Hasya-Vyagya-Rang Ekanki - A Hindi Book by - Ramgopal Verma - हास्य-व्यंग्य-रंग एकांकी - रामगोपाल वर्मा
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Hasya-Vyagya-Rang Ekanki

हास्य-व्यंग्य-रंग एकांकी

<<खरीदें
रामगोपाल वर्मा<<आपका कार्ट
मूल्य$ 9.95  
प्रकाशकआत्माराम एण्ड सन्स
आईएसबीएन81-7043-217-x
प्रकाशितअप्रैल २०, २००६
पुस्तक क्रं:4891
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Hasya-Vyagya-Rang Ekanki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरा यह पहला एकांकी-संग्रह है। इस संग्रह में मेरे जिन एकांकी नाटकों को स्थान मिला है वे सभी नाट्य-प्रतियोगिताओं व वार्षिक समारोहों के अवसर पर मंचित हो चुके हैं। ‘कन्ज़क्टीवाइटीज’, ‘कूड़ा-फेंक-विरोध-समिति’ और ‘शान्ति की खोज’ इन तीनों नाटकों का रेडियो से प्रसारण हो चुका है। यहाँ इन्हें मंच के उपयुक्त बनाकर प्रस्तुत किया गया है।
प्रस्तुत सभी एकांकी हास्य-व्यंग्य से भरपूर हैं। संवादों में शब्दों और वाक्यों का गठन चरित्र के व्यवहार में निहित हास्य रूप को ध्यान में रखकर किया गया है। व्यक्ति में जो चरित्र छिपा रहता है, वह परिस्थिति के अनुकूल व्यवहार और शारीरिक भंगिमाओं के द्वारा प्रस्तुत होता रहता है। ऐसा नहीं कि जिस व्यक्ति के हास्य-चरित्र को हम एक परिस्थिति में देख रहे हैं, उस व्यक्ति को रोना कभी नहीं आता। परिस्थिति के अनुसार वह दुःख भी अभिव्यक्त करता है। इन नाटकों में प्रस्तुत चरित्र समाज के ही अंग हैं; उनके जीवन से हास्य-व्यंग्य सामग्री की कल्पना कर उनके व्यवहार के द्वारा प्रस्तुत की गई है।
इन नाटकों के सभी पात्र काल्पनिक हैं। समाज की परिधि में ही उनकी कल्पना की गई है। व्यंग्य को स्पष्ट करने के लिए उन्हें प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह प्रस्तुतीकरण सरलता के धरातल पर सरसता बिखेरता चलता है; मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान और तर्क प्रस्तुत करता है।
सभी नाटक पूर्णतः रंगमंच प्रस्तुति के लिए उपयुक्त हैं। एकांकी कहकर प्रत्येक नाटक की मंचीय प्रस्तुति की समयावधि पन्द्रह मिनट से बीस मिनट तक सीमित है। मंच सज्जा के संकेत प्रत्येक नाटक के प्रारम्भ में दिए गए हैं। वेशभूषा, मुख-लेपन, अभिनय आदि रंगमंचीय विधानों की कल्पना निर्देशक के कौशल के लिए छोड़ दी गई है।
नाटकों को पुस्तकाकार करने में जिन प्रिय व पूज्य मित्रों का सहयोग व योगदान रहा उनमें प्रमुख हैं श्री सुभाष जी और श्री एस.के.स्याल जी जिनका मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूँ। पाठकों व रंग कर्मियों को ये नाटक सादर समर्पित हैं

