Nari-Hruday ki Sadh - A Hindi Book by - Satyavati Malik - नारी-हृदय की साध - सत्यवती मलिक
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Nari-Hruday ki Sadh

नारी-हृदय की साध

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सत्यवती मलिक<<आपका कार्ट
मूल्य$ 11.95  
प्रकाशकआर्य प्रकाशन मंडल
आईएसबीएन81-88118-89-3
प्रकाशितमार्च ०३, २००६
पुस्तक क्रं:3523
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Nari Hriday Ki Sadh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


श्रीमती सत्यवती का सारा जीवन मौन साधना का जीवन रहा। यह साधना इतनी सहजता से उनके जीवन का अंग बन गई कि उन्हें लगता नहीं था कि कोई साधना कर रही हैं। वे अपने समय की सुविख्यात साहित्यकार ही नहीं, समर्पित-समाज-सेविका और मर्मज्ञ कला प्रेमी भी थीं। कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्त, ललित निबंध आदि अनेक विधाओं के माध्यम से हिन्दी-साहित्य की अभिवृद्ध में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं-‘दो फूल‘ ‘वैसाख की रात’, ‘नारी हृदय की साध’ और ‘दिन- रात’, जो लोकप्रिय हुए हैं और पुरस्कृत भी। मानव-मन की गहरी पकड़ और सहज-सरल अभिव्यक्ति के कारण उनकी कहानियाँ आज तक पाठकों के हृदय में घर किए हुए हैं।

 इनके अतिरिक्त ‘अमर पथ’ ‘अमिट रेखाएँ’, ‘मनव-रत्न’ सरीखे उनके बेजोड़ रेखाचित्र और संस्मरण तथा ‘कश्मीर की सैर’ जैसे अप्रतिम यात्रावृत्त बहुचर्चित हुए। ‘मानव रत्न’ का तो देश की शिक्षा-संस्थाओं में अभूतपूर्व स्वागत हुआ और वह वर्षों तक उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में पाठ्यपुस्तक रही। वे नियमित रूप से ‘विशाल भारत’, ‘विश्ववाणी’, ‘विश्वभारती’ और ‘नया समाज’ में छपती रहीं। इस पुस्तक में उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ संकलित हैं।

संदर्भिका

साहित्यकार का जीवन साधना का जीवन है। दीये की भाँति स्वयं जलकर भी वह दूसरों को प्रकाश देता है। जीवन-भर व्यथा में तपकर वह जो पाता है, उसे कंचन-सा निखारकर जगती में लुटा देता है। जीवन और जगत् के समस्त विष को वह अपनी साधना के बल से अमृत कर लेता है और इस अमृत से सहृदयों को सराबोर कर देता है। इसलिए श्रीमदभागवद्गीता में साहित्य साधना को ‘वाङ्मय तप’ की संज्ञा देकर आत्मदर्शन का निमित्त माना गया है।

श्रीमती सत्वती मलिक का सारा जीवन मौन साधना का जीवन रहा है और यह साधना इतनी सहजता से उनके जीवन का अंग बन गई है कि उन्हें लगता ही नहीं कि वे कोई साधना कर रही हैं। वे अपने समय की सुविख्यात साहित्यकार ही नहीं, समर्पित समाज-सेविका और मर्मज्ञ कलाप्रेमी भी हैं। कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्त, ललित निबंध आदि अनेक विधाओं के माध्यम हिंदी-साहित्य की अभिवृद्धि में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उनके चार कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं-‘दो फूल’, ‘वैशाख की रात’, ‘नारी-हृदय की साध’ और दिन-रात’। वे खूब लोकप्रिय हुए हैं और पुरस्कृत भी। मानव-मन की गहरी पकड़ और सहज-सरल अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियाँ आज तक पाठकों के हृदय में घर किए हुए हैं। इनके अतिरिक्त ‘अमर पथ’, ‘अमिट रेखाएँ’, ‘मानव-रत्न’ सरीखे बेजोड़ रेखाचित्र और संस्मरण तथा ‘कश्मीर की सैर’ जैसे अप्रतिम यात्रावृत्त बहुचर्चित हुए हैं। ‘मानव-रत्न’ का तो देश की शिक्षा-संस्थानों में अभूतपूर्व स्वागत हुआ और वह वर्षों तक उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में पाठ्य-पुस्तक के रूप में लगी रही।

