‘मृगान्तक’ एक अदभुत गल्प है। इस अर्थ में
पृथ्वीवासियों के
मनोलोक में अमरत्व की कामना कहीं गहरे विश्वास के रूप में पैठी हुई है।
निजंधरी कथाओं के रूपान्तरण के असंख्य जादुई वृत्तान्त इस कामना को कुछ
ज़्यादा ही बल प्रदान कर डालते हैं।
गंगाप्रसाद विमल ने हिमालय के एक ऐतिहासिक किन्तु ध्वस्त तंत्रपीठ की खोज
के लिए जिस व्यग्र विदेशी खोजी के ज़रिए जिस वृत्तान्त की सर्जना की है वह
चाहे कल्पना की ही खदान से ही क्यों न निकला हो, अब एक रत्न की तरह चमकता
है, क्योंकि उसी की चमक में एक ओर सच रहता है तो उसकी दूसरी ओर झूठ का
निवास है। सच अगर बाहरी परत है तो झूठ रूपान्तरण के किस्सों में कहीं बहुत
भीतर मिथ्यात्व के विराट आकार में जीवित-सा प्रतीत होता है। वास्तव में
अतीत और वर्तमान की चिंतनधाराओं के सामाजिक प्रभाव का मृगान्तक जिस ढंग से
उत्खनन करता है उसके विवरण आकर्षण का केंद्र बनने लगते हैं।
क्लासिक रचनाओं की तर्ज़ पर उभरती मानवीय द्वंद्व जो किस्सों से छलकता है,
इसकी दार्शनिक आधारभूमि बनता है। शायद यही वह तत्व है, जो अपनी ओर
बलपूर्वक आकर्षित करता है और छलता भी जाता है। कि मृगान्तक का अनुवाद अनेक
भारतीय और विदेशी भाषाओं में हुआ है।
अभी हाल ही में ‘मृगान्तक’ पर आधारित अँग्रेजी में
अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म ‘बोक्षु द मिथ’ भी बनी है,
जिसका
प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में हुआ था।
मृगान्तक
बोक्षु विद्या के चक्कर में
बोक्षु प्रकरण में सबसे पहले याद आते हैं एक अंग्रेज़ –मैकटॉफ
साहब।
अंग्रेजों को अजब सनक थी। वे पूर्वीय क्षितिज के तमाम रहस्यों को समझना
चाहते थे। लोगों का कहना है कि अंग्रेज़ कौम का यह खोजी स्वभाव एक किस्म
का शौक है, पर ज़्यादातर लोग कहते हैं कि ख़बरें जुटाना, चीज़ों का बारीकी
से अध्ययन करना, लोगों के विश्वास के ज़रिए उनकी कमजोर नब्ज़ पकड़ लेना और
उन इलकों पर अपना आधिपात्य जमा लेना अंग्रेजों के मंसूबे का लक्ष्य कुछ और
ही है।
पर मैकटॉफ साहब–जैसा की खोजियों का अनुमान है, दूसरे ही किस्म
के अंग्रेज़ थे।
बोक्षु विद्या के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ इन्हीं मैकटॉफ साहब के
ग्रंथों में मिलती हैं। उन्होंने भी प्राचीन संस्कृत, पालि ग्रंथों के
अध्ययन के बाद इस गुह्य विद्या की जानकारी प्राप्त की थी। मैकटॉफ की तरह
ही डेविड चेम्बरलिन नामक एक विद्वान ने इस मामले को अपने अनुसंधान का विषय
बनाया था। दोनों विद्वानों ने जिस महत्त्वपूर्ण बिंदु की खोज की थी, वह था
बोक्षुविद्या का अस्तित्व तथा मूल पांडुलिपि का होना। उन्होनें काफी खोज
के बाद उस सिद्ध पीठ का नाम भी खोज निकाला था, जहाँ इस पाण्डुलिपि के
सुरक्षित होने की संभावना थी। और वह जगह थी ‘जलेड’।
लेकिन कोई भी पुराना खोजी यह नहीं बता सका था कि अंततः यह जलेड नामक जगह
है कहाँ ?
प्रिय पाठक–आपकी जिज्ञासा होगी कि यह बोक्षु विद्या है क्या
चीज़ ?
