अंग्रेजी के प्रसिद्ध पत्रकार, स्तम्भकार और कथाकार खुशवंत सिंह की
आत्मकथा सिर्फ आत्मकथा नहीं, अपने समय का बयान है। एक पत्रकार की हैसियत
से उनके सम्पर्कों का दायरा बहुत बड़ा रहा है। इस आत्मकथा के माध्यम से
उन्होंने अपने जीवन के राजनीतिक, सामाजिक माहौल की पुनरर्चना तो की है,
पत्रकारिता की दुनिया में झाँकने का मौका भी मुहैया किया है। भारत के
इतिहास में यह दौर हर दृष्टि से निर्णायक रहा है। इस प्रक्रिया में न जाने
कितनी-जानी-मानी हस्तियाँ बेनकाब हुई हैं और न जाने कितनी घटनाओं पर से
पर्दा उठा है। ऐसा करते हुए खुशवंत सिंह ने हैरत में डालने वाली साहसिकता
का परिचय दिया है।
खुशवंत सिंह यह काम बड़ी निर्ममता और बेबाकी के साथ करते हैं। खास बात यह
है कि इस प्रक्रिया में औरों के साथ उन्होंने खुद को भी नहीं बख़्शा है।
वक्त के सामने खड़े होकर वे उसे पूरी तटस्थता से देखने की कामयाब कोशिश
करते हैं। इस कोशिश में वे एक हद तक खुद अपने सामने भी खड़े हैं-ठीक उसी
शरारत-भरी शैली में जिससे ‘मैलिस’ स्तम्भ के पाठक बखूबी
परिचित हैं, जिसमें न मुरौवत है और न संकोच।
उनकी जिदंगी और उनके वक्त की इस दास्तान में ‘थोड़ी-सी गप है, कुछ
गुदगुदाने की कोशिश है, कुछ मशहूर हस्तियों की चीर-फाड़ और कुछ
मनोरंजन’ के साथ बहुत-कुछ जानकारी भी।
उत्तरकथा : फसल पकने का दौर
छ: वर्ष से ऊपर हो गए मैंने इस आत्मकथा को पूरा करके इसकी पांडुलिपि अपने
प्रकाशक को सौंप दी थी। रवि दयाल ने इसका टंकण कराया, इसके कवर जैकेट का
डिज़ाइन तैयार कराया और इसे छापकर प्रकाशित करने की पूरी तैयारी कर ली।
प्रकाशन से पहले विज्ञापित करने की गरज़ से उन्होंने इसके तीन अध्यायों
में से एक इंडिया टुडे को, एक द टेलिग्राफ को और एक द हिन्दू को भेज दिया।
इंडिया टुडे ने वह अध्याय प्रकाशित कर दिया जिसमें अपनी सास इंदिरा गांधी
के घर से मेनका गांधी के निकाले जाने के प्रसंग की चर्चा है। इंदिरा गांधी
उस समय भारत की प्रधानमंत्री थीं। इस घटना का एक ब्यौरा उसी समय इंडिया
टुडे में प्रकाशित हुआ था जब यह घटित हुई थी। मैंने इस विवरण के अलावा,
पुपुल जयकर और वेद मेहता द्वारा रचित इंदिरा गांधी की जीवनियों को आधार
बनाकर यह अध्याय लिखा था। मुझे इसके अतिरिक्त इस घटना की विस्तृत जानकारी
मेनका गांधी और उसकी बहन अम्बिका से मिली, जो उस समय वहाँ मौजूद थी।
बहरहाल, मेनका ने मुझ पर और मेरे प्रकाशक पर मुकदमा दायर कर दिया, पर
इंडिया टुडे को छोड़ दिया।
बारह दिसम्बर, 1995 को दिल्ली हाईकोर्ट से, मेनका ने एक तरफ़ा आदेश जारी
करा लिया जिससे किताब के प्रकाशन पर रोक लग गई। हमने आदेश के खिलाफ फौरन
अपील की। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के. रामामूर्ति ने कई महीनों के
बाद दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। लगभग डेढ़ वर्ष के बाद उन्होंने फैसला