साहित्य के अलावा संगीत और ललित कलाओं के विकास में भी श्रीमती मलिक का महत्त्वपूर्ण योग रहा है। गांधर्व महाविद्यालय, संगीत भारती, सरस्वती समाज, इंडियन नेशनल थियेटर और हिंदी भवन, चित्र-कला-संगम जैसी अनेक संस्थाएँ उनके अथक सहयोग और निःस्वार्थ सेवाभाव से गौरवान्वित हो चुकी हैं। वर्षों तक वे आकाशवाणी एडवाइज़री बोर्ड और फिल्म और सेंसर बोर्ड की सदस्या रही हैं और विभिन्न विषयों पर आकाशवाणी से प्रभावोत्पादक वार्ताएँ भी प्रसारित करती रही हैं।

श्रीमती मलिक, जिन्हें हम सब प्यार और आदर से अन्ना जी कहते हैं, सात्त्विकता की मूर्ति हैं। उनसे मिलने पर जो चीज़ सर्वाधिक आकृष्ट करती है, वह है सहज मुस्कान और कोमल मधुर वाणी से युक्त उनका सौम्य व्यक्तित्व। उनके सान्निध्य में सौमनस्य अपने आप आ घेरता है और व्यक्ति अभिभूत होने लगता है। इधर कुछ वर्षों से अन्ना जी पक्षाघात के कारण शय्याग्रस्त हैं। पर जिस अटूट मनोबल और असीम धैर्य के साथ वे इस लंबी बीमारी को झेलकर अपनी सहज सौम्यता को बनाए हुए हैं, वह स्तुत्य ही नहीं, प्रेरणाप्रद भी है। अन्ना जी की बीमारी से पहले उनके साथ साहित्य पर और विशेष रूप से उनके अपने सर्जनात्मक कृतित्व पर बातचीत करने के मुझे अनेक आह्लादकारी सुअवसर मिले हैं। अब भी उनके दर्शनार्थ जाता हूँ, पर सहज वार्तालाप के अभाव में मन मारकर रह जाता हूँ। उनसे मिलने पर हर बार मुझे लगा कि अपने साहित्यकार होने का उन्हें अलग से कोई भान-गुमान नहीं है। उनकी वाणी और व्यवहार से, और समूचे लेखन से भी, मुझे सदा यह आभास हुआ है कि उनमें नारी के बेटी, बहन, पत्नी, माँ आदि सभी रूप एकाकार होकर उन्हें साहित्य और समाज के निर्माणार्थ समर्पित होने को प्रेरित करते रहे हैं। शायद इसलिए उनकी रचनाएँ जीवन की समग्रता को समेटे उसकी आकर्षक, पर कठोर धरती पर टिकी हैं और अपने पाठकों को विपरीतताओं से कतराने की नहीं, बल्कि पूरी शक्ति और मनोयोग के साथ उनसे जूझने की प्रेरणा देती हैं।

साहित्यकार की एकांतिकता को नकारते हुए एक बार लंबी चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था-‘‘ज़िंदगी में जो उतार-चढ़ाव, तूफान, गृहस्थ जीवन, समाज एवं राष्ट्र में आते हैं, उसके दायित्व को भली भाँति निबाहना प्रत्येक साहित्यकार का कर्तव्य है, क्योंकि वह घर, समाज और राष्ट्र का अभिन्न अंग है। उनमें से मैं भी एक हूं, जिसे पुत्री, बहन, पत्नी, माता के परिवेश में प्रकृति ने सृजन किया है। साथ ही यह भी कि समय-पाकर कुछ मृदु-करुण-स्नेहसिक्त प्रसंग अभिव्यक्त कर सकूँ, जो एक संवेदनशील मन की स्वाभाविक क्रिया व प्रकृति है।

