25 अप्रैल, 1941 को बर्लिन रेडियो से अचानक सुभाष बाबू की वाणी सुनकर
हिंदुस्तान में लोग खुशी से नाच उठे।
‘‘इतने बड़े संसार में हमारा एक और केवल एक ही शत्रु
है-ब्रिटिश साम्राज्य। इस समय वह युद्ध में घिरा हुआ है। अगर वह इस जंग
में जीत गया तो उसकी शक्ति पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी और वह हमारे देश
को क़तई आज़ाद नहीं करेगा। इसके विपरीत, अगर वह हार गया तो उसे मजबूरन
अपना विस्तार समेटना पड़ेगा। याद रहे, पिछले महायुद्ध को अंग्रेज़ों ने
हमारी सहायता से जीता था, परंतु उसका पुरस्कार हमें अधिक दमन व जनसंहार के
रूप में मिला। इस बार हमें उस यह ग़लती को नहीं दोहराना। हर हिंदुस्तानी
का यह धर्म है कि मौक़े का लाभ उठाकर दुश्मन की हार का हर संभव उपाय ज़रूर
करे। यही काम आपको देश के अंदर रहकर करना है और यही काम करने के लिए मैं
देश से बाहर आ गया हूं। लक्ष्य हम सभी का एक है तथा एक ही होना
चाहिए।’
भूमिका
यह इस उपन्यास का, तनिक परिवर्धित, दूसरा संस्करण है। पहले संस्करण ने
निर्विवादित रूप से साबित कर दिया था कि जिस आयु वर्ग के निमित्त यह लिखा
गया, उसने इसे हाथों-लिखा लिया। यह दावा मैं लेखक के तौर पर नहीं, बल्कि
एक पेशेवर लायब्रेरियन की हैसियत से अपने निजी अनुभव के आधार पर कर रहा
हूँ। मैं अपनी सनक के तहत बनारस यूनिवर्सिटी से पुस्तकालय विज्ञान में
डिप्लोमा करने के बावजूद एम.एम.एच.(पोस्ट डिग्री) कॉलेज, गाजियाबाद से
आग्रपूहर्वक त्यागपत्र देकर, बिना सरकारी या बढ़िया नौकरी का मोह किए,
सीधा रामजस सी.सै.स्कूल नं.4 नई दिल्ली में इसलिए जा लगा कि अपने सोचे हुए
साँचे में ढालने के लिए मुझे कच्चे लोहे की तलाश थी। कॉलेज स्तर के बच्चे
प्राय: परिपक्व होते हैं जबकि मैं उन बच्चों में रहना चाहता था, जिनकी
आदतें अभी सँवर या बिगड़ रही होती हैं।
उन दिनों अंग्रेजी आदि भाषाओं से अनुवादित सिंदबाद जहाज़ी, सुनहरी तीर,
समुद्री लुटेरे या स्वर सुंदरी की दर्जनों प्रतियाँ पुस्तकालय में थी,
जिन्हें बच्चे बड़े चाव से पढ़ते थे। ऐसे में अगर उन्हें गांधी, नेहरू,
सुभाष, भगतसिंह या हरदयाल की जीवनी देना चाहो तो उनका मुँह साफ़ तौर पर
लटक जाता। शरम या भय से अगर ले भी लेते तो सात दिन बाद स्पष्ट दिख जाता कि
बिना पढ़े ही लौटा रहे हैं। तभी मुझे सूझा कि अगर महापुरुषों की जीवनियों
को कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो बच्चे अवश्य रुचि लेंगे। उन्हीं
दिनों मैंने भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के लिए सुभाष बोस चित्रावली पर
काम लिया था और उन्हीं पर एक वृहत् टी.वी. सीरियल की तैयारी में भी था। अतः सुभाष के जीवन के अत्यंत रोमांचक अंशों पर आधारित यह उपन्यास लिख डाला।
