Aranyakand a hindi book by Pranav Kumar Vandhyopadhyay - अरण्यकाण्ड - प्रणव कुमार वन्द्योपाध्याय
प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
वक्तव्य
मनुष्य की असमाप्य यात्रा। समय-समय पर
ध्वस्तप्राय। कई बार
उसी स्थान से एक नया अध्याय। सामने का समय अज्ञात तो होता ही है। आंशिक ही
सही। किंतु इस अनिर्णय में भी मनुष्य पराजित हो अंततः चुप बैठ नहीं जाता।
प्रस्तुत यह कथा राम की तो है, किंतु आज के मनुष्य की भी। संभवतः समय इससे
भिन्न नहीं है। इसी आधार पर प्रस्तुत है अरण्यकाण्ड। एक उपन्यास।
प्रणव कुमार बंद्योपाध्याय
अरण्यकाण्ड
पंपासरोवर का जल वैदूर्यमणि की भाँति उज्जवल
था। संभवतः उस
जल में राघव कहीं विलुप्त हो गए थे। हृदय था झंझावत से आक्रांत एवं
श्वासों में कंपन था। शरीर का एक-एक रोम दावानल की अग्नि के मध्य आ मानो
एक प्रलयंकारी समय के सम्मुख पड़ा था—विपर्यस्त !
राघव को प्रतीत होने लगा—इस विशाल पंपासरोवर ने जनकनंदिनी सीता
तो
अपने भीतर की गहराई में कहीं आत्मसात् कर लिया है। यह अत्यंत सुंदर जलराशि
अकस्मात् आक्रामक प्रतीत होने लगी थी।
लक्ष्मण कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे। इस समय सर्वाधिक आवश्यकता
उन्हीं की थी। राघव विस्मृत हो गए थे। अग्रज को पंपासरोवर के सम्मुख
विश्राम हेतु छोड़ लक्ष्मण चले गए थे—ऋष्यमूक् पर्वत के भीतर,
वानरराज सुग्रीव के संबंध में सूचनाएँ प्राप्त करने। अधीर राघव उद्वेलित
तो थे ही, अब अनुज की अनुपस्थिति के कारण तनिक विचलित भी प्रतीत हुए।
पंपा के तट पर प्रस्फुटित थे असंख्य पुष्प, जिनकी सुगंधि से संपूर्ण
वनप्रदेश परिपूर्ण हो गया था।
राघव के चित्त में पुष्पों के कारण अब सम्मोहन नहीं, था क्रोध का उन्माद।
सीता की अनुपस्थिति के कारण प्रकृति विचलित क्यों नहीं हुई, राघव समझ नहीं
पाए। यही कारण था कि पंपासरोवर हो या उसके तटों पर पुष्पों का संभार या
गहन ऋष्यमूक् पर्वत—राघव को सब प्रपंचकारी ही प्रतीत हुए।
पुष्पों के अतिरिक्त सम्मुख थीं असंख्य फलों से लदी तरु-शाखाएँ। किंतु
राघव के नेत्रों में वसंत का आगमन नहीं, थी कोप की ज्वाला। दृष्टि में न
तो ऋतुओं का कोई अर्थ था, न काल का। सबके ऊपर व्याप्त थी एक अपरिसीम
रिक्तता। संपूर्ण धरित्री के बाहर और भीतर।
चंदन-वन से निःसृत वायु से राघव के चित्त में द्वंद्व था। विश्वामित्र कई
बार पंपासरोवर के सम्मुख खड़े तमाल एवं चंदन वृक्षों की चर्चा करते हुए
पृथिवी के सम्मोहन की व्याख्या करते थे। राघव ने तब एक बार प्रश्न किया
था, ‘‘यह सम्मोहन मनुष्य की यात्रा को प्रतिबंधित भी
तो कर
सकता है !’’
