572 Ram ke Poorvaj - A Hindi Book by - Anant Pai - 572 राम के पूर्वज - अनन्त पई
Hindi / English

शब्द का अर्थ खोजें

पुस्तक विषय
नई पुस्तकें
कहानी संग्रह
कविता संग्रह
उपन्यास
नाटक-एकाँकी
लेख-निबंध
हास्य-व्यंग्य
व्यवहारिक मार्गदर्शिका
गजलें और शायरी
संस्मरण
बाल एवं युवा साहित्य
जीवनी/आत्मकथा
यात्रा वृत्तांत
भाषा एवं साहित्य
प्रवासी लेखक
संस्कृति
धर्म एवं दर्शन
नारी विमर्श
कला-संगीत
स्वास्थ्य-चिकित्सा
योग
बोलती पुस्तकें
इतिहास और राजनीति
खाना खजाना
कोश-संग्रह
अर्थशास्त्र
वास्तु एवं ज्योतिष
सिनेमा एवं मनोरंजन
विविध
पर्यावरण एवं विज्ञान
पत्र एवं पत्रकारिता
ई-पुस्तकें
अन्य भाषा

मूल्य रहित पुस्तकें
सुमन
चन्द्रकान्ता
कृपया दायें चलिए
प्रेम पूर्णिमा
हिन्दी व्याकरण

अगस्त ०३, २०१४
पुस्तकें भेजने का खर्च
पुस्तकें भेजने के सामान्य डाक खर्च की जानकारी
आगे
572 Ram ke Poorvaj

572 राम के पूर्वज

<<खरीदें
अनन्त पई<<आपका कार्ट
मूल्य$ 2.45  
प्रकाशकइंडिया बुक हाउस लिमिटेड
आईएसबीएन81-7508-449-9
प्रकाशितमई ०३, २००६
पुस्तक क्रं:2981
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:

सदियों से माना जाता रहा है कि राम एक आदर्श राजा थे। जब गाँधी जी ने अपनी कल्पना के स्वराज्य का नाम रामराज्य रखा तो उनके ध्यान में राम के आदर्श राज्य का ही रूप था। राम के इक्ष्वाकुवंशीय पुरखे भी उतने ही पराक्रमी और उदार थे जितने स्वयं राम। इस कथा में राम के उन्हीं महान पुरखों का परिचय दिया गया है।

महाकाव्य में जीवन का सम्पूर्ण चित्रण होता है इसलिए उसमें नायक के गुणों के साथ-साथ उसकी कमजोरियों का चित्रण भी रहता है। वाल्मीकि की रामायण से प्रेरणा पाकर कालिदास ने अपना महाकाव्य रघुवंश लिखा। उस काव्य में राम के पूर्वजों का इतिहास बताते हुए कालिदास ने उस वंश के ह्रास की कहानी भी कही है। परन्तु हमारी इस कथा में राम के पूर्वजों के उस पक्ष का चित्रण है जिसमें उन्होंने महान कार्य करके यश और गौरव प्राप्त किया था।

मुख्र्य पृष्ठ  

No reviews for this book..
Review Form
Your Name
Last Name
Email Address
Review
 

   

पुस्तक खोजें

चर्चित पुस्तकें


अनंत नाम जिज्ञासा
    अमृता प्रीतम

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे
    शरद जोशी

मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से
    मुकेश नादान

आधुनिक हिन्दी प्रयोग कोश
    बदरीनाथ कपूर

औरत के लिए औरत
    नासिरा शर्मा

वक्त की आवाज
    आजाद कानपुरी

  आगे

समाचार और सूचनाऍ

अगस्त ०३, २०१४
हमारे संग्रह में ई पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। कुछ ई-पुस्तकें यहाँ देखें।
आगे...

Font :