शायद आपने तांत्रिकों के शरीर –रूपांतरण के सनसनी खेज,
अविश्वसनीय
किस्सों के बारे में सुन होगा। बोक्षु विद्या भी एक ऐसी विद्या है जिसको
जानकर सहज ही में आदमी बोक्षु यानि बाघ का रूप धारण कर सकता है। हाँलाकि
यह बहुत रहस्यपूर्ण साधना है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि शायद तंत्र-मंत्र
की दुनिया में यह सबसे सरल साधना है जिसे मनुष्य थोड़े ही समय में आसानी
से सिद्ध कर सकता है। असली बात यह नहीं है कि आपने अपना रूप बदल
लिया और अपने विरोधियों को डरा दिया या मित्रों को हक्का-बक्का कर दिया।
वस्तुतः यह अमरत्व की साधना है- एक बार बोक्षु रूप धारण कर आप एक वर्ष के
लिए सुरक्षित हो जाते हैं, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि आपकी उम्र में एक
वर्ष बढ़ जाता है। बोक्षु साधना के बाद एक वर्ष तक मनुष्य को कोई रोग,
आघात, कोई भी चीज़ नहीं मार सकती। अर्थात् मनुष्य चाहे तो केवल एक छोटे से
समय की साधना के बाद अपनी उम्र में वर्ष पर जोड़ सकता है। अमरत्व के इसी
आकर्षण ने कितनी ही खोजियों, साधकों और जिज्ञासुओं को हिमालय की तराइयों,
कामरूप, भास्कर पीठ, नेपाल, ज्ञान लोक और तिब्बत की यात्राओं की ओर खींचा
है।
हिमालय क्षेत्र की इन्हीं बीहड़ यात्राओं का वृत्तांत मैकटॉफ साहब ने दिया
है। वे दूरांत, निर्जन घाटियों, जंगलों के रास्ते ऐसे-ऐसे मठों तक पहुँचे
हैं जहाँ तक जाने का अर्थ अपनी मौत को निमंत्रण करना है। अपनी खोज के
निष्कर्ष के रूप में मैकटाफ ने स्पष्ट कहा है कि बोक्षु विद्या ? जैसे सहज
तंत्र का अस्तित्व है और यह कि एक समय में उसका दूर-दूर तक प्रचलन भी हो
गया था। पुराने समय में रूस के ज़ार तक ने इसमें दिलचस्पी दिखाई थी। पंजाब
के कूफा संतों ने इस विद्या की एक प्रति ज़ारवंश के एक क्रूरतम वंशज को दी
भी थी।
हैरानी की बात यह है कि बोक्षु विद्या जिस भी लिपी में अंकित है- उसके
अक्षर कोई भी व्यक्ति, चाहे जो भाषा जानता हो, पढ़ सकता है। अर्थात् वह
एक ऐसी लिपी है जिसे विश्व लिपी कहा जाना चाहिए। कभी बोक्षु
तंत्र
मिले और उस लिपि का विकास हो तो क्या दुनिया-भर के लिए एक लिपि की संभवना
का सपना पूरा नहीं हो जाएगा ?
