Iqbal Aur Unki Shayari - A Hindi Book by - Prakash Pandit - इक़बाल और उनकी शायरी - प्रकाश पंडित
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Iqbal Aur Unki Shayari

इक़बाल और उनकी शायरी

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प्रकाश पंडित<<आपका कार्ट
मूल्य$ 5.95  
प्रकाशकराजपाल एंड सन्स
आईएसबीएन81-7028-214-4
प्रकाशितजनवरी ०१, २००६
पुस्तक क्रं:4993
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Iqbal Aur Unki Shayari

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उर्दू के लोकप्रिय शायर

नागरी लिपी में उर्दू के लोकप्रिय शायरों व उनकी शायरी पर आधारित पहली सुव्यवस्थित पुस्तकमाला। इसमें मीर, ग़लिब से लेकर साहिर लुधियानवी-मजरूह सुलतानपुरी तक सभी प्रमुख उस्तादों और लोकप्रिय शायरों की चुनिंदा शायरी उनकी रोचक जीवनियों के साथ अलग-अलग पुस्तकों में प्रकाशित की गई हैं। इस पुस्तकमाला की प्रत्येक पुस्तक में संबंधित शायर के संपूर्ण लेखन से चयन किया गया है और प्रत्येक रचना के साथ कठिन शब्दों के अर्थ भी दिये गये हैं। इसका संपादन अपने विषय के दो विशेषज्ञ संपादकों-सरस्वती सरन कैफ व प्रकाश पंडित-से कराया गया है। अब तक इस पुस्तकमाला के अनगिनत संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और पाठकों द्वारा इसे सतत सराहा जा रहा है।

इक़बाल


उर्दू साहित्य में इक़बाल का स्थान रवीन्द्रनाथ टैगोर के समान है। वे जहां एक ओर चिंतनपरक और सूफ़ियाना शायरी के लिए मशहूर हैं, वहीं उन्होंने प्रकृति-चित्रण, राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति तथा सर्वधर्म सद्भाव को भी अपनी शायरी का विषय बनाया है। प्रगतिशील शायरी का झंड़ा सबसे पहले उन्हीं ने उठाया जो बाद में जोश, फ़िराक़, फ़ैज़, साहिर आदि अनेक शायरों में पुष्पित-पल्लवित हुआ।


हज़ारों साल नर्गिस1 अपनी बेनूरी2 पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर3 पैदा


इक़बाल का यह शे’र संसार के अन्य महापुरुषों की तरह, जिन्होंने मनुष्य तथा मनुष्य की महानता के गीत गाए, तथा उस पतन की दलदल से निकालकर आत्मविश्वास, आत्मसम्मान तथा कर्म एवं संग्राम के पथ पर लगाने का प्रयत्न किया, स्वयं इक़बाल पर भी ठीक बैठता है। हज़ारों साल का दीर्घ विराम न सही, लेकिन इसमें सन्देह नहीं कि ‘दीदावर’ बड़ी मुश्किल से पैदा होता है, और जब भी वह पैदा होता है दीर्घ विरामों की टूटी श्रृंखलाएं जुड़ जाती हैं।
उर्दू और फ़ारसी शायरी के चमन का यह ‘दीदावर’ 1857 ई. में स्यालकोट (पंजाब) में पैदा हुआ। पुरखे कश्मीरी ब्राह्मण थे जिन्होंने तीन सौ वर्ष पूर्व इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और कश्मीर से निकलकर पंजाब में आ बसे थे। पिता शेख़ नूर मोहम्द का स्यालकोट में छोटा-सा व्यवसाय था लेकिन सहृदयता और सत्कर्मों के कारण बड़ा नाम था। अता मोहम्मद और मोहम्मद इक़बाल दोनों पुत्रों को उन्होंने उर्दू, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी की उच्च शिक्षा दिलवाई। अता मोहम्मद
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1.आँख की आकृति से मिलता-जुलता फूल 2.ज्योतिविहीनता 3.आँख रखने वाला (पारखी)।

