ध्रुव की कथा भागवत पुराण से ली गयी है। केवल पाँच वर्ष की नन्हीं उम्र
में ही ध्रुव ने भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी।
बालक की अद्भुत भक्ति से प्रसन्न हो कर भगवान् ने उसे दर्शन दिये। उसे
वरदान दिया कि वह छत्तीस हज़ार वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य करेगा। आज भी
परंपरावादी हिंदू उत्तर दिशा में टिमटिमानेवाले एक अचल तारे को ध्रुव
नक्षत्र कह कर पुकारते हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने उसे वह
स्थान दिया, जो तीनों लोकों में सबसे महान है। सभी ग्रहों, सब नक्षत्रों
और सब देवगणों से श्रेष्ठ है।
अष्टावक्र की कथा महाभारत से ली गयी है। अज्ञातवास के समय पांडवों ने अनेक
तीर्थों के दर्शन किये थे। जब वे श्वेतकतु के आश्रम पर पहुँचे, तो उनके
साथ आये हुए लोमश ऋषि ने श्वेतकेतु के भांजे अष्टावक्र की यह कथा पांडवों
को सुनाई थी।















