जूठन सामाजिक सड़ाँध को उजागर करने वाले दलित लेखक ओमप्रकाश
वाल्मीकि की आत्मकथा है। बकौल-लेखकः ‘‘दलित जीवन की
पीड़ाएँ असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्यक अभिव्यक्तियों
में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने सासें ली हैं, जो
बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असंवेदनशील भी...
‘‘अपनी व्यथा-कथा को शब्द-बद्ध करने का विचार काफी
समय से मन में था। लेकिन प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
कितनी ही बार लिखना शुरु किया और हर बार लिखे गए पन्ने फाड़ दिए...
‘‘इन अनुभवों में लिखने में कई प्रकार के खतरे थे। एक
लम्बी जद्दोजहद के बाद, मैंने सिलसिलेवार लिखना शुरु किया। तमाम कष्टों,
यातनाओं, उपेक्षओं, प्रताड़नाओं को एक बार फिर जीना पड़ा, उस दौरान गहरी
मानसिक यंत्रणाएँ मैंने भोंगी। स्वयं को परत-दर-परत उधेड़ते हुए कई बार
लगा-कितना दुःखदायी है यह सब ! कुछ लोगों को यह अविश्वसनीय और
अतिरंजनापूर्ण लगाता है...’’
जूठन दिल दहला देनेवाली एक दलित लेखक की सच्ची कहानी।
लेखक की ओर से....
दलित-जीवन की पीड़ाएँ असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक
अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज-व्यवस्था में हमने
साँसें ली हैं जो बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असंवेदनशील
भी।
अपनी व्यथा-कथा को शब्द-बद्ध करने का विचार, काफी समय से मन में था। लेकिन
प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिली थी। कितनी ही बार लिखना शुरू किया
और हर बार लिखे गए पन्ने फाड़ दिए। कहाँ से शुरू करूँ और कैसे ? यही
दुविधा थी। कुछ मित्रों की राय थी, आत्मकथा के बजाय उपन्यास लिखो।
अचानक दिसम्बर, 1993 में राजकिशोर जी का पत्र आया। वे ‘आज के
प्रश्न’ श्रृंखला में ‘हरिजन से दलित’
पुस्तक की योजना
बना रहे थे। वे चाहते थे, उस पुस्तक के लिए दस-ग्यारह पृष्ठों में, अपने
अनुभव आत्मकथात्मक शैली में लिखूँ। उनका आग्रह था, अनुभव सच्चे एवं
प्रामाणिक हों। पात्रों के नाम चाहें तो बदल भी सकते हैं। राजकिशोर जी के
इस पत्र ने मेरे मन में बेचैनी पैदा कर दी थी।
कुछ दिन दुविधा में निकल गये। एक पंक्ति तक नहीं लिख पाया। इसी बीच
राजकिशोर जी का दूसरा पत्र आ गया था, अल्टीमेटम के साथ। जनवरी,
’94
के अंत तक सामग्री भेजो। पुस्तक प्रेस में जाने के लिए तैयार है। पता नहीं
राजकिशोर जी के उस पत्र में ऐसा क्या था, मैंने उसी रात अपने शुरुआती
दिनों के कुछ पृष्ठ लिख डाले, और अगले ही दिन राजकिशोर जी को भेज दिए।
सप्ताह-भर उत्तर की प्रतीक्षा की। फोन पर बात हुई, उस सामग्री को वे छाप
रहे थे।
‘हरिजन से दलित’ पुस्तक में पहला ही शीर्षक
था-‘एक दलित
की आत्मकथा’। पुस्तक छपते ही पाठकों के पत्रों का सिलसिला शुरू
हो
गया था। दूर-दराज ग्रामीण क्षेत्रों तक से पाठकीय प्रतिक्रियाएँ मिली थीं।
दलित वर्ग के पाठकों को उन पृष्ठों में अपनी पीड़ा दिखाई दे रही थी। सभी
का आग्रह था, मैं अपने अनुभवों को विस्तार से लिखूँ।
इन अनुभवों को लिखने में कई प्रकार के खतरे थे। एक लंबी जद्दोजहद के बाद,
