भारत में पर्वों के साथ व्रत और अनुष्ठान जोड़े गये हैं। अन्य संस्कृतियों
में भी पर्वों, व्रतों और अनुष्ठानों का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता
है। किन्तु जितनी वैज्ञानिकता हिन्दुओं के व्रत उपवासों में है उतनी अन्य
कहीं नहीं।
हर त्यौहार में मौसम के अनुसार व्रत, अनुष्ठान किये जाते हैं। हिन्दू
शास्त्रों में किए किये व्रत में क्या खायें, क्या पहनें किसका पूजन करें,
इन सभी बातों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। लोक संस्कृति में इनका समावेश
होने से जन साधारण को भी इस बात का ज्ञान है कि व्रत-स्वास्थ्य के लिये
कितने लाभदायक हैं। प्रत्येक व्रत-उपवास के पीछे पौराणिक कथायें हैं जो
सुखी जीवन के लिये हितकर संदेश देती हैं।
लेखकीय
भारत में पर्वो के साथ व्रत और अनुष्ठान जोड़े गये हैं। अन्य संस्कृतियों
में भी, व्रतों और अनुष्ठानों का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है।
किन्तु जितनी वैज्ञानिकता हिन्दुओं के व्रत उपवासों में है उतनी अन्य कहीं
नहीं।
हर त्यौहार में मौसम के अनुसार व्रत, अनुष्ठान किये जाते हैं। हिन्दू
शास्त्रों में किए व्रत में क्या खायें, क्या पहनें, किसका पूजन करें, इन
सभी बातों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। लोक संस्कृति में इनका समावेश होने
से जन साधारण को भी इस बात का ज्ञान है कि व्रत-उपवास स्वास्थ्य के लिए
कितने लाभदायक है। प्रत्येक व्रत-उपवास के पीछे पौराणिक कथायें हैं जो
सुखी जीवन के लिये हितकर संदेश देती हैं।
हर कथा बोध है। नीति कथा है। वह लोक स्वरों में लोक बिम्बों के साथ गूथी
हुई हैं। इतना ही नहीं भारतीय समाज का सर्वाधिक भरोसा रिश्ते में हैं।
रिश्ते बनाना और निभाना भारतीय संस्कृति की आदर्श स्थिति है। यहां कोई
स्त्री सिर्फ स्त्री नहीं है। कोई निपट पुरुष नहीं है। वे मां है, बहन है,
पत्नी है इसी तरह पुरुष भी भाई हैं, सखा है, बेटा है कुछ है। सिर्फ देह
नही है। इस सबके गूथने से बनता है परिवार। कई परिवार बनाते हैं समाज और इस
तरह इकाई बड़ी होती रहती है। जीवन को पूर्ण बनाने; सात्विक बनाने के लिए
व्रत और चेतनामयी बनाए रखने के लिए त्यौहार मनाये जाते हैं।
व्रतों के प्रभाव से मनुष्य की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती
है। बुद्धि, सद्विचार तथा ज्ञान विकसित होता है। परम्परा के प्रति भक्ति
और श्रद्धा बढ़ती है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य कुशलतापूर्वक,
सफलतापूर्वक तथा उत्साहपूर्वक कार्य करता है। उसके सुखमय दीर्घ जीवन के
आरोग्य साधनों का स्वयं ही संचय हो जाता है।
प्रस्तुत पुस्तक में सभी प्रचलित पर्व त्यौहार, तथा व्रत, उपवासों उनसे
संबंधित विधि-विधान तथा पौराणिक कथाओं का समावेश करने का प्रयास किया है।
इस पुस्तक को प्रस्तुत करने में मैंने विभिन्न लेखकों व प्रकाशन संस्थानों
द्वारा लिखित पुस्तकों का सहयोग लिया मैं उनके प्रति आभारी हूँ।
मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक लोकोपयोगी सिद्ध
होगी।
राजेश शर्मा
चैत्र (कृष्ण पक्ष)
होली महोत्सव
पुराण समुच्चय तथा मुक्त संग्रह के अनुसार यह उत्सव होली के दूसरे दिन
चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को होता है। इसे धुलेंडी अथवा फाग कहते हैं। नर-नारी
इसे रंग, गुलाल, गोष्ठी, परिहास और गायन-वादन से सम्पन्न करते हैं। आज कल
इस उत्सव का रूप विकृत और उच्छृङ्खलता पूर्ण हो गया है। यह उत्सव सभ्यता व
सद्भावना के साथ प्रेमपूर्वक मनाना चाहिये।
होलिका के जलाने में प्रहलाद के निरापद निकल जाने के हर्ष में यह उत्सव
सम्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त शास्त्रों के अनुसार इस दिन नव प्राप्त
नवान्न के सम्मान में इसी रूप में नवानैष्टि यज्ञ होता है। सब
लोग
जौ की बलियां भूनते हैं तथा एक दूसरे को अभिवादन कर जौ के भुने दाने देते
हैं।
यज्ञ की समाप्ति में भस्म वन्दन और अभिषेक किया जाता है किन्तु ये दोनों
कृत्य कुत्सित रूप में होने लगे हैं। माघ शुक्ल पंचमी के चैत्र शुक्ल
पंचमी तक वसन्तोत्सव होता है।
गनगौर (गौरी तृतीया)
गौरी व्रत
व्रत विज्ञान के अनुसार यह व्रत चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र प्रतिपदा
चैत्र शुक्ल तृतीया तक किया जाता है। होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण
प्रतिपदा) से तो कुमारी और विवाहित बालिकाएं अर्थात् नव विवाहिताएं
प्रतिदिन गनगौर पूजती है, वे चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नद, नदी,
तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गनगौरों को पानी पिलाती हैं, और
दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहिता
लड़कियों के लिए पति का अनुराग उत्पन्न कराने वाला और कुमारियों को उत्तम