‘‘कई कारणों से इधर परिवार व समाज में वैसा मधुर सामंजस्य एवं आनंदपूर्ण वातावरण अनेक चेष्टा करने पर भी स्थापित नहीं हो पा रहा। यद्यपि हम पहले से कहीं अधिक सहिष्णु, चट्टानों-से दुःख-सुख झेलने के आदी होते चले जा रहे हैं। फूल-सी भावनाएँ बाह्य परिस्थितियों से कुचली जा रही हैं। ‘गुड्स ट्रेन’, ‘बुत’, उऋण’, ‘दृष्टि’ ‘दिन-रात’ ‘पर जो चला जाता’, ‘सन्नाटा’ आदि बाद की कहानियों में आप यह पाएँगे। विश्लेषण करना तो संभव नहीं, क्योंकि इन्हें लिखे भी काफी समय निकल गया है, और अब वर्तमान युग की लहरों के साथ बहना या संघर्ष करना ही है। जो आज प्रमुखतया वैज्ञानिक व तकनीकी है, उसे मोड़ने की शक्ति किसमें है ?’’

अन्ना जी का जन्म 1 जनवरी, 1906 को श्रीनगर में हुआ था। उनके पिता लाला चिंरजीवलाल अपने समय के प्रसिद्ध व्यापारी और गण्यमान्य समाजसेवी थे। परोपकार की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपनी दीर्घायु के चौथे चरण में संन्यास ग्रहण कर वे ‘स्वामी प्रेमभिक्षु’ के नाम से विख्यात हो गए थे। उनके अनुसरण में उनका परिवार भी सरल, सात्त्विक और प्रबुद्ध बन आया था। छोटी उम्र में ही अन्ना जी का विवाह प्रसिद्ध एडवोकेट श्री रामलाल मलिक से हो गया था। पर अपनी माता के अचानक और करुण निधन के बाद छोटे-छोटे भाई-बहनों के लालन-पालन का भार उन पर आ पड़ा था, जिसे उन्होंने सहर्ष निष्ठापूर्वक निभाया। यही नहीं, अपनी दिवंगत माताकी स्मृति में उन्होंने श्रीनगर में स्थापित कन्या पाठशाला का नाम भी बदलकर उनके नाम पर रख दिया।

पति के घर अन्ना जी को भाँति-भाँति के लोगों के संपर्क में आने का अवसर मिला और उसका सदुपोयग उन्होंने भरपूर किया अपने जीवनानुभवों को गहन और समृद्ध बनाने में। बाद में तो उन्हें उस युग के शीर्षस्थ साहित्यकारों, कलाकारों और समाजसेवियों का सान्निध्य भी प्राप्त हुआ। इसमें उन्हें अपने पति का भी स्तुत्य सहयोग मिला और मलिक-परिवार की गणना समृद्ध सांस्कृतिक घरानों में होने लगी। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि जब लंबी भेंटवार्ता का आरंभ करते हुए मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अपनी पहली कहानी और उसकी प्रेरणा के बारे में विस्तार से बताएँ, तो वे पलक झपकते ही साठ-पैंसठ वर्ष पहले के अपने अतीत में पहुँच गईं और बिखरी स्मृतियों को बटारने लगीं, इसमें उन्हें बस दो चार मिनट ही लगे और सूत्र मिलते ही वे धीरे-धीरे बताने लगीं, ‘‘यह एक बीता हुआ लंबा समय है जिसे पीछे मुड़कर देखती हूँ तो हृदय एक प्रकार के अनिर्वचनीय आनंद से भर उठता है। सोचती हूँ, तब कैसा रहा होगा ? यह निश्चित सरल-स्वच्छ, वन-वीथियों में विचरता कौतूहलपूर्ण सुसंस्कृत कश्मीर की प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण उन्मुक्त भूमि और एक सुनिश्चित सुसंस्कृत संभ्रांत घर में जन्म, पालन-पोषण शिक्षा-दीक्षा-जहाँ घर में प्रारंभ ही से ‘गृहलक्ष्मी’, ‘कन्या-मनोरंजन’, ‘सरस्वती’, ‘चाँद’, ‘ज्योति’ आदि मासिक पत्रिकाएँ आती थीं।