मैंने सिलसिलेवार लिखना शुरू किया। तमाम कष्टों, यातनाओं, उपेक्षाओं
प्रताड़नाओं को एक बार फिर जीना पड़ा। उस दौरान गहरी मानसिक यंत्रणाएँ
मैंने भोगीं। स्वयं को परत-दर-परत उधेड़ते हुए कई बार लगा-कितना दुखदायी
है यह सब ! कुछ लोगों को यह अविश्वसनीय और अतिरंजनापूर्ण लगता है।
कई मित्र हैरान थे, अभी से आत्मकथा लिख रहे हो ! उनसे मेरा निवेदन
है-उपलब्धियों की तराजू पर यदि मेरी इस व्यथा-कथा को रखकर तौलोगे तो हाथ
कुछ नहीं लगेगा। एक मित्र की यह भी सलाह थी कि मैं आत्मकथा लिखकर अपने
अनुभवों का मूलधन खा रहा हूँ। कुछ का यह भी कहना था कि खुद को नंगा करके
आप अपने समाज की हीनता को ही बढ़ाएँगे। एक बेहद आत्मीय मित्र को भय सता
रहा है। उन्होंने लिखा-आत्मकथा लिखकर आप अपनी प्रतिष्ठा ही न खो दें।
जो सच है, उसे सबके सामने रख देने में संकोच क्यों ? जो यह कहते
हैं-‘हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता’ यानी अपने आपको
श्रेष्ठ साबित
करने का भाव-उनसे मेरा निवेदन है, इस पीड़ा के दंश को वही जानता है जिसे
सहना पड़ा।
इस प्रक्रिया में ऐसा बहुत कुछ है जो लिखा नहीं गया या मैं लिख नहीं पाया।
मेरी सामर्थ्य से बाहर था। इसे आप मेरी कमजोरी मान सकते हैं।
पुस्तक का शीर्षक चयन करने में श्रद्धेय राजेन्द्र यादव जी ने बहुत मदद
की। अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर पांडुलिपि को पढ़ा। सुझाव दिए।
‘जूठन’ शीर्षक भी उन्होंने ही सुझाया। उनका आभार
व्यक्त करना
मात्र औपचारिकता होगी। उनके सुझाव और मार्गदर्शन मेरे लिए महत्ता रखते
हैं।
कँवल भारती और डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन ने इस दौरान मानसिक संबल दिया है।
और अंत में, अशोक माहेश्वरी जी, जिनकी बगैर यह पुस्तक शायद पूरी न हो
पाती। इसे छापने में उन्होंने जो रुचि दिखाई, उससे मेरी बहुत-सी समस्याओं
का समाधान स्वतः ही हो गया।
4, न्यू रोड स्ट्रीट
कलालोंवाली गली, देहरादून-248001 (उ.प्र.)
-ओमप्रकाश वाल्मीकि
जूठन
हमारा घर चंद्रभान तगा के घेर से सटा हुआ था। उसके बाद कुछ परिवार मुसलमान
जुलाहों के थे। चंद्रभान तगा के घेर के ठीक सामने एक छोटी-सी जोहड़ी
(जोहड़ का स्त्रीलिंग) थी, जिसने चुहड़ों के बगड़ और गाँव के बीच एक फासला
बना दिया था। जोहड़ी का नाम डब्बोवाली था। डब्बोवाली नाम कैसे पड़ा, कहना
मुश्किल है। हाँ, इतना जरूर है कि इस डब्बोवाली जोहड़ी का रूप एक बड़े
ग़्ढे के समान था. जिसके एक ओर तगाओं के पक्के मकानों की ऊँची दीवारें
थीं। जिनसे समकोण बनाती हुई झींकरों के दो-तीन परिवारों के कच्चे मकानों
की दीवारें थीं। उसके बाद फिर तगाओं के मकान थे।
जोहड़ी के किनारे पर चूहड़ों के मकान थे, जिनके पीछे गाँव भर की औरतें,
जवान लड़कियाँ, बड़ी-बूढ़ी यहाँ तक कि नई नवेली दुल्हनें भी इसी डब्बोवाली
के किनारे खुले में टट्टी-फरागत के लिए बैठ जाती थीं। रात के अँधेरे में
ही नहीं, दिन के उजाले में भी पर्दों में रहनेवाली त्यागी महिलाएँ, घूँघटे
काढ़े, दुशाले ओढ़े इस सार्वजनिक खुले शौचालय में निवृत्ति पाती थीं। तमाम
शर्म-लिहाज छोड़कर वे डब्बोवाली के किनारे गोपनीय जिस्म उघाड़कर बैठ जाती
थीं। इसी जगह गाँव भर के लड़ाई-झगड़े गोलमेल कॉन्फ्रेंस की शक्ल में