मेरे पुस्तकालय में इसकी पांच प्रतियाँ आई। कुछ ही दिनों में स्थिति यह
हो गयी कि हर बुक कार्ड के साथ बच्चों के मांग-पत्र सदा नत्थी रहने लगे।
अगर पुस्तक मेरी ही लिखी हुई न होती तो निसंस्कोच मैं 5-10 प्रतियाँ और
मँगा लेता, क्योंकि माँग लगातार बढ़ रही थी। यहाँ मैं उल्लेख कर दूँ कि
पुस्तक के लेखक के रूप में मेरा वह नाम नहीं था, जिस नाम से छात्र मुझे
जानते थे।
बावजूद संकोच के मैंने जो थोड़ा-सा निजी विवरण ऊपर दिया है वह मात्र अपने
दावे की पैरवी के तौर पर देना पड़ा है। आशा करता हूं, इसे अन्यथा न लिया
जाएगा।
पहले संस्करण में छपाई की बेशुमार अशुद्धियों तथा साज-सज्जा की भारी कमी
ने मुझे बहुत व्यथित किया था। तभी से कामना थी कि मैं इसे किसी प्रतिष्ठित
संस्थान से पुनः प्रकाशित कराऊँ। मगर कुछ उलझनों के कारण अपनी मुराद जल्दी
पूरी न कर सका। अब जबकि यह फिर मुद्रित हो रहा है तब कहा जा सकता है कि
देर आयद, दुरुस्त आयद’, क्योंकि अब इसे सचमुच ही एक प्रतिष्ठित
संस्थान आपके पास पहुँचा रहा है।
सुदर्शन कुमार चेतन
फ़रारी
घुप अँधेरी रात,
ख़ामोश शहर,
गहरा सन्नाटा और
ठंड से दुबककर ऊँघते पहरेदार।
एलगिन रोड की कोठी नंबर 38/1 के एक कमरे में से मुसलमानी लिबास पहने,
दाढ़ी वाला एक आदमी निकला, लंबे बारजे को तेजी से पार करता हुआ घर के
पिछवाड़े कूदा, भागकर सड़क पर आया, जहाँ काले रंग की एक कार पहले से ही
तैयार खड़ी थी। फुर्ती से वह उस कार में घुसा और कार फर्राटे से सड़के पर
भागने लगी।
यह 16 जनवरी 1941 की घटना है और शहर है कोलकाता, जो उस समय
‘कलकत्ता’ कहलाता था।
इस प्रकार रहस्यपूर्ण ढंग से निकलने वाला यह आदमी कोई साधारण व्यक्ति नहीं
था, बल्कि अंग्रेज़ी हुकूमत के सबसे बडे़ दुश्मन निर्भीक, साहसी
दृढ़निश्चयी तथा वीर स्वाधीनता सेनानी सुभाषचंद्र बोस थे। वे अंग्रेज़ी
सरकार की सी.आई.डी. को धता बताकर तथा घर के पहरे पर बैठी पुलिस की आँखों
में धूल झोंककर फरार होने के विचार से ही इस प्रकार निकल रहे थे।
सुभाष की यह फ़रारी फ़िरंगी सत्ता की मौत की तैयारी थी।
वे इस समय खाली हाथ अवश्य थे, परंतु उनके मन-मस्तिष्क में एक योजना थी कि
एक विशाल सेना बनाकर बम, गोलों तथा टैंकों व जहाजों की मदद से अंग्रेज़ी
सरकार पर देश के बाहर से हमला किया जाए। दरअसल वे गोरों की सरकार पर युद्ध
द्वारा विजय प्राप्त करना चाहते थे।
बचपन में ही एक प्रश्न सुभाष को बार-बार उलझा लेता था। वे बैठे-बिठाए
प्राय: सोच में पड़ जाते थे कि उनका जन्म किसलिए हुआ है ? विशेष रूप से जब
माता-पिता के आठ बच्चे पहले से थे तब वे नौंवी संतान बनकर क्यों पैदा हुए
? वे गुपचुप बैठकर सोचते और माँ काली से पूछते-‘‘बताओ
माँ !