‘‘साथ ही परीक्षाओं के अतिरिक्त पुस्तकालयों से लेकर रोचक उपन्यास, कहानियाँ, महाभारत रामायण कथासरित्सागर, राजतरंगिणी आदि पढ़ना। उन दिनों भारत से जो प्रबल उत्साहित करने वाली खबरें पहुँचती थीं, उन्हीं से प्रेरित व अनुप्राणित होकर मन में जो भाव उठे, उन्होंने कहानी का आकार धारण कर लिया। इसी से प्रथम कहानी ‘क्या यह सब स्वप्न था ?’ (पूज्य महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के आधार पर) (श्रीनगर के एक शीतल पहाड़ी आँचल में बैठकर अनायस लिखी गई थी। उसे गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार की ‘ज्योति’ नामक पत्रिका के संपादक श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के नाम साहसपूर्वक भेज दिया। उसके छपने पर निश्चय ही मेरे हर्ष का पारावार न रहा। इसके कुछ वर्ष बाद अपनी पूज्य माता जी के करुण देहावसान के कारण छोटे-छोटे भाई-बहनों व पितृगृह को देखते-सँभालते हुए ‘अधूरा जीवन’ लेखमाला मन से व्यक्त हुई और ‘आर्य्य’ लाहौर में प्रकाशित होती रही। किंतु समय बीतता गया; बच्चे-बच्चियाँ बड़े हो गए, घर सँभल गया और ब्याह-शादियाँ आदि भी हो गईं।

‘‘और कई वर्षों के व्यवधान के बाद ‘दो फूल’ कहानी अनायास ही लिखी गई, जिसके ‘विशाल- भारत’ जैसे उच्चकोटि के मासिक पत्र में प्रकाशित होने पर मुझे ही प्रसन्नता नहीं हुई, मेरे भाई-बहनों-साथियों ने भी खुशियाँ मनाईं-बधाइयाँ दीं; और मेरी लेखनी को राह मिल गई। इसपत्र के संपादक सुप्रसिद्ध पत्रकार पं. बनारसीदास चतुर्वेदी और सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार ने सराहना करके आगे लिखते रहने को प्रेरित किया।’’

अन्ना जी को उकसाने की दृष्टि से मैंने पूछा, ‘‘आपकी प्रमुख कहानियों का रचनाकाल आज से चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले का है। इस बीच जीवन-मूल्यों में जो क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है, उसके परिप्रेक्ष्य में क्या आपको यह नहीं लगता कि ‘नारी-हृदय की साध’ जैसी कहानियों पर पुनर्विचार अपेक्षित है ? यदि आज के युग में आप ये कहानियाँ लिखतीं, तो क्या उनका रूप कुछ बदल नहीं जाता ?’’ वे शांत स्वर में बोलीं, ‘‘नारी-हृदय की साध’ निर्मल मन पर अंकित एक ऐसा अमर सूक्ष्म भाव है, जो उन दो छलछलाती हिमानी नदियों के समान युग-युगांतर से प्रवाहित होता आ रहा है और जब तक सृष्टि की यह रचना है, मानव-मन में तरंगित होता रहेगा। आज के युग में भी क्यों नहीं ? मैं तो फिर भी इसी को कहीं न कहीं प्रतिपादित कर सकूँगी। बिना स्नेह-बंधन के जीवन सूना है। ‘भाई-बहन’, ‘सखा-सखी’, ‘पति-पत्नी’, ‘पिता-पुत्री’ किसी भी पवित्र प्रेम में जीवन की सार्थकता है। ‘वंशी और चिट्ठी’ इसके कई वर्ष बाद लिखी गई। ‘माली की लड़की’, ‘भाई-बहन’, ‘कैदी’, ‘हसन’, ‘सुमाना’ कहानियों में भी वैसा ही भाव है और वे उस स्वस्थ वातावरण युग व मन की उपज हैं।’’