चर्चित होते थे। चारों तरफ गंदगी भरी होती थी। ऐसी दुर्गंध कि मिनट भर में
साँस घुट जाए। तंग गलियों में घूमते सूअर, नंग-धड़ंग बच्चे, कुत्ते
रोजमर्रा के झगड़े, बस यह था वह वातावरण जिसमें बचपन बीता। इस माहौल में
यदि वर्ण-व्यवस्था को आदर्श-व्यवस्था कहनेवालों को दो-चार दिन रहना पड़
जाए तो उनकी राय बदल जाएगी।
उसी बगड़ में हमारा परिवार रहता था। पाँच भाई, एक बहन, दो चाचा,
एक
ताऊ का परिवार। चाचा और ताऊ अलग रहते थे। घर में सभी कोई न कोई काम करते
थे। फिर भी दो जून की रोटी ठीक ढंग से नहीं चल पाती थी। तगाओं के घरों में
साफ-सफाई से लेकर, खेती-बाड़ी, मेहनत-मजदूरी सभी काम होते थे। ऊपर
रात-बेरात बेगार करनी पड़ती। बेगार के बदले में कोई पैसा या अनाज नहीं
मिलता था। बेगार के बदले में कोई पैसा या आनाज नहीं मिलता था। बेगार के
लिए ना कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी। गाली-गलौज, प्रताड़ना अलग। नाम
लेकर पुकारने की किसी को आदत नहीं थी। उम्र में बड़ा हो तो ‘ओ
चूहड़े’, बराबर या उम्र में छोटा है तो ‘अबे चूहड़े
के’
यही तरीका या संबोधन था।
अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय-भैंस को छूना बुरा नहीं था
लेकिन यदि चूहड़े का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर
इनसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ जरूरत की वस्तु थे। काम पूरा होते ही
उपयोग खत्म। इस्तेमाल करो, दूर फेंको।
हमारे मोहल्ले में एक ईसाई आते थे। नाम था सेवक राम मसीही। चूहड़ों के
बच्चों को घेरकर बैठे रहते थे। पढ़ना-लिखना सिखाते थे। सरकारी स्कूलों में
तो कोई घुसने नहीं देता था। सेवक राम मसीही के पास सिर्फ मुझे ही भेजा गया
था। भाई तो काम करते थे। बहन को स्कूल भेजने का सवाल ही नहीं था।
मास्टर सेवक राम मसीही के खुले, बिना कमरों, बिना टाट-चटाईवाले स्कूल में
अक्षर ज्ञान शुरू किया था। एक दिन सेवक राम मसीही और मेरे पिताजी में कुछ
खटपट हो गई थी। पिताजी मुझे लेकर बेसिक प्राइमरी विद्यालय गए थे जो कक्षा
पाँच तक था। वहाँ मास्टर हरफूल सिंह थे। उनके सामने मेरे पिताजी ने
गिड़गिड़ाकर कहा था, ‘‘मास्टरजी, थारी मेहरबान्नी हो
जागी जो
म्हारे इस जाकत (बच्चा) कू बी दो अक्षर सिखा दोगे।’’
मास्टर हरफूल सिंह ने अगले दिन आने को कहा था। पिताजी अगले रोज फिर गए। कई
दिन तक स्कूल के चक्कर काटते रहे। आखिर एक रोज स्कूल में दाखिला मिल गया।
उन दिनों देश को आजादी मिले आठ साल हो गए थे। गाँधी जी के अछूतोद्धार की
प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती थी। सरकारी स्कूलों के द्वार अछूतों के लिए खुलने
शुरू तो हो गए थे, लेकिन जनसामान्य की मानसिकता में कोई विशेष बदलाव नहीं
आया था। स्कूल में दूसरों से दूर बैठना पड़ता था, वह भी जमीन पर। अपने
बैठने की जगह तक आते-आते चटाई छोटी पड़ जाती थी। कभी-कभी तो एकदम पीछे
दरवाजे के पास बैठना पड़ता था। जहाँ से बोर्ड पर लिखे अक्षर धुँधले दिखते
थे।
त्यागियों के बच्चे ‘चुहड़े का’ कहकर चिढ़ाते थे।
कभी-कभी
बिना कारण पिटाई भी कर देते थे। एक अजीब-सी यातनापूर्ण जिंदगी थी, जिसने
