पा के गहन
चिंतन को मुखर करते लेख संकलित हैं।
लेखिका ने इनमें बड़ी वेबाकी से औरत की गहन पीड़ा पर अपनी चिंता व्यक्त की
है। साथ ही प्रगतिशील होने का नारा देकर भी उसी मानसिक दासता में जकड़ी
आधुनिकाओं-फैशन परस्त तथा ‘सुंदर’ की प्रेमी ‘उच्चवर्णों’ की लेखिकाओं करवाचौथ का व्रत करने के लिए पुरुष के संकेत पर सदा की भांति अप्सरा की तरह सजने संवारने वाली राजनीतिक ‘बहनजियों’, मंत्रियों तथा अपने ‘सत्यवान’ की
मृतसत्ता को जीवत रखने के लिए सतत साधनारत, अनपढ़ अनगढ़ कलयुगी सावित्री
जैसी मुख्यमंत्रियों को भी नहीं बख्शा है।
‘मनुष्य की मूल रूप स्त्री’ को अपनी संपत्ति मानते हुए उसे
पशु एवं दलित बनाए रखकर मनमानी भोगने वाले पुरुषों के साथ-साथ सुख सुविधा
सत्ता भोगने की लालसा में भरसी श्रृंगार और विलास के मंच पर थिरकती औरत की
मानसिकता को भी अपनी पैनी दृष्टि से भेदती उधेड़ती लेखिका निरंतर दलदल में
फंसते समाज के समक्ष गंभीर चिंता की दिशा प्रस्तुत करती हैं, साथ ही प्रखर
चेतावनियां भी जारी करती हैं ‘खुली खिड़कियां’ में !
सामयिक प्रकाशन वर्षों से नारी विमर्श की दिशा में गहन चिंतन से भरपूर
उच्च कोटि का साहित्य प्रस्तुत करता आ रहा है। ‘खुली
खिड़कियां’ उसी क्रम में अगला महत्त्वपूर्ण सोपान है। निश्चय ही
यह
पुस्तक भी पाठक वर्ग को भारतीय नारी के संदर्भ में सही दिशा में सोचने के
लिए प्रेरित करेगी।
यदि युवा पत्रकार और अपने खास तेवरों की लेखिका मनीषा का आग्रहपूर्ण स्वर
मेरे आस पास न होता तो इस किताब का सृजन नहीं होता।
यह किताब रणभेरी गुंजाती ऐसी अस्मिताओं के नाम, जिन्होंने अपनी अंतश्चेतना
के झरोखों से उन औरतों की तकलीफें देखी हैं, जो पितृसत्ता के किले में आज
भी बंद हैं। कहने के लिए देश की आजादी की उर्द्धशतीमनाकर हम इक्कीसवीं सदी
में प्रवेश कर गए हैं !
अपनी बात
किताब की शुरुआत में मैं इतना ही कहना चाहती हूं कि यहां जो लेख लिखे गए
हैं, वे सदियों पुराने चलन से लेकर आज तक के समय से जुड़ते हैं। यदि कह
दूं कि इनकी विषयवस्तु हजारों सालों में फैली हुई है तो अत्युक्ति न होगी।
इस द्रोपदी के चीर से लंबे सिलसिले का सूत्र दो बातों से निकलता है-पहली
है पुरुष के खाते में शामिल शौर्य, वीरता, आक्रामकता, नियंत्रण और दमन की
अनिवार्यता तथा आकांक्षा, तो दूसरी बात है स्त्री से त्याग, क्षमा,
सहनशीलता, उदारता और ममता की आग्रहपूर्ण जिद। हो सकता है यह सब पुरुष और
स्त्री के शारीरिक गठन और रचाव के कारण रहा हो, मगर यह है अधूरा सिद्धांत
ही, जिस पर लोगों ने पूरा विश्वास दिखाया है।
पुरुष अपने गौरव पर प्रसन्न है, मगर स्त्री क्या सोचती है, इस पर किसी ने
गौर नहीं किया। बस मान लिया कि वह सोचने की शक्ति से वंचित है, क्योंकि
सबके साथ उसे भी मालूम है कि उसके दिमाग (यदि है तो) से उसकी देह ज्यादा
महत्त्वपूर्ण है, जो सृष्टि आधारभूमि है। भूमि कोई भी हो, कैसी भी हो, कभी