मैंने थोड़ा और कुरेदा, ‘‘माली की लड़की’, ‘सुमाना’, ‘कैदी’, ‘हसन’ आदि आपके रेखाचित्र हिंदी-साहित्य की निधि हैं। कहानी की अपेक्षा रेखाचित्र की रचना में आज अधिक सहज लगती हैं। इसका मूल क्या व्यक्ति-मानस की गहराइयों को नापने की आपकी प्रवृत्ति में माना जाए ?’’ वे बोलीं, ‘‘यह सत्य है कि लंबे कथानक मुझसे अभी तक चित्रित नहीं हो पाए, किंतु रेखाचित्र भी तो एक डिज़ाइन की तरह होता है, जिसमें पेंसिल स्केच का-सा आकार देकर अनुकूल रंग भरने होते हैं। फिर देखना होता है कि रचना का सौंदर्य कैसे निखरता है। वास्तव में, मूलभूत तो वह अनुभूति भाव या परम सत्य है जो हृदय से टकराता रहता है, जिसे किसी प्रकार प्रकट करना ही होता है। आखिर रेखाचित्र भी तो साहित्य की विधा या सांकेतिक शैली है।’’

मैंने पूछा, ‘‘आपने हिंदी-साहित्य का स्वर्ण-युग देखा है और आपको अनेक शीर्षस्थ साहित्यकारों के सान्निध्य का अवसर प्राप्त हुआ है। कृपया प्रसंग सहित यह बताएँ कि उस युग के साहित्यिक वातावरण में ऐसा क्या था, जिसके लिए आज हम तरस जाते हैं ?’’
उस युग की गरिमा को उकेरती हुई वे बोलीं, ‘‘स्वराज्य प्राप्त से लगभग पंद्रह वर्ष पूर्वही देश में दो प्रमुख धाराएँ प्रबल रूप से प्रवाहित हो रही थीं। यह युग प्रत्यावर्तन एवं नव-निर्वाण का था। एक ओर तो पश्चिम से वेगवान तूफान-से उठने वाले आंदोलन महात्मा गांधी की ‘नवजीवन’, ‘हरिजन’ आदि में व्यक्त ओजस्वी भाषा-शैली दूसरी ओर पूर्व से सुवसित, प्रफुल्लित, मंद-मंद समीर-सी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की, अनुपम, आकर्षक लेखन-शैली, कविताएँ गीत और जीवन को स्थिर एवं कलापूर्ण बनाने की शिक्षा-प्रणाली। सो मुझे इस सरिता के कूलों पर चलना था।

‘‘मेरा यह परम सौभाग्य था, जो शांतिनिकेतन में कुछ दिन बिताए और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के दर्शन करके उनके मुख से उनकी कहानियों के बारे में साहित्यचर्चा सुनी। पुनः वहाँ के संतों, विचारकों, पंडितों और कलाकारों के सान्निध्य में आई, परिचय हुआ, जैसे-पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य क्षितिमोहन सेन, श्री गुरुदलयाल मलिक, श्री सुधीरे खास्तगीर। फिर कलकत्ता के पाँच-छह वर्षों से लेकर दिल्ली में स्थायी रूप से बस जाने पर जिन विशिष्ट साहित्यकारों कवियों कलाकारों से मिलती रही या जिनका उत्कृष्ट रचना-साहित्य पढ़ती-सुनती रही, उनमें पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के अलावा प्रमुख हैं-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन श्री हरिवंशराय बच्चन, श्री भगवतीचरण वर्मा, श्री सियारामशरण गुप्त, कविवर सुमित्रानंदन पंत, श्रीमती महादेवी वर्मा, महापंडित राहुल सांकृत्यान, श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान, श्री रामधारीसिंह दिनकर डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल श्री जैनेंद्रकुमार, श्रीवंशीधर विद्यालंकार, श्री राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंह, श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी।