इक़बाल से चौदह वर्ष बड़े थे, इसलिए शिक्षा समाप्त कर वे तो मशीनों के इंजीनियर बन गए, लेकिन मोहम्मद इक़ाबल, जिन्हें मानव-मस्तिष्क का इंजीनियर बनना था, स्यालकोट से एफ.ए. करने के बाद लाहौर के गवर्नमेंट कालेज में प्रविष्ट हो गए। स्यालकोट में उन्हें मौलवी सय्यद मीर हसन जैसे उस समय के माने हुए विद्वान से लाभान्वित होने का अवसर मिला था जिन्होंने उनके मन में पूर्वी साहित्य तथा अन्य विधाओं के प्रति विशेष आदर उत्पन्न कर दिया था। लाहौर पहुँचे तो प्रोफ़ेसर आर्नल्ड जैसे विख्यात दार्शनिक का पथ-प्रदर्शन प्राप्त हुआ। गुरु ने शिष्य की तीक्ष्ण बुद्धि और दार्शनिक प्रवृत्ति को भांप लिया और उसे पश्चिमी दर्शन-शास्त्र से पूरी तरह परिचित कराने में विशेष परिश्रम किया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ का वह काल राजनीतिक रूप से पूरे भारत का जागरण-काल था। पिछड़ी हुई मुसलमान जाति भी सर सय्यद, हाली आदि नेताओं के अनथक प्रयत्नों तथा 1857 ई. के विद्रोह के बाद की चालीस वर्षीय नूतन शिक्षा-दीक्षा के कारण परिस्थितियों को समझने और भारत के अन्य जातियों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने के योग्य हो चुकी थी। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र-प्रेम की आवश्यकता के वशीभूत हिन्दू और मुसलमान नेता अपने इतिहास का संपरीक्षण कर रहे थे। देश-भर में यह भावना जगाने का प्रयत्न किया जा रहा था कि हम उस समय भी सभ्य थे जब अंग्रेज़ गंवार थे। बाल गंगाधर तिलक जैसे हिन्दू नेताओं ने अपना नया कर्म-दर्शन गीता और वेदान्त से निकाला और सर सय्यद, अमीर अली (तथा बाद में इक़बाल) आदि मुसलमान नेताओं ने क़ुरान मजीद की नवीन व्याख्या की। धर्म को दोनों जातियों ने एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयत्न किया जो उनके विचार में उन्हें पूँजीवाद तथा परतन्त्रता की भर्त्सनाओं से बचा सकती थी। अतीत की महानताओं की चर्चा अंग्रेज़ शासकों के सामने अपने हीनता-भाव को कम करने के उद्देश्य से की जाती थी।1

 इस राजनीतिक एवं सामाजिक जागरण से तथा सर सय्यद, हाली और शिबली के साहित्य-सम्बन्धी सुधारों से उर्दू के साहित्य क्षेत्र में भी पर्याप्त परिवर्तन हो रहा था। तसव्वुफ़ (भक्तिवाद) और इश्क़िया शायरी (प्रेम-काव्य) के उन्मूलन तो अभी नहीं हुआ था, लेकिन वह पहले जैसा धूम-धड़क्का भी न रहा था जिसने विद्रोह से पहले के लगभग समस्त उर्दू शायरों को अपने बाहुपाश में जकड़ रखा था। ग़ज़ल के साथ-साथ नज़्म (कविता) भी पनपने लगी थी, लेकिन एक नया काव्य-रूप होने के कारण अभी उसमें कलात्मक प्रौढ़ता और चिन्तनात्मक गहनता उत्पन्न न हो पाई थी। ऐसे समय में इक़बाल जैसा शायर क्षेत्र में आता है जिसके हाथों न केवल अपूर्ण रेखाचित्रों में रंग भरा गया बल्कि उर्दू शायरी धरती से उठकर आकाश तक जा पहुँची। निःसन्देह उर्दू भाषा ने ‘ग़ालिब’ के अतिरिक्त अभी तक इक़बाल से बड़ा शायर उत्पन्न नहीं किया।
इस सम्बन्ध में स्वर्गीय शेख़ अब्दुल क़ादिर बैरिस्टर-एट-लॉ, भूतपूर्व सम्पादक ‘मख़ज़न’ (पत्रिका) का यह कथन दिलचस्पी से ख़ाली न होगा कि :

