Gyan Ganga - A Hindi Book by - Ganga Prasad Sharma - ज्ञान गंगा - गंगा प्रसाद शर्मा
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Gyan Ganga

ज्ञान गंगा

<<खरीदें
गंगा प्रसाद शर्मा<<आपका कार्ट
मूल्य$ 13.95  
प्रकाशकएम. एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर
आईएसबीएन81-7900-039-7
प्रकाशितमार्च ०४, २००४
पुस्तक क्रं:4915
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Gyan Ganga

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संतो, महात्माओं, राजनेताओं, बहादुर सूरमाओं, फकीरों, कवियों, नर-नारायनो और पूजा योग्य देवी-देवताओं के विचारों का कभी न घटने वाला खजाना।

महान ग्रंथों से

गुणावदा श्रयान्निर्गुणोऽपि गुणी भवति
(चाणक्यसूत्राणि 176)
निर्गुण व्यक्ति भी गुणवान की संगत से गुणी बन जाता।
ब्रुवते ही फलेन साधवो न तु कंठेन निजोपयोगितम्:।
--नैषीधीयचरितम् 2/48

-साधु अपनी उपयोगिता फल से प्रकट करते हैं, वाणी से नहीं।
वृथापि खेदो हि वरं शुभात्पनः सुखं न तत्वेऽपि विगर्हितात्मनः।
(बुद्धचरितम् 9/75)
शुभाचारी का वृथा प्रयत्न भी अच्छा है, किंतु अशुभाचारी का यथार्थ सुख भी अच्छा नहीं है।
निरुपधि ही प्रेम कथंचिदप्युपघिं न सहते।
(चैतन्यचंद्रोदयम् 7/16)

निष्कपट प्रेम किसी भी कपट को नहीं सह सकता है।
स्वमानसारेण सदैव दुष्टो जगद् विजानाति हि दुष्टमेव
-मनोरंजन-नाटक 2/17

अपने मान-स्वभाव के अनुसार दुष्ट तो संसार को भी दुष्ट ही समझता है।
प्रमादो नैव कर्तव्यो नरेण शुभमिच्छता
(तंत्रोपाख्यानम् पृ 39)

शुभेच्छु व्यक्ति को प्रमाद नहीं करना चाहिए।
कल्पद्रुमः कल्पितमेव सूते, सा
कामधुक् कामितमेव दोग्धि।
चिंतामणिश्चिंतिमेव दत्ते, सतां हि सगः
सकलंप्रसूते
(सुभाषितावली 501)

कल्पवृक्ष केवल संकल्पित वस्तुएं ही देता है। कामधेनु काम्य वस्तु ही प्रदान करती है। चिंतामणि भी चिंतित पदार्थ देने में समर्थ है, किंतु सत्पुरुषों का संग सब कुछ देने की सामर्थ्य रखता है।
विदुषां वदनाद्वाचः सहसा यान्ति नो बहिः ।
याताश्चेन्न पराञ्चन्ति द्विरदातां रदा इव।।
(भामिनी-विलास)

विद्वानों के मुख से सहसा बातें बाहर नहीं निकलती और यदि कहीं निकली तो हाथी के दांत की तरह कभी परावर्तित नहीं होती।
आशा बलवती कष्टं नैराश्यं परमं सुखम्।
(व्यास)

बलवती आशा कष्टप्रद है। नैराश्य परम सुख है।
गुणिनामपि निजरूपप्रतिपत्तिः पस्त एवं संभवति।
स्वमहिमदर्शननमक्ष्योर्मु कुरतत्रे जायते यस्मात्।।
(कविता-कौमुदी पृष्ठ 355)

गुणियों को भी अपने रूप का ज्ञान दूसरों के द्वारा ही होता है। वे स्वयं अपने गुणों को नहीं जान सकते, नेत्र अपने गौरव का अनुभव तब तक नहीं कर सकते, जब तक कि उनके सामने दर्पण न रखा जाए।
जे संग नामे, से बहुं नामे।
(आचारांग 1/3/4)

जो एक अपने को नमा लेता है—जीत लेता है, वह समग्र संसार को नमा (जीत) लेता है।
हीना वा एते हीयंस्ते ये व्रात्यां प्रवसन्ति।
(तांड्य महाब्राह्मण-(17/1/2)