मुझे अंतर्मुखी और चिड़चिड़ा, तुनकमिजाजी बना दिया था। स्कूल में प्यास
लगे तो हैंडपंप के पास खड़े रहकर किसी के आने का इंतजार करना पड़ता था।
हैंडपंप छूने पर बवेला हो जाता था। लड़के तो पीटते ही थे। मास्टर लोग भी
हैंडपंप छूने पर सजा देते थे। तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे ताकि मैं
स्कूल छोड़कर भाग जाऊँ, और मैं भी उन्हीं कामों में लग जाऊँ, जिनके लिए
मेरा जन्म हुआ था। उनके अनुसार, स्कूल आना मेरी अनधिकार चेष्टा थी।
मेरी ही कक्षा में राम सिंह और सुक्खन सिंह भी थे। राम सिंह जाति में चमार
था और सुक्खन सिंह झींवर राम सिंह के पिताजी और माँ खेतों में मजदूरी करते
थे। सुक्खन सिंह के पिताजी इंटर कॉलेज में चपरासी थे। हम तीनों साथ-साथ
पढ़े, बड़े हुए बचपन के खट्टे-मीठे अनुभव समेटे थे। तीनों पढ़ने में हमेशा
आगे रहे। लेकिन जाति का छोटापन कदम-कदम पर छलता रहा।
बरला गाँव में कुछ मुसलमान त्यागी भी थे। त्यागियों को भी तगा कहते थे।
मुसलमान तगाओं का व्यवहार भी हिंदुओं जैसा ही था। कभी कोई अच्छा साफ-सुथरा
कपड़ा पहनकर यदि निकले तो फब्तियाँ सुननी पड़ती थीं। ऐसी फब्तियाँ जो बुझे
तीर की तरह भीतर तक उतर जाती थीं। ऐसा हमेशा होता था। साफ-सुथरे कपड़े
पहनकर कक्षा में जाओ तो साथ के लड़के कहते, ‘‘अबे
चूहड़े का,
नए कपड़े पहनकर आया है।’’ मैले-पुराने कपड़े पहनकर
स्कूल जाओ
तो कहते, ‘‘अबे चूहड़े के, दूर हट, बदबू आ रही
है।’’
अजीब हालात थे। दोनों ही स्थितियों में अपमानित होना पड़ता था।
चौथी कक्षा में थे। हेडमास्टर बिशम्बर सिंह की जगह कलीराम आ गए थे। उनके
साथ एक और मास्टर आए थे। उनके आते ही हम तीनों के बहुत बुरे दिन आ गए थे।
बात-बेबात पर पिटाई हो जाती थी। राम सिंह तो कभी-कभी बच भी जाता था, लेकिन
सुक्खन सिंह और मेरी पिटाई तो आम बात थी। मैं वैसे भी काफी कमजोर और
दुबला-पतला था उन दिनों।
सुक्खन के पेट पर पसलियों के ठीक ऊपर एक फोड़ा हो गया था, जिससे हर वक्त
पीप बहती रहती थी। कक्षा में वह अपनी कमीज ऊपर की तरफ इस तरह मोड़कर रखता
था, ताकि फोड़ा खुला रहे। एक तो कमीज पर पीप लगने का डर था, दूसरे मास्टर
की पिटाई के समय फोड़े को बचाया जा सकता था।
एक दिन मास्टर ने सुक्खन सिंह को पीटते समय उस फोड़े पर ही एक घूँसा जड़
दिया। सुक्खन की दर्दनाक चीख निकली। फोड़ा फूट गया था। उसे तड़पता देखकर
मुझे भी रोना आ गया था। मास्टर हम लोगों को रोता देखकर लगातार गालियाँ बक
रहा था। ऐसी गालियाँ जिन्हें यदि शब्दबद्ध कर दूँ तो हिंदी की अभिजात्यता
पर धब्बा लग जाएगा। क्योंकि मेरी एक कहानी ‘बैल की
खाल’ में
एक पात्र के मुँह से गाली दिलवा देने पर हिंदी के कई बड़े लेखकों ने
नाक-भौं सिकोड़ी थी। संयोग से गाली देनेवाला पात्र ब्राह्मण था। ब्राह्मण
यानी ब्रह्म का ज्ञाता और गाली...!
अध्यापकों का आदर्श रूप जो मैंने देखा वह अभी तक मेरी स्मृति से मिटा नहीं
है। जब भी कोई आदर्श गुरु की बात करता है तो मुझे वे तमाम शिक्षक याद आ
जाते हैं जो माँ-बहन की गालियाँ देते थे। सुंदर लड़कों के गाल सहलाते थे
और उन्हें अपने घर बुलाकर उनसे वाहियातपन करते थे।
एक रोज हेडमास्टर कलीराम ने अपने कमरे में बुलाकर पूछा,
‘‘क्या नाम है बे तेरा ?’’