अमरत्व की इस विद्या ने असंख्य लोगों को भटकाया है। इसका कोई
हिसाब
नहीं कि कितने लोग मरे होंगे। मैकटॉफ के वृत्तांतो में तिब्बत जैसे
रहस्यमय देश के ऐसे-ऐसे रोंगटे खड़े करने वाले प्रसंग हैं आदमी
पढ़ते-पढ़ते खुद को उन खोजियों के साथ उसी पंक्ति में खड़े देखता
है।
लेकिन... चाहे जो विद्या हो, तंत्र हो....उसे मनुष्य के संदेह से गुजरना
होता है। आधुनिक समय में ज्ञान-विज्ञान का इतना विकास हुआ है कि जब तक
प्रमाण और तर्क न हों-यकायक किसी चीज़ पर विश्वास करना मूर्खता मानी जाती
है ।
विज्ञान ने प्राचीन ज्ञान को संदेह की वस्तु बना डाला है। अब बोक्षु के
सत्यासत्य की परीक्षा बहुत ज़रूरी है। इसी सत्यासय की भावना से प्रेरित एक
अनुसंधान के कागज़, डायरियाँ हमारे हाथ लगे थे। उन कागज़ों में ही मैकटॉफ,
चेम्बरलिन तथा दूसरे लोगों की खोजों के वृत्तांत हैं। हमने उन विवरणों की
तारीखें हटाकर उन्हें सिर्फ संपादित भर किया है। दुनिया के बड़े-बड़े
विश्वविद्ययालयों में अतीत के रहस्यों की छानबीन हो रही है- शायद कोई
विश्वविद्यालय बोक्ष तंत्र की खोज करे इसलिए इन विवरणों का प्रकाशित होना
अनिवार्य लगा।
बोक्षु विद्या की खोज के ये कागज़ाद क्योंकि दूसरे व्यक्ति
की खोज हैं, अतः इन पर टिप्पणी करना या इनके ही सत्यासत्य का निर्णय देना
हमारे लिए मुश्किल है कार्य है। एक बलीलाई संस्कृति और आधुनिक दृष्टि के
बीच घटित एक तनाव की उपस्थित का रूप कैसा हो- हम तो यह भी अपनी ओर से नहीं
जोड़ सकते। सिर्फ कुछ संदेश हैं। केवल पशु रूप में रूपांतरण का
आखिर
अर्थ क्या है ? क्या शताब्दियों से तंत्र-मन्त्र के परिशोधन की दिशा में
कोई काम नहीं हुआ ? खासकर बोक्षु विद्या ? के संदर्भ में विचार करें तो
पशुवत् आचरण रक्तजीवी प्रवृत्ति- आखिर इसका प्रयोजन क्या हो
सकता है
? पशु और आदमी की दुनिया में सभ्यता और संस्कृति ने जो फ़र्क़ पैदा किया
है, क्या उसे पाटने की कोई कोशिश है- या देह रूपारंतरण के ज़रिए
पूर्ण पशुत्त्व की इच्छा मनुष्य की कोई दमित कामना है ?
इंसानी दुनिया में जानवरों की तरह व्यवहार करने वाले
उदाहरणों
की कमी नहीं है। लेकिन अगर ऐसी विद्या है तो यह कितनी चमत्कारपूर्ण है।
चमत्कारपूर्ण तो अमरत्व भी है।
परंन्तु मैकटॉफ साहब के विविरण-स्वयं प्रकट होने वाली साधना पद्घति की
बात- केवल परिकल्पना जैसी चीज़ है.... मैकटॉफ महोदय के वृत्तांत जैसे
गप्प.....गप्प कोरी गप्पें हो।
इसमें सिर्फ अंतिम विविरण, जो मैकटॉफ साहब के बारे
में इकट्ठा
किया गया है। शिवालिक पहाड़ी पर बसे सत्यनारायण मंदिर के आसपास के जंगली
इलाके के खानाबदोश लोगों से मालूम किया गया है- सच है। मैकटॉफ साहब और
आसपास के इलाकों के कुछ लोगों का विश्वास था कि मंदिर का पुजारी बोक्षु
सधाना जानता है। इसी जगह मैकटॉफ साहब की मृत्यु हुई थी। जिन ग्रामीणों और
सड़क पर काम करने वालों ने मैकटॉफ का शव देखा था- उनके कथन कागज़ों के
आखिरी हिस्से में वर्णित हैं। जिन्होंने उस शव को देखा था। उन्होंने समझा
था, गोरे रंग के मैकटॉफ जोगी समाधि में लेटे हुए हैं- पर उनके गले पर दाँत
के घाव थे- चेहरा सफेद से भी सफेद था। रक्तविहीन। लगता नहीं था कि मैकटॉफ
मरे हुए हैं।
अमरत्व साधना के खोजी क्या किसी बोक्षु के शिकार हो गए थे.....?
