Jatak Kathayein - A Hindi Book by - Anil Kumar - जातक कथाएं - अनिल कुमार
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Jatak Kathayein

जातक कथाएं

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अनिल कुमार<<आपका कार्ट
मूल्य$ 3.95  
प्रकाशकमनोज पब्लिकेशन
आईएसबीएन81-8133-369-1
प्रकाशितअप्रैल ०४, २००६
पुस्तक क्रं:3958
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:
jatak-kthayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सच्चा शिष्य कौन

पंडित रामनारायण अपने समय के विद्वानों में सबसे अधिक विद्वान और पूज्यनीय तथा सम्माननीय भी माने जाते थे।
कंचनपुर के बाहर ही जंगल में उन्होंने अपना आश्रय बनाया हुआ था। जिसमें दूर दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे।
पंडित जी के आश्रम में किसी प्रकार का भेदभाव या ऊंच-नीच नहीं बरती जाती थी। चाहे राजा का बेटा हो या रंक का, सभी को समान रूप से शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी।
पंडित जी के एक ही पुत्री थी जो तेजी से युवावस्था की ओर बढ़ रही थी।
पंडित जी चाहते थे कि जल्दी-से-जल्दी योग्य वर ढूंढ़कर उसकी शादी कर दें और इस कर्ज से मुक्त हों।
उनकी बेटी थी भी सुशील और बुद्धिमान।

पंडित जी ऐसा ही नेक और बुद्धिमान युवक उसके लिए ढूंढ़ना चाहते थे।
एक दिन पंडित रामनारायण के मन में विचार आया कि क्यों न मैं अपनी सभी शिष्यों की परीक्षा लूं ? इन सबमें जो भी सबसे अधिक बुद्धिमान होगा, उसी से मैं अपनी बेटी की शादी करूंगा।
दूसरे दिन पंडित जी ने अपने सभी शिष्यों को बुलाकर कहा-‘‘देखो बच्चो ! मैं एक बहुत ही विकट स्थिति में फंस गया हूँ।’’
‘‘कैसी विकट स्थिति गुरुजी ?’’ भीमसेन नामक युवक ने पूछा।
‘‘बात दरअसल यह है कि मेरी बेटी विवाह योग्य हो गई है और आज तक उसकी शादी के लिए मैंने कुछ भी बचाकर नहीं रखा-अब शीघ्र ही मुझे उसकी शादी करनी है, जिसके लिए वस्त्र और आभूषण चाहिए।’’

‘‘इसमें चिन्ता की क्या बात है गुरुजी।’’ एक सुन्दर-सा युवक अपने स्थान से उठकर बोला-‘‘मेरे पिता नगर सेठ हैं-आपके आदेश पर मैं हजारों स्वर्ण मुद्राएं आपके चरणों में लाकर डाल सकता हूं।’’

‘‘नहीं-नहीं गुरुजी-आप मुझे आदेश दें-मैं इस राज्य का युवराज हूं-आपके एक इशारे पर मैं आपके कदमों में हीरे-मोती, सोने चांदी के ढेर लगा दूंगा।’’

इसी प्रकार बहुत से युवकों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन देने की पेशकश की।
किन्तु पंडित जी ने किसी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और बोले-‘‘नहीं नहीं, इस प्रकार तो सारा मान-सम्मान धूल में मिल जाएगा-लोग कहेंगे कि पंडित रामनारायण ने भिक्षा लेकर बेटी के हाथ पीले किए हैं।’’
‘‘फिर आप ही कोई रास्ता सुझाइए गुरुजी-इस समस्या का समाधान कैसे हो ?’’ युवराज वीरसिंह ने कहा।
‘‘देखो शिष्यों ! हमें कोई ऐसा रास्ता तलाशना है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे-तुम सभी थोड़ा-थोड़ा सामान जहां तहां से चोरी करके लाओ-मगर एक बात का ध्यान रहे कि इस चोरी का किसी को पता नहीं चलना चाहिए-अगर दाएं हाथ से चोरी करो तो बाएं बाथ को पता न चले कि क्या चुराया गया है। यह चोरी एकदम गुप्त होनी चाहिए-इस प्रकार तुम्हारे गुरु की लाज बच सकती है।’’

‘‘आप चिन्ता न करें गुरुदेव।’’ सभी शिष्यों ने एक साथ कहा-‘ऐसा ही होगा।’’

