सार्थ अर्थात व्यापारियों का काफिला। नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा
द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है। कथा के वाचक
नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवन्त चित्र प्रस्तुत किया गया है।
उस समय वैदिक धर्म पतोन्मुख था, भले ही शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन
मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियाँ उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं।
दूसरी ओर बौद्धधर्म अपने उत्कर्ष पर था। उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए
स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे। साथ ही, योग-साधना
और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था। भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम
धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ.
भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी
विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है।
संभवतया साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की स्थिति में था, जिसमें आज अपने को
पा रहा है। इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारम्भ करके छोड़ नहीं
पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले।
डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति ‘सार्थ’ अब
‘शब्दाकार’ द्वारा आपके सम्मुख प्रस्तुत है।
सार्थ
1
मुझे पहचानते ही नारायण दीक्षित ने कहा, ‘‘नागभट्ट,
मैंने
सोचा था कि वैसे इतनी दूर जा ही रहा हूँ। आगे तीन दिन का रास्ता है। काशी
जाकर तुम्हें खोजकर समाचार पहुँचाना ही चाहिए। अच्छा हुआ कि तुम यहीं मिल
गए।’’ यह सुनते ही मुझे इतनी खुशी हुई मानो वहीं
मैंने अपना
गांव और घर देख लिया हो।
उत्साह और उत्तेजना में मेरे मुँह से निकला दीक्षित जी, आप यहाँ कैसे आए
?’’
वे बोले, ‘‘पिताजी का स्वर्गवास हो गया। मैंने उनकी
अस्थियाँ
प्रयाग में विसर्जित करने का निश्चय लिया। एक सार्थ मिल गया। उसके साथ
मथुरा आया। यहाँ से प्रयाग का सीधा रास्ता है। रास्ते में यात्रियों के दल
भी मिलते हैं। अभी पूजा समाप्त करके निकलने वाले एक दल के साथ आ रहा हूँ।
मैंने बताया न कि प्रयाग से काशी तीन दिन का रास्ता है। तुम्हें खोजकर
समाचार देना चाहता था। यह अच्छा ही हुआ कि तुम्हीं मिल गए। लौटकर गाँव जा
रहे हो। या काशी गए ही नहीं ? जो भी कहो, अविवेक ही है। यज्ञभट्ट के पुत्र
होकर तुम्हें इस तरह नहीं करना चाहिए।’’
उनकी अन्तिम बात सुनकर मैं आतंकित हुआ। यह नारायण दीक्षित सदा कठोर बात के
लिए प्रसिद्ध थे। ‘न ब्रूयात
सत्यमप्रियम’—हितोपदेश से
इनका संबंध बहुत दूर था। पर कभी झूठ बोलने वाले नहीं हैं। साठ वर्ष। हाँ,
मैंने हिसाब लगाकर देखा, साठ वर्ष हो चुके हैं। उन्होंने ऐसा ही जीवन
बिताया है। आधा सिर गंजा हो गया है, पर दाँत एक भी नहीं गिरा है। आतंक में
ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, ‘‘क्या हुआ, दीक्षित जी
?’’
वे बोले, ‘‘विद्याभ्यास, विशेष अध्ययन, देशाटन जो भी
हो,
गृहस्थाश्रम ग्रहण करने से पहले, बाद में, स्वाध्याय में, स्वस्थल में
प्राप्त होने वाले वयोवृद्धों से प्राप्त होने वाले मार्ग दर्शन से तृप्त
होना चाहिए। इस नियम का पालन न करके तुमने विवेक से काम नहीं
किया।’’
मैं बीच में ही पूछ बैठा, ‘‘क्या हुआ, दीक्षित जी
?’’
उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हारी छोटी आयु की पत्नी, राजा के
हीरे–जवाहरातों के आकर्षण में फँस गई, गर्भवती हो गई, एक बच्चे
को
जन्म दिया। तुम्हारी माँ यह सह न सकी और उसने घुल-घुलकर प्राण दे दिए।
तुम्हें कहाँ समाचार भेजते और किसके द्वारा ? काशी क्या चार-पाँच दिन का
रास्ता है ?’’