सुनाया कि मैंने मेनका के गोपनियता के आधार का उल्लंघन किया, और उन्होंने
पुस्तक के प्रकाशन पर लगाए प्रतिबंध को उचित ठहराया। हमने एक बार फिर अपील
दाखिल की। हाईकोर्ट में इस अपील की सुनवाई के लिए पेश होने में चार साल से
अधिक समय लग गया।
इतने लम्बे विलम्ब का एकमात्र कारण हमारी कानूनी व्यवस्था की ढील नहीं थी।
पहले तो मेरे वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी को एटर्नी जनरल बना दिया गया। वे
इस पद से मेरी पैरवी नहीं कर सकते थे। उसके बाद उनके सहायक एम.मुद्गल की
पदोन्नति न्यायपीठ पर हो गई : वे भी इसके बाद मेरी पैरवी नहीं कर सकते थे।
कपिल सिब्बल मेरा केस लेने के लिए राजी हो गए। वे राज्य सभा के लिए चुन
लिए गए और उनके पास अपनी वकालत के लिए समय की कमी रहने लगी। अपील को
सँभालने के लिए बच रहे सिर्फ श्रीधर चिताले, जो हमारे जूनियर काउंसिल थे।
हमारे केस में बहस सी.ए. सुन्दरम ने की। चिताले इसमें उनके सहायक थे।
न्यायमूर्ति देवेन्द्र गुप्त और संजय कृष्ण कौल की न्यायपीठ के सामने
प्रस्तुत इस केस की बहस के दौरान मैं और मेरी बेटी लगातार मौजूद रहे। हमने
मेनका के वकील राज पंजवानी को घंटों मशक्कत करते हुए, उन दलीलों को
दोहराते सुना जो वह पहले न्यायमूर्ति रामामूर्ति के सामने पेश कर चुका था।
हमारे वकील सी.ए. सुन्दरम, सिर्फ दो बार आधे घण्टे के करीब बोले।
मैंने
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में इतनी जोरदार दलीलें बहुत कम सुनी
हैं। हो सकता है यह मेरा पूर्वाग्रह हो, क्योंकि वे मेरी तरफ से बोल रहे
थे। मुझे लगने लगा था कि वे न्यायाधीशों को अपने पक्ष में कायल कर ले जा
रहे हैं। फैसला तीन हफ्ते बाद सुनाया गया। मेरी बेटी और दामाद रानीखेत गए
हुए थे। मेरे साथ मेरा बेटा राहुल और पोती हाईकोर्ट गए। फैसला न्यायमूर्ति
कौल ने सुनाया। मेरी आत्मकथा के प्रकाशन पर लगाया गया प्रतिबंध निरस्त कर
दिया गया, और मेनका को हमारे खर्चे के लिए दस हजार रुपए देने का आदेश दिया
गया। मेनका ने मुझ पर आरोप लगाया था कि मैंने उसके गोपनीयता के अधिकार का
उल्लंघन किया है। मैंने उसके विरोध में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
अधिकार की रक्षा के लिए, इस रकम से कहीं अधिक पैसा खर्च किया। अब फैसला आप
पर छोड़ता हूँ।
इस फैसले की खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई। मेरा टेलीफोन बधाई देने के
लिए लगातार बज रहा था। मीडिया को लोगों ने, जिनमें दूरदर्शन की टोलियाँ भी
शामिल थीं, मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए मेरे निजी माहौल पर धावा बोल
दिया। मेरी पोती ने जश्न मनाने के लिए मुझे आइसक्रीम खरीदकर खिलाई।
मेनका ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। वह अब