जलेड की खोज
कहाँ होगा जलेड ? कहीं भी तो उसकी भौगलिक स्थिति का ठीक-ठीक ज़िक्र नहीं
है। ढेर सारे तंत्र-मत्र में उस महत्तम तंत्र पीठ का उल्लेख है लेकिन कहीं
भी उन मार्गों का उल्लेख नहीं है जिनसे जले़ड तक पहुँचा जा सके। उसका
भौगोलिक सूत्र केवल यह हासिल होता है कि जलेड किसी पहाड़ी स्थान पर स्थित
है। भारत में पहाड़ियों का सिलसिला बहुत लंबा है। अगर आदमी एक सिरे से खोज
करना आरंभ करे तो शायद यह ज़िदंगी भी पूरे पहाड़ी इलाकों के बीच पहुँचने,
वहाँ की घाटियों, पर्वत-शिखरों को देख पाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
तंत्रिकों के सिद्धपीठ अगर गोपनीय और वर्जित क्षेत्र होते तो कामाख्या के
मंदिर या पश्चिमी बंगाल के रुद्रेश्वर मंदिर या अनेकानेक तंत्र सिद्धपीठ
तक लोगों के पहुँचने की वर्जना होती। सामान्य जनों के लिए गोपनीय से
गोपनीय रहस्य द्वारों तक पहुँचने की स्वतंत्रता होती है। आखिर आदिम
संस्कृति से अब तक के इतिहास में यही स्वतंत्रता तो ऐसी चीज़ है-जिसे पाने
के लिए मनुष्य समुदाय बेचैन रहा है।
‘जलेड’ की खोज के लिए ग्रंथकारों के
अतिरिक्त कुछ
पुरातत्त्व संस्थानों की सामग्री को देखना ज़रुरी लगा, लेकिन यह कितना
हास्यास्पद लगता है कि हिन्दुस्तान के एक सिद्धपीठ खोजने के लिए विलायत के
‘आर्काइव्ज़’ देखे जाएँ। लेकिन विलायत के सरकारी, गैर
सरकारी
और निजी पुरातत्व संग्रहालयों में, भारत के पुराने नक्शों में तथा
घुमंतुओं के मार्ग-विवरणों में कहीं भी ‘जलेड’ के
रास्ते के
बारे में पता नहीं चला। वह तो इंग्लिस्तान में खोज के दौरान ही पता चला कि
पुराने अंग्रेज़ अफसरों द्वारा तैयार किए गए जिला गजोटियरों को देखना
जरूरी है। बहुत मुमकिन है कि जिलाधिकारियों ने अंग्रेज़ प्रशासन
की
सहायता के लिए कुछ न कुछ ऐसी सामग्री ज़रूर छोड़ी होगी, जो मार्ग-निर्देशन
कर सके। शोधार्थियों की नियति भी क्या है—अपने मुल्क की खोज के
निमित्त दूसरे देशों में सूत्र खोजना और दूसरे देशवासियों की आधार सामग्री
पर निर्भर रहना।
‘जलेड’ की सामग्री के बारे में ऐसा ही हुआ कि बहुत-से
दूसरे
सूत्रों में खोज जारी रखनी पड़ी। लेकिन मिला कुछ भी नहीं। गजेटरियों में
भी नहीं। गजेटरियों में ‘जलेड’ नाम का उल्लेख था ही
नहीं,
स्वामी विशुद्धानंद नामक सूर्य-तांत्रिक के ग्रंथों एवं उनके
शिष्यों द्वारा तैयार ग्रंथों में भी जलेड का नाम नहीं था।
उन्होंने
नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में, किसी अज्ञात सिद्धपीठ
‘ज्ञानलोक’
का उल्लेख किया था। यदि ज्ञानलोक के एक एक अक्षर को जोड़कर तीन अक्षरों
वाला नाम भी बनाया जाए तो वह ‘ज्ञलेक’ होगा
‘जलेड’ नहीं। संभव है ‘ज्ञानलोक’
का ही नाम
‘जलेड’ रहा हो तो किंतु स्वंय
‘ज्ञानलोक’ के
भूगोल का कोई विवरण कहीं नहीं मिलता। ज्ञानलोक से तांत्रिकों को आदेश
अवश्य मिलते हैं किंतु वे लोग सदेह ज्ञानलोक नहीं जा सकते। स्वामी
विशुद्धानन्द के शिष्यों का विश्वास है कि बड़े-बड़े महात्मा, तांत्रिक