मेरा शरीर काँप उठा। यमुना तट का वह कृष्ण मंदिर। प्रातः की वर्षा में
गिजगिज करते भक्त, मंदिर में बीच-बीच में बजते घण्टों की ध्वनि के बीच कान
बहरे-से हो गए मेरे मुँह से निकला, ‘‘छोटी आयु की
पत्नी माने
कौन ?’’
‘‘और कौन ? तुम्हारी पत्नी, शालिनी। केवल आभरणों की
चकाचौंध
से ही प्रभावित हो गई अथवा रसिक राजा के चक्कर में आ गई। सार यह है कि
सारी जाति में बदनामी हो गई। कुल से बाहर निकाल दी गई। मोहल्ले वाले
क्या-क्या बातें करते हैं, मालूम है ? अमरूक राजा की आँख शालिनी पर पड़
गई। वह भी राजा के सम्पर्क के लिए मन हार बैठी। दीर्घ समय के लिए तुम्हें
बाहर भेज दिया जाए तो अपना सम्पर्क जारी रखना आसान होगा-यह सोचकर राजा ने
काशी में व्यासंग करने का पागलपन तुम्हारे दिमाग में भरा और तुम्हें चलता
किया। तुम मूर्खानन्द उसके षड्यन्त्र की बलि हो गए। सब लोग इसी तरह की
बातें कर रहे हैं। सत्य तो तुम्हें ही मालूम है। काशी से लौट रहे हो ?
तुम्हें छोड़े चार वर्ष से भी ज्यादा हो गए न ? मेरा मन तो जड़
से
उखड़े नन्हें पौधे के समान झुलस गया। पलकें झपकाने की भी शक्ति तक न होने
से आँखें खुली-की-खुली रह गईं। इतने में पास से किसी ने आवाज लगाई-
‘‘दीक्षित जी, बिलम्ब हुआ तो दल निकल
जाएगा।’’
‘‘जो भी हो तुम गाँव जा ही रहे हो। लौटने के बाद भेंट
होगी,’’ कहकर दीक्षित जी मंदिर की ओर चल पड़े। उनके
आँखों से
ओझल होने तक मेरी बुद्धि जड़-सी हो गई। यह स्थिति काफी देर तक वैसी ही
रही। यमुना नदी के उस पार के सूर्य के काफी ऊपर आने के बाद मुझे ज़रा होश
आया। तब यह संशय हुआ कि क्या यह संभव है ? मैंने और राजा
अमरूक–दोनों ने यह निश्चय किया था। कि कशी में उच्च शिक्षा पाने
के
बहाने की बात को सार्थ वालों से ही नहीं, अपितु गाँव वालों से भी एक रहस्य
के रूप में ही रखा जाए। उसने यह निश्चय किया था। कि मेरा जाना सार्थ
संचालन के भीतरी मर्म को जानना है। मैं उसकी बलि बन गया। उसने मुझे धोखा
दिया शालिनी ने भी धोखा दिया। मेरे भीतर गुस्सा उमड़ आया। मेरे
मन
में यह विचार आया कि इसी समय गांव जाना चाहिए और उस नालायक का जूड़ा
पकड़कर पूछना चाहिए, क्या ऐसा मित्र-द्रोह करना चाहिए ? उसकी छाती में
छुरा भोंक देना चाहिए। पति-द्रोह करने वाली शालिनी को भी छुरी भोंककर जान
से मार डालना चाहिए। पर यह बात मन में नहीं उठी कि अभी नारायण दीक्षित का
पीछा करके उससे अन्य बातों का ब्यौरा पा लेना चाहिए। उसी समय अपने गाँव
अमरावती चल देने का मन हुआ। परंतु उठकर आगे कदम रखने की इच्छाशक्ति ही
नहीं हुई।
घर जाकर परिचारक द्वारा परोसा भोजन खाया न गया। बीच ही में उठकर हाथ धो,
सोने के कमरे में जाने तक बदला लेने का विचार कमजोर पड़ने लगा था। मन दुख
से भर गया था। ध्यान आया- वह राजा है। सदा अंगरक्षकों से घिरा रहता है।
सूचना पाते ही वह सचेत हो जाएगा कि मैं कहीं प्रतिशोध लेने पर उतारू न हो
जाऊँ। मुझे तो पास फटकने तक नहीं दिया जाएगा। शालिनी से बदला तो, अवसर
देखकर उसे मौत के घाट ही लिया जा सकता है। उसने जैसा मित्र-द्रोह किया है
वैसे ही इसने भी पति-द्रोह किया है। कम-से-कम उसे मारा जा सकता है। इस
कल्पना ने मेरे मन को घेर लिया। इस कल्पना के मन पर तीव्रता से छा जाने से