भी हो सदा अपने कर्ता के कब्जे में रहती है। फिर कब्जे में रहने वाली चीज
भला अपने बारे में क्या सोचेगी और क्यों सोचेगी ? उसके लिए फैसले लेने
वाला उसका कर्ता, नियामक नियंता ही होता है। इस महान भावना के आघार पर
स्त्री को अपने लिए कुछ करने से पहले, अपने लिए कुछ सोचने के अधिकार से
काट दिया गया। ऊपर से हमारे धर्मों ने इस कोटि में आने वाले विचारों और
क्रिया-कलापों की पवित्रता का नीर क्षीर किया और ऐसे मंत्र श्लोक, स्मृति
और सूत्र दिए, जिनके अनुसार चलना ही मनुष्य धर्म माना गया है। और यही चलन
हमारे समाज का स्वरूप ढालने लगा।
यदि आज मैं और मेरी जैसी स्त्रियां ऐसे धार्मिक और सामाजिक पक्ष को चुनौती
देती हैं, तो हमारा यह कृत्य समाज विरोधी, धर्म विरोधी और कुल मिलाकर महान
सांस्कृतिक परंपरा विरोधी ठहराया जाता है। स्त्री द्वारा चाही जाने वाली
समानता, जिसे वह अपनी स्वतंत्रता भी कह सकती है, सिरे से पश्चिम से आयातित
उच्छृंखलता से जोड़ दी जाती है। ‘उच्छृंखलता’ शब्द की
आड़ में
वे सारी रूढ़ियां खारिज होने से बच जाती हैं,
जिनके आधार पर स्त्री को उन
सारे कार्यों के लिए अयोग्य होने से बच जाती हैं, जिनके आधार पर स्त्री को
उन सारे कार्यों के लिए अयोग्य तथा कमजोर ठहराया गया है, जिन कार्यों के
दम पर पुरुष को मालिक माना जाता है। अव्वल स्थान पर गिने जाने वाले पुरुष
की हिमायत भी नहीं करनी पड़ती। दिलचस्प बात यह भी है कि हमारे विद्वान और
मनीषी कहे जाने वाले पुरुष अपनी ज्यादातर बातों को पश्चिमी देशों के
लेखकों, दार्शनिकों और समाज सुधारकों से जोड़कर पेश करते हुए गर्वित होते
हैं, मगर पश्चिम की स्त्रियों से यदि भारतीय स्त्रियां जुड़ती हैं तो
उन्हें अपमानित करते हैं। संभवतः वे समझ रहे हैं और आशंकित हैं कि
इक्कीसवीं सदी तक आते आते स्त्री स्वतंत्रता का आंदोलन विश्वव्यापी स्तर
पर आ गया है, जिसमें भारतीय स्त्रियां भी एकजुट होकर शामिल हैं।
स्त्री और पुरुष की शारीरिक रचना का विज्ञान बताने की जरूरत नहीं, आज वह
बहुज्ञात मामला है। कहना यह है कि पुरुष के मुकाबले कोमल तन लेकर जन्म
लेने वाली स्त्री को कमजोर मन की स्वामिनी भी क्यों मान लिया जाता है
?’ जबकि उसको शरीर को भी कोई अतिरिक्त सहूलियत नहीं मिलती। कठोर
दैहिक श्रम से गुजरती हुई वह लगभग और प्रसव जैसे कठिन कार्यों को पार जाती
है। अपने खून को दूध में परिवर्तित करने की नैसर्गिक प्रवृत्ति द्वारा
मनुष्य के बच्चों को पालने और विकसित करने का शौर्य दिखाती है। कहा जा
सकता है कि ये प्रवृत्तियां तो पशु में भी होती हैं, तब क्या पूछना नहीं
चाहिए कि मनष्य के मूल रूप नारी को क्या इन्हीं नैसर्गिक प्रवृत्तियों के
आधार पर पशु जैसे जीवन से जोड़ दिया गया है ? वह पुरुष के लिए पशु की तरह
ही जीवन भर खटती है। और उसका सिर हिलाना मर्यादा तथा शील के विरुद्ध माना
जाता है।
बस यहीं से हमारा मत भेद शुरू होता है और तब पुरुष बिरादरी को आश्चर्य