लोग समाधि लेकर फिर ज्ञानलोक चले जाते हैं तो लौटते नहीं हैं। महात्माओं
की मरणोपरांत स्थिति को लेकर इस विश्वास के कई प्रमाण भी जुटाए जाते हैं।
केवल शिष्य परंपरा ही उन पर विश्वास रखती है। शेष जन उन बातों को न कोवल
अविश्वास की दृष्टि से देखते हैं, बल्कि उन्हें कोरी गप्प मानकर स्वार्थी
तत्वों की दिमागी शरारत भी कहते हैं। स्वामी विशुद्धानन्द के शिष्यों के
प्रचार में यह बात विशेष रूप से प्रचारित की जाती है कि स्वामी
विशुद्धानन्द अब भी शिष्यों पर अपना कृपा-प्रसाद बरसाते हैं। पंडित कविराज
गोपीनाथ भी स्वामी विशुद्धानंद के शिष्य रहे हैं। स्वामी विशुद्धानंद के
सूर्य-विज्ञान तंत्र के विषय में पंडितराज गोपीनाथ जी ने अनेक भाषाओं में
अनेक ग्रंथ लिखे हैं। उन्होंने भी स्वीकार किया है कि अब भी उन पर
गुरु-कृपा रहती है और पारिजात पुष्प की सुगंध के रूप में अब भी स्वामी
विशुद्धानंद जी उनसे मिलने आते हैं। ज्ञानलोक में ऐसे अनेक महात्मन्
तांत्रिकों का सिद्धपीठ है। वह ज्ञानलोक कहाँ है—उस तक पहुँचने
का
मार्ग भी है—इसका किंचित भी विवरण कविराज गोपीनाथ ने नहीं दिया
है।
बहरहाल, बहुत सारे सिरों से जलेड की अपनी खोड को पहाड़ी इलाकों की
जानकारियों तक सीमित करना पड़ा। गाँव, तहसील, परगनों और पट्टियों की लंबी
सूचियों के बीज मुझे कहीं भी ‘जलेड’ नाम नहीं दिखाई
दिया।
पूरे मुल्क के सरकारी बंदोबस्त के महकमें किसी एक केंद्रीय स्थान पर जमा
नहीं हैं, इसलिए उन्हें देखने के लिए अलग-अलग जगहों पर जाना पड़ा। जगहें
वे ही चुननी पड़ीं, जहां कहीं निकटस्थ ‘जलेड’ होने की
संभावना
हो सकती थी।
पूरे मुल्क के बंदोबस्त (ज़मीन बंदोबस्त) संबंधी कागजों को पलटना भी कितना
मुश्किल काम है—यह तो बताना भी मुश्किल है। साथ-ही-साथ एक तरफ
से
ऐसा काम खब्त और मूर्खता से भरा भी लगता है।
पहाड़ी राज्यों की ग्राम-सूचियों में जो नाम हाथ लगे थे, वे जलधार, जलगाड,
जालूड, जगधार, जल्ड, जाल्डी, जलगाँव, जमेठी, जलखाड। जलगाड और जलधार को
छोड़ शेष जगहें तराई के इलाकों की थीं और उनमें वह भौगोलिक समता नहीं थी
कि जिससे ‘जलेड’ की सम्भावना उनमें की जाती। उन जगहों
का कोई
ऐसा ऐतिहासिक महत्त्व भी नहीं था। इतनी थका देने वाली खोज के बाद सिर्फ दो
नाम और वे भी केवल संभावना के तौर पर मुझे मिले थे, वे बहुत आशाजनक खोज का
हिस्सा नहीं कहे जा सकते थे। एक लंबे अर्से तक साधुओं, तंत्रिकों से मिलकर
भी मैं उस तंत्रपीठ का सुराग नहीं पा सका था। सरल हृदय साधुओं और अक्खड़
तांत्रिकों ने मुझसे कुछ छिपाया हो, यह मैं कल्पना में भी नहीं सोच सकता
था। पर मैं उन लोगों से मिल-मिल कर ऊब गया था। उनके रहने के तौर-तरीके
मुझे जरा भी चमत्कारी नहीं लगे थे। बल्कि उनसे किसी किस्म कि विरति हुई थी
अब कोई साधु मुझे दीखता तो मुझे लगता, उसके पूरे जिस्म में काली, सफेद
भूरी जूएँ रेंग रही हैं। उनके खान-पान, व्यवहार का भी कोई उत्साहप्रद असर
मुझ पर नहीं था।