सन 648 में कन्नौज के प्रतापी नरेश, महाराज हर्षवर्धन की मृत्यु होने के
बाद उत्तर भारत राजनीतिक रूप से छिन्न-भिन्न होने लगा। अनेक छोटे-छोटे
राज्य बन गये। इस विभाजन से देश दुर्बल हो गया। छोटे-छोटे राजा अपने-अपने
बड़प्पन के मिथ्या गर्व में परस्पर लड़ने लगे। विदेशी आक्रामकों ने इस
परिस्थिति से फायदा उठाया।
बारहवीं शताब्दी के अन्त में शहाबुद्दीन गोरी
नामक अफगान सरदार ने गजनी को जीतकर गजनवी साम्राज्य का अन्त कर दिया। फिर
उसने लाहौर पर चढ़ाई की और उसे जीता। वहाँ से वह दिल्ली की ओऱ बढ़ा।
दिल्ली का राजा, पृथ्वीराज चौहान बड़ा वीर था।
उसने अपनी सेनाएँ लेकर गोरी
से लोहा लिया और बड़ी वीरता दिखायी। परन्तु शहाबुद्दीन ने उसे हरा दिया।
शहाबुद्दीन की इस विजय के फलस्वरूप भारत में मुसलमानों का शासन स्थापित
हुआ। यदि भारतीय राजाओं ने आपस में लड़-भिड़ कर देश को दुर्बल न किया होता
तो भारत का इतिहास कुछ और होता।
पृथ्वीराज चौहान ने शहाबुद्दीन गोरी के
विरुद्ध ऐसी वीरता दिखायी थी कि पराजय के उपरान्त भी वह अमर हो
गया
और उसकी वीरता की अनेक गाथाएँ प्रचलित हो गयीं। इन गाथाओं के आधार पर यहाँ
प्रस्तुत है वीर पृथ्वीराज चौहान की कथा।