राघव का प्रश्न सुनकर विश्वामित्र तनिक गंभीर हो गए थे।
वार्तालाप स्थगित हो गया था।
कुछ पलों के उपरान्त राघव ने कहा, ‘‘आपका दास हूँ
भगवन् ! यदि कोई प्रमाद हो गया हो तो क्षमा करें।’’
‘‘नहीं वत्स,’’ विश्वामित्र
बोले,
‘‘आपसे प्रमाद नहीं होता तथा आपका अनुमान भी असत्य
नहीं है।
आपने सत्य ही कहा है कि प्रकृति का यह सम्मोहन मनुष्य को प्रतिबंधित कर ही
सकता है।’’
‘‘प्रकृति में कोई ऐसा क्षेत्र है भगवन्, जहाँ
सम्मोहन न हो ?
जहाँ मनुष्य मुक्त होकर विचरण कर सकता हो ?’’ राघव ने
प्रश्न
क्या।
‘‘ऐसा स्थान प्रकृति में तो अंततः कहीं नहीं है,
किन्तु
मनुष्य के अंतर्जगत् में उसकी उपस्थिति निश्चित ही रहती है। आप समझ ही
सकते हैं वत्स, के अंतर्जगत् के उस राज्य में विचरण करना सबके लिए संभव
नहीं है। किंतु सत्यमार्गी व्यक्ति निष्ठा के माध्यम से एक दिन वहाँ अवश्य
पहुँच सकता है।’’
‘‘चित्त में इसके उपरांत जिस प्रश्न का उदय होता है,
वह यह है कि प्रकृति में इतने सम्मोहन क्यों हैं ?’’
सुनकर विश्वामित्र हँसे थे।
राघव निःशब्द !
‘‘आप तनिक विचलित हैं राघव !’’
विश्वामित्र ने व्यक्त किया।
‘‘आपका अनुमान असत्य नहीं है। किन्तु मुझे ज्ञात है,
आप मुझे
अधिक समय तक विचलित नहीं रहने देंगे।’’ राघव ने
निवेदन किया।
‘‘माया की सृष्टि प्रकृति से अवश्य हुई है, किंतु
प्रकृति
मात्र माया ही नहीं है। प्रकृति है विश्वचराचर की सत्ता, जिसके भीतर निहित
है मनुष्य हेतु रची हुई परीक्षाएँ।’’
‘‘इन परीक्षाओं का कारण और अर्थ क्या है भगवन्
?’’
‘‘परीक्षा दिए बिना आगे जाना संभव नहीं है। मात्र
परीक्षा में
सम्मिलित होना ही पर्याप्त नहीं है पुत्र, अपितु उसमें उत्तीर्ण होना भी
परम आवश्यक है। ऐसा न हो तो पृथिवी पर विकास हो सकना संभव न
होगा।’’
राघव शब्दों के निहितार्थ में डूब गए थे।
‘‘अब आपसे परीक्षाओं के अर्थ के संबंध में तनिक विचार
व्यक्त करूँगा।’’ विश्वामित्र बोले थे।
‘‘मैं प्रस्तुत हूँ प्रभु !’’
‘‘परीक्षा का अर्थ अत्यंत व्यापक है राघव ! परीक्षा
ज्ञानान्वेषी को उस प्रदेश में ले जाती है, जहाँ पहुँचना कठिन तो है,
किंतु यह कठिन मार्ग ही व्यक्ति को परम सत्य में अभिव्यक्त करता है। समझना
यह है कि प्रकृति में यदि माया न होती तो सृष्टि में भीतर के सत्य की
प्राप्ति हेतु—निरविच्छिन्न साधना—परिलक्षित कहाँ हो
पाती
?’’
लक्ष्मण लौट आए थे।
राघव ने अनुज को देखा तो अतीत से बाहर आकर समय के सम्मुख आ खड़े हुए। अब
उन्हें स्मरण आ गया, अनुज ने उन्हीं से आज्ञा लेकर ऋष्यमूक् की यात्रा की
थी। अग्रज ने कोई प्रश्न तो नहीं किया, किंतु नेत्रों में थी एक असमाप्य
जिज्ञासा।
‘‘क्षमा करें राघव, मुझे लौटने में तनिक विलंब हो
गया।’’ लक्ष्मण ने निवेदन किया।
‘‘मैं आप ही की प्रतीक्षा में बैठा
था।’’ राघव बोले।
‘‘आप स्वस्थ तो हैं ?’’
