जवां दिलों की दास्तान है। उनके सपनों, उनके अरमान उनके भविष्य की कथा है
और जब इनमें से कुछ भी हाथ नहीं लगता तो वे टूट कर बिखर जाते हैं।
कथाकार आबिद सुरती की स्वयं देखी हुई, भुगती हुई, जी हुई अपनी जिंदगी की
इसमें जीती-जागती एक तस्वीर है। इसमें कॉलेज है पर आम नहीं। विद्यार्थी
हैं पर अनोखे, क्योंकि यह कहानी सूरज की तरह उगते और शाम से पहले ढल जाते
चंद चित्रकारों के संघर्ष की है।
टूटे हुए फरिश्ते
डबल-डेकर बी.ई.एस.टी. की थी। ड्राइवर सिख। खून पंजाबी था। आज तक गोश्त
झटके का खाया था। ‘हलाल’ उसके लिए
‘हराम’ था। बात करते समय उसके शब्द झटके के साथ
निकलते थे। हास्य झटके के साथ उठता था और रात प्यार करते-करते....
स्टॉप आते ही उसने बस रोकी, झटके से। मुसाफ़िरों को यह आशा थी ही, क्योंकि
वे इसके पहले के स्टॉपों पर झटके खा चुके थे। बीच रास्ते में भी जाट की
तरह बस रोककर उसने खड़े हुए मुसाफ़िरों—ख़ासकर कमज़ोर
और बुड्ढों का परस्पर मिलाप करा दिया था।
‘क्रॉफ़ोर्ड मार्केट !’
बस के दरवाजे पर से कंडक्टर ने आवाज़ लगाई। मन ही मन गाली देते, ड्राइवर
की तरफ़ घृणा से देखते सँभलते-सँभलते बीच के रास्ते से चार-पाँच यात्री
आगे बढ़े और उतर गए।
कंडक्टर शटर के पास बैठी विचार मग्न प्रज्ञा के पास आया, बेवकूफ़ की तरह
उसने उसे देखा और सहज, ऊँचे तथा मज़ाकिया स्वर में दोनों शब्द अलग कर फिर
से एक बार आवाज़ दी—
‘क्रॉफ़ोर्ड मार्केट !’
प्रज्ञा ने चौंककर उसकी ओर नज़र उठाई।
‘क्रॉफ़ोर्ड मार्केट’ आ गया क्या ? कहते हुए एक नज़र
शटर के बाहर डाली और उठ खड़ी हुई। बीच में खड़े मुसाफ़िरों ने एक तरफ़ हो
उसे राह दी। कंडक्टर ने घंटी बजाई। बस झटके के साथ फिर चल पड़ी।
फ़ुटपाथ पर खड़ी प्रज्ञा ने डबल-डेकर के आकार को दूर तक जाते हुए देखा
उसकी दृष्टि बस के साथ सफ़र करती अकारण टी.वी स्टेशन तक पहुँच गई। कार,
टैक्सी, लारी, विक्टोरिया, स्टेशन वैगन, जीप, सब मंद गति से एक कतार में
आगे बढ़ रही थीं। कारण ? खुदे हुए रास्ते पर काम करते हुए म्यूनिसिपल
कर्मचारियों की प्रगति ! पिछले दो महीनों में इस एक ही सड़क को तीन बार
खोदा गया था। पहले पाइप लाइन बदलने के लिए। फिर टेलीफ़ोन के नये तार लगाने
के लिए और अंत में ट्राम की लाइनें उखाड़ने के लिए (ट्रामें बंद हो जाने
के कारण)।
दृष्टि फेर प्रज्ञा ने दाहिनी ओर देखा, आर्ट स्कूल की इमारत पर नज़र पड़ी।
बाहर के फुटपाथ पर युवक-युवतियों की चहलक़दमी थी। बायीं ओर।
‘एस. रामचंद्र’ आर्ट डीलर की दूकान के बोर्ड को एक
नौकर गीले कपड़े से साफ़ कर रहा था। रास्ते की धूल की बारीक परत के नीचे
धुँधले साइन बोर्ड के अक्षर चमकने लगे थे।