जो निषिद्ध कर्म का अचरण करते हैं, वे हीनतर होते जाते हैं।
न लोके दीव्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया।
अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्या प्रकाशते।।
--महाभारत

केवल अपनी प्रशंसा करने से मूर्ख जगत् में ख्याति नहीं पा सकता। गुफा में छिपे रहने पर भी विद्वान् की सर्वत्र प्रसिद्धि होती है।
सम्पत्तौ विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा।।
-पंचतंत्र

संपत्ति और विपत्ति में महापुरुषों का व्यवहार एक सा रहता है। सूर्य उदय के समय रक्त वर्ण का होता है और अस्त के समय भी रक्त वर्ण का ही होता है।
वयोऽनुरूपः वेषः।
-चाणक्यनीति

अवस्था के अनुरूप ही वेष होना चाहिए।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
-नीतिशतक

आलस्य मनुष्यों के शरीर में रहने वाला महान् शत्रु है।
बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।
-हितोपदेश

भूखा मनुष्य कौन-सा पाप नहीं कर सकता ?
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्नने चापराह्गिकम।
नहि प्रतिक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम।।
-महाभारत

कल का कार्य आज कर। दोपहर का कार्य दोपहर से पहले कर। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती कि मनुष्य ने काम पूरा किया या नहीं।
मातरं पितरं चैव यस्तु कुर्यात् प्रदिक्षिणम्।
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्रद्वीपा वसुन्धरा।।
-पद्मपुराण

जिसने अपने माता और पिता की प्रदक्षिणा कर ली समझो कि उसने सातों द्वीपों वाली पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर ली।
कृतिनोह्मपि प्रतीक्षन्ते सहायं कार्यसिद्दये।
चक्षुष्मानपि नालोकाद् विना वस्तूनि पश्यति।।
-कवितामृतकूप

कुशल व्यक्ति भी कार्य की सिद्धि के लिए सहायक की अपेक्षा रखता है। नेत्रों से संपन्न होने पर भी कोई पदार्थ को प्रकाश के बिना नहीं देख सकता है।
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
-ऋग्वेद

देवता श्रम करने वाले के अतिरिक्त किसी और से मित्रता नहीं करते हैं।
आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति।
-नैषीधीपंचारत

सरलता कुटिल व्यक्तियों के प्रति नीति नहीं है।
उपायेषु स्थितस्यापि नश्चन्तयर्थाः प्रमाद्यतः
-शिशुपालवध

युक्तिपूर्वक कार्य करनेवाले मनुष्य के कार्य भी असावधान हो जाने से नष्ट हो जाते हैं।
यथा हि कुरुते राज प्रजास्तमनुवर्तते।
-रामायण

जो राजा करता है, प्रजा उसी का अनुसरण करती है।
अर्थातुराणां न गुरुर्न बंधुः।
-नीतिशास्त्

धन में आसक्त लोगों का न कोई गुरु होता है और न कोई बंधु।
योजनानां सहस्त्राणि याति गच्छन् पिपीलिका।
अगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति।।
-मार्कण्डेयपुराण

चींटी चलती रहे तो हजारों योजन पार कर जाती है। न चलता हुआ गरुण भी एक कदम आगे नहीं चलता।
शनैः शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जिम।
-पंचतंत्र

स्वयं कमाने गये धन का धीरे-धीरे उपयोग करना चाहिए।
दुर्बलोह्मपि राजा नावमन्तव्यः
-चाणक्य सूत्र

दुर्बल राजा का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञान न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।
-नीतिशतक

जिन मनुष्यों के पास न विद्या, न दान, न ज्ञान, न शील, न गुण, और न धर्म ही है, वे इस मनुष्यलोक में पृथ्वी पर भाररूप हैं, जो आकृतिमात्र से मनुष्य होकर पशुरूप में विचरण करते हैं।
पाण्डितोऽपि वरं शत्रु न मूर्खो हितकारकः।
-पंचतंत्र

पण्डित शत्रु भी अच्छा है, हित करने वाला मूर्ख नहीं।
को हि वितं रहस्यं व स्त्रीषु शक्चोति गूहितम्।
-कथासरित्सागर

कौन धन या रहस्य की कोई बात स्त्रियों में छिपाने में समर्थ है ?
गुणों ही गौरवस्थानं न रूपं न धनं तथा।
-अज्ञात