‘‘यह तो कोई प्रश्न नहीं हुआ लक्ष्मण ! सीता के अपहरण
के उपरांत मैं सामान्य रह सकता हूँ क्या ?’’
‘‘एक सामान्य व्यक्ति के लिए तो यह संभव नहीं भी हो
सकता है,
किंतु आप तो भिन्न हैं। एक तत्त्वज्ञानी पुरुष हैं आप। सुख हो या
दुःख—दोनों को ही या तो आप समान भाव से ग्रहण करते हैं या दोनों
को
ही एक माया जानकर कोई महत्त्व नहीं देते।’’
राघव ने कुछ व्यक्त तो नहीं किया, किंतु उनके नेत्र गीले थे। हृदय के भीतर
मानो पर्वत की एक विशाल शिला विशालतर होती जा रही थी।
‘‘क्षमा करें राघव !’’ लक्ष्मण
ने निवेदन किया,
‘‘मैंने आपने विचार आपके समक्ष उचित शब्दों में प्रकट
नहीं
किए, जिस कारण आपको कष्ट पहुँचा है।’’
राघव ने उत्तर नहीं दिया।
‘‘इस समय किन शब्दों से मैं आपकी पीड़ा का हरण कर
सकता
हूँ—इसका तो मुझे ज्ञान नहीं, किंतु आपके समक्ष यह अवश्य निवेदन
करना चाहूँगा कि मेरी आज की ऋष्यमूक्-यात्रा अत्यंत फलदायी रही। मैं
सुग्रीव के समीप तो नहीं पहुँच सका, किंतु यह संकेत अवश्य मिल गया है कि
अपने उद्देश्य की पूर्ति में अब और अधिक समय व्यतीत नहीं
होगा।’’
‘‘इस विश्वास का कारण ?’’
‘‘ऋष्यमूक् में वानर प्रजाति अत्यंत व्यापक है।
सुग्रीव के
प्रति निष्ठावान वे सब अत्यंत कर्मठ एवं बुद्धिमान हैं। अभी मैं किरात-वेश
में उन्हीं से मिलकर लौट रहा हूँ। सुग्रीव के प्रति उनके विचार गहन एवं
उच्चकोटि के हैं। इसी कारण अब आपका सेवक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि
वानरराज सुग्रीव हमारी सहायता करेंगे और अंततः एक विशाल सेना लेकर हम रावण
को पराजित कर सीता को पुनः प्राप्त कर सकेंगे।’’
राघव ने उत्तर में कुछ भी व्यक्त नहीं किया।
सम्मुख था कर्णिकार का एक वृक्ष। इतना विशाल कि ऋष्यमूक् का अनुज प्रतीत
हो रहा था। हरिताभ पर्णों से आच्छादित यह वृक्ष पक्षियों का आश्रय था।
पक्षियों के स्वर और वायु के प्रवाह के मध्य ऋतुश्रेष्ठ वसंत तो
था—अपरिभाष्य, किंतु राघव के चित्त का उद्वेलन झंझावत को
आमंत्रित
करता-सा लग रहा था।
लक्ष्मण शंकित हुए। अग्रज से इस समय क्या व्यक्त करना चाहिए, समझ पाने में
वे अक्षम थे। कुछ समय तो अनिश्चय में व्यतीत हो गया, किंतु फिर लक्ष्मण ने
निवेदन कर दिया, ‘‘सरोवर के तट पर तनिक विचरण करना
संभवतः
उत्तम रहेगा राघव !’’
इस प्रस्ताव पर राघव कुछ कह नहीं पाए। स्थिति अत्यंत कठोर हो गई थी एवं
लक्ष्मण के समक्ष कोई उपाय नहीं था।
राघव ने एक गहरा श्वास लिया तो लक्ष्मण को प्रतीत हुआ कि अग्रज के भीतर की
रिक्तता वन-वनांतर में व्याप्त हो गई है।
सम्मुख चले आए थे अनन्य सुंदर दो युगल मयूर। संभवतः कर्णिकार वृक्ष के
पश्चाद्देश्य से निकलकर वे राघव के निकट आ गये थे।
लक्ष्मण चिंतित हुए। अकस्मात् मयूरों के आगमन से वायु थी भाराक्रांत, मानो
कोई अपघटन घटित हो गया था।
राघव ने अनुज की चित्तावस्था जान ली। उन्होंने लक्ष्मण को संकेत दिया कि
मयूर-मयूरी के आगमन के कारण वे विषण्ण न हों।
संध्या उतर रही थी।
लक्ष्मण ने निवेदन किया, ‘‘अब आप सरोवर में स्नान कर
संध्या आरंभ नहीं करेंगे राघव !’’