‘‘अगर मैं तनासख़ (आवागमन) का क़ायल होता तो ज़रूर कहता कि ‘ग़ालिब’ को उर्दू और फ़ारसी शायरी से जो इश़्क था उसने उनकी रूह को अदम (परलोक) में भी चैन नहीं लेने दिया और मजबूर किया कि वह फिर किसी इन्सानी जिस्म में पहुँचकर शायरी के चमन की सिंचाई करे; और उसने पंजाब के एक गोशे में, जिसे स्यालकोट कहते हैं, दोबारा जन्म लिया और मोहम्मद इक़बाल नाम पाया।’’
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1.इस प्रकार के अतीतवाद से बाद में संकीर्णता उत्पन्न हुई और फिर इस प्रवृत्ति ने इतना भयंकर रूप धारण कर लिया कि इससे न केवल ‘दो जातियों के सिद्धान्त’ को हवा मिली बल्कि देश तक का विभाजन हो गया।

यों तो शायरी का शौक़ इक़बाल को स्कूल-जीवन ही में उत्पन्न हो चुका था और वे अपनी कविताएँ डाक द्वारा उर्दू के प्रसिद्ध शायर और उस्ताद ‘दाग़’ देहलवी को संशोधनार्थ भेजा करते थे, लेकिन वास्तविक रूप में उनकी शायरी की शुरुआत लाहौर आकर हुई। उस समय उनकी आयु बाईस वर्ष की थी जब मित्रों के आग्रह पर उन्होंने वहाँ के एक मुशायरे (कवि-सम्मेलन) में अपनी ग़ज़ल पढ़ी। उस मुशायरे में मिर्ज़ा अ़शरद गोरगानी भी थे जिनकी गणना उन दिनों चोटी के शायरों में होती थी। जब इक़बाल ने ग़ज़ल का यह शे’र पढ़ा !


        मोती समझ के शाने-करीमी1 ने चुन लिये
        क़तरे जो थे मेरे अर्क़-इन्अफ़ाल2 के


तो मिर्ज़ा अरशद तड़प उठे। बड़ी प्रशंसा की और कहा कि ‘‘मियां साहबज़ादे ! सुबहान अल्लाह, इस उम्र में यह शे’र !’’
उसी उम्र में मिर्ज़ा ‘दाग़’ ने भी अपने प्रतिभाशाली शिष्य की रचनाएँ इन शब्दों के साथ वापस करनी शुरू कर दीं कि रचनाएँ संशोधन की मोहताज नहीं हैं।

सन् 1899 में इक़बाल ने पंजाब विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया और कुछ समय तक ओरियंटल कालेज में और फिर गवर्नमेंट कालेज में प्रोफ़ेसर की हैसियत से काम करते रहे। और यही वह ज़माना था जब लाहौर के सीमित क्षेत्र से निकलकर उनकी शायरी की चर्चा पूरे भारत में पहुँची। पत्रिका ‘मख़ज़न’ उन दिनों उर्दू की सर्वोत्तम पत्रिका मानी जाती थी। उसके सम्पादक स्वर्गीय शेख़ अब्दुल क़ादिर ‘अंजुमने-हिमायते-इस्लाम’ के जल्सों में इक़बाल को नज़्में पढ़ते देख चुके थे और देख चुके थे कि इन दर्द-भरी नज़्मों को सुनकर उपस्थिति सज्जनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उन्होंने इक़बाल की नज़्मों को ‘मख़ज़न’
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1.दया की शान (भगवान) 2. पश्चात्ताप के कारण आए हुए पसीने के।