कामन सैन्स
पात्र-परिचय


सेठ : आयु 55 वर्ष
सेठानी (मैम साहब) : आयु 50 वर्ष
धर्मचन्द : आयु 55 वर्ष
सेल मैन : आयु 25 वर्ष
ट्यूटर : आयु 45 वर्ष
नवयुवक : आयु 24 वर्ष
बेटी : आयु 18 वर्ष
गिटी : आयु 20 वर्ष
नितिन : आयु 24 वर्ष
अन्य : इन्सपैक्टर, कॉन्सटेबल, दो सिपाही तथा एजेण्ट
(सेठ जी के बंगले का ड्राइंग रूम। मध्य में सोफा सैट। दाहिने कोने में एक छोटी-सी मेज और कुर्सी। मेज पर पुस्तकें लगी हैं। बाएँ कोने में खाने की मेज जिसमें सजी हुई छः कुर्सियाँ रखी हुई हैं। सामने दीवार पर एक विदेशी पेंटिंग टँगी है। दाहिनी मेज के साथ दीवार पर एक तिथि-कैलेंडर है। अन्य सामान भी रखे जा सकते हैं जिससे भाषित होता है कि परिवार विदेशी संस्कृति में डूबा है। हाँ, खाने की मेज के साथ दीवार पर ऊपर ऊँटों के काफिले में लकड़ी के बने ऊँटों की पंक्ति नजर आ रही है। परिवार का सम्बन्ध राजस्थान से जुड़ा है।
समय प्रातः काल। बूढ़ा नौकर धर्मचन्द झुकी कमर से प्रवेश करता है। सफ़ाई करते हुए खाने की मेज़ पर पड़े हुए कलैंडर को उठा कर, खोल कर, उस पर अंकित राजस्थान की एक गूजरी की तस्वीर देखता है।)
नौकर : आहा ! रात नै सेठ जी लाए सूँ गुजरिया। कैसी सुन्दर सै ! म्हारे गाँव की होगी। (इधर-उधर की दीवारों में उसे टाँगने के लिए जगह तलाशता है।) खाने की मेज के पास दीवार पर टाँगता है।)
(इठे ठीक से। सेठ जी की कुर्सी के पास और मेम साहब की कुर्सी से दूर। (पुनः सफाई में लग जाता है। राजस्थानी धुन पर गुनगुनाता है।)
(मेम साहब नाईट गाउन में जम्हाई लेते हुए प्रवेश करती हैं।)
मेम साहब : धर्मचन्द, यह क्या ! फिर तुमने राजस्थानी फूहड़ गीत गाना शुरू कर दिया ? दुनिया बदल जाएगी, पर तू नहीं बदलेगा। देश 21वीं सदी में प्रवेश करने को है और तू अभी 16वीं सदी के गीत गाएगा। अँग्रेजी गीत नहीं सीख सकता ? जाओ मेरे लिए बैड टी बिरिंग।
नौकर : बिरिंग ?
मेम साहब : बिरिंग माने लाओ। लाओ। मेरी बैड टी यहीं ला।
नौकर : अभी लाया मेम साहब।
मेम साहब : नो, एटीकेट्स। नो कॉमन सैन्स। इडियट।
(अँग्रेजी गीत की भद्दी धुन गुनगुनाने लगती है। अचानक उसकी निगाह गूजरी के कलैंडर पर पड़ती है। उसे देखती है। मुँह बनाती है, उतारने दौड़ती है, रुक जाती है, जैसे यह काम मुझे करना नहीं बल्कि करवाना चाहिए। नौकर को पुकारते हुए)
धर्मचन्द, धर्मचन्द !

नौकर : (दौड़कर आता है) जी मेम साहब।
मेम साहब : यह कलैंडर कहाँ से लाया ?
नौकर : रात सेठ जी लाए थे।
मेम साहब : फिर सेठ जी।
नौकर : सॉरी मेम साहब, साब लाए थे।
मेम साहब : यहाँ यह किसने हैंग किया ?
नौकर : हैंग किया ?
मेम साहब : ओफ, ओह ! किसने लटकाया ?
नौकर : वह...वह...
मेम साहब : तुमने ?
