महात्मा गांधी और कविवर रवींद्रनाथ टैगोर के बीच सन् 1915 से 1941 के बीच
हुए पत्र-व्यवहार और विचार-विमर्श को इस पुस्तक में संकलित किया गया है।
कई पुरानी पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों व अप्रकाशित स्रोतों से इस सामग्री को
एकत्र किया गया है। ऐतिहासिक महत्व वाले कई नितांत निजी किस्म के पत्र भी
इस संकलन में हैं, जो कि श्री टैगोर द्वारा स्थापित विश्व-भारती के
अभिलेखागार में संरक्षित किए गए हैं। इन महान विभूतियों के बीच हुए
विचार-विमर्श के विषय आज भी प्रासंगिक हैं। संकलन के संपादक द्वारा इस
पुस्तक की प्रस्तावना में पत्र-व्यवहार के ऐतिहासिक संदर्भ और
विचार-विमर्श से उभरे मुख्य मुद्दों की व्याख्या की गई है।
पुस्तक के संपादक सव्यसाचि भट्टाचार्य विश्व-भारती, शांतिनिकेतन के कुलपति
तथा जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय, नई दिल्ली में इतिहास विभाग के
प्राध्यापक रहे हैं। अनुवादक श्री तालेवर गिरि कई वर्षों तक नेशनल बुक
ट्रस्ट के संपादकीय सहित विभिन्न विभागों में कार्य करते रहे। उन्होंने कई
अन्य पुस्तकों का अनुवाद भी किया है।
आमुख
महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच पत्र-व्यवहार और उनके कुछ लेखों
का यह संकलन बिना किसी जमापूंजी के 1992 में एक साधारण परियोजना के रूप
में शुरू में किया गया था। जब मैं टैगोर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय
शांतिनिकेतन में कुलपति था तब विश्वविद्यालय के अभिलेखागार में गांधी और
टैगोर के बीच हुए पत्र-व्यवहार पर मेरी दृष्टि पड़ी, इस पत्र-व्यवहार की
सार्थकता को देख मैं दंग रह गया, इन दोनों की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय
समस्याओं की समझ में कितनी भिन्नता थी और साथ ही ये पत्र दोनों मित्रों और
प्रतिद्वंद्वियों की घनिष्ठता को भी दर्शाते थे। इन पत्रों के संकलन का
प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा 1994-95 में 125वीं गांधी जयंती के अवसर
पर होना था। लेकिन जैसे ही मैंने इन पत्रों का संपादन आरंभ किया तो मैंने
महसूस किया कि गांधी और टैगोर के मध्य हुए संवाद की प्रासंगिता की
आवश्यकता को देखते हुए इसमें उनके कुछ उन लेखों का भी समावेश होना चाहिए
जिनमें उन्होंने महत्वपूर्ण विषयों को अपने व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार में
उठाया था। कुछ स्रोत जिनसे ग्रंथ के लिए सामग्री एकत्र हो सकती थी,
इधर-उधर बिखरे हुए थे और उन तक पहुँचना भी आसान न था। इस काम के लिए मैं
जितना समय निकाल सकता था। उससे अधिक की आवश्यकता थी और यह तभी संभव हुआ जब
मैंने कुलपति के पद का त्याग किया और स्वयं अनुसंधान कार्य में लगा। इसी
कारण इस काम को पूरा करने में अनुचित देरी हुई जिसको मैंने पाँच साल पहले
अपने हाथ में लिया था।
इस पुस्तक की प्रस्तावना में मैंने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का खाका खींचने की
कोशिश की है जिसके तहत गांधी टैगोर के बीच बौद्धिक आदान-प्रदान का