होता है कि स्त्री सोचती भी है ! अचंभा भी स्वाभाविक है, क्योंकि विचार का
क्षेत्र शुरू से पुरुषों के लिए आरक्षित रहा है। हमारे देश में ही नहीं यह
धारणा कमोबेश श्रेष्ठतर चिंतन से वे भारतीय मनीषा को समृद्ध करते रहे हैं,
अगर हम कहते हैं
कि हमारे मनीषियों का चिंतन मनन पक्षपात पूर्ण रहा है,
इसलिए ही अन्याय का सेहरा उनके सिर है। इस बात से उन्हें गुरेज नहीं करना
चाहिए और अपनी अतार्किक अवधारणा को खारिज होते देखने के लिए तैयार रहना
चाहिए। अजीबोगरीब-सा तर्क है कि स्त्री के पास विचार नहीं होते, हां,
अनुभव हो सकते हैं, मगर इससे वह बुद्धि की स्वामिनी नहीं हो जाती।
मगर गौर से देखिए, गहराई से सोचिए, उस गहराइ से, जिस गहनता का दावा आप
करते हैं तो पाएंगे कि अनुभव से ही विचार का जन्म होता है। किसी विचार से
अनुभव पैदा नहीं होता। चिंतक लेकिन इस ओर ध्यान नहीं देते तो फिर स्त्री
लिए जीवनगत नियमों का जो सिलसिला चलता रहा है, वह रूढ़ियों और कुरीतियों
की रक्षा करता है। कसावट का यह ढर्रा ही उसे आजाद नहीं होने देता। फिर
हमारे नियामक नियंता पक्षपातपूर्ण रवैये और स्वतंत्रता विरोध के अपराधी
माने जाएंगे। ठीक उसी तरह जैसे स्त्री अपने ऊपर लागू कड़े आडंबरों की बाड़
लांघकर अपराधिनी घोषित होने के लिए बाध्य की जाती है।
मालिकों को क्रोध जल्दी आता है, क्रोध भी कम खूंखार नहीं होता। शायद इसी
क्रोध के कारण स्त्री की कमाई हुई उपलब्धियों को श्रेय देने के बजाय उसके
चलन को कठघरे के हवाले कर दिया जाता रहा है। क्या किया जाए, दरअसल धार्मिक
विश्वास, सामाजिक भावनाएं और संस्कारों की दीक्षा पीछा नहीं छोड़ते।
स्त्री का दिया गया बड़े से बड़ा तर्क स्त्री की तथाकथित कमजोरियों से
जुड़कर झूठा लगने लगता है और वे इक्का-दुक्का बौद्धिक लोग बेहूदा और
व्याभिचारी मालूम होते हैं, जो स्त्रियों के पक्ष में अपना मत देते हैं।
लेकिन कोई बात नहीं, ये सब पुरुषों की व्यावहारिक आदतें हैं। स्त्री उन
आदतों के खिलाफ जाकर उनसे लचीलेपन की उम्मीद लगा बैठती है क्योंकि खुद
लचीलेपन से गुजरी है। मनुष्य के रूप में जन्म वाली मनुष्य से समानता की
अपेक्षा रखने लगी है, यही उसका आधुनिक रवैया है। पितृसत्ता के किले की
दीवारों में उसने खतरों से खेलते हुए यत्नपूर्वक कुछ झरोखे खोल लिए हैं और
अपनी चेतना के बलबूते देखा है कि रीति रिवाजों का रूप ऐसी कुरीतियों की
तसवीर है, जिसमें स्त्री का तबाह जीवन दिखाई देता है। पुराने विश्वास
अंधविश्वासों में ढल गए हैं, यह बात बड़ी आसानी से समझी जा सकती है। चेतना
संपन्न स्त्री आज ऐसी ही चेतावनी बराबर दे रही है।
यदि आप इन चेतावनियों को नहीं मानेंगे या उसके कहे सुने पर गौर नहीं
करेंगे तो अपने दर्शन और सिद्धांतों को गढ़ते हुए खुद ही पिछड़ जाएंगे।
पिछड़ जाने वालों के लिए गायब हो जाने की स्थिति आने में देर नहीं लगती।
तब फिर ?
फिलहाल तो इस पुस्तक में दिए गए लेखों में कुछ चिंताएं हैं और कुछ
चेतावनियां...