नौकर : (स्वीकृति में सिर हिलाता है )
मेम साहब : उतारो इसे (नौकर तस्वीर उतारता है) तुम्हें हमारी प्रैस्टीज का बिल्कुल भी ख्याल नहीं है। बाहर फेंको इसे और मेरे कमरे से जर्मन की पेंटिंग लाकर लगाओ यहाँ। बाहर से आने वाले हमारे दोस्तों को यह नहीं पता चलना चाहिए कि हम राजस्थान के हैं। कोई पूछे भी तो बताओ हम दिल्ली के हैं और हमारे एन्सैस्टर इंग्लैण्ड से आए थे, समझे ? नो इण्डियन भाषा, नो इण्डियन फूड, नो इण्डियन ड्रेस। एवरीथिंग इम्पोर्टिड। (नौकर जाता है) इडियट नो कॉमन सैन्स (टेलीफोन की घण्टी बजती है।)
हैलो हाय किरण ! हाव यू ! वीसा के लिए एप्लाई कर दिया है...नहीं ऐसी बात नहीं है। अब इण्डिया में अच्छी कल्चर नहीं रह गई। यहाँ तो एटमॉसफियर बिल्कुल खराब हो गया है। कॉमन सैन्स तो है ही नहीं लोगों में। सब कुछ स्पोइल हो रहा है। अब, यू सी बच्चों में भी यह पौल्यूशन बढ़ता जा रहा है। बच्चों के डवलपमेंट के लिए उन्हें पूरी फ्रिडम देनी चाहिए। ऐसी फ्रिडम अमेरिकन कल्चर में है। इसलिए वहीं एस्टेबिलिस होने का थाट है...हाँ उसी की तैयारी चल रही है। माई हसबैंड...हाँ, उन्हीं को विदेशी कल्चर सिखा रहे हैं तुम्हारा ट्रेवलिंग एजेण्ट आया था। पासपोर्ट ले गया है बोला एक महीना लगेगा...हाँ, एक महीना तो हो गया है। आजकल में आने वाला है...याह...याह...डांस प्रैक्टिस भी चल रही है। (नौकर चाय रख कर चला जाता है) याह...ओ...के...बॉय,,,,बॉय। धर्मचन्द !

नौकर : जी मेम साहब।
मेम साहब : (चाय बनाते हुए) साहब उठे या नहीं ?
नौकर : सेठ जी तो...
मेम साहब : फिर सेठ जी ?
नौकर : ओह...सॉरी, साहब तो चार बजे ही उठ गये थे।
मेम साहब : चार बजे ?
नौकर : जी हाँ मेम साहब। नहा-धोकर पूजा करने मन्दिर गए हैं।
मेम साहब : (सिर पर हाथ रखकर) कितनी बार समझाया है लेट सो कर उठा करो। जल्दी उठना अमेरिकन फैशन नहीं है। तुमने उन्हें उठाया होगा !
नौकर : नहीं मेम साहब। उन्होंने मुझे उठाया था।
मेम साहब : क्यों ?
नौकर : मैंने उनके साथ योगासन किए थे।
मेम साहब : और कल जो हैल्थ मैनेजर उन्हें एक्सरसाइज बता गया था, वे नहीं कीं ?
नौकर : नहीं मेम साहब।
मेम साहब : और सुबह कुत्ते को टट्टी कराने बाहर ले गए थे या नहीं ?
नौकर : नहीं मेम साहब।
मेम साहब : ओह...नो कॉमन सैन्स। पता नहीं अमरीकन एटमोसफियर में कैसे सेट होंगे ?
(चाय समाप्त करती है। चली जाती है। बाहर से कुत्ते के भोंकने की आवाज आती है। सेठ जी कुत्ते से बचने के लिए भागते हुए चिल्ला रहे हैं। नौकर भागकर सेठ जी को बचाता है और उन्हें पकड़े हुए मंच पर प्रवेश करता है)
नौकर : सेठ जी, यह कुत्ता तो आपकी धोती का दुश्मन है।
मैडम : (आते हुए) क्या हुआ ?
सेठ : (साँस फूली है) हुआ क्या ? जब से यह विलायती कुत्ता इस घर में आया है, मेरी धोती तो साबुत बची ही नहीं।
मैडम : जब आपको यह पता है कि यह विदेशी कुत्ता धोती पसन्द नहीं करता, तो क्यों पहनते हो ?