में विशेष स्थान देना शुरू किया। पहली नज़्म ‘हिमालय’ के प्रकाशन पर ही, जो अप्रैल 1901 के अंक में निकली, पूरा उर्दू-जगत् चौंक उठा। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से मांगे आने लगीं और सभाओं द्वारा प्रार्थनाएं की जाने लगीं कि उनके वार्षिक सम्मेलनों में वे अपनी नज़्मों के पाठ द्वारा लोगों को लाभान्वित करें। स्वर्गीय अब्दुल क़ादिर के कथनानुसार उन दिनों इक़बाल दिन-रात साहित्य सम्मेलनों और बैठकों में व्यस्त रहते थे। प्रवृत्ति ज़ोरों पर थी। शे’र कहने पर आते तो एक-एक बैठक में अनगिनत शे’र कह डालते। उनके मित्र या शिष्य, जो भी पास होते, पेन्सिल-काग़ज़ लेकर लिखते जाते और वे अपनी धुन में कहते जाते। ‘‘मैंने उन दिनों उन्हें कभी काग़ज़-क़लम लेकर शे’र लिखते नहीं देखा। गढ़े-गढ़ाए शब्दों का एक दरिया या चश्मा उबलता मालूम होता था। अपने शे’र सुरीली आवाज़ में, तरन्नुम से (गाकर) पढ़ते थे। स्वयं झूमते थे, औरों को झुमाते थे। यह विचित्र विशेषता है कि मस्तिष्क ऐसा पाया था कि जितने शे’र इस प्रकार ज़बान से निकलते थे, सब-के-सब दूसरे समय और दूसरे दिन उसी क्रम से मस्तिष्क में सुरक्षित होते थे।’’

इक़बाल की शायरी का प्रारम्भ देश-प्रेम तथा साम्राज्य-विरोध की भावना से हुआ। आरम्भ-काल ही से वे ऐसी शायरी को व्यर्थ समझते थे जिसका उद्देश्य मानव-जंगल न हो और उस शायर पर धिक्कार भेजते थे जो जीवन की कठिनाइयों तथा परीक्षाओं से मुँह मोड़कर पलायनवाद में शरण लेता हो। उनके समीप शायर कर्त्तव्य यह था कि प्रकृति असीम धन में से जीवन और शक्ति का जो अंश उसे मिला है उसमें वह औरों को भी शामिल करें, यह नहीं कि उठाईगीर बनकर जो रही-सही पूंजी औरों के पास है उसे भी हथिया ले :

‘‘अगरचे आर्ट के मुतअ़ल्लिक़ दो नज़रिये (दृष्टिकोण) मौजूद हैं : अव्वल यह कि आर्ट की ग़रज़ (उद्देश्य) महज़ हुस्न (सौंदर्य) का अहसास (अनुभूति) पैदा करना है और दोयम यह है कि आर्ट से ज़िन्दगी को फ़ायदा पहुँचाना चाहिए। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि आर्ट ज़िन्दगी के मातहत है। हर चीज़ को इन्सानी ज़िन्दगी के लिए वक़्त होना चाहिए और इसलिए हर आर्ट जो ज़िन्दगी के लिए मुफ़ीद हो, अच्छा और जाइज़ है। और जो ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ हो, जो इन्सानों की हिम्मतों को पस्त और उनके जज़बाते-आलिया (उच्च भावनाओं) को मुर्दा करने वाला हो, क़ाबिले-नफ़रत है और उसकी तरवीज (प्रसार) हुकूमत की तरफ़ से ममनू (निषिद्ध) क़रार दी जानी चाहिए।’’