‘‘इन सबके आगमन से दिल्ली की प्रबुद्ध जनता में उत्सुकता की धूम मच जाती थी। सब लोग उनके गंभीर रोचक, भाषण, प्रवचन, कविता-पाठ आदि सुनना चाहते थे। इसी से कभी श्री जैनेंद्रकुमार के यहाँ और कभी हमारे यहाँ 5/90, कनॉट सरकस में ये सभाएँ गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। इसी युग को हम संभवतः हिंदी का स्वर्णिम युग कह सकते हैं।
‘‘बाद में स्थानाभाव से ऐसे साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण को जुटाने के निमित्त नई दिल्ली कनॉट सरकस के बीचोबीच (थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग में) प्रेमचंद जी के जन्म-दिवस पर राजधानी में स्थानीय हिंदी भवन की स्थापना हुई-एक बृहत पुस्तकालय, संग्रहालय, वाचनालय और देश-विदेश के महान्, साहित्यकारों के सुंदर चित्रों सहित। देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के पधारने और उनका स्वागत करने में हमें आनंद-उल्लास मिलता था, जिनमें सर्वश्री राधाकुमुद मुखर्जी, कविवर वल्लतोल श्री पराड़कर जी (‘भारत मित्र’ के संपादक), मामा वरेरकर, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, रूस से श्री चैलीशेव, श्री वारान्निकोव, चैकोस्लोवाकिया से श्री स्मेकल और पूर्व एशिया-वियतनाम, बर्मा चीन जापान, श्रीलंका आदि-से कई विद्वान्, हिंदी-प्रेमी प्रमुख थे।

‘‘साहित्य किसी भी राष्ट्र और समाज का दर्पण, सौरभ एवं आत्मा है। उसे जीवित व सुरक्षित रखना हमारा परम कर्तव्य है, इसी ध्येय को लेकर लगभग बीस वर्षों तक मुझे दिल्ली में राष्ट्रभाषा हिंदी को परिष्कृत करने-देखने व इन कार्यों में सहयोग देने का सुअवसर मिला। इसमें निजी लेखन कार्य तो रुक गया (यद्यपि ‘अमिट रेखाएँ’, ‘मानव-रत्न’, ‘अमर पथ’, ‘कश्मीर की सैर’ आदि रेखाचित्र-संग्रह निकलते रहे) तो भी उस काव्यकलापूर्ण वातावरण की अलौकिक आनंदपूर्ण ध्वनियों की गूँज एवं स्मृति से अवश्य ही सुख व संतोष मिलता है। अन्य प्रांतीय भाषाओं के अंतस्तल तक पहुँचने से भी हमारा दृष्टिकोण व्यापक हुआ, जिनमें संभवतः वैसे दिनों का अभाव उन लोगों को जो इन सभाओं गोष्ठियों में सम्मिलित होते थे, अखरता होगा।’’

मैंने अनुरोध किया, ‘‘अधिक नहीं, एक-दो संस्मरण तो अवश्य सुनाएँ, जिससे नई पीढ़ी के समक्ष वह युग और उनके साहित्यकार हो सकें।’’ प्रफुल्ल मन से वे बोलीं, ‘‘आपके इस प्रश्न ने बरबस मेरे हृदय-पटल पर वह मनोरम दृश्य पुनः अंकित कर दिया है-जिन दिनों सबेरे–सबेरे कलकत्ता के ईडन गार्डन में कमलिनी-पूरित सुवासित सरोवरों एवं पगोड़ा के आसपास ताज़ी हवा के लिए घूमते रहते थे। वहीं एक दिन हमें पूज्य पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के दर्शन हुए थे। वे संभवतः कुमारी लिस्टर के साथ टहलते-टहलते बातें करते जा रहे थे। फिर एक दिन देखा, वहीं पेड़ की छाया तले वे कुछ लिख रहे हैं। मैंने मलिक जी से कहा, ‘यह तो कोई बहुत बड़े पढ़े-लिखे पंडा जान पड़ते हैं, किसी अंग्रेज़ महिला से बातें भी करते हैं।’
‘‘कुछ दिन बाद देखती हूँ कि श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, जो उन दिनों हमारे घर ठहरे हुए थे, उन्हें ही घर लिवा लाए हैं और परिचय दिया-ये हैं पं. बनारसीदास जी चतुर्वेदी संपादक विशाल भारत’-इन्हीं के पास प्रायः सवेरे-सवेरे मैं रोज़ जाता हूँ और बातें करते-करते देरी हो जाती है। हम दोंनो चकित थे और हँस रहे थे, किंतु अपने को सौभाग्यशाली माना, क्योंकि मैंने तो उनका नाम केवल ‘प्रवासी भारतवासी’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक व ‘भारत-मित्र’ के ओजस्वी लेखों के कारण ही सुन रखा था।

