‘जिसे मृत्यु छीन ले वह सब ‘पर’
है, जिसे मृत्यु
भी छीन न पाए, वह ‘स्व’ है। इस
‘स्व’ में जो
स्थिति है, सिर्फ वही स्वस्थ है, बाकी सब अस्वस्थ।’ जिन्हें मन
के
रहस्य के जानने के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए उनके शरीर को अच्छा और दीर्घायु
देने में यह पुस्तक पूर्ण समर्थ है। इस कृति में विभिन्न आसनों को सरल
भाषा तथा रोचक शैली में आकर्षक चित्रों के माध्यमों से समझाया गया है।
उपयोगिता एवं जानकारी की दृष्टि से यह अति महत्त्वपूर्ण एवं संग्रहणीय
कृति है।
योग-जगत के अति श्रद्धास्पद अधिकारी गुरु के रूप में प्रख्यात
स्वामी अक्षय आत्मानंद द्वारा योगासन, प्राणायाम, अध्यात्म विज्ञान,
सम्मोहन विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान आदि पर अत्यन्त सरल-सुबोध भाषा एवं
तार्किक शैली में अति रोचक एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की गई है।
स्वामी जी का साहित्य इतना लोकप्रिय हुआ है कि उनके ग्रन्थों के कई-कई
संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।
आत्मावलोकन
लेखन-कार्य तो मैंने सन् 1945 से ही कर रहा हूँ, परन्तु उन दिनों
युवावस्था थी। श्रंगार और सामयिक समस्याएं ही प्रेरणादायक प्रतीत होती
थीं। लेख, कहानियां और कविताओं का रास्ता सुगम था, महत्त्वाकांक्षा थी,
राजनीतिक मंच प्राप्त था, अत: स्थायी महत्त्व का कुछ भी नहीं लिखा पाया।
वास्तव में पीड़ा वास्तविक या सामाजिक थी भी नहीं, वह तो सिर्फ़ मेरी निजी
थी। अत: मित्रों-परिचितों में वाहवाही तो मिली, परन्तु स्थायी स्थान नहीं
मिला।
जब सिर पर पारिवारिक बोझ का दबाव बढ़ा तो विभिन्न नौकरियों, विभागों से
नोन-तेल-लकड़ी जुटाने लगा। बहुत भटकन के बाद ही शिक्षा-विभाग में
स्थायित्व मिला। बस रोज़ी रोटी की चिन्ता से मुक्त होते ही, फिर यश का
आकांक्षा की दंश चुभने लगा। पुन: लिखा और देश के प्रतिष्ठित
पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगा। शिक्षा विभाग का स्थायी सहारा और बीच-बीच
में मिल जाने वाला पारिश्रमिक जरूरत से कुछ ज्यादा प्रतीत हुआ, तो स्वयं
के सम्पादन, प्रकाशन और मुद्रण का सहारा लेकर, पत्रकारिता में धंस गया।
आँखें खुली तो पाया कि जमी-जमायी गृहस्थी चौपट होने लगी। घर का सामान
बिकने लगा। शायद मेरी दौड़ में गति बहुत थी, इसलिए मुंह के बल गिरने की
नौबत आयी।
अध्यापक को अवकाश तनिक ज्यादा ही मिलता है। यदि उसमें प्रतिभा है, विभिन्न
क्षेत्रों की ताज़ा से ताज़ा जानकारी है, अभिव्यक्ति में रोचकता है, अपने
छात्रों की व्यक्तिगत समस्याएँ सुलझाने व उनका मन जीत लेने की कुशलता है
तो बालकों, पालकों और नागरिकों की श्रद्धा, प्रेम और विश्वास जीतने में