राघव ने शब्दों से कुछ भी वयक्त नहीं किया। केवल मस्तक को अस्वीकृत में
हिला दिया था। किंतु मात्र इतने से ही मानो सम्पूर्ण पृथिवी अकस्मात् ठहर
गई थी।
लक्ष्मण ने साहस संचित कर निवेदन किया, ‘‘आप श्रांत
प्रतीत हो
रहे हैं तात, तनिक विश्राम कर लें तो उत्तम रहेगा।’’
राघव ने शून्य दृष्टि से अनुज को देखा तो लक्ष्मण के चित्त में भय का
संचार हो गया। परमवीर राघव की यह स्थिति किसी को भी आधारहीन कर उद्वेलित
कर सकती थी। लक्ष्मण को रिक्तता और भय से मुक्त करने की इच्छा से राघव ने
निर्देश दिया, ‘‘आप शिला पर आसन ग्रहण
करें।’’
सम्मुख पड़ा था एक हरिताभ प्रस्तर-खण्ड। लक्ष्मण आरंभ से ही स्वयं को राघव
का सेवक मानते रहे। इस कारण अग्रज के निर्देश की अवमानना संभव नहीं थी।
सुमित्रानन्दन ने विलंब नहीं किया एवं निर्धारित स्थान पर आसन ग्रहण कर
लिया।
‘‘आप अत्यंत श्रांत प्रतीत हो रहे हैं। विश्राम तो
आपको करना
चाहिए। किंतु इस विश्राम के उपरांत पुनः आपको अपने कार्य हेतु ऋष्यमूक् की
दिशा में निकलना पड़ेगा।’’ राघव बोले।
‘‘उस विषय में आप चिंतित न हों राघव ! मुझे ज्ञात
है—अपने अग्रज की सेवा में ही मेरी सार्थकता है। किंतु राघव,
मेरे
लिए सीता की खोज तथा उनकी पुनःप्राप्ति मात्र ही अपने अग्रज की सेवा नहीं
है, यह तो स्वाभाविक रूप में अब मेरा भी नित्यकर्म हो गया। इस कर्म के
माध्यम से वांछित फल के अतिरिक्त मेरा न तो कोई उद्देश्य है, न धर्म, न
इच्छा ।’’ लक्ष्मण ने व्यक्त किया।
राघव प्रसन्न हुए। अनुज के शब्दों ने भीतर की रिक्तता से मुक्त होने का
माध्यम दे दिया था।
‘‘यह वसंत का समय तो है, किंतु मेरा दुर्भाग्य है कि
आपके
चित्त में तत्काल आह्लाद संचरित करने की सामर्थ्य मेरे भीतर नहीं
है।’’
राघव मौन रहे।
‘‘मातुलिंग, कुंद, केतकी, सिंदूवार एवं वासंती के
अतिरिक्त
पंपासरोवर के इस प्रदेश में प्रस्फुटित हैं—पारिभद्रक,
चिरबिल्व,
बकुल, पाटल, तिलक, पद्माख तथा कोविदार। यही नहीं, नागवृक्ष भी अपने
अपरिसीम पुष्पों के कारण इस प्रदेश को मधुमय बना रहे हैं। किंतु ये पुष्प
अब आपको तनिक भी आह्लादित नहीं करते राघव ! काल का यह प्रहार हमें कुछ समय
और स्वीकार तो करते रहने होगा, किंतु यह मरणांतक वसंत हमें नष्ट नहीं कर
पाएँगे।’’ लक्ष्मण ने कहा।
‘‘योद्धा के रूप में आपका विचार उत्तम है। अनुकरणीय
भी। आपकी शक्ति मुझे रास्ता दिखा रही है लक्ष्मण !’’