प्रज्ञा दूकान में प्रविष्ट हुई। काँच के शो-केश में ललित कला की
पुस्तकें, रंग की ट्यूबें, ब्रश, पेस्टल के डिब्बे, पोस्टर कलर की शीशियां
और वीनस पैंसिलें आकर्षक ढंग से सजा कर रखी हुई भी अकलात्मक लग रही थीं।
दूकान न बड़ी थी, न छोटी, पर फ़र्नीचर के कारण बहुत छोटी लग रही थी।
‘येस मिस ?’ प्रज्ञा को अकेले खड़े देख सेल्समैन उसके
पास आया।
प्रज्ञा ने पर्स में से लिस्ट बाहर निकाली। उस पर एक उड़ती नज़र डाल उसे
सेल्समैन के आगे सरका दिया।
दो युवक भीतर आए। एक ने टेबल पर पड़ा ब्रश का डिब्बा सहज ही पास खींचा और
दूसरे युवक की ओर मुड़ा। उसने एक ब्रश उठाया। ऊपर पड़े नंबर को पढ़ा। बाल
ज़रा कड़े थे। उसने ब्रश वापिस रख दिया। दोनों बाहर निकल गए।
प्रज्ञा चुपचाप उस बँधे वातावरण में टूयब लाइट के मंद प्रकाश में चमकती
वस्तुएँ देखती रही। एक ऊँचे शो-केश में रासायनिक मसाले से भरे सँभालकर रखे
मृत पक्षियों की सुन्दर-चिकनी देह उसे भा गई।
सेल्समैन ने लिस्ट के अनुसार वस्तुएँ लाकर मेज़ पर ढेर लगा दिया। हाफ़
इम्पीरियल बोर्ड, पोर्टफ़ोलियों, कार्टरिज पेपर, 3बी-6बी, पेंसिलें
और—
‘कितने पैसे ?’
सेल्समैन ने कान पर पैंसिल खींचकर डायरी पर हिसाब किया।
‘आपको बिल चाहिए ?’
‘देंगे तो ठीक है।’
‘सेल-टैक्स भरना पड़ेगा।’
बिल लिए बिना प्रज्ञा ने पैसे चुका दिए।
‘दूसरा कुछ ?’ सेल्समैन ने आदतन मुस्कराते हुए
विवेकपूर्वक पूछा।
‘नो, थैंक्स।’
‘सामान पैक करा दूँ ?’
‘येस्। प्लीज़—’
प्रज्ञा बाहर आई। सड़क पर से उड़े जाते वाहनों के कारण उसे रुक जाना पड़ा।
थोड़े समय के लिए। फिर वह आगे बढ़ी और सड़क पार कर सामने के फ़ुटपाथ तक
पहुँच गई। आर्ट स्कूल का गेट उसके सामने था। बैठे घाट की इमारत उसके सामने
स्थिर खड़ी थी। गेट में अंदर जाते ही गुलमोहर के वृक्ष पर बैठे कौए उड़े।
कोमल फूलों की पंखुड़ियों के साथ कुछ पत्तियाँ नीचे गिर पड़ीं। प्रज्ञा ने
साड़ी को झटका और ऊँचे पेड़ों की घनी छाया में से आगे बढ़ती अहाते में
प्रविष्ठ हुई।
बीच का भव्य विशाल हॉल। आगन्तुकों का स्वागत करती, सतारा की एक युवती की
छह फुट ऊँची प्रतिमा हाथ में टोकरी लिए बीच में खड़ी थी। तिपहलू काँच में
से चमकता झूमर उसके माथे पर शोभायमान था। हल्का, मधुर गुंजार।
हॉल की दोनों दिशाओं से सीढ़ियाँ ऊपर की तरफ़ चली गई थीं। एक
विद्यार्थियों के लिए, दूसरी प्राध्यापकों के लिए। पर प्राध्यापक उनका
उपयोग भाग्य से ही करते होंगे। हॉल तथा ज़ीने की दीवारें काँच से मढ़े
चित्रों से सुसज्जित थीं। काँगड़ा, राजपूत, जैन, अजंता आदि के चित्रों की
प्रतिकृतियाँ तथा जापानी वुडकट बरबस अपनी ओर ध्यान खींच लेने वाले थे। हॉल