गुण ही प्रतिष्ठा का स्थान है, रूप और धन नहीं।
रिक्तपाणिनं पश्येत् राजानं देवतां गुरुम।
-सुभाषितरत्न

राजा, देवता और गुरु से खाली हाथ नहीं मिलना चाहिए।
सर्वः प्रियः खलु भवत्यनुरूपचेष्टः।
-शिशुपालवध

अपने अनुकूल चेष्टा करने वाले सभी प्रिय होते हैं।
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः।
-महाभारत

जो अपने प्रतिकूल जान पड़े उसे दूसरों के प्रति भी न करें।
आम्रं छिज्वा कुठारेण निम्बं परचिरेत्तु कः।
-रामायण

आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी जगह नीम का सेवन कौन करेगा ?
महाजनस्य सम्पर्कः कस्य न उन्नतिदायकः।
पद्यपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रिमम्।
-पंचतंत्र

महान् पुरुषों का संग सबको उन्नति देनेवाला होता है। कमल के पत्ते पर पड़ा हुआ जल मोती की-सी श्री को प्राप्त करता है।
कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः।
-मुद्रारासक्षस

आग के साथ तिनकों का कैसा विरोध ?
अहिं नृपं च शार्दूलं वरटां बालकं तथा।
परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयता।।
चाणक्य नीति

सांप, राजा, शेर, ततैया, शिशु, पराया कुत्ता और मूर्ख इन सात को सोते हुए से नहीं जगाना चाहिए।
स्त्रीचित्तमहो विचित्रमिति।
-कथासरित्सागर

स्त्रियों का चित्त सचमुच बड़ा विचित्र होता है।
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।
(यजुर्वेद 34/1)

मेरे मन के संकल्प कल्याणमय हों।
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः।
(कठोपनिषद् 1/1/27)

मनुष्य की तृप्ति लौकिक धन से नहीं हो सकती।
सहृदयं सामनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
(अथर्ववेद)

मनुष्यों को परस्पर किसी प्रकार के द्वेष से रहित मित्रता और प्रेम का व्यवहार करना चाहिए।
निधानं सर्वरत्नाम हेतुः कल्याणसंपदाम्।
सर्वस्या उन्नतेर्मूलं महतां संग उच्यते।।
(रश्मि-माला 38/1)

महान् पुरुषों का संग समस्त उत्कृष्ट अमूल्य पदार्थों का आश्रय, कल्याण-संपत्तियों का हेतु और सारी उन्नति का मूल कहा जाता है।
उदायुषा स्वायुषोदस्थाम्।
(यजुर्वेद 4/28)

हम दीर्घ और शुभ जीवन के लिए सदा उद्योगशील रहें।
उद्यमो मित्रवद् ग्राह्मः प्रमादं शत्रुवत्त्यजेत्।
उद्यमेन परा सिद्धिः प्रमादेन क्षयो भवेत्।।
(बुद्धचरितम् 26/73)

उद्योग को मित्र की तरह ग्रहण करना चाहिए। प्रमाद को शत्रु की तरह त्यागना चाहिए। उद्यम से परम सिद्धि मिलती है तथा प्रमाद से क्षय होता है।
स्वस्ति पंथामनुचरेम सूर्याचंद्रमसाविव।
(ऋग्वेद 5/51/15)

सूर्य और चंद्रमा के समान हम अपने जीवन-मार्ग पर सकुशल चलते रहें।
माहं राजन्नन्यकृतेन भोजम्।
(ऋग्वेद 2/28/9)

राजन ! मैं दूसरों की कमाई न खाऊं।
मा प्र गाम पथो वयम्।
(ऋग्वेद 10/57/1)

हम राह से बेराह न हों।
आशया हि किमिव न क्रियते।
(कादम्बरी)

आशा से क्या नहीं किया जाता ?
धीरास्तु दृष्ट सन्मार्गा विवेकामल चक्षुषः।
न पतन्त्यवेटे प्राप्यमवश्यं प्राप्नुवन्ति च।।
(कथासरित्सागर 12/34/22)

विवेक के कारण निर्मल दृष्टि से युक्त धीर मनुष्य, सन्मार्ग को देखकर चलने के कारण गर्त में नहीं गिरते और अपने उद्देश्य को अवश्य प्राप्त कर लेते हैं।
निर्मल न मनो यावत् तावत् सर्वं निरर्थकम्।
(देवी भागवत)