सेठ : कैसे न पहनूँ। यह धोती मेरे देश की संस्कृति है।

मैडम : संस्कृति...संस्कृति...संस्कृति...। तो फड़वाते रहिए अपने देश की प्यारी संस्कृति कुत्तों से। कुछ ही दिन रह गए हैं अमेरिका जाने को। अब तो इसका पीछा छोड़ो। वहाँ भी मेरी ऐसी ही इन्सल्ट कराओगे ? वहाँ तो और भी कुत्ते होंगे इसे फाड़ने के लिए। धर्मचन्द, जा धोती उतरवा कर पैन्ट दे दो साब को।
नौकर : साब की पैंट तो अभी सिल कर नहीं आई।
मैडम : नहीं आई तो मेरी पैंट दे दो। पहनने की प्रैक्टिस भी तो होनी चाहिए। नो कॉमन सैंस (अन्दर चली जाती है)
नौकर : उठो सेठ जी, चलो, आपकी बीवी जी की 21वीं सदी की पैंट पहना दूँ।...
सेठ जी : धर्मचन्द !...
नौकर : अगर बीबी जी अपनी चूड़ियाँ पहनाएँगी तो भी आप पहनेंगे सेठ जी ?
सेठ जी : तू क्या सोचता है मैं उससे डरता हूँ ?
नौकर : आप नहीं डरते। डर आपको लगता है
सेठ जी : धर्मचन्द गुस्सा मत दिलवाओ। राजस्थानी खून है, उबल पड़ा तो...(कुत्ते के भौंकने की आवाज आते ही सेठ जी धर्मदास से चिपक जाते हैं) धर्मचन्द, पैंट...पैंट...पैंट..।
नौकर : सेठ जी, आप इसके मुँह में एकलव्य के बाँण नहीं ठूँस सकते ?
(टेलीफोन की घंटी बजती है। सेठ जी डरते-डरते उठाते हैं।)
सेठ जी : हैलो, कौन ? मैनेजर ! क्या कहा। खोज पूरी हो गई ? बहुत अच्छा, अब जल्दी से गोलियों का एक पैकेट यहाँ अभी भिजवाओ। हाँ...जल्दी...
नौकर : क्या हुआ सेठ जी ?
सेठ जी : एकलव्य का बाण तैयार हो गया।
नौकर : एकलव्य का बाण ?
सेठ जी : हाँ धर्मचन्द, हमारी मैडसिन फैक्ट्री के मैंनेजर ने बहुत खोज करने के बाद कॉमन सैंस का एक फार्मूला तैयार किया है। ऐसी गोलियाँ तैयार की गई हैं जिनके खाने से आदमी में कॉमन सैंस पैदा हो सकती है। (कुत्ते के भौंकने की आवाज आती है। सेठ जी घबरा कर) धर्मचन्द...पैंट...पैंट...पैं...(दोनों अन्दर चले जाते हैं)
(सेठ जी को पढ़ाने के लिए अँग्रेजी अध्यापक आता है। घण्टी बजती है। मेम साहब मास्टर जी का स्वागत करती हैं। अब सेठानी ने अँग्रेजी वस्त्र धारण कर लिए हैं जिससे वह अपनी उम्र से कम दिखाई देती हैं।)
मैडम : आइए सर, वैलकम।
सर : हैलो यंग लेडी। (सोफे पर बैठते हैं सिगार निकाल कर पीते हैं)
मैडम : सर साहब को अँग्रेजी के साथ-साथ कुछ एटीकेट्स भी सिखाइए। बिहेवियर की वजह से विदेशी लोग इण्डियन्स को पसन्द नहीं करते।

सर : क्या आप परमानैन्टली विदेश रहेंगे ?
मैडम : पूरी फैमिली वहीं सैटल होगी।
सर : तो इण्डिया बिल्कुल छोड़ देंगी ?
मैडम : वहाँ रहकर सेठ जी भी कल्चर्ड हो जाएँगे और यदि वर्ड वार एशिया से शुरू हुआ तो...
सर : ओ...वेरी क्लेवर लेडी।
मैडम : थैंक्यू सर, थैंक्यू। आपके लिए जूस मँगवाती हूँ। धर्मचन्द, धर्मचन्द !