साहित्य में प्रयोगवाद के भी वे कट्टर विरोधी थे। ऐसी सुन्दर कलाकृति से क्या लाभ जिसमें केवल कला के चमत्कार दिखाए गए हों। भाषा कोई मूर्ति नहीं है जिसकी पूजा की जाए, बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति का एक साधन है। विचारों के बिना साधन अपने-आप में कोई महत्व नहीं रखता। इन्हीं विचारों तथा दृष्टिकोणों पर उन्होंने अपनी शायरी की नींव रखी। लगभग आधी शताब्दी में फैली हुई उनकी शायरी इस बात की गवाह है कि वे जीवन-पर्यन्त इन्हीं कर्त्तव्यों का पालन करते रहे। अपनी शायरी के पहले काल अर्थात् 1905 तक की शायरी में उन्होंने :

        
        मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
        हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा

                    
और

        वतन की फ़िक्र कर नादां ! मुसीबत आने वाली है
        तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में
        न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
        तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में


ऐसी देश-प्रेम में डूबी हुई तथा भारत की पराधीनता और दरिद्रता पर खून के आँसू रुलाने वाली नज़्मों की रचना की। भारत के चश्मों और पर्वतों, गाती हुई नदियों, लहलहाते हुए पुष्प-कुंजों और देश-प्रेम के प्रकाश से जगमगाते हुए धरती-आकाश का पुजारी बनकर उन्होंने नानक और चिश्ती, राम और रामतीर्थ का गुणगान किया और अबोध बालकों तक के मुंह में यह प्रार्थना डाली :
    

        हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
        जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


अपनी शायरी के इस आरंभिक काल में उनका मानसिक क्षितिज देश-प्रेम तथा राष्ट्रवाद के (तंग) क्षेत्र तक सीमित था; और यदि उनकी मानसिक यात्रा इसी मंज़िल पर समाप्त हो जाती तो उनकी शायरी चिन्तन की नहीं केवल नई परम्परा की शायरी होकर रह जाती। वह विशालता तथा सार्वभौमता, सृष्टि तथा ब्रह्माण्ड की वे गूढ़ समस्याएँ और उनका समाधान1 जो यूरोप-भ्रमण के बाद उनकी रचनाओं में उत्पन्न हुआ, हम तक न पहुँचता।
1905 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जब आप यूरोप गये2 तो वहाँ आपको एक नई दुनिया देखने को मिली। यूरोपियन सभ्यता में उन्हें गुँ भी नज़र आए, लेकिन गुणों से अधिक दोष दिखाई दिए। विशेषकर यूरोपवालों की अन्य देशों तथा जातियों को दास बनाने की
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1.जिनसे सैद्धान्तिक मतभेद तो हो सकता है लेकिन जिनकी प्रभावात्मकता से इन्कार करना सम्भव नहीं।
2.यूरोप के तीन वर्षीय निवास में आपने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र क्री डिग्री प्राप्त की। ईरान के दर्शन पर एक पुस्तक लिखी, जिस पर जर्मनी म्यूनिख विश्वविद्यालय ने आपको डाक्टरेट की डिगरी प्रदान की। जर्मनी से वापस आकर आपने लन्दन में बैरिस्टरी की परीक्षा पास की। उन दिनों प्रोफ़ेसर आर्नल्ड भारत से वापस लन्दन जाकर लन्दन विश्वविद्यालय में अरबी के प्रोफेसर नियुक्त हो चुके थे। उनके छुटटी जाने पर छः मास तक आप उनके स्थान पर अरबी पढ़ाते रहे।

दुर्भावना, तथा-छोटे-बड़े और काले-गोरे का भेद-भाव देखकर उनके हृदय पर गहरी चोट लगी। भारत में भारतवासियों की अंग्रेज़ों द्वारा हो रही दुर्दशा को वे पहले ही देख चुके थे और उन्हें जगाने का यथासम्भव प्रयत्न भी कर चुके थे। अब विशाल अध्ययन तथा विस्तृत निरीक्षण के बाद उनकी क़लम से :