‘‘उस दिन से ‘विशाल भारत’ घर में आने लगा। उसमें विश्वविख्यात लेखकों की उच्च स्तर की कहानियाँ लेख, कविताएँ मिलने लगीं। इसके अतिरिक्त इस पत्र में शिष्ट हास्य के कई स्तंभ रहते थे, जिसका श्रेय उनके सहयोगी स्व. ब्रजमोहन को मिलना चाहिए-जैसे ‘यौवन का झरना’, ‘खुदाई का मास्टरपीस’, ‘थर्ड क्लास का डिब्बा’ (उनकी बर्मा यात्रा) और फिर ‘चायचक्रम’ आदि। वे ऐसा कौतूहल बनाए रखते थे कि हर नया अंक देखने की उत्सुकता प्रबल हो उठती थी।

‘‘जैसा कि मैं पहले कह चुकी हूँ, वे ही हमें शांतिनिकेतन भी ले गए। वह कैसा भव्य सूर्यास्त था, जिस समय कलकत्ता की विशाल प्राचीरों से निकलकर हमारी मित्रमंडली-पं.सुदर्शन जी, श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा अन्य-गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कुटीर श्यामली में पहुँची और उनके समीप बैठे-बैठे, उनकी अमर वाणी से उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियों, ‘समाप्ति’, ‘काबुलीवाला’ ‘पोस्टमास्टर’ आदि के बारे में सुनते रहे थे। पं. सुदर्शन जी कुछ मनोरंजक प्रश्न सहसा छोड़ देते थे-कहानियों के पात्रों के बारे में-उठते समय हँसते हुए स्वयं ही पं. चतुर्वेदी जी ने कहा, ‘गुरुदेव, मैं तो शांतिनिकेतन का पंडा हूँ। बहुत लोगों को यहाँ लाता हूँ-यहाँ मुझे फिर ईडन गार्डन के प्रभात की स्मृति हो आई।’
‘‘इतना ही नहीं, दिल्ली में दस-बारह वर्ष तक संसद-सदस्य होकर नॉर्थ एवेन्यू में रहते हुए जबकि उन्हें शहीदों की स्मृति-संबंधी रचना तथा अन्य पार्लियामेंटरी कार्यों से अवकाश नहीं मिल पाता था और भी इधर भवन तथा अन्य सामाजिक कामों से घिरी-गोष्ठी जुटा ही लेते थे।

‘‘एक बार तो सबेरे-सबेरे गाड़ी आकर नीचे खड़ी हो गई। आग्रह था-चलिए-चलिए, दादा जी (श्री चतुर्वेदी जी) बुला रहे हैं-तब हम तुरंत बुद्ध जयंती पार्क की ओर चल पड़े, जो उन्हें दिल्ली रहते हुए अत्यंत प्रिय था और ठंडी हवा, हरे-हरे लॉन व छायादार पेड़ों के नीचे, चादर बिछाकर स्वर्गीय पं. वंशीधर विद्यालंकार जी से, जो हैदराबाद से पधारे थे, मधुर वाणी में उनकी प्रिय कविताएँ सुनते रहे।’’
इसी रौ में अन्ना जी ने एक और रोचक घटना सुनाई, ‘‘इसी प्रकार अमिट स्मृति है एक दिन की, जब पं. चतुर्वेदी जी ने शांतिनिकेतन से आए हुए कुछ अतिथियों को हमारे पास चितरंजन एवेन्यू वाले घर में श्री रामधन (कर्मचारी, विशाल भारत’ ऑफिस) के संग भेजा था। दो व्यक्ति पधारे, खादी की वेशभूषा कुर्ता सफेद धोती और चद्दर-टोपी। शांतिनिकेतन का नाम सुनते ही मेरे हर्ष का पारावार न रहा।