प्रादुर्भाव और विकास हुआ, और यही इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय है। मैंने
उन प्रमुख विवादों का सिंहावलोकन करने का भी प्रयास किया है जिनके बारे
में वे एकमत अथवा सहमत थे। ऐसे विवादों की चर्चा उन्होंने अपने व्यक्तिगत
पत्रों में बड़ी ही स्पष्टता से की थी जो कि प्रकाशनार्थ नहीं थे और जिन
पर उन्होंने अपने प्रकाशित लेखों में बड़ी ही सतर्कता पूर्वक विचार-विमर्श
किया था। इस संकलन की उल्लेखनीय विशिष्टता यह है कि इनमें उनके सार्वजनिक
संवादों और व्यक्तिगत पत्रों को गुंफित किया गया है। इन दोनों प्रकार के
लेखनों का सामंजस्य करने की परिकल्पना इस प्रलेखन में चार विभिन्न
अवस्थाओं के कालक्रमिक ढांचे में की गई। मैंने इस वृतांत को चार भागों में
विभाजित किया है। चार कालावधि के इस संकलन में प्रत्येक भाग के आरंभ में
उस भाग से संबधित पत्रों और लेखों की विस्तृत व्याख्या संपादकीय
टिप्पणियों में की गई है।
मैंने मूल विषय के साथ पाद टिप्पणियों की भरमार करने की कोशिश नहीं की
हैं। क्योंकि आम पाठकों को इनमें कोई रुचि नहीं होती और गांधी और टौगोर के
साहित्यि के विशेषज्ञों के लिए ये अनावश्यक हैं। दास्तावेजों के ऊपर तिरछे
टाइप में संपादकीय टिप्पणी में स्रोत निर्देशित किया गया है यदि नहीं तो
वे दास्तावेज विश्व-भारती के रवीन्द्र भवन में स्थिति टैगोर अभिलेखागार से
लिए गये हैं। परिशिष्ट में अथवा टैगोर द्वारा अन्य व्यक्तियों को लिखे,
पत्र, समाचार पत्रों को भेजे वक्तव्य किये गये हैं, जो कि गांधी-टैगोर
पत्र-व्यवहार का अंग नहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद उस पत्र-व्यवहार के साथ
आवश्यक रूप से इनकी प्रासांगिकता है। जहाँ तक हुआ है पत्र व्यवहार को मूल
रूप में दिया गया है। मूल पाठ में संगति बैठाने के लिए मामूली-सी संपादन
की व्यवस्था की गयी है। तकनीकी दिक्कतों के कारण गैर अंग्रेजी शब्दों पर
विशेषक चिन्ह नहीं लगाये गये हैं। जहाँ तक संभव हो सका है बांग्ला से
अंग्रेजी अनुवादों का कृतज्ञता ज्ञापन किया गया है।
टैगोर के जीवन में अन्तिम दो दशकों में अनेक लोगों ने अनुवाद किये थे
जिनकी पहचान आसान नहीं है, जो अनुवाद मैंने स्वयं किये हैं, जो लेखक ने
नहीं किये हैं अथवा लेखक ने अनुमोदित किये हैं, उनका संक्षेप
में
उल्लेख किया गया है।
मैं वर्तमान कुलपति डी.के. सिन्हा, साथ-ही-साथ ग्रन्थन विभाग और रवींन्द्र
भवन अभिलेखागार, विश्व-भारती, श्री अरविंद कुमार, पूर्व निदेशक, नेशनल बुक
ट्रस्ट, नई दिल्ली, नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद और गांधी स्मारक निधि, नई
दिल्ली के प्रति धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापन करता हूँ।
मैं इस पुस्तक को अपनी पत्नी मालविका को समर्पित करता हूँ जिसने
शांतिनिकेतन में आवास के दौरान इस संकलन में सहायता की।
सव्यसाचि भट्टाचार्य
प्रस्तावना
इस पुस्तक में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समस्याओं पर लिखित वाद-विवादपूर्ण कुछ