    दियारे-मग़रिब1 के रहनेवालों खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
    खरा जिसे तुम समझ रहे हो, वो अब ज़रे-कम-अयार होगा
    तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी
    जो शाख़े-नाजुक2 पे आशियाना बनेगा नापायदार3 होगा


ऐसे शे’र निकलने लगे और उन्होंने गम्भीर समस्याओं पर विचार करना शुरू किया।
क्या सृष्टि के रहस्य को हम बच्चों का खेल कहकर टाल सकते हैं ? और यदि सचमुच यह बच्चों का ही खेल है तो पश्चिम में यह अधिक सफलता के साथ क्यों खेला जा रहा है ? पूर्वी देश क्यों केवल प्राचीन महानता और आध्यात्मिक विचारधारा पर सन्तुष्ट हैं ? यहाँ उनके सामने दर्शन और विज्ञान के नए मोड़ आए। ‘डार्विन’ की खोज, मात्र ‘बुद्धि’ को अपूर्ण प्रमाणित करने वाला ‘कांट’ का तर्क, ‘हैगल’, जो अनुकूलता-प्रतिकूलता (Opposites) को ही विश्व-विकास का नियम सिद्ध करता है, ‘नत्शे’ का ‘तूफ़ानी अहं’ का सिद्धान्त और ‘बरगुसां’ का अन्तर्ज्ञान को प्रदान किया हुआ नया महत्व इत्यादि दार्शनिक सिद्धान्त नए-नए पहलुओं से उनके सामने आए। कुछ सिद्धान्त उन्होंने मार्क्स और लेनिन से भी लिए। अब उन्होंने पूरे ब्रह्माण्ड को एक विशाल कैन्वेस के रूप  में देखा। सत्य और तथ्य की तलाश उन्हें नए-नए रास्तों पर ले गए। एक पड़ाव से दूसरा पड़ाव। एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल। विभिन्न
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1.पश्चिमी देशों के 2.कोमल टहनी 3. क्षण-भंगुर।

पथ-प्रदर्शकों के नेतृत्व में उन्होंने ब्रह्माण्ड के कोनोंखुदरों की सैर की। कल्पना की वादियों में वे बहुत दूर तक निकल गए, यहाँ तक कि उनकी कल्पना पर कोई भी सिद्धान्त पाबन्दी न लगा सका। कोई मंज़िल-मंज़िल, न रही। आगे बढ़ने और बढ़ते चले जाने की, सितारों से आगे और जहान देखने की उमंग और उत्सुकता उत्पन्न हुई और यहीं से उनकी शायरी में वह वेग, सौन्दर्य प्रेरणा और दर्शन-सम्बन्धी गहनता पैदा हुई जो उससे पहले की उर्दू शायरी में कहीं नहीं मिलती और जिसके बिना हम आधुनिक उर्दू शायरी की–और विशेष रूप से प्रगतिशील शायरी की-कल्पना तक नहीं कर सकते। ये इक़बाल ही थे जिन्होंने सबसे पहले ‘इंक़िलाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और उर्दू शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया। पूँजीपति और मज़दूर, ज़मींदार और किसान, स्वामी और सेवक, शासक और पराधीन की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की उर्दू शायरी में देखते हैं, उन सबपर सबसे पहले इक़बाल ने ही क़लम उठाई थी और यही वे विषय हैं जिनसे उनके बाद की पूरी पीढ़ी प्रभावित हुई और यह प्रभाव ‘जोश’ मलीहाबादी, ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी, ‘हफ़ीज़’ जालंधरी, ‘एहसान दानिश’ इत्यादि राष्ट्रवादी, रोमांसवादी और क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ तथा अधिक स्पष्ट रूप धारण करता हुआ फ़ैंज अहमद ‘फ़ैज’, ‘सरदार जाफ़री’, ‘साहिर’ लुधियानवी, ‘मख़दूम’ मुहीउद्दीन, ‘वामिक़’ जौनपुरी जैसे आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है।