भी मुझे मानहानि का आरोप लगाकर कचहरी में घसीट सकती है। उस स्थिति में
प्रधानमंत्री के निवास से बाहर निकाले जाने के बारे में खुद उससे विस्तार
से जिरह की जाएगी। इससे उसके लिए धर्मसंकट पैदा हो सकता है। कुछ भी हो, जब
तक मुकदमें का फैसला होगा, मैं उसकी पहुँच से परे हो जाऊँगा। मैं अब
अट्ठासी साल का होने वाला हूँ।
मेरे खिलाफ न्यायमूर्ति रामामूर्ति ने जो फैसला दिया था, उस पर मेरा एतराज
उस बेमतलब की सलाह के बारे में था जो उन्होंने लेखकों को दी थी। उन्होंने
फैसला दिया : ‘....यह बात सर्वविदित है कि वे (यानी मैं) एक
बहुत
तजुर्बेदार और पढ़े-लिखे इंसान हैं। भारत और विदेशों की महान हस्तियों से
उनका सम्पर्क रहा है। उनसे हर व्यक्ति ऐसी सामग्री की उम्मीद करता है जो
समाज के लिए उपयोगी हो, जो युवा पीढ़ी को प्रेरणा दे।....सामान्यत: लोग
बड़े लेखकों से उच्चकोटि के विचार, जीवन-शैली और ज्ञान की अपेक्षा करते
हैं। भारतीय कानून किसी व्यक्ति को इस बात की इजाज़त नहीं देता कि वह
व्यक्ति वैर-भाव से पैदा होने वाले आवेगों के संतोष के लिए घसीटामार लेखन
करे।’ न्यायमूर्ति रामामूर्ति को यह बताने के लिए कि मुझे किस
विषय
पर और कैसे लिखना चाहिए, मेरा धन्यवाद। लेकिन, किसी भी ऐसे लेखक की तरह,
जिसकी कुछ प्रतिष्ठा है, मैं आपके इस मशविरे को मन में तिरस्कार और होठों
पर मुस्कान के साथ खारिज करता हूँ।
मैंने अपनी भूमिका में लिखा था, कि वह अपनी ज़िन्दगी के बारे में मेरी
आखिरी किताब होगी। यह मेरी गलती थी। पिछले छ: सालों में मैंने जितनी
किताबें लिख डालीं, उतने किन्हीं छ: वर्षों में पहले नहीं लिखीं। इनमें से
ज्यादातर उन लेखों का पुन:प्रकाशन है जिन्हें मेरे पाठक ने बचा रखा था या
उन चुटकुलों के संग्रह हैं, जिन्हें मैं हर उस कॉलम के पीछे जोड़ देता था,
जो मैं नियमित रूप से लिखा करता था। इस समय बाजार में ऐसे चुटकुलों के छ:
संग्रह हैं। इनमें से हर एक के दर्जन से ऊपर संस्करण छप चुके हैं। इनकी
रायल्टी से मुझे कीमती किस्म की व्हिस्की मुहैया हो जाती है, जो एक चीज है
जिसकी मैं इस बुढ़ापे में बहुत कद्र करता हूँ। मैंने एक उपन्यास लिखा है
‘द कम्पनी ऑफ वीमेन’ (महिलाओं की सोहबत)
(पेंगुइन-वाइकिंग)।
इसके प्रकाशन के बारे में मैं उत्साहित नहीं था, क्योंकि इसमें एक अस्सी
वर्षीय (यानी ‘मैं’) आदमी की सेक्स-संबंधी कल्पनाओं
का वर्णन
है। लेकिन पेंगुइन-वाइकिंग के रवि सिंह ने इसके असम्बद्ध टुकड़ों को
व्यवस्थित करके उन्हें किताब की शक्ल देने के लिए, मेरे साथ कसोली में एक
हफ्ता गुजारा। तिस पर, यह किताब बेतरह बिकी और भारत की
‘बैस्टसैलर’ (सबसे अधिक बिकने वाली) किताबों की सूची
में छ:
महीने तक पहले स्थान पर बना रही। इससे मुझे अपनी किसी भी अन्य पुस्तक की
अपेक्षा कहीं अधिक रायल्टी मिली। मेरे आलोचकों के लिए यह बहुत काफी था !