सी-18-बी, डी.डी.ए. फ्लैट्स मुनीरिका
नई दिल्ली-67
मैत्रेयी पुष्पा
पति की जाति का पट्टा
कुछ स्त्रियों के नाम हैं-सीमा अरोड़ा नी चढ्ढा, रति अग्रवाल नी खंडेलवाल,
वंदना भारद्वाज नी वशिष्ठ। ये नाम यह मुनादी करते हुए मेरे सामने हैं कि
सीमा चढ्ढा अब श्रीमती सीमा अरोड़ा हो गई हैं, तो रति खंडेलवाल अब श्रीमती
रति अग्रवाल हैं। इसी तरह वंदना वशिष्ठ श्रीमती वंदना भारद्वाज हुईं। जाति
ग्रोत्र बदलने का यह विधान असल में विवाह की शर्त हैं,
जो लड़की पर लागू
होती है। यह परंपरा आज की नहीं, प्राचीनकाल के गोमुख से इस दिव्यता का
सोता फूटा है, जो इसी रूपी में स्त्री सम्मान को सींच रहा है। वैसे
धर्मगुरुओं ने स्त्री को धर्म समझने के काबिल नहीं माना। हां, धर्मदंड
धारण करने का पात्र अगर माना है, तो उसी को माना है। यह स्थापित भी किया
है कि उस धर्मचारिणी की तपस्या से स्वर्ग के देवताओं के आसन हिले हैं और
जब आसान हिले हैं तो परम तेजस्वी पुरुषों ने भी धर्मगुरुओं से यह
प्रार्थना की है कि उनके गृहस्थ की धुरी स्त्री है। उसको छोटी-मोटी पदवी
दे दी जाए तो काम सुलभ हो जाए, और वह तप में पिघल-पिघलकर परिवार को जोड़ती
रहे।
स्त्री-तप के सबूत में ‘सती’ का नाम सर्वोपरि है,
जिसने अपने
पिता द्वारा पति का अपमान किए जाने पर अग्नि में प्रवेश किया था। धर्मगुरु
मन ही मन मुसकराए, ऐसी बेवकूफी तो स्त्री ही कर सकती है। लेकिन धर्मगुरुओं
ने घोषणा यही की कि पुरुष प्रतिष्ठा में स्वयं को होम करने वाली स्त्री
वंदनीय है। तब धर्मगुरुओं ने अनेक ऐसी कथाएं प्रचारित कीं जैसे शिवजी सती
के मृत शरीर को लेकर जगह-जगह घूमे। जहां-जहां सती के अंग गिरते गए,
वहां-वहां तीर्थ स्थल बने। स्त्री सम्मान का यह नुस्खा धड़ल्ले से चला।
इसी दृष्टांत को सामने रखकर स्त्रियां अपने उस पितृकुल के विरुद्ध खड़ी हो
गईं, जहां उन्हें प्रथम नागरिकता मिली थी। इसी दृष्टांत के बलपूते पर
हिमालय पुत्री पार्वती ने निर्जल, अर्पण तपस्या की। तपस्या का फल मिला तो
सती वाले फल से भिन्न तथा नितांत मौलिक था। शंकर का नाम गौरीशंकर हुआ। इसी
तर्ज पर सीताराम, राधेश्याम जैसे नाम आए। बात आगे बढ़ी कुंती का पुत्र
कौंतेय हुआ, राधा का राधेय और सुमित्रा का सौमित्र। स्त्री अपने सम्मान के
भार से आपाद झुक गई। अहसान खून में घुलने लगा। यही संस्कार बनता गया।
अब
वह उस हिंदू पर भी, जहां पिता कन्या को परायी अमानत के सिवा कुछ समझता न
था और लड़की अपने परिवार से कटी बेल की तरह मुरझाने के अलावा कुछ कर नहीं
सकती थी-भले शंकर महादेव के कंधे पर पड़ी रहे। ताज्जुब नहीं कि स्त्री का
इतिहास सती-परंपरा की अमरबेल का चबाया हुआ है। वह पतिनाम-धारिणी सम्मान की
कड़ियों से बनी सांकल में बंधती चली गई। हमारा अज्ञान भी तो देखो कि उन
जंजीरों में बंधे हुए लगातार स्त्री-आजादी का शंख फूंक रहे हैं और ताज्जुब
कर रहे हैं कि शंख की आवाज लौट-लौट कर क्यों आ रही है ?