की छत काफ़ी ऊँची होने के कारण दीवारों के ऊपरी भाग में अंग्रेज तथा
फ्रांसीसी चित्रकारों के तैल चित्र नक्काशी किए हुए चार इंच चौड़े तथा एक
इंच मोटे सुनहरे तथा रुपहले क़ीमती फ्रेमों में जड़े थे। नई टर्म का पहला
दिन था। नये विद्यार्थी घंटी की प्रतीक्षा में हॉल में इधर-उधर टहल रहे
थे। कोई तंग वस्त्रों में दुहरे बदन की आकर्षक लड़की को देख रहा था, कोई
दीवार पर के चित्रों को, तो कोई सब-कुछ देखता हुआ भी कुछ नहीं देख रहा था।
दूसरे, तीसरे, चौथे वर्ष और डिप्लोमा के विद्यार्थी नहीं के बराबर थे। वे
जानते थे कि ज़्यादा नहीं तो टर्म के दो-तीन दिन तो यों ही चहल क़दमी और
बकवास में बीतेंगे। मुश्किल से आधे दिन तक क्लास, क्लास रहती और दोपहर बाद
तो चार-पाँच बड़े ईमानदार विद्यार्थियों को छोड़, सभी या तो थियेटर की
सीटों या होटल के रंगीन कोनों से जा चिपकते।
प्रज्ञा ने दीवार पर की घड़ी में देखा। दस बजकर बीस और सेकेण्ड का दौड़ता
काँटा। घंटी बजने में पन्द्रह मिनट का समय था। हॉल को पार कर सामने की
तरफ़ से पोर्टिको से बाहर निकलकर बायीं ओर घूम गई।
सामने फैले लॉन की घास पर ऊँची कक्षाओं के कुछ लड़के बढ़िया कपड़ों में
सजे-धजे नयी लड़कियों के साथ कांटेक्ट बढ़ाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से बातचीत
कर रहे थे। वे खुल कर हँसते, बत्तीसों दाँतों का प्रदर्शन करते, साक्षात्
सौंदर्य का ख़्याल अपनी ओर खींचते, अपनी हस्ती की नीलामी कर रहे थे। उनसे
थोड़ी दूर पर एक अल्हड़-सी लड़की बैठी थी। पैर सीधे फैले हुए और शरीर पीछे
झुक कर हाथों पर टिका हुआ। सूती टेरीलीन की पैण्ट और लड़कों की तरह ही
अन्दर खुसी हुई हैंडलूम की चैक शर्ट। उसे देखकर शायद ही कोई कह सकता कि वह
लड़की है। उसे पूर्णरूप से निरखने के लिए ध्यान से देखने की आवश्यकता थी।
उसके बाल ‘बीटल’ की तरह चारों ओर फैले थे।
‘हाय पेरीन !’ घास पर पाँव रखते हुए प्रज्ञा ने
प्रफुल्लित मुख से कहा। युवकों के गिरोह ने दोनों को परेशान नज़रों से देख
लिया।
‘तू....?’
‘हम महीने भर पहले एडमीशन लेने आए थे। यहीं मिले थे। भूल गई
?’
‘मुझे लड़कियों के नाम बहुत कम याद रहते
हैं—’
‘मैं प्रज्ञा...’
‘कब आई ?’
‘बस पाँचेक मिनट हुए,’ कहकर प्रज्ञा उसके पास बैठ गई।
ड्राइंगबोर्ड को नीचे रख बाक़ी सब चीज़ों को उस पर रख दिया। फिर नाक पर
रूमाल रख एक बार छींकी।
‘माफ़ करना। ज़रा सर्दी हो गई है।’ रूमाल को तह कर
उसने पर्स में रख लिया।
‘महाबलेश्वर का मौसम कैसा था ?’ पेरीन ने कुछ कहने की
ख़ातिर पूछा।
‘हमेशा की तरह। तू आई नहीं !’
‘तेरे डैडी-मम्मी वहाँ हैं। मेरा कौन है ?’