वायु से पुष्पों में निर्बंध-सी गति आ गई थी। झरती हुई पंखुरियों में राघव
कहीं दूर चले गए थे। इतनी दूर कि लक्ष्मण को प्रतीत होने लगा, यह दूरी समय
को भी ग्रसने में समर्थ है।
लक्ष्मण ने राघव को नहीं रोका। रोक लेना अब संभव भी नहीं था। राघव की
दृष्टि थी ऋष्यमूक् के सूर्यशिखर पर, जहाँ मुचकुंद, अर्जुन, उद्दालक,
शिरीष, ध्रुव, शाल्मलि एवं किंशुक के साथ थे रक्त कुरवक, तिनिस, हिंताल,
नक्रमाल एवं चंदन के असंख्य वृक्ष। पर्वत का सूर्यशिखर वायु के साथ
संवादरत था। संभवतः अभी उन्हें यह विस्मृत हो गया था कि लंका के अधीश्वर
ने पंचवटी से जनकनंदिनी का अपहरण कर लिया था। चित्त में यह भी उद्भासित
नहीं हुआ कि प्रियतमा के वियोग ने राघव को मरणासन्न-सा कर दिया है।
लक्ष्मण ने राघव से निवेदन किया, ‘‘संसार के प्रत्येक
प्राणी
को समय-समय पर कंटकाकीर्ण पथ से यात्रा करनी पड़ती है और संभवतः इसका कोई
विकल्प नहीं है।’’
राघव ने अनुज को विराम का निर्देश दिया। बोले, ‘‘आपका
संकेत
संभवतः सीता-हरण की ओर है। किंतु आप यह भूल रहे हैं कि कंटकाकीर्ण पथ की
यात्रा एवं सीता-हरण एक-दूसरे का पर्याय नहीं हैं। मेरी प्रिया की
अनुपस्थिति एक विशाल ध्वंस के समान है। यह स्थिति व्यक्ति को चेतनारहित कर
देती है। जहाँ तक कंटकाकीर्ण पथ से यात्रा करने की बात है, वह मेरे अथवा
आपके लिए कोई चिंताजनक स्थिति नहीं है। सद्गुरु वशिष्ठ ने हमें भली भाँति
समझा दिया था कि किसी भी मार्ग को कंटकाकीर्ण स्वीकार कर लेना अपने आप में
एक पराजय है। कहीं इस तत्व को आप भूल तो नहीं गए ?’’
लक्ष्मण ने अपनी विस्मृति स्वीकार की, बोले, ‘‘मेरा
चित्त
सत्य के आकलन से कहीं दूर चला गया था राघव ! मुझे क्षमा
करें।’’
‘‘किंतु आपका पौरुष ऐसा होने नहीं देता। स्पष्ट है कि
इस समय
आप अत्यंत श्रांत हैं और संभवतः तनिक व्याकुल भी, जो आप प्रकट नहीं
करते।’’
लक्ष्मण के नेत्रों में लज्जा थी; अधर वाक्-हीन।
राघव मुस्कराए, ‘‘यह कोई असामान्य प्रकरण नहीं है।
मनुष्य-शरीर में सीमाओं की कमी नहीं। यह तो उन्हीं में से एक
है।’’
लक्ष्मण अब भी निरुत्तर थे।
राघव बोले, ‘‘आपके सम्मुख सरोवर में कारंडव पक्षी
अपनी
प्रेयसी के साथ विहार कर रहे हैं। इस दृश्य से आपके भीतर मेरे और
जनकनंदिनी की युग्मता का अभाव प्रविष्ट हो गया। यही आपके कष्ट का कारण है।
किंतु इस घड़ी आपके समान धनुर्धारी को क्या आचरण करना चाहिए यह आप भूल रहे
हैं !’’