मेरा जन्म क्यों हुआ ?’’ वे जब भी काली से पूछते तभी
अंतर्मन
से एक उत्तर उभरता-‘‘उस विशेष प्रयोजन के निमित्त
जन्मे हो।
तुम्हें एक महान् कार्य का बीड़ा उठाना है।’’
और वे सोचने लगते थे कि कौन-सा महान् कार्य होगा, जिसका बीड़ा उठाने के
लिए मेरा विशेष रूप से जन्म हुआ है।
सुभाष अभी कोई आठ वर्ष के ही थे कि उनके स्कूल के हेडमास्टर वेणी माधव जी
ने उनके हृदय में देशभक्ति और त्याग की भावना कूट-कूटककर भर दी थी। वे
रह-रहकर देश में घटने वाली घटनाओं से विचलित हो जाते थे। एक बार तो एक
गोरे प्रोफेसर की पिटाई के जुर्म में तीन साल के लिए कॉलेज से निष्कासित
भी हुए। यह अंग्रेज़ प्रोफेसर हिंदुस्तानियों का अपमान करने व उनको
गालियाँ बकने में ही अपनी शान समझता था।
सुभाष अपनी जन्मजात प्रकृति के
चलते अपमान को सह नहीं पाते थे। उनके मन में बड़े-बड़े स्कूलों की उस
प्रथा के प्रति भारी विद्रोह भावना भरी हुई थी, जिनमें अंग्रेज़,
एंग्लो-इंडियन और हिंदुस्तानी बच्चों साथ-साथ पढ़ते तो थे मगर नियम यह था
कि कक्षा में पहले अंग्रेज़ बच्चे जाकर आगे की सीटों पर बैठें, उसके बाद
एंग्लो इंडियन और अंत में हिंदुस्तानी बच्चे सबसे पीछे की सीटों पर बैठे।
छुट्टी होने पर पहले अंग्रेज़ फिर एंग्लो-इंडियन और अंत में हिंदुस्तानी
बाहर निकलें। ऐसी बेहूदा बल्कि अमानवीय प्रथा उन्हें सदा कचोटती रहती।
कुशाग्र बुद्धि के कारण वे बोर्ड या यूनिवर्सिटी में सदा प्रथम श्रेणी में
उत्तीर्ण होते। परंतु देश की परिस्थितियों के कारण शिक्षा की गति कुछ मंद
चल रही थी। सन् 1919 में जब वह तेईस वर्ष के थे तब बी.ए. पास करके एम.ए
में दाखिल हुए।
सन् 1919 देश के लिए भारी उथल-पुथल का वर्ष था। रौलेट एक्ट का विरोध करने
के लिए समूचे देश में आंदोलन चल रहे थे। अमृतसर में जलियाँवाला बाग़ के
नृशंस हत्याकांड से देशभक्तों का खून खौल रहा था। बंगाल में महाकवि
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेज़ी सरकार की नीतियों के विरोध में अपना खिताब
लौटाकर न सिर्फ बंगालियों को ही वरन् देश के सभी बुद्धिजीवियों को जगा
दिया था।
इस स्थिति में सुभाष के पिता बाबू जानकीनाथ बोस को यह डर हुआ कि कहीं उनका
बेटा देश की इस आग में ही न कूद पड़े। उन्होंने सुभाष को इन परिस्थितियों
से दूर रखने के लिए एक तरकीब सोच निकाली। वह कटक में वकालत करते थे, परंतु
एक दिन अचानक ही सुभाष के पास कलकत्ता जा
पहुंचे-‘‘मैं
तुम्हें आई.सी.एस. की परीक्षा पास करने के लिए इंग्लैड भेजना चाहता
हूं।’’
सुभाष आश्चर्य में पड़ गए-‘‘आई.सी.एस.? लेकिन किसलिए
?’’
‘‘तुम्हारी सुखी भविष्य के लिए यह बहुत ज़रूरी है।
तुम जानते
हो कि बहुत-से प्रतिष्ठित तथा प्रभावशाली लोगों से मेरा परिचय है। मैं उन
लोगों के प्रभाव से तुम्हारे लिए किसी ऊँचे पद की सरकारी नौकरी का प्रबंध
ज़रूर कर लूँगा। तुम केवल यह परीक्षा पास कर लो।’’
लेकिन मैं अंग्रेज़ी सरकार की नौकरी करना नहीं चाहता, चाहे छोटी हो या
बड़ी।
‘‘यह तुम्हारी भावुकता है जबकि मैंने खूब सोच-विचारकर
तुम्हारे लिए ऐसी योजना बनाई है।’’
आपकी बात मैं मात्र भावुकता के कारण ही नहीं टाल रहा। क्षमा करें, मैं