‘मैं थी न।’ प्रज्ञा मुस्कराई। ‘तूने वादा
किया था। शायद यह भी याद न रहा होगा।’
‘अगर तूने एक बार मिलकर निश्चय कर लिया होता तो...’
‘ओह !’ मुँह और आँखें एक साथ खोल प्रज्ञा बीच में ही
बोल उठी। आइ एम रियली सॉरी। एकाएक जाना हो गया, इसलिए मिल ही न
सकी।’ छींक आती जानकर वह क्षण भर रुकी, स्टाइल से नाक पर उंगली
फिराई और फिर बात आगे बढ़ाई—
‘अच्छा एक बात बता—जिमख़ाना कहाँ है ?’
‘मुझे पता नहीं। सुना है कैंटीन के पीछे कहीं है।’
पेरीन ने थोड़ी दूर पर कैंटीन की ओर संकेत किया और फिर रुककर
पूछा—‘बॉयज़ कॉमन रूम कहाँ है, तुझे मालूम है
?’
प्रज्ञा ने सशंक दृष्टि से उसके चेहरे की ओर देखा और देखती ही रही।
घंटी बज उठी। उसकी प्रतिध्वनि अहाते के बाहर तक फैल गई। ‘एस.
रामचन्द्र’ के सेल्समैन ने सुस्त पड़ गई घड़ी के काँटे को
धकेलकर समय ठीक किया—रोज़ की तरह।
प्रज्ञा उठ खड़ी हुई। जाँघों के बीच सिकुड़ गई साड़ी को झटककर ठीक किया।
पेरीन के साथ आगे बढ़ी और सीढ़ियाँ चढ़ गई। उसके मुख पर मिश्रित भाव
प्रतिबिंबित हो रहे थे। आँखों में जिज्ञासा। एस.एस.सी. पास करने के पहले
उसने मित्रों और परिचितों से कालेज जीवन की पर्याप्त जानकारी ले ली थी।
यहाँ प्राथमिक शाला के से बन्धन न थे। यहाँ क्लास से गायब हो जाने अथवा न
आने के लिए किसी की अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता न थी। यहाँ के
प्रोफेसर स्कूल मास्टरों की तरह लाल आँखें निकालकर डराते नहीं थे। डाँटते
भी न थे।
क्षणभर को प्रज्ञा को लगा कि वह मुक्त प्रदेश में प्रविष्ट हो रही है।
उसकी नासिका स्वतंत्र वातावरण में साँस ले रही थी। मुक्त प्रदेश में उसके
पाँव गर्व से पड़ रहे थे। और फिर भी—कहीं त्रुटि थी। एकाएक उसे
याद आ गया। बी.ए. से बहादुरी के साथ तीसरी बार पीछे हट आई, महाबलेश्वर की
उसकी पड़ोसन सहेली ने उसे समझाया था, युवकों से दूर रहने और उनकी ललचाने
की खूबियों से सावधान रहने के लिए विशेष चेतावनी दी थी।
‘कॉलेज के लड़के नालायक होते हैं,’ उसने कहा था,
‘और चालाक भी। तू सच नहीं मानेगी। यह सफ़ेदपोश किसी न किसी चाल
से किसी भोली और निर्दोष लड़की को पलक मारते माँ बना दें, तो कोई आश्चर्य
नहीं। सच कहूं तो मैं बस बाल-बाल बच गई। नहीं तो आज मैं भी तेरे
सामने...’