मनुष्य का मन जब तक निर्मल न हो तब तक पूजा-पाठ आदि सब धर्मकार्य निरर्थक हैं।
तस्य तदेव हि मधुरं यस्य मनो यत्र संलगति।
(सुभाषितरत्नभाण्डारगार पृष्ठ 170)

उसके लिए वही वस्तु मधुर है जिसका मन जिसमें लगता है।
चिन्तया चित्तसंताप आत्मदौर्बल्यमेव च।
प्रत्यक्षं जायते तस्मात् चिंता तां परिवर्जयेत्।।
(रश्मि-माला 46/3)

यह प्रत्यक्ष देखने में आता है कि चिंता से चित्त को संताप और आत्म-दुर्बलता ही होती है। इसलिए चिंता को छोड़ ही देना चाहिए।
विश्राहा वयं सुमनस्यमाताः।
(ऋग्वेद 3/75/8)

हम सदा ही अपने मन को प्रसन्न रखें।
दृष्टपूर्व फलं बीजं धीमान् वपति नान्यथा।
तथा त्वं कुरु तत्कर्म यस्य दृष्टं फलं पुरा।।
(बुद्ध चरितम् 26)

बुद्धिमान लोग, जिसका फल पहले देख लिया गया हो, वैसा बीज बोते हैं; अन्यथा नहीं बोते। इसी तरह तुम भी ऐसा कर्म करो जिसका फल महात्माओं ने पहले देखा।
दातृणां धार्मिकाणां च शूरणां कीर्तन सदा।
श्रणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिंद नैव लक्षयते्।।
(शुक्रनीति : 3/110)

दाता, धार्मिक और शूर-पुरुषों का गुण-कीर्तन (प्रशंसा) सदा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए और इन सब के दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए।
क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत्।
(नारद परिव्राजकोपनिषत् 3/43)

क्रोधी पर प्रतिक्रोध न करें। आक्रोशी से भी कुशलतापूर्वक बोलें।
जयति तदा वै रिपुमाल्लोकुष्टो भवेद्यदा वैरिपुमान।
(युधिष्ठिर विजयम् 3/79)

निश्चित ही शत्रुयुक्त पुरुष की तभी जय होती है जब वैरी-पुरुष लोक से निंदित होता है।
धर्मार्थ क्षीणकोशस्य कृशत्वमपि शोभते।
(कामंदकीय नीतिसार 5/87)

धर्म तथा सत्कार्यों में अधिक व्यय के कारण जिसका कोष/खजाना क्षीण हो गया है, ऐसे व्यक्ति की निर्धनता भी शोभनीय होती है।
क्व च स्वजनसंवासः क्व च नीचपराश्रयः।
(वाल्मीकिरामायण 6/67/14)

कहां तो स्वजनों के बीच रहना और कहां नीचों का सहारा।
लक्ष्मीः शिक्षयति गुणानमूरुनर्दुगतिर्निधूनयति।
(आर्यासप्तशती 503)

लक्ष्मी जिन गुणों को उत्पन्न करती है। दुर्गति उन्हें नष्ट कर देती है।
मा गतानामा दीधीथा ये नयन्ति परावतम्।
(अथर्ववेद 8/1/8)

अतीत का शोक मत कर, क्योंकि ये शोक मनुष्य को बहुत दूर पतन की ओर ले जाते हैं।
अमात्यैः कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रितः निग्राह्मः सर्वथा सदिभः
रामायण

अच्छे मंत्रियों को चाहिए कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्ग पर चलने लगे, उसे सब प्रकार से रोकें।
पुष्पहीनं सहकारं नोपसर्पन्ते भ्रमराः।
चाणक्य नीति

भंवरे बिना फूल वाले पेड़-पौधे के पास नहीं जाते हैं।
याच्या मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा।
-मेघदूत

अधिक गुणवाले के पास की गयी याचना निष्फल भी हो जाती है तो अच्छी ही है, किंतु गुणहीन पुरुष के पास की गयी याचना सफल भी ही तो अच्छी नहीं।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्वजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।
-हितोपदेश

कुल के कल्याण के लिए एक को त्याग दे, ग्राम के कल्याण के लिए सारे कुल को त्याग दे, प्रांत के कल्याण के लिए ग्राम को त्याग दे और अपनी आत्मा के कल्याण के लिए पृथ्वी को ही त्याग देना चाहिए।
न काचस्य कृते जातु मुक्तामणेः क्षतिः
-कथासरित्सागर