और फिर गुरुजी की आज्ञा का पालन करने के लिए सभी अलग-अलग दिशाओं में बढ़ गए।

जो भी शिष्य वस्त्र या आभूषण चुराकर लाता, उसे चुपचाप गुरु जी को दे देता।
कुछ ही दिनों में गुरुजी के पास ढेरों चीजें एकत्रित हो गईं।
हर शिष्य द्वारा चुराकर लाई गई वस्तु गुरुजी अलग-अलग रख रहे थे।
कुछ दिन गुजर जाने के बाद गुरुजी ने देखा कि लगभग सभी शिष्य कोई न कोई चीज चुराकर ले आए हैं, लेकिन भीमसेन नामक युवक आज तक कोई चीज चुराकर नहीं लाया। इसका कारण जानने की उत्सुकता को वे दबा नहीं पाए।

अतः एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्रित किया और बोले-‘‘हमारे हर शिष्य ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार चोरी करके हमें कुछ न कुछ लाकर दिया है, मगर भीमसेन ! इतने दिन गुजर जाने के बाद भी तुम कोई वस्तु चुराकर नहीं ला पाए-क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे गुरुजी की चिन्ता दूर हो ?’’

‘‘चाहता हूं गुरुदेव-हृदय से चाहता हूं।’’
‘‘फिर तुम कोई चीज चुराकर क्यों नहीं लाए ?’’
‘‘कैसे चुराकर लाता गुरुदेव-आपकी आज्ञा ही कुछ ऐसी थी जिसने मुझे बार-बार चोरी करने से रोका।’’

‘‘क्या मतलब ?’’ पंडित रामनाराणय पैनी नजरों से उसकी ओर देखने लगे।
अन्य शिष्य भी चौंककर उसकी ओर देखने लगे कि गुरुजी ने स्वयं चोरी करके लाने को कहा था, फिर यह आज्ञा की बात कर रहा है ?
‘‘गुरुजी !’’ भीमसेन ने कहा-‘‘आपने ही तो कहा था चोरी करके लानी है, लेकिन इस चोरी का किसी को पता न चले। यहां तक कि दायां हाथ चोरी करे तो बाएं हाथ को भी पता न चले।’’

‘‘हां कहा था-मगर इसमें क्या परेशानी थी ?’’
‘‘गुरुदेव ! आपने ही तो हमें यह सबक सिखाया है कि हमारी आत्मा सब कुछ देखती है-फिर मैं अपनी आत्मा से इस चोरी को गुप्त कैसे रख सकता था-बस यही कारण है कि मैं आज तक कुछ भी चुराकर नहीं ला सका।’’
‘‘धन्य हो..तुम धन्य हो बेटे।’’ पंडित रामनारायण ने शाबाशी से उसकी पीठ ठोककर सभी छात्रों के सामने उसे सीने से लगा लिया और बोले-‘‘तुम मेरे सच्चे शिष्य हो।’’
फिर अन्य शिष्यों से संबोधित होकर बोले-देखो ! मुझे इस बात की खुशी है कि तुम सब मेरे आज्ञाकारी शिष्य हो और तुम सभी ने मेरी आज्ञा का पालन किया-मगर मेरे प्रिय शिष्यों, आज मैं तुम्हें एक शिक्षा और देता हूं कि यदि मां-बाप, भाई-बहन, यहां तक कि यदि गुरु भी किसी गलत कार्य करने के लिए कहे, तो भी जीवन में कोई गलत कार्य नहीं करना-तुम लोगों की बुद्धि परीक्षा और अपनी पुत्री के लिए योग्य वर ढूंढ़ने के लिए ही मैंने यह सब नाटक किया था-भीमसेन को मैं अपनी पुत्री के योग्य वर मानता हूं-आशा है, इस पाठ से तुम सभी ने एक नया सबक सीखा होगा-जाओ, अब जो-जो वस्तु तुम जहां जहां से चोरी करके लाए हो-क्षमा मांगकर ये सभी वस्तुएं वापस कर आओ।’’

‘‘गुरुदेव ! हम मानते हैं कि भाई भीमसेन हम सबसे योग्य है-हम इसे गुरु जामाता के रूप में स्वीकार करते हैं।’’ सभी शिष्यों ने एक स्वर में कहा और भीमसेन को कंधो पर उठाकर खुशी से नाचने-गाने लगे।
इस प्रकार गुरु की आज्ञा का पालन न करने के बाद भी भीमसेन ने ही उनकी पुत्री का वरण किया, क्योंकि उसने गुरु आज्ञा का पालन मन से किया था और अपने मन की ही बात सुनी भी। यही कारण था कि वह कुछ भी चुराकर न लाया, उसकी अंतरात्मा उसके लिए गवाही नहीं देती थी।