मानसी मनोज, शगुफ्ता अनवर, मोनिका विलियम्स जैसे नाम साफ तौर पर बताते हैं
कि स्त्री की मानसिक गुलामी हमसे छल कर रही है। नहीं तो शिक्षा-दीक्षा
में, ज्ञान-विवेक में और पद-पदवी में बराबर की दावेदारी करने वाली स्त्री
विवाह होते ही पैंतरा क्यों बदल देती है ? इंजीनियर, डॉक्टर राजनीतिज्ञ या
व्यावसायी औरत पुरुष का वरण करते हुए पति का नाम या जाति-कुल-गोत्र
राजनीतिज्ञ औरत पुरुष का वरण करते हुए पति का नाम या जाति कुल गोत्र धारण
क्यों कर लेती है ? क्या इसलिए कि खुशामदपसंद पुरुष वर्ग औरत के इस समर्पण
को उसका बेशकीमती गुण मानता है ?
इसी खुशी में सुरक्षा प्रदान करता है ?
नहीं, याद तो उसको यह भी होगा-राम का नाम धारण करने के बावजूद सीता का
क्रमशः अग्निपरीक्षा वनवास और भूमि प्रवेश मिला था। राधा को बिछोह के सिवा
क्या मिला ? पार्वती शिव को पुत्र दे सकीं, दूसरी उपलब्धि क्या है ? क्या
आज की स्त्री ने ऐसे दुःखों को औरत की नियति मान लिया है ? नहीं, तो दूसरे
परिवार में प्रवेश करती हुई वह धर्म और संस्कृति की परंपरा से आक्रांत
क्यों है ? आडंबर की आदत बजूद का हिस्सा बन जाती है और यहीं से उसका सारा
जीवन पुरुष के लिए पूजाओं का उत्सव हो जाता है। भक्ति करते-करते कब अंध
भक्ति के हवाले हो जाती है, पता ही नहीं चलता। यदि होश में रहती तो जरूर
सोचती के साथ फेरे के साथ सात वचन भरने वाले जोड़े में से पुरुष ने उसके
लिए अपना क्या त्यागा है ? वह आज से लेकर आजन्म अपने पिता की बल्दियत से
जुड़ा रहेगा,
जो उसकी जड़े हैं। वह पत्नी के गोत्र से घृणा करता है,
क्योंकि उसे नीचा मानता है और कभी भी उसमें शामिल नहीं होता।
यदि स्त्री होश में होती तो जरूर सोचती कि उसके विलय पर परिवार और समाज
एकमत क्यों हैं ? क्या वह आत्महत्या करके पति के कुल गोत्र या उसके नाम के
साथ मिलाई गई है ? अब उसे किस रूप में पुनर्जीवित होना है ? सती के रूप
में या सीता के रूप में ? इसीलिए लड़की के उस वजूद का खात्मा करना जरूरी
है जो पिता के घर अपेक्षाकृत ज्यादा मुखर था, ज्यादा चौकन्ना था। उस
चौकन्नेपन के खात्मे के समोरोह को महिमा-मंडित करना खालिस वही मामला है,
जिसे अंग्रेजीदां लड़कियां ‘हिप्पोक्रेसी’ कहती हैं
और इस छूत
की बीमारी से बच नहीं पातीं। कैसे बचें, यह विलय तो विवाह संस्था का पहला
और अनिवार्य नियम माना गया है, इसी के जरिये परिवार के पुरुष और पुरोहित
मिलीभगत का खेल खेलते चले आ रहे हैं। नहीं तो समझदार और विवेकशील
नवयुवतियों की जीवन पद्धति को कैसे कील पाते ? किस तरह शिक्षित स्त्री को
पति के खूंटे से बांधते ?