‘‘उन दिनों वहाँ कच्चा नारियल, नीबू व अनन्नास का रस आदि तैयार रहता था-किंतु साथ ही एक नया शीत पेय भी बनने लगा, जिसमें सुगंधित संदल, केवड़ा दूध आदि डालकर स्वादिष्ट किया जाता था। यह था ताज़े बेल का शरबत और साथ में लिप्टन के बिस्कुट बादाम की बर्फी आदि। नए किस्म के शरबत को आगे करके मैंने कहा, ‘आप इतनी गर्मी में कष्ट करके आए हैं, लीजिए’, पर देखती हूँ, दोनों अतिथि हाथ जोड़े हँसते हुए शरबत के गिलासों के पास वैसे के वैसे बैठे हैं। मैंने फिर कहा, ‘‘जी, यह तो मलिक जी ने बड़े शौक से नया तैयार किया है, जो हम सबको पीना पड़ता है।’ उन्होंने कहा, ‘‘है तो ठीक, बेलपत्र से भगवान् शिव की आराधना होती है, बड़ी पवित्र वस्तु है, पर इसके पीछे एक कहानी है।’ जो उन्होंने सुनाई कैसे एक जाट चाव से तहमत, टोपी पहन, चद्दर ओढ़े हुए लाठी लेकर नदी पार कर ससुराल पहुँचा, सोचा बड़ी दावत होगी, कुछ मीठे व्यंजन होंगे-हलवा पूरी आदि लेकिन वहाँ भी उसे थाली में परोसी मिली वही अरहर की दाल या बाजरे की खिचड़ी। उसने दोनों हाथ इसी तरह जोड़े और कहा, हे अन्न देवता ! मैं तो नदी पार करके पैदल बड़ी मुश्किल से यहाँ आया, पर आप किस गाड़ी से पहले ही पहुँच गए।’ फिर वही ज़ोर की हँसी, ‘बहन जी, बेल तो शांतिनिकेतन में बहुत होता है। आप आएँगी तो इससे ऊँचे-ऊँचे पेड़ दिखाऊँगा। मुझे कलकत्ता आकर भी इसी का रस-प्रसाद मिला-धन्यवाद ! पर ले लेता हूँ, ठंडा है।’ यह थी आचार्य पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी से हमारी प्रथम भेंट।’

‘‘उन दिनों ‘विशाल भारत’ में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्य-रचनाओं-‘बलाका’, ‘पुनश्च’, ‘डाकघर’ पर प्रतिमास ऐसा आकर्षक वे लिख रहे थे-जिसे हिंदी में देखकर मूल बाँग्ला में रवीन्द्र साहित्य पढ़ने का अनुराग मुझे हुआ-‘कुमुदिनी’, ‘गोरा’, ‘चोखरे बाली’, ‘नौका डूबी’ आदि। वास्तव में विराट् रवि-साहित्य में अवगाहन करने और आनंद लेने का श्रेय पं. हजारीप्रसाद जी द्विवेदी को और उनके द्वारा ही है। बाद में तो उन्होंने अपनी नई कृतियाँ-बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘हिंदी-साहित्य की भूमिका’, ‘कबीर’, ‘प्राचीन भारत के कलाविनोद’ आदि स्वयं आकर मुझे दीं-और विशाल भारत में मेरे कहानियाँ लिखने पर बड़ा ही प्रोत्साहन दिया। उनकी ‘विश्वभारती’ पत्रिका मुझे प्रसाद रूप में बराबर मिलती रही। उनके परिवार से हमारे परिवार का बड़ा स्नेह बना रहा। वे बड़े ही सहृदय और प्राचीन परंपरा के गंभीर चिंतक व संपूर्ण भारतीय वाङ्मय के कुशल आचार्य थे।’’

चर्चा को समेटते हुए मैंने कुछ संक्षिप्त प्रश्न किए-‘आपकी रचनाएँ गद्य-काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। आपका आदर्श गद्यकार कथाकार कौन रहा है ?’’ उन्होंने बताया, ‘‘मैंने किसी भी गद्यकार या कथाकार को आदर्श रूप से नहीं चुना-केवल प्रिय लेखक रहे शरत्-चन्द्र, रवीन्द्र ठाकुर, बंकिमचन्द्र, द्विजेन्द्रलाल राय, टॉलस्टॉय, चेखव, तुर्गनेव, प्रेमचन्द आदि।’’


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