1908 में यूरोप से वापस आकर इक़बाल स्थाई रूप से लाहौर में रहने लगे। कुछ समय तक प्रोफ़ेसरी करने के बाद हमेशा के लिए नौकरी छोड़ दी और बैरिस्टरी का स्वतन्त्र धंधा अपना लिया। इस काल में उन्होंने उर्दू की बजाय फ़ारसी में अधिक लिखा। फ़ारसी को उर्दू भाषा के स्थान पर विचार-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने का कारण यह था कि ज्यों-ज्यों दर्शन-शास्त्र आदि विधाओं का उनका अध्ययन गहन होता गया और उन्हें गूढ़ विचारों के प्रकटीकरण की आवश्यकता अनुभव हुई तो उन्होंने देखा कि उर्दू भाषा का शब्द-भण्डार फ़ारसी के मुक़ाबले में बहुत कम है। कुछ लोगों का मत यह है कि उर्दू के स्थान पर फ़ारसी को अपना माध्यम बनाने में यह भावना निहित थी कि अब वे केवल भारत के लिए नहीं, संसार-भर के मुसलमानों के लिए शे’र कहना चाहते थे। कारण कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि फ़ारसी भाषा में शे’र कहने से उनका यश भारत से निकलकर न केवल ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, टर्की और मिश्र तक पहुँचा, बल्कि ‘असरारे-ख़ुदी’ ‘अहंभाव के रहस्य) पुस्तक की रचना और डॉक्टर निकल्सन के उसके अंग्रेज़ी अनुवाद से तो पूरे यूरोप और अमरीका की नज़रें इस महान भारतीय कवि की ओर उठ गईं।

और कदाचित् इससे प्रभावित होकर अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें ‘सर’ की श्रेष्ठ उपाधि प्रदान की। (साहित्य-सेवा के फलस्वरूप टैगोर के अतिरिक्त केवल इक़बाल को ही भारत में यह सम्मान मिला।) ‘असरारे-खुदी से तो ख़ैर उनकी ख्याति को चार चाँद लगे ही, लेकिन चिन्तन की दृष्टि से उनकी अन्य फ़ारसी रचनाएँ ‘असरारे-खुदी’ से आगे जाती हैं। ‘पयामे-मशरिक़’ में, जो जर्मनी के महान कवि और विचारक ‘गेटे’ की रचना ‘पश्चिमी प्रणाम’ के उत्तर में लिखी गई थी, दर्शन-सम्बन्धी विचारों का बड़ा सुन्दर उल्लेख मिलता है। इसमें कुछ ऐसी गहन समस्याएं और उनका समाधान किया गया है जिसका उल्लेख इससे पूर्व इतने सरल तथा आकर्षक ढंग से नहीं हुआ था। सारांश इस रचना का यह है कि एक भूला-भटका शायर जन्नत में पहुँच जाता है। अपने विचारों में वह इतना डूबा हुआ है कि जन्नत की खूबसूरतियों की ओर आँख तक उठाकर नहीं देखता। जन्नत की हर हूर उसे देखती है और कहती है कि तू बड़ा विचित्र प्राणी है, न तू शराब पीता है, न मेरी ओर देखता है ! इसपर शायर उत्तर देता है कि मेरा मन जन्नत में नहीं लगता। आकांक्षा की कसक मुझे कहीं चैन नहीं लेने देती। जब मैं किसी रूपवान को देखता हूँ जो बजाय इसके कि मैं उसके रूप की सराबना करूँ या उससे आनन्दित होऊँ मेरे मन में तुरन्त यह इच्छा उत्पन्न हो जाती है कि काश मैंने इससे अधिक रूपवान को देखा होता।






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