निबंधों के साथ महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा एक-दूसरे को
लिखे पत्रों का संग्रह किया गया है। टैगोर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय
शांतिनिकेतन में सुरक्षित ये पत्र अत्यंत ऐतिहासिक महत्व के हैं। ऐतिहासिक
महत्व से भी अधिक गाँधी और टैगोर के बीच महत्वपूर्ण विषयों और
प्रश्नों पर बहस है जिसकी आज तक और इस युग में भी प्रासंगिता है। इस
बौद्धिक विनिमय की शुरूआत 1914-15 में हुई जब महात्मा गांधी दक्षिण
अफ्रीका के अपने फीनिक्स स्कूल के छात्रों के साथ टैगोर के शांतिनिकेतन
पधारे। इसके बारे में बाद में गाँधी ने याद किया
‘‘इसी जगह
मेरे दक्षिण अफ्रीकी परिवार को 1914 में जोरदार मेहमानवाजी मिली, इंग्लैड
से आगमन के लंबित होने पर, मुझे भी लगभग एक महीने के लिए यहीं पर आश्रय
मिला।’’1
उस समय शांति निकेतन में टैगोर के स्कूल को स्थापित हुए 15 साल भी नहीं
हुए थे। टैगोर 53 साल के थे और उन्हें मात्र एक साल पहले ही नोबेल
पुरस्कार मिला था। गाँधी उम्र में आठ साल छोटे थे और उन्हें अभी राष्ट्रीय
स्तर पर महत्ता नहीं मिल पायी थी हालांकि अफ्रीका में उनके कार्य की
व्यापक रूप से जानकारी थी। इनके व्यक्तित्व में आश्चर्यजनक विषमताएं थीं।
फिर भी उन्होंने एक-दूसरे के मन की थाह पा ली थी और उनकी मित्रता आरंभ हो
गयी थी जो 1941 में टैगोर की मृत्यु पर्यन्त रही। हमारा मानना है कि लगभग
फरवरी 1915 में टैगोर ने गाँधी
1, हरिजन 9 मार्च 1940: महादेव देसाई द्वारा लिपिबद्ध महात्मा
गाँधी
का 1940 में शांतिनिकेतन में भाषण फीनिक्स स्कूल के छात्र शांतिनिकेतन में
4 नवम्बर 1914 से 3 अप्रैल 1915 तक ठहरे। गांधी इंग्लैंड से 9 जनवरी 1915
को आये, डी.जी. तेंदुलकर ‘महात्मा भाग-1 (दिल्ली-1951) पृष्ठ
157।
दूसरी बार वे टैगोर से शांतिनिकेतन में 6 मार्च 1915 को मिले। आज तक इस
आगमन की याद में हर साल 10 मार्च को शांतिनिकेतन में
‘‘गाँधी
पुन्याहा’’ दिन के रूप में मनाया जाता है। संभवताः
टैगोर का
अपना पहला पत्र गांधी को जनवरी 1915 में लिखा गया होगा। लगभग इसी समय
गाँधी भारत पहुँचे होंगे। विश्व-भारती अभिलेखागार 1915 में लिखा गया होगा।
लगभग इसी समय गांधी भारत पहुँचे होंगे। विश्व-भारती अभिलेखागार में रखे इस
पत्र में तिथि अंकित नहीं है।
को ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया और गांधी ने भी
तत्काल टैगोर को गुरुदेव कहकर संबोधित करने का तरीका अपना लिया।2
लेकिन उन दोनों की मित्रता मात्र एक-दूसरे की प्रशंसा पर आधारित नहीं थी।
मूलभूत दार्शनिक प्रश्नों पर उनके आपसी मतभेद थे जिनकी वजह से बहुत सारे
राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों पर वाद-विदाद उठ खड़ा होता था।
वाद-विवाद में दोनों ही एक-दूसरे के प्रति निष्ठुर थे और वास्तव में ऐसा
नहीं कहा जा सकता कि दोनों में से कोई एक अपने विचारों से दूसरे को सहमत
कराने में सफल हुआ हो। हर एक सौहार्दपूर्ण ढंग से दूसरे की अलग राय रखने