‘‘ओमप्रकाश,’’ मैंने डरते-डरते
धीमे स्वर में
अपना नाम बताया। हेडमास्टर को देखते ही बच्चे सहम जाते थे। पूरे
स्कूल में उनकी दहशत थी।
‘‘चूहड़े का है ?’’ हेडमास्टर का
दूसरा सवाल उछला।
‘‘जी ।’’
‘‘ठीक है...वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है, उस पर
चढ़ जा
और टहनियाँ तोड़के झाड़ू बणा ले। पत्तों वाली झाड़ू बणाना। और पूरे स्कूल
कू ऐसा चमका दे जैसा सीसा। तेरा तो यो खानदानी काम है। जा...फटाफट लग जा
काम पे।’’
हेडमास्टर के आदेश पर मैं स्कूल के कमरे, बरामदे साफ कर दिए। तभी वे खुद
चलकर आए और बोले, ‘‘इसके बाद मैदान भी साफ कर
दे।’’
लंबा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था, जिसे साफ करने से मेरी
कमर दर्द करने लगी थी। धूल से चेहरा, सिर अँट गया था। मुँह के भीतर धूल
घुस गई थी। मेरी कक्षा में बाकी बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाड़ू लगा रहा
था। हेडमास्टर अपने कमरे में बैठे थे लेकिन निगाह मुझ पर टिकी थी। पाना
पीने तक की इजाजत नहीं थी। पूरा दिन मैं झाड़ू लगाता रहा। तमाम अनुभवों के
बीच कभी इतना काम नहीं किया था। वैसे भी घर में भाइयों का मैं लाड़ला था।
दूसरे दिन स्कूल पहुँचा। जाते ही हेडमास्टर ने फिर झाड़ू के काम पर लगा
दिया। पूरे दिन झाड़ू देता रहा। मन में एक तसल्ली थी कि कल से कक्षा में
बैठ जाऊँगा।
तीसरे दिन कक्षा में जाकर चुपचाप बैठ गया। थोड़ी देर बाद उनकी दहाड़ सुनाई
पड़ी, ‘‘अबे, ओ चूहड़े के, मादरचोद कहाँ घुस
गया...अपनी
माँ...’’
उनकी दहाड़ सुनकर मैं थर-थर काँपने लगा था। एक त्यागी लड़के ने चिल्लाकर
कहा, ‘‘मास्साब, वो बैट्ठा है कोणे
में।’’
हेडमास्टर ने लपककर मेरी गर्दन दबोच ली थी। उनकी उँगलियों का दबाव मेरी
गर्दन पर बढ़ रहा था। जैसे कोई भेड़िया बकरी के बच्चे को दबोचकर उठा लेता
है। कक्षा से बाहर खींचकर उसने मुझे बरामदे में ला पटका। चीखकर बोले,
‘‘जा लगा पूरे मैदान में झाड़ू...नहीं तो गांड में
मिर्ची
डालके स्कूल से बाहर काढ़ (निकाल) दूँगा।’’
भयभीत होकर मैंने तीन दिन पुरानी वही शीशम की झाड़ू उठा ली। मेरी तरह ही
उसके पत्ते सूखकर झरने लगे थे। सिर्फ बची थीं पतली-पतली टहनियाँ। मेरी
आँखों से आँसू बहने लगे थे। रोते-रोते मैदान में झाड़ू लगाने लगा। स्कूल
के कमरों की खिड़की, दरवाजों से मास्टरों और लड़कों की आँखें
छिपकर
तमाशा देख रही थीं। मेरा रोम-रोम यातना की गहरी खाई में लगातार गिर रहा
था।
मेरे पिताजी अचानक स्कूल के पास से गुजरे। मुझे स्कूल के मैदान
में
झाड़ू लगाता देखकर ठिठक गए। बाहर से ही आवाज देकर बोले,
‘‘मुंशी जी, यो क्या कर रा है
?’’ वे प्यार से
मुझे मुंशी जी ही कहा करते थे। उन्हें देखकर मैं फफक पड़ा। वे स्कूल के
मैदान में मेरे पास आ गए। मुझे रोता देखकर बोले,
‘‘मुंशी
जी..रोते क्यों हो ? ठीक से बोल, क्या हुआ है ?’’