लक्ष्मण ने कुछ भी व्यक्त नहीं किया।
‘‘आप सरोवर को देखें, देखते रहें लक्ष्मण ! इसकी
जलराशि से
आपको जीवन का मार्ग प्राप्त हो जाएगा।’’ राघव बोले।
लक्ष्मण कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थे। अब राघव ने अपने निर्देश की
व्याख्या कर दी, ‘‘यह पंपासरोवर मात्र लग्नों से
उत्पन्न कष्ट
हैं, तो समय-समय पर आए आह्लाद भी। किंतु यह सरोवर इन स्वाभाविक घटनाओं के
कारण ध्वस्त नहीं हो गया।’’
‘‘गुरु वशिष्ठ की वाणी को अपने कर्ममय जीवन में आपने
जिस
प्रकार सँजोकर रखा है, उसका उदाहरण सहजलभ्य नहीं।’’
लक्ष्मण
ने अपना विचार व्यक्त कर दिया।
‘‘आप विनय के कारण इस प्रकार बोल रहे हैं। किंतु मुझे
ज्ञात
है, गुरु के इन शब्दों का ज्ञान आपके भीतर भी उसी प्रकार है, जिस प्रकार
मेरे चित्त में। यह अवश्य है कि अपने अग्रज को कष्ट के अतलांत समुद्र में
देखकर आप इस सत्य को भूल गए थे।’’
‘‘आपके शब्द पूर्णतः सत्य हैं राघव
!’’ लक्ष्मण
बोले, ‘‘स्वीकार करने में मुझे लज्जा नहीं है कि मेरी
विस्मृति मुझे सत्य से दूर ले गई थी। इस कारण मैं इस सत्य को समझ पाने में
समर्थ नहीं था।’’
‘‘जनकनंदिनी के विरह में स्वयं मैं भी कई बार सत्य को
समझने
में असमर्थ हो जाता हूँ। वहीं से आरम्भ होता है
प्रमाद।’’
राघव बोले।
‘‘इससे मुक्ति का उपाय है कोई राघव
?’’
‘‘संसार में ऐसा कोई ध्वंस नहीं है, जिससे मुक्ति का
उपाय न
हो। उपाय तो अवश्य होता है, किंतु स्वयं में साहस के अभाव के कारण हम उसे
देख नहीं पाते।’’
लक्ष्मण अपने तत्त्वज्ञानी अग्रज के शब्द मनोयोग से सुन रहे थे।
‘‘प्रमाद से मुक्ति का वास्तविक उपाय बाहर नहीं,
व्यक्ति के भीतर अवस्थित होता है।’’ राघव बोले।
‘‘उसे समझा कैसे जा सकता है राघव
?’’
‘‘सत्यानुभव के आधार पर व्यक्ति को उपाय का ज्ञान हो
जाता है।
यह कोई चमत्कार नहीं, एक तथ्य है। यदि कोई सत्यानुसंधानी है तो उसे सत्य
की प्रतीति अंततः हो ही जाती है।’’
‘‘और जो लोग प्रमाद से मुक्त नहीं हो पाते
?’’
‘‘वे सत्य से दूर हैं। यह दूरी ही उनकी मुक्ति में
बाधक होती है।’’
‘‘वे क्या करें राघव ?’’
‘‘वे तो वही कर रहे हैं जो उनसे सम्भव है। उस काल में
अतिरिक्त कुछ कर पाना उनके लिए कठिन होगा। किंतु कई कारणों से जब वह समय
व्यतीत हो जाता है, व्यक्ति प्रमाद के मायाजाल से बाहर आ मुक्ति का आनंद
लेना आरंभ करता है।
‘‘यह सत्य है राघव ?’’
‘‘गुरु से प्राप्त ज्ञान तो यही कहता है। आपको तो
ज्ञात ही है
कि संसार का यह मायाजाल स्थायी नहीं है। इस कारण मनुष्य काल के किसी न
किसी पड़ाव पर अवश्य मुक्त हो जाता है। यह भी प्रकृति का एक नियम है
लक्ष्मण !’’
