महाभारत के नायक अर्जुन का नाम वीरता और पराक्रम का पर्यायवाची बन गया है।
अर्जुन जन्म-जात योद्धा थे। उनमें बल, साहस और एकाग्रता का अभूतपूर्व संगम
था।
अर्जुन कृष्ण के प्रति उतनी ही श्रद्धा रखते थे जितनी हनुमान राम के
प्रति। इस संग्रह की पहली कथा, जो दक्षिण भारत में प्रचलित एक लोक कथा पर
आधारित है, अर्जुन और हनुमान की भेंट के विषय में है। दोनों को अंत में यह
ज्ञात हो जाता है कि कृष्ण और राम एक ही हैं।
अर्जुन को धनुर्विद्या में प्रवीण गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा मिली थी।
उन्होंने अनेक देवताओं को प्रसन्न कर बहुतेरे शस्त्रास्र्त्र प्राप्त किये
थे, परन्तु उनको अजेय बनाने का श्रेय उनके गाण्डीव धनुष को है। उन्हें
गाण्डीव अग्निदेव से मिला था।
अर्जुन और उनके ममेरे भाई कृष्ण अभिन्न मित्र थे। अर्जुन सदैव कृष्ण से
परामर्श करते थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कृष्ण अर्जुन के सारथी बने थे।
फिर भी, कुछ अवसरों पर अर्जुन दम्भी और अहंकारी हो जाते थे। तो कहानी में
यह दर्शाया जाता है कि किस प्रकार कृष्ण ऐसे अवसरों पर उन्हें
कोमलतापूर्वक किन्तु दृढ़ता के साथ ठीक राह पर ले आते थे।