मेरी हिचकियाँ बँध गई थीं। हिचक-हिचककर पूरी बात पिताजी को बता दी कि तीन
दिन से रोज झाड़ू लगवा रहे हैं। कक्षा में पढ़ने भी नहीं देते।
पिताजी ने मेरे हाथ से झाड़ू छीनकर दूर फेंक दी। उनकी आँखों में आग की
गर्मी उतर आई थी। हमेशा दूसरों के सामने तीर-कमान बने रहनेवाले पिताजी की
लंबी-लंबी घनी मूछें गुस्से में फड़फड़ाने लगी थीं। चीखने लगे,
‘‘कौण-सा मास्टर है वो द्रोणाचार्य की औलाद, जो मेरे
लड़के से
झाड़ू लगवावे है...’’
पिताजी की आवाज पूरे स्कूल में गूँज गई थी, जिसे सुनकर हेडमास्टर के साथ
सभी मास्टर बाहर आ गए थे। कलीराम हेडमास्टर ने गाली देकर मेरे पिताजी को
धमकाया। लेकिन पिताजी पर धमकी का कोई असर नहीं हुआ। उस रोज जिस साहस और
हौसले से पिताजी ने हेडमास्टर का सामना किया, मैं उसे कभी भूल नहीं पाया।
कई तरह की कमजोरियाँ थीं पिताजी में लेकिन मेरे भविष्य को जो मोड़ उस रोज
उन्होंने दिया, उसका प्रभाव मेरी शख्सियत पर पड़ा।
हेडमास्टर ने तेज आवाज में कहा था, ‘‘ले जा इसे यहाँ
से..चूहड़ा होके पढ़ने चला है...जा चला जा...नहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा
दूँगा।’’
पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ा और लेकर घर की तरफ चल दिए। जाते-जाते हेडमास्टर
को सुनाकर बोले, ‘‘मास्टर हो...इसलिए जा रहा हूँ...पर
इतना
याद रखिए मास्टर...यो चूहड़े का यहीं पढ़ेगा...इसी मदरसे में। और यो ही
नहीं, इसके बाद और भी आवेंगे पढ़ने कू।’’
पिताजी को विश्वास था, गाँव के त्यागी मास्टर कलीराम की इस हरकत पर उसे
शर्मिदा करेंगे। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। जिसका दरवाजा खटखटाया यही उत्तर
मिला, ‘‘क्या करोगे स्कूल
भेजके’’ या
‘‘कौवा बी कबी हंस बण सके’’,
‘‘तुम
अनपढ़ गँवार लोग क्या जाणो, विद्या ऐसे हासिल ना
होती।’’,
‘‘अरे ! चूहड़े के जाकत कू झाड़ू लगाने कू कह दिया तो
कोण-सा
जुल्म हो गया’’, ‘‘या फिर झाड़ू
ही तो लगवाई है,
द्रोणाचार्य की तरियों गुरु-दक्षिणा में अँगूठा तो नहीं
माँगा’’ आदि-आदि।
पिताजी थक-हार निराश लौट आए, बिना खाए-पिए रात भर बैठ रहे। पता नहीं किस
गहन पीड़ा को भोग रहे थे मेरे पिताजी। सुबह होते ही उन्होंने मुझे साथ
लिया और प्रधान सगवा सिंग त्यागी की बैठक में पहुँच गए।
पिताजी को देखते ही प्रधान बोले, ‘‘अबे, छोटन...क्या
बात है ? तड़के ही तड़के आ लिया !’’
‘‘चौधरी साहब, तुम तो कहो ते सरकार ने चूहड़े
–चमारों
के जाकतों (बच्चों) के लिए मरदसों के दरवाजे खोल दिए हैं। और यहाँ वो
हेडमास्टर मेरे इस जाकत कू पढ़ाने के बजाए क्लास से बाहर लाके दिन भर
झाड़ू लगवावे है। जिब यो दिन भर मदरसे में झाड़ू लगावेगा तो इब तम ही बताओ
पढ़ेगा कब ?’’ पिताजी प्रधान के सामने गिड़गिड़ा रहे
थे। उनकी
आँखों में आँसू थे। मैं पास खड़ा पिताजी को देख रहा था।
प्रधान ने मुझे अपने पास बुलाकर पूछा, ‘‘कोण-सी किलास
में पढ़े हैं ?’’
‘‘जी चौथी में।’’
‘‘म्हारे महेन्द्र की किलास में ही हो
?’’
‘‘जी।’’
प्रधान जी ने पिताजी से कहा, ‘‘फिकर ना कर, कल मदरसे
में इसे भेज देणा।’’