एक प्रकार की तसल्ली मिली। पर यह तो दो दिन की बात थी। तीसरे दिन तक उस
कल्पना की तीव्रता भी कम हो गई। मृत्यु ! वह भी चोरी से जाकर, निस्सहाय
स्थिति में रहनेवाली, आत्मरक्षा के लिए भी अवकाश न देकर की जाने वाली
हत्या मुझे अपने धर्म के अनुकूल नहीं लगी। अमरूक रसिक है, अपना समवयस्क
है, सहपाठी भी है। यह भी मालूम था कि दूसरी स्त्रियों पर उसकी नजर फिसल
जाती थी। परंतु इस प्रकार पात्र और अपात्र की ओर ध्यान न देकर मित्र की
पत्नी पर आसक्त हुआ। वह भी वस्त्र तथा किसी प्रकार की कमी न होने पर भी
हीरे-जवाहरातों से प्रभावित हो गई, राजसंपर्क के लिए अपना मन हार बैठी। यह
जिज्ञासा भी मन में उठी।
इसके अगले दिन, रात को सोते समय गाँव छोड़कर जाने के संदर्भ की याद से मन
में एक कुंडली खुलने लगी।
इसके लिए मैं सदा सपना देखा करता था। बचपन से। देश-देशान्तरों का भ्रमण
करके, नदी-नाले, वन-पर्वत लाँघकर राज्य-साम्राज्यों को देखते हुए यात्रा
करना। पैदल, नहीं तो घोड़े की सवारी करके भ्रमण करना। यात्रा का अर्थ इतना
कष्टदायक होता है, उस समय इसकी कल्पना तक नहीं थी। यदि पता होता, सपने ही
नहीं आते। राजकुमार के साथ और एक घोड़े पर सवार होकर अपने राज्य में तेज़ी
से घोड़ा भगाते समय कभी राजकुमार का साथ छूट जाता तो अकेले ही भटकते समय
जंगली लोग या कृषक सामने पड़ते। उनको पता लगते ही कि मैं
राजकुमार—राजकुमार अमरूक सिंह का मित्र हूँ तो कितना सम्मान
गौरव और
सुरक्षा प्राप्त होती थी ! यदि ऐसा न होता तो देशाटन के सपने ही नहीं आते।
यात्रा इतनी सुलभ नहीं–यह बाद में पता चला। बचपन के सपने इतने
रंगीन
होते हैं और वे ही समस्त भविष्य को निर्मित करते हैं, यह बाद में ज्ञात
हुआ। अमरूक को मुझे घुड़सवारों की देखभाल में समान-सरंजामों की गाड़ियों
के साथ महिष्मति के गुरुकुल भेजा गया। तब राज्य की सीमा के बाद सराय में
होने वाली जाँच-पड़ताल, यात्री के अन्य उत्तरदायित्वों का अनुभव भी हुआ।
उनकी देखभाल के लिए राज्य के अन्य अधिकारी थे।
उनका उत्तरदायित्व निभाना मेरे कन्धों पर न था। यदि वे सब काम
मुझे
करने पड़ते तो उसके लिए मैं कभी तैयार न होता। एक दिन राजकुमार अमरूक ने
मुझसे कहा था, ‘‘मित्र नागभट्ट, हमारे राज्य की
स्थिति
तुम्हें मालूम ही है। उसके बारे में हम दोनों ने कई बार बात की है। हमारा
तो एक छोटा-सा राज्य है। उधर उत्तर में गुर्जर-प्रतिहारों का साम्राज्य
इधर दक्षिण में राष्ट्रकूटों का साम्राज्य-एक-न-एक दिन हम इनमें
किसी-न-किसी का ग्रास बन ही जाएंगे। और अपनी स्वतंत्रता का खो जाना असंभव
तो नहीं। किसी का सामंत बनकर रहना मुझे से संभव नहीं। हमें अपनी सेना को
सुदृढ़ करना चाहिए, उत्तर में नर्मदा तक अपनी सीमा का विस्तार करना चाहिए।
उनसे यह कहना चाहिए कि विस्तार में हम आपके समान नहीं हैं, पर आपमें किसी
के अधीन भी नहीं होंगे। मित्र बनकर रह सकते हैं। हम अपने राज्य में आपके
राज्य से किसी को घुसने नहीं देंगे। हमें ऐसी स्थिति पैदा करनी होगी। समय
से लाभ उठाकर स्नेह से दोनों से कहना है कि हमारे राज्य की सीमा से लगने
वाले क्षेत्रों को हमें छोड़ दें। इस बारे में तुम्हारा क्या विचार है
?’’