मेढ़े की फितरत



विजयपुर राज्य में हर वर्ष एक विचित्र मेला लगा करता था।
विचित्र इसलिए था कि यह मेढ़ों का मेला था। आस-पास के गावों के निवासी अपने अपने हृष्य-पुष्ट मेढ़े लेकर आते थे और उनकी लड़ाई करवाकर आनन्द लेते थे।
इस वर्ष भी मेढ़ों का मेला लगा हुआ था। शहर के मुख्य चौक में हजारों की भीड़ लगी थी। आनेवाले किसान अपने-अपने साथ एक से एक तगड़े मेढ़े लेकर आए हुए थे।
मेढ़ों की भिड़न्त का आयोजन होने ही वाला था कि तभी एक साधु वहां आया और लोगों की भीड़ देखकर इस भीड़ का कारण पूछा। एक किसान ने उसे बताया-‘‘महाराज ! यह मेढ़ों का मेला है-यहां हर वर्ष यह मेला लगता है जिसमें मेढ़ों की लड़ाई होती है-जो भी मेढ़ा जीतता है, उसे मेढ़ों का राजा घोषित किया जाता है और उसके मालिक को कई प्रकार के पुरस्कार भी मिलते हैं।’’

‘‘अच्छा !’’ साधु ने हैरानी से कहा और भीड़ को चीरकर आगे आ गया।
उधर, लड़ाई शुरू हो चुकी थी।
सभी दिलचस्पी से लड़ाई देख रहे थे।
लड़ते लड़ते अचानक एक मेढ़ा रुककर साधु की और देखने लगा।
दूसरा मेढ़ा भी जहां-का-तहां रुक गया।
सभी लोग उस मेढ़े को देखने लगे।
साधु के सामने आकर मेढ़ा रुक गया। उसका सिर झुका था। सींग ऊपर की ओर उठे हुए थे।

ऐसा लगता था जैसे साधु पर वार करने को तैयार है।

लेकिन साधु तो अपनी ही मस्ती के रंग में डूबा हुआ था। मेढ़े को सिर झुकाए देखकर बोला, ‘‘वाह-वाह..कितना समझदार है यह जीव जो साधु सन्तों का भी आदर करना जानता है।’’
उस मेढ़े का मालिक समझ गया कि साधु गलत समझ रहा है। वह तत्परता से बोला, ‘‘महाराज ! यह आदर-वादर नहीं कर रहा है-पीछे हट जाइए-यह मार देगा।’’
‘‘नहीं-नहीं-यह बेजुबान जीव भला किसी को क्या मारेगा-यह तो आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। इंसान ही है जो इन बेजुबान जीवों पर अत्याचार करता है।’’ साधु अपनी ही रौ में बोलता चला गया।
‘‘महाराज आप भूल रहे हैं कि यह मेढ़ा है और स्वभाव से मरखना है-इसका स्वभाव तो भगवान भी नहीं बदल सकते-हर प्राणी अपने स्वभाव से ही पहचाना जाता है’’ मेढ़े के स्वामी ने साधु को फिर चेताया।
साधु बोला, ‘‘नहीं-नहीं-तुम मूर्ख हो।’’
पास खड़े एक अन्य व्यक्ति ने भी कहा-‘‘महाराज ! यह लड़ाकू मेढ़े हैं-इनका तो स्वभाव ही मरना-मारना है।’’
लेकिन साधु ने किसी की नहीं सुनी। वह आगे बढ़ा।
उधर, मेढ़ा भी दो कदम आगे बढ़ा

मेढ़े के मालकि ने उसे रोकना चाहा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
पलक झपकते ही मेढ़े ने साधु को सींगों, पर उठाकर धरती पर पटक दिया।
‘‘हे राम !’’ साधु के हलक से एक तेज चीख निकली।
साधु मुंह के बल गिरा था। उसके सारे दांत टूट गए। मुंह में खून भर गया।
लोगों ने लाठी मारकर मेढ़े की पीछे धकेला।
फिर साधु को उठाते हुए बोले-‘‘क्यों महाराज ! हमने कहा नहीं था कि यह मेढ़े स्वभाव से मरखने होते हैं।

‘‘हां भाई !’’ दर्द से कराहते हुए साधु बोला-‘‘वास्तव में ही यह मेरी भूल थी-तुमने सच कहा था कि मेढ़े का स्वभाव ही मारना होता है, जैसे बिच्छू डंक मारना नहीं छोड़ सकता-हाय ! इसने तो मेरी हड्डी-पसली ही तोड़ डाली।’’
लोग साधु को घसीटकर पीछे ले गए। एक व्यक्ति ने उसे कुल्ला कराकर दूध पिलाया। साधु समझ चुका था कि जीव चाहे कोई भी क्यों न हो, अपनी प्रकृति के अनुसार अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता।

यूं भी किसी के स्वभाव या आचरण के विषय में तुरंत कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए, उसके सम्पर्क में आने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए।



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