कांच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है।
न निष्प्रयोजनमाधिकारवन्तः प्रभुभिराहुयन्ते
-मुद्राराक्षस

राजाओं के द्वारा अधिकारी लोग बिना प्रयोजन के नहीं बुलाये जाते हैं।
वामः कामो मनुष्याणां यस्मिन् किल निबध्यते।
जने तस्मिंस्त्वनुकोशः स्नेहश्च किल जायते।।
मनुष्यों में यह प्रेमभाव बड़ा टेढ़ा है। वह जिसके प्रति बंध जाता है, उसी के प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है।
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः।।
धनवानों में सुस्वादु अन्न को सेवन करने की शक्ति प्रायः नहीं रह जाती है, परंतु गरीब लोग काठ को भी पूरी तरह से पचा जाते हैं।
कुलीनैः सह सम्पर्कं पंडितैः सह मित्रताम्।
ज्ञातिभिश्च समं सख्यं कुर्वाणो नावसीदिति।।
-चाणक्यनीति

कुलीनों के साथ संपर्क, पंडितों के साथ मित्रता, बंधुओं के साथ मेलजोल रखनेवाला व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता है।
उच्छेत्तुं प्रभवति यन्न सप्तसप्तिस्तन्नैशं तिमिरमपाकरोति चन्द्रः।
-अभिज्ञान शाकुंतलं

सूर्य रात्रि के जिस अंधकार को विनष्ट करने में समर्थ नहीं होता, उसको चंद्रमा दूर करता है।
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः।
-पंचतंत्र

यत्न करने पर भी यदि काम सिद्ध न हो तो इसमें मनुष्य का क्या दोष ?
जले तेलं खलं गृह्यं पात्र दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः।।
-चाणक्यनीति

पानी में तेल, दुर्जन में गुप्त बात, सत्पात्र में दान और विद्वान व्यक्ति में शास्त्र का उपदेश थोड़ा भी हो, तो स्वयं फैल जाता है, क्योंकि इनमें वस्तु की शक्ति प्रधान कारण है।
न यथा रिपुर्न शस्त्रं नाग्निं विषं न दारुणो व्याधि
परितापयाति च पुरुषं यथा कटुक्भाषिणी वाणी
-नीतिविदषाष्टिका

न शत्रु न शस्त्र, न अग्नि, न विष और न दारुण रोग ही मनुष्य को उतना संतप्त करते हैं। जितनी कड़वी वाणी।
मधुरापि हि मूर्च्छयते विषविटपिसामिश्रित बल्ली।
-वेणीसंहार

विषवृक्ष का आश्रय लेनेवाली लता मधुर होने पर मनुष्य को मूर्च्छित कर देती है।
उप्तं सुकृतबीजं हि सुक्षेत्रेषु महाफलम्।
कथासरित्सागर

सही स्थान पर बोया गया सुकर्म का बीज ही महान् फल देता है।
जलसेकेन बर्धन्ते रवो नाश्सञ्चयाः।
भव्यो हि द्रव्यतामेति क्रियां प्राप्य
तथाविधाम्।।
(सुभाषितावलिः203)

जल से सींचने पर पेड़ बढ़ते हैं, पत्थरों का ढेर नहीं। योग्य ही अपने अनुकूल आचरण पाकर पदार्थ बन जाता है।
अस्थाभिनिवेशी प्रायो जऽ एव भवति नो विद्वान।
बालादन्यः कोऽम्भसि जिघृक्षतीन्दोः स्फुरद्विम्बम्।।
(सुभाषित रक्तकोष 1356)

अलभ्य वस्तु कामना मूर्ख ही करते हैं न कि बुद्धिमान।
अन्य नहीं बल्कि बालक ही पानी में चमकते हुए चंद्रमा के प्रतिबिम्ब को पकड़ने की कोशिश करता है।
उत्साहवन्तः पुरुषः नावसीदन्ति कर्मसु।
(वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड 1/123)

उत्साही पुरुष बड़े-से-बड़े जटिल कार्यों में भी अवसन्न-दुःखित नहीं होते।
अर्थैरर्थाः प्रबध्यन्ते गजाः प्रतिगजैरिव।
(कौटिल्य अर्थशास्त्र 9/4/2)