आई.सी.एस. नहीं करूँगा। उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा।
पिता ने और दबाव न डाला। वास्तव में वह सुभाष के दृढ़ और साहसी स्वभाव से
मन ही मन डरते थे। एक बार, ऐसे ही मन की बेचैनी के कारण सुभाष घर व पढ़ाई
को तिलांजलि देकर चुपचाप खिसक गए थे तथा कई महीनों तक भिन्न-भिन्न
तीर्थस्थानों और निर्जन पर्वतों पर भटकने के बाद जब घर वापस लौटे थे तो
महीनों बीमार पड़े रहे। इसीलिए पिता ने इनसे अधिक कुछ न कहा, लेकिन इनकी
माता से कहा-‘‘इतनी बड़ी परीक्षा पास करने के लिए
हिम्मत
चाहिए। वहां अंग्रेज़ों के साथ मुकाबला करना पड़ेगा। यह डर रहा है,
क्योंकि वहाँ फेल हो जाएगा।’’
पिता की बात सुभाष के लिए चुनौती बनकर उभरी। वे चुनौती को बर्दाश्त नहीं
कर सकते थे। अत: इंग्लैड जाने को तैयार हो गए।
इंग्लैंड पहुँचकर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में दाख़िला लेने तक पढ़ाई के लगभग
तीन महीने व्यतीत हो चुके थे। फिर भी उसी वर्ष परीक्षा देकर जब वह चौथे ही
स्थान पर पास हुए तो सुनने वालेदंग रह गए। लोगों को और भी अधिक आश्चर्य तब
हुआ जब परीक्षा पास करने के बाद सुभाष ने परिवार के दवाब में न आते हुए
आई.सी.एस. पद को सीधी ठोकर मार दी।
सुभाष अंग्रेज़ों की गुलामी करने की बजाय उनसे अपने देश को आज़ाद कराना
श्रेयस्कर समझते थे। त्यागपत्र देकर वे स्वदेश लौट पड़े।
दो वर्ष के प्रवास के बाद जब 16 जुलाई, 1921 को बंबई (अब मुंबई) बंदरगाह
पर उतरे तब सबसे पहले उन्होंने माँ भारती को प्रणाम कर मन ही प्रार्थना
की-‘‘माँ, मैं तुझे बंधनमुक्त कराने का प्रण लेकर आ
गया हूं,
अब तू ही मुझे राह दिखा। कोई मोह, माया, प्रलोभन या आतंक मुझे विचलित न कर
सके, ऐसी शक्ति मुझे देना।’
मुंबई में वे सीधे महात्मा गांधी जी से मिले। फिर कोलकाता (तब कलकत्ता)
में जाकर देश-सेवा के काम में लग गए।
कर्मठता तथा दृढ़ता के कारण कुछ वर्षों में ही उनकी कीर्ति देश-विदेश में
फैल गयी। राजनीति में वे युवा पीढ़ी तथा गरम दल के लोगों में चर्चित हो गए।
लगभग बीस साल तक देश के शीर्षस्थ नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए
फ़िरंगी सरकार की लाठियां खाकर जेल की यातनाएँ सहकर, तपेदिक जैसी भयानक
बीमारी तथा देश निकाले जैसी सजाएँ भुगतने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि
अंग्रेज़ जैसे धूर्त शासक अहिंसात्मक आंदोलनों से पराजित न होंगे। वे इस
निष्कर्ष पर पहुँचे कि अंग्रेज़ों का गला दबाकर या उनसे जंग करके ही
आज़ादी हासिल की जा सकती है। कांग्रेस के प्रधान पद पर रहकर भी उनकी गांधी
जी से पटरी नहीं बैठी। सुभाष वीर थे तथा उनके ख़ून में गरमी थी जबकि गांधी
जी शांत स्वभाव के थे। उनका मूल-मंत्र था कि किसी पर अन्याय करना पाप तो
है ही, दूसरे का अन्याय चुपचाप देखते रहना या सहना महापाप है। वे ईंट का
जवाब पत्थर से देने में विश्वास रखते थे। फलस्वरूप गांधी जी के प्रति अपार
श्रद्धा रखते हुए भी उन्होंने अपना रास्ता अलग चुन लिया। वे जब ग्यारहवीं
बार जेल-यातना भुगत रहे थे तभी बेचैनी रहने लगी-‘मैं क्या जेलों
में
सड़ने के लिए ही पैदा हुआ है। क्रूर अंग्रेज़ी शासन क्या हमारी ऐसी
कुर्बानियों से ही पिघल जाएगा ?