चक्करदार घेरे की उलटगति यह भी कि अब यह भी कि अब यह कुचक्र गांवों की ओर
रुख कर रहा है। गांवों में जातियों के कठिन दायरे तो रहे हैं, मगर स्त्री
से कुल-गोत्र का नाम पूछने पर ही पता चलता है। किसी स्त्री के नाम से
मुनादी नहीं होती कि वह किस जाति की है। अकसर तो उसको उसके मायकेवाले गांव
के नाम के साथ पुकारा जाता है, जैसे
मधोपुरावाली मड़ोरावाली। लेकिन अब यह
रीति पुरानी पड़ने लगी। क्योंकि गांव से जो लोक शिक्षा, नौकरी उद्योग या
राजनीति के लिए शहर आ रहे हैं, वे शहरोंवालों की देखादेखी अपने नाम, जाति
कुल गोत्र की तख्ती बनवाकर गांव ले जा रहे हैं कि अपनी स्त्रियों के गले
में लटका दें। माधोपुरावाली का नया संस्करण हुआ है-सीता सेंगर और
मड़ोरावाली लड़की हो गई है गंगा यादव, सुमन को सुमन विजय किया गया है।
क्या तो गौरव का विषय है, गंवई औरतें एक ही तमगे से
अंतरराष्ट्रीय सभ्यता
में छलांग लगा गईं कि अपने पुरुष के लिए, पुरुष की जाति के लिए पुरुष के
धर्म के लिए उत्सर्ग होना उन्हें धर्म के रूप में सिखाया गया। यदि सही
शब्दों में कहा जाए तो ऊपर से नीचे तक की संरचना में स्त्री के
‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ की सौदेबाजी का कौशल दिखाई देता
है।
कुत्ते के गले में जिसका पट्टा होता है, कुत्ते की वफादारी का मालिक वही
होता है। मालिक एक क्षण के लिए भी बेवफाई बरदाश्त नहीं करता, सीधे गोली से
उड़ा देता है। कुत्ते को या कुत्ते के लिए शिकायत करने का अधिकार भी क्या
है ?
कुत्ते और स्त्री की नस्ल में तो जमीन-आसमान का अंतर है। मनुष्य की मूल
रूप नारी से कौन कहता है कि मालिक के नाम का पट्टा पहन ले ? औरत के मुंह
में नुकीली सांग यहीं धंसी दिखती है, वह विवाह से मिले मालिक और मालिक के
परिवार की इच्छा के आगे बोल नहीं सकती, क्योंकि नियम है कि जो स्त्री कुल
गोत्र बदले बिना वैवाहिक जीवन जिएगी, उसकी वफा भरोसेमंद नहीं होती। उसकी
आस्था पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, चाल चलन से बगावत की बू आती है, क्योंकि
उसने अपना विलय करने से इनकार किया है।
क्या समाज का अभिजात हिस्सा औरत के वजूद को कुचलता, रौंदता अखंड परिवार की
झंडी का बांस उस स्त्री की पीठ में नहीं गाड़ता, जिसे विवाह मंडप में
बिठाकर सुहाग बख्शा है ? क्या हमारे सामने यह वह स्त्री पीढ़ी है जिसको
हमने जीवन दांव पर लगाकर नए ढंग से विकसित किया है ? आगे वाली पीढ़ी इस
आधुनिकतम दिखने वाली स्त्री को कौन-सी आजादी अर्जित करते देखेगी, जिसने
अभी तक अपनी गुमनामी गले लगा रखी है ? वह जरूर पूछेगी, यह आजादी, कहां तक
आजादी है ?
स्त्री की धार्मिक यात्रा
राजधर्म की दुहाई देने वाले क्या समझते नहीं कि दरबार में धर्मराजों को
अकसर चुप्पी साध लेनी पड़ती है, क्योंकि यहां धर्म, (करुणा उदारता और
मानवता) धर्म के सहिष्णु आधार पर नहीं चलता, उग्र ताकतों के इशारे पर
नाचता है, भले ही चिंतन मनन और निरपेक्ष धार्मिकता का अनुकरण का भ्रम देते
हुए अंतरात्मा की दुहाई दी जाए। फिर भी इसमें क्या संदेह है कि हम मानवता
के नारे के नीचे हिंदू मुस्लिम, सिख ईसाई हैं। हम मनुष्य नहीं, अलग-अलग
धर्म हैं। अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग महंत, पैगंबर, गुरु और फादर माने गए
हैं और लोग उनके तंबुओं तले खड़े दिखाई देते हैं। प्रेम का प्रतीक धर्म