नौकर : जी मेम साहब।
मैडम : देखो (धर्मचन्द इधर–उधर देखता है) ओ नो, सुनो, सर को एक गिलास जूस लाओ। और साहब को बोलो सर आया है। अपनी होमवर्क कापी लेकर आओ।
नौकर : अच्छा बीबी जी।
मैडम : ह्वाट बीबी जी !
नौकर : ओह...सॉरी, मेम साहब। (जाता है)
सर : हाँ, मैडम, आज मैं ज्यादा देर नहीं पढ़ा सकता। एक इम्पोर्टिड मिटिंग में जाना है।
मैडम : नैवर माइंड। पर इनकी लैंग्वेज-एक्सैंट के साथ-साथ एटिंकेट्स पर भी ध्यान रखिए।
सर : ओह...श्योर।
(सेठ जी का पतलून पहन कर आना। पतलून ढीली है जिसके कारण उन्हें पेट पर तकिया लगाना पड़ा है।)
सर : ह्वाट इज दिस ?
मैडम : ओफ ओह !
सेठ : 21वीं सदी की पतलून है।
मैडम : ह्वाट नोंन सैंस (उसका तकिया निकालती है, उसकी पैंट नीचे खिसक आती है। नौकर पैंट ऊपर करता है।)
मैडम : सॉरी...सर...
(सेठ जी को पकड़ कर डायनिंग टेबल पर बिठाया जाता है।)
सर : जितना हिन्दी शब्द है उनमें बाद में ‘ए’ लगाया करो। लाइक रामा-कृष्णा, रावणा ओ.के. ! कल का होम वर्क दिखाइए।
सेठ : होम-वर्क नॉट डन।
सर : आज भी तुमने होमवर्क नहीं किया। ह्वाट नोंन सैंस ! हम ऐसे नहीं पढ़ा सकता।
(ट्यूटर चला जाता है। सेठ जी की मैडिसन कम्पनी का सेलमैन सेठ जी के घर कॉमन सैंस की गोलियाँ बेचने आता है। घण्टी बजती है, धर्मचन्द दरवाजा खोलता है। सेलमैन का प्रवेश)
सेठ : कुण सै ?
नौकर : कोई चन्दा माँगने वाला दीखे सै।
सेठ : आ भई, चन्दा तो जितना चाहिए ले ले, पर ( पैंट ऊपर करता है) म्हारी सेठाणी को माथा ठीक कर दे।
सेलमैन : गारंटी है इस बात की जनाब।

सेठ : किस बात की ?
सेलमैन : माथा ठीक करने की। चाहे कितना भी माथा खराब हो। आदमी सभ्यता भूल गया हो, अपनी कल्चर भूल गया हो, अपना कर्तव्य भूल गया हो, स्वार्थ की खातिर अपनी आत्मा का खून कर लेता है, अपने घर को, अपने देश को फौरन एजेन्सीज को बेचने और अपने काले धन को विदेशी बैंकों में रख कर गर्व करता हो। झूठे आश्वासन देकर वोट खरीदता हो। अपने देश की आलोचना और विदेशों की झूठी तारीफ करता हो। विदेश में बसने के सपने देखता हो; इस प्रकार वह अपनी ऐस्थेटिक और कॉमन सैंस को भूल कर नोंन सैन्सिस की ओर जा रहा हो। ऐसे व्यक्तियों के लिए हमारी कम्पनी ने बेहतरीन दवा तैयार की है जिसमें वेदों का रस, रामायण रामचरितमानस की सभ्यता, गीता का सार और प्राचीन भारतीय कल्चर, भ्रातृत्व भाव, शौर्यता, वीरता, सौहार्द को पीस कर डाला गया है। इसमें दो तरह की गोलियाँ हैं 100 मिली ग्राम 18 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए, और 500 मिली ग्राम 18 वर्ष से ऊपर वालों के लिए। कल्चर की पेटेन्ट दवा इससे पहले कभी नहीं बनी। कौन-सी गोली दूँ ?
सेठ : दोनों के पाँच-पाँच पैकेट दीजिए।
सेलमैन : पाँच-पाँच ! क्या घर में इतनी नॉनसैंस है ?
सेठ : आपको इससे सरोकार ? कितने पैसे हुए ?