‘‘मैं कृतज्ञ हूँ राघव ! आपने मुझे उस परम सत्य की
दिशा में
निर्देशित कर दिया, जो कदाचित् मुझे याद नहीं था।’’
राघव पुनः मौन हो गए। समस्त शब्द समाप्त हो गए थे।
लक्ष्मण भी वाक्-रहित, किंतु कुछ ही पलों में उन्हें यह ज्ञात हो गया कि
इस समय राघव जिस स्थान पर अवस्थान कर रहे हैं, उनका गंतव्य उससे बहुत आगे
है।
हरिताभ शिला को त्यागकर लक्ष्मण उठ खड़े हुए। कुछ पल तो वे विचार करते
रहे, किंतु अंततः अग्रज के सम्मुख जा खड़े हुए।
‘‘आप कुछ कहना चाहते हैं लक्ष्मण
?’’ राघव का स्वर तनिक कंपित था। कंपित एवं भंग।
‘‘आपके समान साहसी पुरुष के लिए संसार में कुछ भी
असाध्य नहीं
है। आप तनिक धैर्य धारण करें। इसके उपरांत यह चराचर विश्व आपके चरणों के
नीचे होगा।’’ लक्ष्मण ने कहा।
राघव ध्यानपूर्वक अनुज के शब्द सुनते रहे। लक्ष्मण के अधरों से निःसृत
एक-एक शब्द उनके भीतर उतरता चला गया। उससे जागृत होने लगा अंतर्कोष्ठ का
स्पंदन। अनुभूत हुआ—यह अंतर्कोष्ठ, दीर्घकाल से चेतनाशून्य था।
‘‘यह शोक का समय नहीं है राघव ! आपको अपने उद्देश्य
के
अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय का स्मरण नहीं करना चाहिए। कार्य तनिक कठिन तो
है, किंतु आपके समान ज्ञानी पुरुष के लिए कुछ कठिन भी
नहीं।’’
लक्ष्मण ने राघव को समझाने का प्रयत्न किया।
राघव ने अपना मस्तक हिलाया, स्वीकृति में।
‘‘मात्र यही नहीं राघव ! आप इस समय वैदेही को भी
विस्मृत कर
दें। इस समय हमारा एकमात्र उद्देश्य है वानरराज सुग्रीव के साथ मैत्री एवं
लंका-नरेश रावण पर आक्रमण हेतु एक सक्षम सेना का गठन। इस उद्देश्य में
सफलता के उपरान्त ही हम आगे के कार्यक्रम पर विचार कर सकते
हैं।’’ लक्ष्मण बोले।
‘‘ये वानर प्रजाती लोग अत्यंत बुद्धिमान एवं
कार्यकुशल होते
हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। किंतु मुझे ज्ञात नहीं कि वे हमारे उद्देश्य
की पूर्ति में कितने सहायक होंगे ! मात्र यही नहीं, वानर सेना हमें क्यों
सहयोग देती है, उसका कारण भी हमें ज्ञात होना
चाहिए।’’ राघव
ने अपनी शंका व्यक्त की।
‘‘आप चिंता न करें राघव ! सुग्रीव यदि हमारे साथ
मैत्री करते
हैं और अपने मित्रों का विश्वास कर वे अपनी सेना के साथ लंका की यात्रा
आरंभ कर दें, तो उनकी सेना के समस्त वीर आप ही के हो जाएँगे। वानर प्रजाति
के लोग—जो अपने राज्य से विताड़ित होकर सुग्रीव के साथ ऋष्यमूक्
पर्वत पर अवस्थान कर रहे हैं—अपने नरेश के प्रति पूर्ण रूप में
समर्पित हैं। मैंने ऋष्यमूक् के निवासियों से इस प्रजाति के संबंध जो
सूचनाएँ एकत्रित की हैं, उनसे प्रकट तो यही होता है कि ये लोग अपने नरेश
की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हैं।’’
‘‘क्या ऋष्यमूक् पर अवस्थान कर रहे प्रत्येक वानर पर
यह धारणा
बनाना संगत होगा ? एक समय के उपरांत उनमें से कुछ सुग्रीव के अग्रज बालि
को भी सर्वोपरि मान सकते हैं !’’
