Bhaktimati Mirabai Jivan Aur Kavya - A Hindi Book by - Lalbahadur Singh Chauhan - भक्तिमती मीराबाई जीवन और काव्य - लालबहादुर सिंह चौहान
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Bhaktimati  Mirabai Jivan Aur Kavya

भक्तिमती मीराबाई जीवन और काव्य

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लालबहादुर सिंह चौहान<<आपका कार्ट
मूल्य$ 10.95  
प्रकाशकसावित्री प्रकाशन
आईएसबीएन81-7902-011-8
प्रकाशितमार्च ०४, २००६
पुस्तक क्रं:4018
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Bhaktimati Mirabai Jivan Aur Kavya a hindi book by Lalbhadur Singh Chauhan -भक्तिमती मीराबाई जीवन और काव्य - लालबहादुर सिंह चौहान

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अभिमत

डॉ. लालबहादुर सिंह चौहान द्वारा प्रणीत ‘भक्तिमती मीराबाई : जीवन और साहित्य’ पुस्तक मीराबाई को विषय बनाकर लिखी गई कृतियों के मध्य बहुत आदर पाने योग्य है। यह समीक्षात्मक कृति विद्यार्थियों तथा मीरा के भक्तों के लिए समान रूप से उपादेय है। विद्वान लेखक ने प्रेमाभक्ति की जीवंत साकार मूर्ति मीराबाई के जीवन और साहित्य का शोधपरक रूप पाठकों के सम्मुख रखा है। डॉ.चौहान की सारग्राहिणी प्रतिभा के दर्शन स्थान-स्थान पर उपलब्ध होते हैं। भाषा और शैली की प्रौढ़ता इस कृति की अन्यतम विशेषता है। पदों का चुनाव सटीक है जो लेखक की गहरी समझ को द्योतित करती है। विषय के प्रवाहमय वर्णन-विवेचन के साथ पाठक भी भावुक और तल्लीन होकर बहता चला जाता है।
हिन्दी साहित्य को ऐसी सुन्दर कृति प्रदान करने वाले डॉ. चौहान बधाई के पात्र हैं। विश्वास है कि वे हिन्दी संसार को आगामी समय में और भी सारग्राही कृतियाँ प्रदान करने में सफल होंगे। आपको अनेकश: हार्दिक शुभकामानाएँ।

डॉ. विद्यापति मिश्र
वरिष्ठ रीडर (हिन्दी)
क. मुं. हिन्दी तथा भाषा विज्ञान
विद्यापीठ,
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा


सम्मति



डॉ. लालबहादुर सिंह चौहान द्वारा लिखित ‘भक्तिमती मीराबाई : जीवन और साहित्य’ पुस्तक पढ़ने को मिली। इसमें कृष्ण-प्रेम में डूबी मीरा के जीवन और साहित्य का मार्मिक वर्णन किया गया है। पुस्तक के दो पक्ष हैं एक मीरा का जीवन और दूसरा उसका साहित्य। प्रथम पक्ष का वर्णन लेखक ने जीवनी शैली में किया है, जिसमें यथार्थता, ऐतिहासिक, पटस्थता और रोचकता का समावेश किया है। साहित्य पक्ष का विवेचन सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि से किया गया है। दोनों ही पक्षों के निरूपण में लेखक को पर्याप्त सफलता मिली है। मीरा मेड़ता के राठौर वंश की राजुकुमारी थीं, उसका ब्याह चित्तौण के राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। कुछ समय बाद भोजराज युद्ध में मारे गए और मीरा कृष्ण के प्रेम में आकण्ठ डूब गईं। अन्त में द्वारिका के रणछोर मन्दिर में उसने अपना निवास बनाया और वहीं श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गईं।
विद्वान लेखक ने प्रेमोन्मादिनी भक्त मीरा के जीवन का बड़ी सहानुभूति-परक मार्मिक चित्रण किया है। मीरा का कृष्ण-प्रेम अद्भुत था। राणा विक्रमादित्य की क्रूरता और उसके द्वारा दी जाने वाली अनन्त पीड़ा भी मीरा को कृष्ण-प्रेम से विमुख नहीं कर सकी। वह तो कृष्ण की अनन्य प्रेमिका थी इसीलिए सासूजी के कहने पर भी उसने गौरी पूजन नहीं किया-


नहिं हम पूज्या गौर ज्याँ जी, नहिं पूंजा अनदेव।
परम सनेही गोविन्दो थे काँई जारो म्हारा मेषा।


लेखक ने मीरा के चार ग्रन्थों का वर्णन किया है। (1) नरसी जी का माहरा (2) गोतगोविन्द की टीका (3) राग सोरठ (4) राग गोविन्द। इन सभी ग्रन्थों में भावों की मर्मस्पर्शिता, प्रेम की तल्लीनता और विरह की तीव्र अभिव्यंजना मिलती है। मीरा की उपासना मधुरभाव की उपासना थी जिसके वर्णन में मीरा को अद्भुत सफलता मिली है। कहीं-कहीं निर्गुण भक्ति का भी वर्णन मीरा ने किया है, जिसमें रहस्यवाद की झलक दिखाई पड़ती है।
लेखक की मान्यता है कि मीरा के काव्य में पाठक को आत्मविभोर करने की अद्भुत क्षमता है, वह सीधा हृदय पर प्रभाव डालता है मीरा का काव्य मार्मिक विरह-काव्य है। अनुभूति की तीव्रता के क्षणों में मीरा के काव्य में अलंकार सहज ही आ गये हैं, जो उसके भाव सौंदर्य को और बढ़ा देते हैं। मीरा का काव्य विभिन्न राग-रागनियों में बँधा हुआ है। उसकी संगीतात्मकता और सहज भावाभिव्यक्ति पाठक के मन को मुग्ध कर देती है।
इस सुन्दर पुस्तक के लेखन के लिए डॉ. लालबहादुर सिंह चौहान साधुवाद के पात्र हैं। हम उनसे आशा करते हैं कि वे इस प्रकार हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि करते रहेंगे। मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होगी।