प्रज्ञा को हर एक लड़का लफ़ंगा लगा। हर एक की आँखों में मैल था। हर एक की
चाल में रहस्य था। वस्त्रों पर पाप की चमक। चेहरे पर शिकारी का भाव। उसने
ग़ौर से देखा। भ्रम दूर हो गया। अधिकतर विद्यार्थी ग़रीब और भेड़-से लाचार
थे। घंटे से भी ज़्यादा वक्त तक मक्खियाँ उनके चेहरों पर आराम से बैठ सकती
थीं। थोड़े से लड़कों को छोड़, न उनमें बाप बनने की शक्ति थी न योग्यता।
शेष के सम्बन्ध में बिना किसी परिचय के धारणा बना लेना ग़लत था।
ऊपर के हॉल में आए प्रज्ञा के पाँव स्थिर हो गए। यहाँ प्रकाश कम था। केवल
दायीं ओर के खुले, ऊँचे, लँबे चौरस आकार में से आता प्रकाश का टुकड़ा फर्श
के एक छोटे से भाग को उजला कर रहा था।
थोड़ी-थोड़ी दूर पर रखे ग्रीक और रोमन मूर्ति कला के नमूने प्रज्ञा को
रोमांचकारी लगे। जूपिटर, मिनर्वा, मरकरी, वीनस, बेकस और क्यूपिड की
मूर्तियाँ मनुष्य की ऊँचाई से थोड़ी बड़ी और भरी हुई थीं। नये
विद्यार्थियों के लिए आकर्षक। इसके पहले प्रज्ञा ने न कभी देखी थीं, न कभी
कल्पना ही की थी। मूर्तियों को स्पर्श कर उनके मांसल शरीर पर हाथ फिरा सुख
अनुभव करने की इच्छा जाग्रत हुई। पास के पेडेस्टल पर खड़ी एक जवान प्रतिमा
के पैर पर उसने अंगुली रखी। ऊपर की ओर घसीटा और फिर आँखों के सामने कर
देखा। धूल की परत के नीचे त्वचा का रंग छिप गया था। दोनों पंजों को परस्पर
मसल वह कक्षा में प्रविष्ट हुई। अन्य विद्यार्थी उसके पहले अन्दर जाकर
बैठे थे। एक ख़ाली ‘डांकी’ ढूंढ़, प्रज्ञा ने दरवाज़े
में से आते प्रकाश की दिशा में रखा और उस पर बोर्ड टिका दिया। कार्टिज
पेपर खोल बोर्ड पर पिन से जड़ा। ड्राइंग बनाने की शुरुआत हुई। उसके सामने
दीवाल पर ‘कास्ट’ था। फूल-पत्ते की डिज़ाइन वाला।
प्लास्टर ऑव पेरिस था। गोल। पेंसिल हाथ में ले, बाँह सीधी कर उसने माप
लिया। काग़ज पर रेखा खींची। मिटा दी। फिर माप लिया और फिर, और फिर, और वह
ऊब गई। एक दृष्टि क्लास में घुमाई। सब विद्यार्थी अपने काम में व्यस्त थे।
कोने में टेबल के पीछे प्रोफेसर पंड्या हाज़िरी रजिस्टर तैयार करने में
व्यस्त थे। चश्मा नाक के नीचे तक उतर आया था। प्रज्ञा सावधानी से खड़ी हुई
और धीरे-धीरे क्लास से बाहर निकल आई। लोहे की तीन टाँगों पर रखा पानी का
मटका उसके सामने था। ऊपर से ग्लास ले नल के नीचे रखा। नल घुमाया, ग्लास भर
गया। एक ही साँस में वह पानी गले के नीचे ऊतार गई। होंठ पोंछे और तृतीय
वर्ष की कक्षा के द्वार पर आकर खड़ी हो गई। दोनों हाथ दरवाज़े पर टेक उसने
भीतर झाँका। चार लड़के एक लड़की के पास दायरे से बैठे थे।
निश्चिंततापूर्वक, मुस्कराते, परस्पर देखते लड़के लड़की की बातों की धुन
पर भाव की थपकियाँ देते....
प्रज्ञा ने कान खड़े किए। गर्मी की छुट्टियों में वे किसी कला-तीर्थ की
यात्रा करके लौटे थे। वहाँ कैसा मज़ा रहा (?), इसकी चर्चा हो रही थी...