के अधिकार को स्वीकारता था। सार्वजनिक प्रश्नों पर उनके मतभेदों के कारण
उनकी मित्रता पर कोई असर नहीं पड़ा उनके व्यक्तिगत संबंधों और पात्रों के
आधार पर कह सकते हैं।
इस, पुस्तक के संपादन में मुझे पत्रों और लेखों को दो संभावित तरीकों में
से चयन करना था। एक तरीकों से केवल कालक्रमिक पद्धति का अनुसरण करते हुए
सभी तथ्यों को पाठक के सक्षम रखा जा सकता था। विकल्प था कि गांधी-टैगोर
द्वारा चर्चित महत्वपूर्ण विषयों के अनुसार तथ्यों का वर्गीकरण, उदाहरण के
लिए, शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार की प्रभावोत्पादकता, हस्तशिल्प उद्योगों
और चरखा की संभवनाएँ और सीमाएं, धर्मपरायणता के विरुद्ध विज्ञान का उपदेश
आदि। लेखों के इस संकलन में जो तरीका अपनाया गया उनके अनुसार लेखों को
कालक्रमिक ढांचे में रखा गया है तथापि तत्कालीन विवादित विषयों पर विशेष
बल दिया गया है जो उस कालावधि से संबंधित थे। आगामी पृष्ठों में कालक्रमिक
पद्धति का आधार यहाँ संग्रहीत व्यक्तिगत और सार्वजनिक पत्र-व्यवहार रहा
है। मौटे तौर पर यह राष्ट्रीय राजनीति और संस्कृति पर व्याख्यानों के
विकास के साथ सामंजस्य स्थापित करती है।
वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं जिनमें गाँधी और टैगोर के बीच बौद्धिक
आदान-प्रदान का प्रादुर्भाव और विकास हुआ ? बंगाल विभाजन के बाद (1905)
स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता के अनुभव ने रवींद्रनाथ टैगोर को
गाँधी-पूर्व कांग्रेस की राजनीति और सीमाओं के प्रति कवि को संवेदनशील बना
दिया होगा। अपने देशवासियों से पहले, उन्होंने शायद देखा हो कि गांधी भारत
की आजादी के संघर्ष को एकदम नया मोड़ देने में सक्षम हैं। दक्षिण अफ्रीका
में ख्याति प्राप्त मोहनदास करमचन्द गांधी ने फीनिक्स स्कूल के अपने छात्र
टैगोर के शांतिनिकेतन में इसलिए
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2, टैगोर सी. एफ. एंड्रयूज कोः 18 फरवरी 1915 ‘लेटर्स टू ए
संपा.
सी. एफ एंड्रयूज (लंदन 1928)। 12 अप्रैल 1919 को लिखे पत्र में पहली बार
टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ संबोधित किया और 12
जनवरी 1918
को गांधी द्वारा लिखित पत्र में टैगोर को
‘‘गुरुदेव’’ संबोधित किया गया।
भेजे होंगे क्योंकि उन्होंने देखा कि बंगाल के एक सुदूर कोने में कुछ
कार्य प्रगति पर था जो उनकी विचारधारा और प्रयासों के साथ मेल खाता था।
वे एक-दूसरे के लिए एकदम अजनबी नहीं थे इसका लिखित प्रमाण है कि भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस की 1901 में हुए कलकत्ता अधिवेशन में एम. के. गाँधी ने
एक प्रस्ताव पेश किया था। ‘‘दक्षिण अफ्रीका के लाखों
ब्रिटिश
भारतीयों के प्रतिनिधि के आवेदन के रूप में।’’3 उस
अवसर पर
टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्रनाथ से गाँधी मिले थे। उसके तुरंत बाद
दक्षिण अफ्रीका में भारतीय प्रवासियों के बारे में गाँधी के एक लेख का
अनुवाद ‘‘भारती’’4 नामक पत्रिका
में छपा था जिससे
टैगोर लोग संबद्ध थे।