वे चाहें तो भीतर सीझते रहें।
कुछ और किताबों को भी ‘बेस्टसैलर’ सूची में स्थान
मिला :
अनफ़ॉर्गेट्फुल वीमेन (अविस्मरणीय महिलाएँ) (पेंगुइन)। मैंने महाराजा
रंजीत सिंह की जो जीवनी लिखी थी (पेंगुइन) यह उसका दूसरा संस्करण था। द
सिख्स (रोली बुक्स), जिसमें रघु राय द्वारा खींचे गए अद्भुत फोटोग्राफ थे।
मैंने शारदा कौशिक की प्रेम-कविताओं के अनुवादों का भी संग्रह प्रकाशित
किया डिक्लेअरिंग लव इन फोर लैंग्वेजेज़ (चार भाषाओं में प्रेमाभिव्यक्ति)
(पेंगुइन)। मेरी दो और किताबें तैयारी की प्रक्रिया में हैं। वाशिंगटन
डी.सी. की डॉ. सुरजीत कौर के साथ ‘अमंग द
सिख्स’(सिखों के
बीच)। यह किताब विदेशों में बसी सिख बिरादरी के उन पुरुषों और स्त्रियों
के बारे में है जिन्होंने पैसा और यश दोनों कमाए हैं। यह संभवत:रोली बुक्स
से प्रकाशित होगी। सिखों की सांध्यकालीन प्रार्थनाओं
‘रेहरास’
का एक अनुवाद जो रीमा आनन्द के सहयोग से किया गया है, पेंगुइन इंडिया के
पास है। मेरे लिए अब शिकायत की कोई वजह नहीं है।
पिछले छ: वर्षों से मैंने धर्म और ईश्वर के साथ अपने समीकरण की नए सिरे से
व्याख्या की है। रहस्यवाद के साथ जान-बूझकर समझौता किए बगैर मैंने स्वर्ण
मन्दिर से प्रतिदिन प्रसारित होनेवाली सुबह की आसा दी वार को सुनना शुरू
कर दिया। मुझे वह बड़ी शान्तिप्रद लगने लगी और मुझे लगा कि उसको सुनने से
मेरी बीमार पत्नी को, जो कभी बहुत धर्मपरायण थी, राहत मिलेगी। हर शाम मैं
सांध्यकालीन प्रार्थना ‘रेहरास’ का पाठ भी सुनता हूँ।
इससे
मुझे रीमा आनन्द की सहायता से उनका अनुवाद करने में बहुत मदद मिली। हमने
उसे ‘ईवनिंग साँग’ (सांध्य गीत) कहने का फैसला किया।
धार्मिक
ग्रंथों में दिलचस्पी पैदा होने से ज्यादा मेरे भीतर सिख बिरादरी के लगाव
का बोध बढ़ गया। इस एहसास को मैं इस बात की संहिताओं का समर्थन करने से
ज़्यादा महत्वपूर्ण समझता हूँ। खालसा पंथ की 300वीं वर्षगाँठ के अवसर पर,
जिन लोगों को निशान-ए-खालसा की पदवी से सम्मानित किया जाना था, उनमें मेरा
नाम भी शामिल था। इसके साथ, बिरादरी की सेवाओं के लिए गुरुनानक देव
यूनिवर्सिटी ने मुझे डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की। मेरे घर की दीवार
पर दो ही चीजें लगाई गई हैं। एक तो डॉक्टरेट की उपाधि का मानपत्र और दूसरा
ताम्रपत्र जिसमें सिख दरबार के सिक्खों के साथ निशान-ए-खालसा लिखा गया है।
मुझे एक और पुरस्कार चंडीगढ़ स्थित पंजाब काउंसिल से मिला। इसे पाने वालों
में दर्जनों भारतीय और पाकिस्तानी थे। दर्जनों लम्बे-लम्बे भाषण भी हुए।
बेतरह जुकाम से पस्त मैं दिल्ली लौटा। जैसे ही मैंने नोटों के पैकेट को
अपनी पोती की गोद में पटका, कि मेरा जुकाम रहस्यात्मक ढंग से गायब हो गया।
मेरी समझ में आ गया कि पैसे को हाथ का मैल क्यों कहा जाता है !
पिछले छ: सालों में सबसे महत्वपूर्ण और निश्चित रूप से सबसे लाभप्रद घटना
मेरे साथ यह हुई कि मुझे सुलभ इंटरनेशनल द्वारा ‘द ऑनेस्ट मैन
ऑफ द
ईयर’ (वर्ष का ईमानदार व्यक्ति) पुरस्कार प्रदान किया गया। मुझे
यह
पुरस्कार लौटा देना चाहिए था लेकिन दस लाख की करमुक्त रकम का आकर्षण ऐसा
दुर्निवार था कि अपनी ईमानदारी की नाप-जोख करना मुझे संभव नहीं हुआ। इस
पुरस्कार के लिए बड़ा भव्य समारोह किया गया। शहर का सबसे बड़ा सभासागर,
फिक्की, दर्शकों से खचाखच भरा था। आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री