‘‘यदि विषय ऐसा होता तो वे राज्य से विताड़ित होकर
सुग्रीव के
साथ अरण्य में निवास नहीं करते। उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि सुग्रीव के
साथ बालि ने अन्याय किया एवं अपने इस सदाचारी अनुज को उसने राज्य से
निष्कासित कर दिया है। वानर प्रजाति के समस्त सदस्य सुग्रीव के इतने
विश्वस्त हैं कि वे कदापि अपने नरेश की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे।
मात्र यही नहीं, जो लोग किष्किंधा-नरेश बालि को सर्वोच्च स्वीकार करते
हैं, उनके चित्त में भी कोई संशय नहीं है। वे भी अपने नरेश के प्रति
निरादर का भाव मन में नहीं रखते। किंतु जब भी कभी समस्त प्रकरणों से मुक्त
होकर सत्य सम्मुख आएगा, वानर प्रजाति के सारे सदस्य उसी को स्वीकार कर
लेंगे।’’
‘‘उत्तम !’’ राघव संक्षेप में
बोले और मन हो
विचार करते रहे। किन्तु तनिक विरति के उपरांत फिर से प्रश्न किया,
‘‘वानर सेना यदि अंततः हमें सहयोग देती है, तो उसका
कारण क्या
होगा, यह प्रश्न भी आपने किया था ?’’
लक्ष्मण बोले, ‘‘हाँ, किया था। अभी हम केवल सुग्रीव
के संबंध
में ही वार्तालाप करेंगे। सुग्रीव की रक्षावाहिनी को यदि यह विश्वास हो
गया कि राघव के कारण उनके नरेश न्याय प्राप्त कर सकेंगे तो अपने प्राणों
की आहुति देने में भी वह पीछे नहीं रहेंगी।’’
राघव प्रसन्न हुए।
‘‘अनुज को क्षमा करें राघव ! इस समय आपको बहुत कुछ
विस्मृत
करना पड़ेगा। सीता को भी।’’ लक्ष्मण के शब्द ठहर-से
गए थे।
राघव कोई उत्तर नहीं दे पाए।
‘‘इस समय कोई विकल्प नहीं है राघव ! वैदेही के उद्धार
के
उद्देश्य के कारण अब आप सुग्रीव की सेना के साथ मात्र लंका पर महाक्रमण की
योजना पर विचार करें, किसी अन्य विषय पर नहीं। वैदेही के उद्धार के
निमित्त कोई अन्य मार्ग आपके सम्मुख दृष्टिगोचर नहीं
होता।’’
राघव ने एक गहरा श्वास लिया।
सरोवर के ऊपर संध्या उतर रही थी।
‘‘अब आप स्नानादि से निवृत्त हो लें राघव !
संध्योपासना की समस्त व्यवस्था मैं शीघ्र कर देता
हूँ।’’
स्वीकृति में राघव अपना स्थान त्याग अग्रसर होने लगे।
पक्षियों का कलरव घनीभूत होता जा रहा था।
सरोवर का जल वायु की तरंगों से मंद-मंद- खेल रहा था।
महर्षि मतंग ऋष्यमूक् पर्वत पर अनेक वर्षों से साधनारत हैं। वे
ग्रह-नक्षत्रों एवं भूमि के महान् ज्ञाता के रूप में संपूर्ण भुवन में
प्रसिद्ध हैं। सुग्रीव जब अपने अग्रज बालि से प्रताड़ित होकर प्राण-रक्षा
हेतु इस अरण्य-प्रदेश में प्रथम बार आए थे, महर्षि ने उन्हें समस्त वानरों
सहित शरण दी थी। ऋष्यमूक् की कंदराओं एवं उसकी संपदा के सम्बन्ध में
सुग्रीव को समस्त सूचनाएँ उन्हीं से प्राप्त हुई थीं। घोर विपत्ति के समय
महर्षि की इस सदाशयता से वानरराज कृतज्ञ हुए थे।
महर्षि वार्तालाप अधिक नहीं करते थे। किन्तु वानरराज को अपने समक्ष बैठने
का आग्रह किया था। तब वानर राज को भविष्य में अच्छे दिन आने का संकेत तो
प्राप्त हो गया था, किंतु समय इतना दुरूह था कि उस पर विश्वास कर पाना
कठिन था।
एक दिन साहस कर सुग्रीव ने पूछ ही लिया, ‘‘आपके वचन
एवं
संपूर्ण ग्रहलोक की यात्रा पर कोई शंका प्रकट नहीं कर
सकता।’’
महर्षि ने सुग्रीव को उसी स्थान पर स्थगित कर कहा था,
‘‘किंतु
वानरराज, आपका चित्त तो शंका से उन्मथित हो रहा है !’’