गलियारे में से गुज़र प्रज्ञा चतुर्थ वर्ष के कमरे में घुस गई। केवल एक ही
विद्यार्थी को कमरे के बीच सिर झुकाये बैठा देखा उसे आश्चर्य हुआ। अन्य
विद्यार्थी कहाँ थे ? प्रश्न जागा और सो गया। प्रो. गायतोंडे दोनों पंजों
के बीच दृष्टि गड़ा कर कुछ सोच रहे थे। उँगलियों के बीच स्थिर खुले
फाउण्टेन पैन की निब सूख गई थी।
कमरे में दृष्टि घुमाने पर प्रज्ञा को ज्ञात हुआ कि वहां विद्यार्थी डांकी
से अधिक ‘ईज़ल’ का उपयोग करते थे। एक कोने में फोल्ड
किए ईज़ल रखे थे।
फाउण्टेनपैन बन्द कर प्रो. गायतोंडे ने प्रज्ञा पर दृष्टि डाली। एकाएक
घबरा, थोड़ा-सा हँस, धारे-धीरे पिछले पैर दरवाज़े की ओर सरका प्रज्ञा अपनी
क्लास में दौड़ गई। आश्चर्य ! अन्दर जाते ही उसकी आँखें डाँकी पर गईं।
किसी ने उसे सरकाकर पिछली लाइन में कर दिया था। बोर्ड आड़ा पड़ा था। दो
बोर्ड पिनें ग़ायब हो गई थीं। उसने डांकी को पहली जगह पर देखा।
‘ए मिस्टर !’ एक लड़के की ओर बढ़कर धीरे, पर उत्तेजित
स्वर में कहा।
‘भाई लोग मुझे पंकज कहते हैं,’ लड़के ने हल्का-सा
मजाक किया।
‘नाम तो खूबसूरत है’ प्रज्ञा ने कटाक्ष किया।
‘थैंक यू !’
‘काम बदसूरत !’
‘क्या ?’ पंकज खड़ा हो गया।
‘यहां मैंने डांकी रखा हुआ था। यह जगह मेरी है।’
‘कोई प्रूफ़ ?’
‘प्रूफ़ ?’ प्रज्ञा क्रोधित हो उठी, ‘मेरा
डांकी सरका दिया, बोर्ड फेंक दिया, दो पिनें निकाल लीं और ऊपर से प्रूफ़
पूछता है !’
‘किसने निकालीं ?’
‘तूने।’
‘मैंने ?’
‘हाँ, हाँ, तूने।’
आसपास काम करते विद्यार्थियों के चेहरे उनकी ओर घूम गए।
‘ए लड़की—! पंकज ने ढीले हुए पैंट को ऊपर सरकाते हुए
कहा।
‘मेरा नाम प्रज्ञा है।’
‘प्रदीप होता, तो दो तमाचे मार गाल लाल कर देता,’ वह
सहज ही रुका और बोल गया, ‘किसी शरीफ़ आदमी पर इल्ज़ाम लगाने से
से पहले तुझे दो बार शरमाना चाहिए था।
प्रज्ञा बिगड़ गई। पंकज के साथ उसका यह पहला प्रसंग होता, तो कदाचित् वह
चुप हो जाती। इसके पहले भी जब वह एडमीशन के लिए आई थी, तो पंकज ने अपनी
कार उसके पास से गुज़ारी थी, सिर्फ़ उसे डराने के लिए। प्रज्ञा को चिढ़ाने
भर के लिए उसने यह शरारत की थी।
साड़ी के पल्ले को एक तरफ खोंस प्रज्ञा ने दोनों हाथ कमर पर रखे। कुछ कहने
के लिए मुँह खोला। खुला ही रह गया। विभागाध्यक्ष श्री कड़कड़े ने क्लास
में पहला क़दम रखा था। प्रो. पंड्या उनका स्वागत करने के लिए कुर्सी पर से
उछल पड़े थे। औपचारिकतावश विद्यार्थियों को भी खड़ा होना पड़ा।
पंकज की ओर आँखें तरेरती प्रज्ञा पिछली लाइन में पड़े अपने डांकी की ओर
चली गई। श्री कड़कड़े अगर ज़रा देर से आते, तो शायद उसके गाल लाल करने की
इच्छा रखने वाले पंकज के चेहरे पर उसने पाँचों उँगलियों के निशान बना दिये
होते।
श्री कड़कड़े ने उड़ते पंक्षी के पंखों की तरह दोनों हाथ ऊँचे-नीचे कर
विद्यार्थियों को बैठने का संकेत किया। लड़के-लड़कियाँ यंत्रवत् एक साथ