चन्द्रबाबू नायडू ने मुझे चैक भेंट किया और विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इस
समारोह की अध्यक्षता की। मैंने यह साबित करने के लिए मैं किस हद तक बेईमान
हो सकता हूँ, वहीं इन दोनों की फाइलों से बॉल पाइंट पेन उचका लिये। वहाँ
मौजूद मशहूर हस्तियों के भाषणों की तुलना में मेरी इस हाथ-सफाई पर दर्शकों
ने कहीं ज़्यादा जोरदार तालियाँ पीटीं।
मुझे जिन्दगी की कुछ और ऐसी ही ऐतिहासिक घटनाएँ याद आ रही हैं : मेरे
उपन्यास द ट्रेन टू पाकिस्तान पर आखिर पेमेला रुक्स ने फिल्म बना ही ली।
उसने बहुत छोटे से बजट में इस काम को अंजाम दिया पर नतीजा अद्भुत था। इस
फिल्म को दूरदर्शन पर और फिर कुछ महीनों तक सारे देश के सिनेमाघरों में
दिखाया गया। इसके निमित्त मैंने मुफ़्त में लंदन की सैर की। वहाँ इसे
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और ब्रिटेन की मिली-जुली दर्शक मंडली को
दिखाया गया। आमदनी पाकिस्तान के एक अस्पताल को दे दी गई।
मेरे उपन्यास दिल्ली का अनुवाद जर्मन भाषा में हुआ। मेरे जर्मन प्रकाशक ने
मुझे वहाँ आमन्त्रित किया। वे लोग मुझे जर्मनी और आस्ट्रिया के उन तमाम
शहरों में ले गए जहाँ अंग्रेजी और जर्मन भाषा में इसके चुने हुए अंशों का
पाठ होना था, ताकि मैं इस अवसर पर उपस्थित हो सकूँ। ट्रेन टू पाकिस्तान को
मौंडेला पुरस्कार मिला। मुझे एक बार फिर मुफ्त में इटली की यात्रा करने का
अवसर मिला। मैंने पालेरमो के मेयर से अपना दो लाख रुपए का चैक लेने के लिए
सिसली तक हवाई यात्रा की।
अन्त में, रोटरी इंटरनेशनल के निमंत्रण पर मैंने चार दिन कराची में
गुजारे। मैं उनके समारोह का प्रमुख वक्ता था। मैंने जो कुछ कहा उसे समारोह
में भाग लेने वाले भारतीय और पाकिस्तान वक्ताओं ने समान रूप से सराहा।
उन्होंने दूरदर्शन के चैनलों पर मेरा सीधा प्रसारण किया। मैंने जो कहा,
उसका सार यही था कि अगर हम लोगों ने अबकी बार युद्ध किया (यह बात कारगिल
प्रसंग के बाद की है) तो वह हमारा आखिरी युद्ध होगा। उसके बाद न आप
बचेंगे, न हम, इलाके में बच रहेगा सिर्फ कब्रिस्तान का एक टुकड़ा।
इन वर्षों में ऐसी छोटी-मोटी कामियाबियों से ज्यादा बड़ी बात थी मेरी
पत्नी की सेहत में धीरे-धीरे आनेवाली गिरावट। वह हमेशा मेरी अपेक्षा
ज्यादा सेहतमंद रही थी। उन्हें कभी कब्ज की शिकायत नहीं हुई। हर रोज सुबह
विजेता की मुद्रा में वे घोषणा करती थीं ‘क्लीन एज़ ए
व्हिसल’
(सीटी की तरह साफ)। और अक्सर एक दो घंटे बाद फ्रेंच में कहतीं
‘deuxieme fois,’ (दूसरी बार सफाई)। दूसरी तरफ मुझे
अपने पेट
की सफाई के लिए जुलाब, ग्लिसरीन की बत्तियों और अनीमा का सहारा लेना पड़ता
था। वह बहुत कम बीमार पड़ती थी। मुझे बराबर सर्दी-जुकाम और सिर-दर्द की
शिकायत रहती थी। जब भी हम इकट्ठे सैर के लिए निकलते, वह मुझसे आगे चलती
रहती और मुझे याद दिलाना पड़ता कि भारतीय महिलाएँ अपने पति के आगे नहीं,
पीछे चलती हैं। हमारी शादी के बाद शुरुआती वर्षों में डटकर टेनिस खेला
करती थी। विवाहित जीवन के मध्य-काल में हम लोग गॉल्फ खेलते थे। वह हमेशा
मुझसे बेहतर खेलती थी। जब उसने खेलना छोड़ दिया, तो पैदल सैर करने लगी। वह
कार चलाकर लोदी गार्डन चली जाती थी और किसी से बातचीत किए बगैर पार्क के
चक्कर लगाया करती थी। वहाँ नियमित रूप से आनेवाले सब लोग उसे पहचानते थे।