मैंने कहा, ‘‘मित्र अमरूक, क्षमा करना, अमरूक महाराज
!’’ मैं अपना सम्बोधन सुधार ही रहा था कि मुझे रोककर
उसने
कहा, ‘‘जब हम दो ही हों, तब तुम्हें मुझे अमरूक ही
कहना
पड़ेगा। वही मुझे प्रिय है।’’ तब मैंने कहा था,
‘‘स्नेह अंतरंग में है। सदा रहता है। पर सिंहासन पर
बैठने के
बाद तुम एक क्षण भी राज्याधिकार की भावना से मुक्त रह नहीं सकते। उस भावना
के विपरीत कोई भी तुमसे व्यवहार कर नहीं सकता। तुम तो मुझे
‘मित्र
नागभट्ट’ ही कहो, मैं तो तुम्हें ‘महाराज’
कहूँगा। केवल
महाराज ही नहीं, राजाधिराज, परमराजाधिराज, महाराजाधिराज, व राजराजाधिराज,
परमभट्टारक कहूँगा। मैं सदा भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हें
इस प्रकार सम्बोधन करने का सुअवसर मुझे मिले। इसलिए मैं प्रतिदिन होम करते
समय एक दर्वी घृत की आहुति भी देता हूँ।’’ यह सुनते
ही उसका
मुख कितना प्रसन्न हो उठा था ! मरते समय पिताजी का हितवचनः
‘बेटे,
मैं जानता हूँ कि तुम युवराज के परम मित्र हो। इसलिए मैं यह बात कह रहा
हूँ। गद्दी पर बैठने के बाद तुम एक दिन भी उसके साथ बचपन की घनिष्ठा मत
दिखाना। उसके अधिकार की कभी-कभी प्रशंसा करना मत भूलना। उसके अधिकार और
बढ़ें, और विस्तृत हों-यह प्रार्थना करते रहना। इतने वर्ष सिंहासन की सेवा
करने के अनुभव से मैं यह अंतिम उपदेश दे रहा हूँ।’ पिताजी की
मृत्यु
के डेढ़ वर्ष बाद बड़े महाराज भी चल बसे। अमरूक गद्दी पर बैठे, बचपन की
घनिष्ठता जारी रखनेवालों को महाराज के असन्तोष का शिकार बनना पड़ा। पर मुझ
पर उनकी कृपा बढ़ती गई।
महाराज ने मुझे एक विरुद देकर कहा, ‘‘पण्डित नागभटट्,
तुम
जैसे चाहे बुलाओ, मेरे लिए तो तुम बाल सखा ही हो। तुम पण्डित हो, फिर भी
मैं तुम्हें आत्मीयता से पुकारता हूँ। मैं अपने अंतरंग के सारे स्वप्न
तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ। यदि हमें अपने सैनिक बल का विस्तार करना
है तो आर्थिक स्थिति का सुधार करना होगा। हमारी प्रजा द्वारा उत्पादित
समान का बाहर विक्रय होना चाहिए। व्यापार पर हमारा नियन्त्रण होना चाहिए,
हमारे राज्य के ही एक सार्थ को संगठित करके समस्त भारत का भ्रमण करना
चाहिए। संभव हो तो नर्मदा के उत्तर से चलकर सागरोत्तर देशों तक वाणिज्य का
विस्तार करना चाहिए। हमारे देश में ‘हमारे’ कहने
योग्य वणिक
ही नहीं हैं। हमारा सारा व्यापार और उसकी व्यवस्था अलग-अलग सार्थों के हाथ
में है।