सेलमैन : जी ! नब्बे रुपए।
सेठ : धर्मचन्द ! (वह पैसे लेने जाता है)
सेलमैन : मैं आपको आधे रेट पर भी दे सकता हूँ।
सेठ : वह कैसे ?
सेलमैन : मेरे पास सैम्पल पैकेट्स हैं। गोलियाँ वही हैं केवल उन पर ‘नाट फॉर सेल’ लिखा है। (इधर-उधर देखता है। धर्मचन्द आकर पैसे देता है।)
सेठ : धर्मचन्द, एक गिलास पानी।
सेलमैन : आपको सैम्पल दे दूँ ?
(धर्मचन्द पानी का गिलास लेकर प्रवेश करता है, सेठ जी 500 मिली ग्राम की एक गोली निकालता है और सेलमैन को खिलाता है।)
सेठ : लीजिए। खाइए। (धर्मचन्द पानी का गिलास उसके मुँह से लगाता है।)
सेलमैन : मैं...नहीं...मैं...मैं ?
(धर्मचन्द और सेठ जी जबरदस्ती गोली खिलाते हैं। गोली खाकर वह कुछ क्षण के लिए निढाल-सा होता है और फिर चुपचाप पैसे लेकर एक सैम्पल छोड़ कर जाने लगता है)
सेठ : ये अपना सैम्पल पैकेट लेते जाइए।
सेलमैन : आप ये सैम्पल ले लीजिए। पाँच पैकेटस के साथ एक सैम्पल फ्री दिया जाता है। (हाथ जोड़कर नमस्ते करता है। हमें और भी सेवा का अवसर दीजिए। (चला जाता है)
(सेठ जी और धर्मचन्द एक दूसरे की ओर देखते हैं और जोर से हँसते हैं। इतने में कुत्ते के भौंकने की आवाज आती है। सेठ जी अपनी पतलून सँभालते हैं।)
सेठ : धर्मचन्द, कुत्ते के लिए दूध का बर्तन उठा ला।

धर्मचन्द : समझ गया सेठ जी (धर्मचन्द दूध का बर्तन उठाने जाता है। सेठ जी पैकेट से दो गोलियाँ निकालते हैं)
सेठ : आदमी तो क्या जानवरों को भी कॉमन सैंस की गोलियाँ खिलानी पड़ेंगी (धर्मचन्द आता है। दूध में गोलियाँ मिलाते हुए) अब पहचानेगा विलायती कुत्ता कि इस घर का मालिक कौन है। धोती वाला या पतलून वाला। जा खिला आ। (धर्मचन्द जाता है)
(सेठ शीशियों को उठाने लगता है कि एक नवयुवक प्रवेश करता है। उसकी वेशभूषा हिप्पी जैसी है। शक्ल से लगता है वह नशीली वस्तुओं का सेवन करता है।)
नवयुवक : हाय ओल्ड खूसट !
सेठ : (उसे ऊपर से नीचे तक देखता है। खूसट !
नवयुवक : आर यू नाट खूसट ? खूसट मीन्स ओल्ड मैन ऑफ नो यूज। आज कल खूसट का जमाना नहीं। यंग मैन का जमाना है। 21वीं सदी में सब तुम्हारे जैसे खूसटों को हैंग किया जाएगा। हमाना डार्लिंग। स्वीटी-स्वीटी किधर है ? (धर्मचन्द का प्रवेश) ओह। अनदर ओल्ड मैन। दिस इज ओल्ड मैंस हाउस। ऐ खूसट। स्वीटी को बुलाओ। (सेठ और धर्मचन्द की आँखें मिलती हैं)
धर्मचन्द : सेठ जी।
सेठ : धर्मचन्द, 500 मिलीग्राम।
धर्मचन्द : आप बैठिए। मैं स्वीटी दीदी को बुलाता हूँ। आप पानी...
सेठ : पानी के साथ यह गोली खा लीजिए। (दोनों जबरदस्ती करते हैं। इतने में मेम साहब का प्रवेश)
मैम साहब : अरे ! ये क्या ? आप दोनों ये क्या कर रहे हैं ? (दोनों पीछे हटते हैं।)
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