अर्थ से ही अर्थ उसी प्रकार प्राप्त किया जाता है जिस प्रकार हाथी से हाथी प्राप्त किये जाते हैं।
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
चञ्चन ‘चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत।।
(चाणक्य नीति दर्पण: /1)

बुद्धिमान को चाहिए कि वह धन का नाश, मन का संताप, घर के दोष, किसी के द्वारा ठगा जाना और अमानित होना—इन बातों को प्रकाशित न करे, किसी के समक्ष न कहे।
आदौ चित्तै ततः काये सतां संजायते जरा।
असतां च पुनः काये नैव चित्ते कदाचन।।
(सुभाषित रत्नमाला)

ज्ञानी पुरुष का मन पहले प्रौढ़ होता है उसके पश्चात् शरीर, परन्तु मूर्ख का शरीर पहले प्रौढ़ अवस्था प्राप्त करता है और मस्तिष्क कभी भी परिपक्व नहीं होता। न संस्कृतं प्रमिमीतः।
(ऋग्वेद 5/762)

अच्छे संस्कारों को नष्ट न करो।
अचेतानस्य मा पथो वि दुक्षः।
(ऋग्वेद 7/4/7)

मूर्ख के मार्ग का अनुसरण नहीं करना चाहिए।
न दीर्घमायुं लभते धनेन,
न चापि वित्तेन जरं विहंति।
(सूक्ति त्रिवेणी 14/15)

न चापि वित्तेन जरं विहंति।
धन से कोई लंबी आयु नहीं पा सकता हैं, और न धन से जरा का ही नाश किया जा सकता है।
नाऽदेशकाले विक्रांतं कल्याणाय विधयिते।
(महाभारत, विराट्पर्व 49/3)

उचित देश और काल में जो पराक्रम किया जाता है वह कल्याणकारी होता है।
मातरं पितरं यो हि आचार्य चावमन्यते।
स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवंशगतः।।
-रामायण

जो मनुष्य माता, पिता और आचार्य का अपमान करता है, वह यमराज के हाथों में जाकर उस पाप का फल भोगता है।
यथा मधुसमादन्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः।
तद्वदर्थान्मनुष्येम्यः आदद्यादविसिंहया।
-महाभारत

-जैसे भौंरा पुष्पों की रक्षा करता हुआ उनसे मधु ग्रहण कर लेता है, वैसे ही बिना हिंसा किये दूसरों से धन ग्रहण करना चाहिए।
स्वजातिर्दुरतिक्रमा।
-पञ्चतंत्र

अपनी जाति का मोह त्यागना कठिन होता है।
नहि चूड़ामणिं पादे नुपुरं मूर्ध्नि धार्यते।
अज्ञात

कोई भी चूड़ामणि को पैर में नहीं पहनता है और न नुपुर को सिर में।
उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्
-चाणक्य सूत्र

उद्योग करने पर दरिद्रता नहीं रहती।
यद्यच्छीर्षचरितं तत्तदनुवर्तते लोकः।
-भागवतपुराण

बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।
किं केतकी फलति किं पनसस्य पुष्पं
किं नागवल्लर्यपि तु पुष्पफलैरुपेता।
कस्यापि कोअ प्यतिशयोअस्ति नयेन सदिनः
संग्राह्यते जगति याति यतः प्रतीतः।।
-नराभरण

क्या केवड़ा फलता है ? क्या कटहल में फूल होता है ? क्या पान पुष्प-फल से युक्त होता है ? वास्तव में किसी में कुछ वैशिष्ट्य होता है, जिस कारण से सज्जनों द्वारा उसे सम्मान मिलता है और उसकी पहचान होती है।
अराते चित्तं वीअर्सन्याकूतिं पुरुषस्य च।
-अथर्ववेद

कृपणता मनुष्य के मन और संकल्प को मलिन कर देती है।
अकस्मादेव यः कोपात् पुरुषं बहुभाषते।
तस्मादुद्विजते लोकः सस्फुलिड. गादिवानलात्।।
कामन्दकीयनीतिसार
जो व्यक्ति एकाएक क्रोध में आवेश में आकर कठोर वचन बोलता है, लोग उससे उसी प्रकार भयभीत रहते हैं, जैसे आग से निकलनेवाली चिनगारी।
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