डॉ. नारायणसिंह दूबे
पूर्व रीडर हिन्दी विभाग
डॉ. ई.आई.डीम्ड विश्वविद्यालय
दयालबाग, आगरा


‘पारिजात’
ई.-715 कमला नगर
आगरा-4
दीपावली
14 नवम्बर 2001


दो शब्द


राजस्थान की पावन भूमि भक्ति, वीरता और श्रृंगार की त्रिवेणी रही है। एक तरफ यहाँ का कण-कण मातृभूमि पर सर्वस्व बलिदान कर अपने शरीर की आहुति देने वाले शूरवीरों के रक्त से रंजित है, तो दूसरी ओर वह सन्तों और भक्तों की अमृतमयी वाणी से सिंचित भी। जिन्होंने समय-समय पर जन्म लेकर राजस्थान की धरती को अत्यधिक गौरवान्वित किया है। वे सन्त और भक्त उत्कृष्ट कोटि के कवि भी रहे हैं। यही कारण है कि उनकी वाणी काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त होकर लोकमानस को रसाप्लावित करती हुई जन-जन का कण्ठहार बन गई है।
राजस्थान के इन भक्त कवियों में मीराबाई का नाम सम्प्रदाय-मुक्त कृष्ण-भक्त कवियों में सर्वोपरि है। कृष्ण-भक्ति-काव्य में मीराजी की माधुर्य-भावना में जो भक्ति की सत्यता, पावनता और प्रेम की जो टीस, अनुभूति की जो गहराई और प्रामाणिकता पाई जाती है, वह अन्य किसी भी छवि में नहीं।
भक्त कवियत्री मीराबाई कृष्णप्रेम की अनन्य प्रतिमूर्ति थीं और वे उन गिरधर गोपाल के अतिरिक्त अन्य किसी को भी अपना मानती हुई नहीं जान पड़तीं। वे उन्हीं की भव्य छवि के वर्णन तथा उन्हीं के गुणगान में सर्वदा लीन रहना पसन्द करती हैं। उनकी भक्ति के आलंबन केवल गिरधर गोपाल कृष्ण हैं। आज भी मीराजी के सुन्दर पद देश के कोने-कोने में सरस व सरल हृदय लोगों के नयनों को द्रवीभूत कर देते हैं, अपने सुन्दर व मनभावक भजनों में ही भक्तिमती मीराबाई वर्तमान हैं।
धर्मप्राण भारतभूमि में मीराबाई ने साढ़े चार सौ-पाँच सौ वर्ष पूर्व जन्म ग्रहण करके जो लोकप्रियता और प्रसिद्धि प्राप्त की, वास्तव में वह असाधारण है। आज भी मीराजी के भक्तों की संख्या जो इस विशाल देश के प्रत्येक भाग में प्राप्त होते हैं, अगणित तथा असंख्य हैं। वे गिरधर नागर के रंग में सराबोर हो कृष्ण-भक्तों को जितना अनुप्राणित करती हैं, काव्य-मर्मज्ञों को भी उससे किसी भी प्रकार कम नहीं।
‘‘भक्तिमती मीराबाई : जीवन और काव्य’’ शीर्षक मेरी कृति पाठकों के सम्मुख उपस्थित है। भली या बुरी कैसी बन पड़ी है ? इसका निर्णय विज्ञ पाठक स्वयं करेंगे।
अन्त में उ. प्र. के महामहिम राज्यपाल प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री जी का हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने अपने पत्र द्वारा मेरे लेखन कार्य की प्रशंसा करते हुए अपने आशीर्वचन भेजकर निरन्तर साहित्य-साधना करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया है। डॉ. विद्यावती मिश्र, वरिष्ठ रीडर क.मुं. हिन्दी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा और डॉ. नारायण सिंह दुबे, पूर्व रीडर, हिन्दी विभाग, डी. ई. डीम्ड विश्वविद्यालय दयालबाग, आगरा का आभारी हूँ जिन्होंने अपना अभिमत व सम्मति लिखकर मुझे कृतार्थ किया है, मेरा उत्साह-वर्द्धन किया है। डॉ. (श्रीमती) सुषमा सिंह, रीडर हिन्दी विभाग, राजा बलवन्त सिंह महाविद्यालय आगरा का भी शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने पुस्तक-लेखन में सामग्री जुटाकर मुझे सहयोग दिया है।

कुसुम हॉस्पीटल27, दयालबाग रोड,
न्यू आगरा

-डॉ. लालबहादुर सिंह चौहान

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