सुमिरन करके नारायण को *
औ लै प्रथम गुरू को नाम।।
साधु संत की नित सेवा सों *
पूरण होय जगत को काम।।
समरथवान पिता परमेश्वर *
जिनकी कृपा विदित संसार।।
जिनके सुमिरे से दुख छूटै *
औ सुख होय अपार अपार।।
फिर मैं सुमिरूँ शिवशंकर को *
जाके जटा गंग शशि भाल।।
अवढरदानी जगमें जाहिर *
गल में सोहे मुण्डकी माल।।
अद्भुत माया है भोले की *
जिसका पार कोई ना पाया।।
क्या तारीफ करूँ शिवजी की *
कुछ तारीफ करी ना जाय।।
गिरिजा गनपति गौरिपति, रघुपति केशव राम।
तीनि देव रक्षा करैं, अहिपति धनपति नाम।।
फिर मैं सुमिरूँ जगन्नाथ को *
कलियुग बौधरूप अवतार।।
विन्ध्यवासिनी को मैं सुमिरूँ *
जो निकली हैं फोरि पहार।।
काली सुमिरूँ कलकत्ते की *
जिसकी छड़ी लगी असरार।।
सुमिर भवानी चौहारी की *
चौरा खँसी खेत हलुआर।।
चण्डी सुमिरूँ हरद्वार की *
भूरे सिंह होति असवार।।
काशी सुमिरूँ हरद्वार की *
जिनका गढ़ लागे दरबार।।
गोरख सुमिरूँ गोरखनाथ को *
और मगहर में दास कबीर।।
अकबरपुर में नाथू महरा *
नदिया बहै टँवस के तीर।।
शहर जौनपुर के किलवा में *
पुजवा खायँ कररिया पीर।।
फिर मैं सुमिरूँ गढ़ भैरव को *
जो हैं काशी के कोतवाल।।
सूरसती के पद बन्दन करि *
आल्हखण्ड का कहूँ हवाल।।
होहु सहायक श्री जगदीश्वर *
देवी सदा शारदा माय।।
कंठ विराजो तुम मेरे आकर *
भूले अच्छर देहु बताय।।
यहाँ की बातों को यहाँ छोड़ो *
अब आगे का सुनो हवाल।।
आल्हखण्ड का पहला किस्सा *
पंची सुनो लगाकर ख्याल।।
उत्तमपुर की एक बस्ती थी *
जिसमें मिली चन्देरी जाय।।
वहाँ का राजा फूलसिंह था *
योधा शूरवीर कहलाय।।
दो बेटे थे फूलसिंह के *
जिनके बलका नहीं शुमार।।
छोटा बेटा पद्मसिंह था *
बड़ा चन्देला राजड कुमार।।
तबहीं एक दिन की बातों में *
पद्मसिंह ने कहा सुनाय।।