उनकी आत्मा ने उन्हें सजग किया कि उठो और दुश्मन से अंतिम लड़ाई लड़ने के
साधन जुटाओ।
अंग्रेज़ी ताक़त उस समय संसार की एक बहुत बड़ी ताक़त मानी जाती थी। उसका
साम्राज्य इतना विस्तृत था कि उसमें जहाँ रात का दीपक ही कहीं न कहीं जलता
रहता था, वहाँ दिन का सूरज भी कहीं न कहीं अपनी किरणें बिखेरता रहता था
ऐसी सरकार से टक्कर लेना लोहे के चने चबाने से भी अधिक दुष्कर कार्य था।
यह सुभाष जैसे साहसी और फ़ौलादी आदमी का ही बूता था कि अपने दम पर
अंग्रेज़ों के विरुद्ध जंग का सामान पैदा करने की बृहत् योजना उन्होंने
बना ली।
इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था। अमेरिका, ब्रिटेन तथा फ्रांस
आदि मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध जर्मनी और जापान आदि धुरी राष्ट्र युद्ध
कर रहे थे। सुभाष ने सोचा कि धुरी राष्ट्र अंग्रेज़ों के दुश्मन हैं,
इसलिए हमारे दोस्त बन सकते हैं। दुश्मन के दुश्मनों से फ़ौजी मदद लेकर
स्थिति का लाभ उठाने के लिए सुभाष व्यग्र हो उठे वे किसी भी तरह देश से
निकलकर विदेशी मित्रों से मिलने के लिए छटपटाने लगे।
परंतु इस समय दुर्भाग्यवश वे जेल में थे। दुष्ट विदेशी सरकार उन्हें सबसे
अधिक खतरनाक आदमी मानकर जेल से बाहर निकलने ही न देती थी। वे जब भी सजा
काटकर जेल से बाहर आते, गोरी सरकार उन्हें किसी न किसी बहाने पकड़कर फिर
जेल भेज देती।
आखिर सुभाष ने ‘करो या मरो’ का संकल्प लेकर कमर कस
ली।
उन्होंने जेल के अंदर अपनी रिहाई की माँग करते हुए आमरण अनशन की घोषणा कर
दी। सरकार ने उन्हें बहुत दबाया, जबरदस्ती खाना खिलाने की भी बार-बार
कोशिश की, परंतु सुभाष किसी भी तरह काबू में न आए। जब भूखे रहकर उनकी
स्थिति जेल में ही बिगड़ने लगी तथा बाहर जनता भ़ड़कने लगी तब मजबूर होकर
गोरों ने उन्हें जेल से मुक्त कर दिया। रिहाई के बावजूद उन पर से मुक़दमा
नहीं उठाया गया, बल्कि घर में ही उन पर पहरा बिठा दिया गया।
सुभाष बाबू ने इस पहरेदारी का भी फ़ायदा ही उठाया। उन्होंने लोगों से
मिलना छोड़ दिया, दाढ़ी बढ़ा ली और स्वयं को एक मुसलमान के रूप में ढाल
लिया। उन्होंने अपने भतीजे शिशिर बोस की सहायता से अत्यंत गुप्त रूप विदेश
भागने की योजना बना ली। चुपचाप कुछ प्रतिबंध भी किए। इन दिनों घर के
नौकरों व रिश्तेदारों को भी उनके कमरे में जाने की इजाज़त नहीं थी। पहरे
के सिपाही भी खिड़की से ही उन पर नजर रखते थे, जहाँ वे हमेशा पीठ करके कुछ
पढ़ते-लिखते या सोचते रहते थे।
27 जनवरी को उनकी कचहरी में पेशी होनी थी। उस दिन जब पुलिस उन्हें अपनी
निगरानी में ले जाने के लिए प्रात:काल आई तो वह देखकर उसके हाथों के तोते
उड़ गए कि पंछी तो पहले ही पिंजरे से फुर्र हो चुका है। थोड़ी ही देर में
ख़बर जंगल की तरह चारों तरफ फैल गई।
सुभाष की फ़रारी की ख़बर पाकर फिंरगी सरकार दहल गई। चारों तरफ तार-बेतार
खटक गए, सीमाओं पर चौकसी बिठा दी गई, हवाई अड्डों तथा सड़कों की नाकेबंदी
की गई तथा देश-भर में तलाशियाँ होने लगीं।
लेकिन सुभाष तब तक दूर निकल गए थे।
काले रंग की जिस कार में सुभाष घर से फरार हुए थे, उसको स्वयं उनका भतीजा
शिशिर चला रहा था। चाचा-भतीजा इस योजना को किसी तीसरे के कान में नहीं
जाने देना चाहते थे।
कार कोलकाता शहर से बाहर निकलकर भी उसी प्रकार तीव्र गति से भागती हुई
सुबह होने से कुछ पहले गोमोह पहुँची। वे लोग दिन-भर किसी रिश्तेदार के घर
में टिककर रात को धनबाद स्टेशन पहुँचे।
यहाँ सुभाष फ्रंटियर मेल के फर्स्ट क्लास के एक डिब्बे में बैठकर पेशावर
के लिए रवाना हो गए तथा शिशिर कार द्वारा कोलकाता लौट गया।