बैठ गए। उनकी आँखें बिजली के खंभे जैसी उँची, पतली पैंट-बुशर्ट में
सुसज्जित, मेज के पास खड़ी श्री कड़कड़े की कलफ़ लगी सीधी आकृति को देखती
रहीं।
पंकज ने प्रज्ञा की तरफ आँखें चुराकर देखा। प्रज्ञा ने बिना उसकी ओर देखे
ही मुंह बिगाड़ा।
श्री कड़कड़े मेज़ से आगे बढ़ कमरे के बीच में आए। वे हर विद्यार्थी को
अपनी दृष्टि में समेट लेना चाहते थे। ‘छात्रों और छात्राओं
!’....और प्रतिवर्ष की भाँति टर्म की शुरुआत में नये चेहरों को
दिये जाने वाले प्रवचन का आरम्भ हुआ। चिड़ियाघर में कलाबाजी खाते बंदर को
भोला बालक जैसे देखता है, वैसे ही विद्यार्थी उनको देखते रहे।
‘आर्ट स्कूल के फ़र्स्ट ईयर में आप सबको देख मुझे आनन्द होता
है, शब्द-प्रवाह बहने लगा, ‘आपने अपने कैरियर के लिए कलाकार का
जीवन चुना, इसके लिए मुझे गर्व है। आप लोग चाहते तो अपने मित्रों के साथ
लॉ, साइंस, कामर्स या फिर किसी टैक्निकल स्कूल में भी जा सकते थे, परन्तु
नहीं, आपने कला की ओर ही अपनी लगन दिखाई। आपने इस स्कूल में प्रवेश लिया।
इससे अधिक गौरव की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है ?’
बीच की लाइन में बैठे एक विद्यार्थी ने जबर्दस्ती मुँह दबाकर जमुहाई खाई।
दोनों होठों के बीच से एक हास्य-की-सी ध्वनि बाहर आई। श्री कड़कड़े की
आँखें आवाज़ की दिशा में जाकर निष्फल लौट गईं।
‘हमारे समाज में कला को अभी तक वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका
है, जो विदेशों में प्राप्त है। लोक-दृष्टि से वही विद्यार्थी आर्ट
स्कूलों में आते हैं, जिसकी परसेंटेज कम होती है, जिनका दिमाग़ कमज़ोर
होता है। यहाँ विद्यार्थी सिर्फ़ वक्त गुज़ारने के लिए या किसी अन्य कारण
से आते हैं और वक्त पूरा होने से पहले ही ग़ायब भी हो जाते हैं। पर सच्चाई
यह नहीं है। हमारी संस्था के अनेक विद्यार्थी आज देश के उच्च पदों पर हैं।
प्रसिद्ध कंपनियों के आर्ट डायरेक्टर बनने का सौभाग्य भी हमारे
विद्यार्थियों को प्राप्त हुआ है। रज़ा, लक्ष्मण पई तथा पदमसी जैसे युवकों
ने हमारी प्रसिद्धि सात समुद्र पार पहुँचाई है। फ्रांस और अमरीका के महान्
चित्रकारों से होड़ लेकर और प्रदर्शनियों में सर्वोच्च पदक प्राप्त कर
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी संस्था भारत ही नहीं, अपितु समस्त
एशिया में सर्वोत्तम है।’
तालियों की गड़गड़ाहट।
‘इस संस्था की प्रतिष्ठा को स्थिर रखने के लिए आपको और अधिक
प्रयत्न करना है। भविष्य के लिए आदर्श बनाना है। क्लास में नियमित हाज़िरी
देकर आप लोगों को निष्ठापूर्वक अभ्यास करना है। आपके माँ-बाप या सम्बन्धी
आप पर जो ख़र्च करते हैं, उसका पूर्ण लाभ उठाना है।’ तालियाँ।
‘आपको आर्ट स्कूल के नियमों का पालन करते हुए धैर्यपूर्वक
प्रगति करनी है।’ तालियाँ। ‘और आप ऐसा करेंगे इसमें
कोई शंका नहीं है।’