सबका सिरमौर है, मगर अपने विस्तार की लालसा धर्म भी नहीं छोड़ता अतः वह
ताकतवर और कमजोर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक जैसे खांचों में बंध जाता है।
जाहिर है कि हिंदुस्तान के ब्रह्मांड में जलवायु आकाश और धरती से लेकर तीन
मालिक देवताओं के साथ तैंतीस करोड़ छोटे-बड़े देवों की उपस्थिति बताई जाती
है। इस अनुपात में मुस्लिम सिख और ईसाइयों के पैंगबर, गुरु और फादर लोग
अल्पसंख्यकों में ही आ जाते हैं। यों तो हम अपने देवताओं और धार्मिक
मान्यताओं के साथ दया, करुणा, परदुःखकातरता के चलते संकटमोचन की भूमिका
में रहना पसंद करते आए हैं और भेदभाव को परे धकेलते रहे हैं, लेकिन अपनी
सुदृढ़ स्थिति के बरक्स दूसरे को भी सुदृढ़ पाते ही हमारी धर्मनिरपेक्षता
ऐसी अपेक्षा में बदलने लगती है, जिसे ताकतवरी कहते हैं। कोई भी ताकत शासन
करना चाहती है, अतः हमारे हिंदुस्तान में ‘हिंदू
धर्म’ उस
ताकत का पर्याय बन गया है, जो राजाओं की सेना में होती है, सेना के
हथियारों में होती है और हथियारों के लोहे में होती है।
इन दिनों हम धर्म का लोहा मान रहे हैं, कौन कहता है कि धर्म जीवन की गति
को लय देने वाला होता है ? लौकिक भवबाधा का प्रतीक आम आदमी भयभीत हुआ धर्म
को रास्ता दे रहा है, क्योंकि अस्त्र-शस्त्र लिए अक्षौहिणी सामने है,
जिसका नाम भी धर्म बताया जा रहा है और भारतीय आदमी उस अलौलिक, अमूर्त
शक्ति की बाट देख रहा है, जिसे संत-महंत-स्वामी-जोगियों ने परमात्मा कहा
था, रक्षक माना था और कृपासिंधु बताया था। वह कृपासिंधु कहां हैं ? लोगों
के दिल में निवास करता है, यही धारणा लेकर व्यक्ति धर्म से प्रेम करता है।
लेकिन यहां प्रेम नहीं, भय ने जनमानस जकड़ लिया है। तो अब धर्म में किसकी
आस्था रह जाएगी ? ऐसे ही जैसे धर्म के द्वारों को घेरे बैठे ऋषि मुनियों
में मनु और याज्ञवल्क्य सरीखे विभाजनकर्ताओं ने मनुष्य धर्म को
वर्णाश्रमों में बांट दिया और ब्राह्मण-वैश्य-क्षत्रियों के बीच सारी
खुदाई उलीच दी। व्यवस्था के पुरोधाओं ने जब देखा कि अभी तो आधे से ज्यादा
लोग बचे हैं, तब उन्हें इन तीन वर्षों के मुट्ठी-भर पुरुषों की सेवा का
भार सौंपकर उनका वर्ण अलग किया और सृष्टिगत स्त्रियों की आधी संख्या को
नजरंदाज करते हुए उन्हें भेड़ों की तरह पुरुषों के बाड़ों की ओर हांक
दिया। वाह रे राजधर्म और समाजधर्म के विधान ! शूद्र और सभी भौंचक्के से
देखते रह गए। मगर जब महंतों से पाई हुई ताकत के पुतले उठे और हांका लगाने
लगे तो सेवा के लिए नियुक्त चाकर अपनी देहों की खैर मनाते हुए सेवा में
जुट गए। मगर सेवक लोग आपके इस कोड़ेबाज धर्म में आस्था भी रखते हों, यह
खामखयाली हो सकती है।
मैं यहां स्त्री धर्म के विधान पर बात करूंगी, क्योंकि यह धर्म शूद्र को
बताए गए उसके सेवा धर्म से भिन्न है, क्योंकि इसका आधार वर्ण नहीं, जाति
नहीं, व्यवसाय नहीं, शुद्ध लैंगिक भेद है। स्त्री को पुरुष के ब्रह्मचर्य
से लेकर गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास जैसे आश्रमों की सुविधा देने के लिए
मुस्तैद रहना पड़ता है। साथ ही पुरुष की सेवा के लिए जीवन की नैसर्गिक
छूटों को स्वामी के खूंटों से बांधा गया है। उसे धन जमा करने की मोहलत
नहीं, पति की आज्ञा के बिना हिलने-डुलने की छूट नहीं। वह संतान पैदा करने
और उसे पालने से लेकर पुरुष के लिए उत्तम रति के हवाले होती है।