पति देने वाला है। इससे सुहागिनों को सुहाग अखण्ड रहता है। इसी वजह से
हिन्दू स्त्री यह दिन एक त्यौहार के रूप में मनाती हैं।
एक दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को समस्त स्त्री-समाज को सौभाग्य का वरदान
दिया था। इस दिन सुहागिन दोपहर तक व्रत रखती है। व्रत शुरू करने से पूर्व
रेणुका की गौरी की स्थापना करती हैं। गौरी का इस स्थापना पर सुहाग की
वस्तुएं-कांच की चूडियां, सिन्दूर महावर, मेंहदी, टीका, बिन्दी, कन्घी,
शीशा, काजल आदि-आदि वस्तुएं चढ़ाई जाती है। उक्त सामग्री का अर्पण चन्दर,
अक्षत, धूप-दीप आदि से विधिपूर्वक पूजन करके किया जाता है तथा
भोग
लगाने के बाद गौरीजी की कहानी कही जाती है। कहानी के बाद गौरी जी पर
चढ़ाये
हुए सिन्दूर से स्त्रियां अपनी मांग भरती है, इसके पश्चात् मात्र एक बार
भोजन करके व्रत का समापन करती है। इस व्रत की कहानी निम्न प्रकार से है :
व्रत की कहानी
एक बार शंकर भगवान तथा पार्वती जी नारद जी के साथ भ्रमण पर जा रहे थे।
चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच जाते हैं। उनके
आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियां उनके स्वागत सत्कार
के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलम्ब
हो गया। किन्तु साधारण परिवार की स्त्रियाँ श्रेष्ठ परिवार की स्त्रियों
से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन के लिए पहुँच गयीं।
पार्वतीजी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया।
वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर वापस आयीं। तत्पश्चात् उच्च परिवार
की महिलाएं अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान लेकर गौरीजी और शंकर जी की
पूजा करने पहुँची। सोने-चाँदी के पात्र में विभिन्न प्रकार के खाद्य
पदार्थ थे।
उन महिलाओं को देखकर भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा, तुमने सारा सुहाग रस
तो साधारण कुल परिवार की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी।
पार्वती जी ने जवाब दिया, हे प्राणनाथ, आप इसकी चिन्ता मत कीजिए, उन
स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस ही दिया है। इसलिये उनका
रस धोती से रहेगा। परन्तु मैं उच्च परिवारों की स्त्रियों को अपनी अंगुली
चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा,
वह तन मन से मुझ जैसे सौभाग्यवती हो जाएगी।
जब स्त्रियों ने पूजा सामप्त कर ली, पार्वती जी अपनी अंगुली चीर कर उन पर
छिड़क दी। जिस पर जैसे ही छीट पड़ी, उसने वैसा ही सुहाग प्राप्त कर लिया।
इसके पश्चात् भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और
बालू की शंकर जी की मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजा के बाद बालू के
पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया। दक्षिणा आदि करके नदी किनारे की मिट्टी
से माथे पर तिलक लगाकर दो कण बालू का भोग लगाया। इतना सब करते-करते
पार्वती जी को काफी समय निकल गया। काफी देर बाद जब वे लौटकर आयी तो महादेव
जी ने उनसे देर से आने का कारण पूछा।
उत्तर में पार्वती जी ने झूठ ही कह दिया कि वहां मेरे भाई भावज आदि मायके
वाले मिल गये थे। उन्हीं से बातें करने में देरी हो गई।
परन्तु महादेव तो महादेव ही थे। वे शायद कुछ और ही लीला रचना चाहते थे।
अत: उन्होंने पूछा : झूठ बोल दिया, तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज
का भोग लगाया था और स्वयं कौन सा प्रसाद खाया था ?
‘‘स्वामी पार्वतीजी ने पुन: झूठ बोल दिया, मेरी भावज
ने मुझे दूध भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहीं चली आ रही हूँ।
यह सुनकर शिवजी भी दूध भात खाने के लालच में नदी तट की ओर चल दिये।
पार्वती असमंजस्य में पड़ गयीं। तब उन्होंने मौन भाव से भोले शंकर का
ध्यान किया और अर्चना की कि हे भगवान यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो इस
समय आकर मेरी लाज रखिये।
यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शंकर के पीछे-पीछे चलती रहीं,
उन्हें नदीं के तट पर माया का महल दिखाई दिया उस महल के भीतर पहुँचकर वे
देखती हैं कि वहाँ शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित है,
उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव भीना स्वागत सत्कार किया।
वे दो दिनों तक वहां रहे।
तीसरे दिन पार्वतीजी ने शंकर जी से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार नहीं
हुए। वे अभी और ठहरना चाहते थे। इस पर पार्वती जी अकेली ही रूठ कर चल दीं।
इस परिस्थिति में भगवान शंकर को भी गौरी के साथ चलना पड़ा।
नारद जी भी साथ-साथ चल दिए। इस प्रकार काफी दूर निकल आये, उस समय भगवान
सूर्य अपने धाम को पधार रहे है। अचानक भगवान शंकर गौरी जी से बोले, मैं
तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।