भला कितनी देर लगती है ! शायद यही सब मेरी यश की आकांक्षा थी। यह भी भरपूर
मिली। फलस्वरूप घर-खर्च कम हो गया और पुन: वेतन की आय संगृहीत होने लगी।
शारीरिक आवश्यकताएं पूरी हो रही थीं। सामाजिक प्रतिष्ठा भरपूर थी। यश और
अहंकार का भाव भी तुष्ट हो चुका था। दर्शनशास्त्र की स्नातकोत्तर शिक्षा
थी ही, सो शायद वही अध्यात्म की ओर झुकाने लगी। गुरुओं की तलाश शुरू हो
गयी और खूब ठगा गया था। पेट-पालू साधु-संन्यासियों ने इस तथाकथित विरक्ति
से ही विरक्ति पैदा कर दी। लूटमार, धोखा, पाखण्ड, धनलिप्सा और यशलिप्सा के
कूटनीतिक हथकण्डों से कुछ ऐसी घृणा हुई की मेरी जीवन-शैली ही बदल गयी।
पत्नी और परिवार तो नहीं छोड़ा। नौकरी भी नहीं त्यागी। संसार और सामाजिकता
में भी योग-दीक्षा ले ली।
लोगों ने बहुत टोका-टाकी की, भरपूर उपहास भी
किया। मित्र भी खूब तर्क-वितर्क करते थे। पाखण्डी, धूर्त और बहुरूपिया आदि
नामों से पुकारते थे। जाने उन दिनों मेरी कितनी सहज मनोवृत्ति थी कि मैं
वे सभी सम्बोधन स्वीकार कर लेता था। नौकरी में उन्नति चरम पर पहुंचकर भी,
गैरिक लुंगी -कुर्ताधारी ही बना रहा। सम्मान करने और अपमान करने वाले
स्वत: ही दो दलों में बंटकर आपसी संघर्ष में उलझ गये। मैं इन सबसे तटस्थ
ही रहा। न इसे सुख मान सका न दु:ख या अपमान ही प्रतीत हुआ। जीवन यों ही
चलता रहा। नौकरी और सांसारिकता के किसी भी कार्य में भी कोई व्यवधान नहीं
पड़ा। जैसा चलना-करना चाहा, किया। किसी ने कुछ नहीं चाहा, न भला, न बुरा।
जिसने जो दिया (भला भी, बुरा भी) बिना प्रतिरोध के ले लिया। अपेक्षित
कर्तव्यों का निर्वाह करता और घर आकर आत्मचिन्तन में खो जाता। सबके बीच
में था, परन्तु मेरे मन में कुछ भी न था। किसी भी मान्य सीमा का उल्लंघन
नहीं किया। उदारता या कृपणता कुछ भी न थी और एक साथ भी थी।
इसी बीच एक परिचित बैंक आफ़ीसर मेरा रोगी बनकर आ गया। शायद आधुनिक
चिकित्सा के प्रयोगों के चलते अपने जीवन से भयभीत था, मृत्यु-भय भी था। वह
सिर्फ़ भयभीत थी और शरण मांग रहा था। न जाने क्यों, मैंने उसे अभय दान दे
दिया। धन, श्रद्धा, शिष्यत्व कुछ भी मांग मैंने रखी नहीं, पर उसका संघर्ष
अपने सिर ओढ़ लिया। इस करुणा ने ही इस पुस्तक को जन्म दिया है। यदि यह
प्रेरणा थी, तो उस पात्र के नाम ही, उसका परिणाम यह पुस्तक समर्पित है।
साथ ही इस पृथ्वी पर जो भी किन्हीं रोगों से ग्रसित हैं वे भी मेरा यह
समर्पण स्वीकार करें।
स्मरण रहे, यदि आप इस पुस्तक के समर्पण को स्वीकार कर लेते हैं, तो रोग से
छुटकारे का प्रयास भी आपको ही करना होगा। यही वह योग होगा, जो आपको स्वस्थ
बनायेगा। भूल से भी मुझे मत पकड़ना, सिर्फ योग को ही पकड़ लेना, पार उतर
जायेंगे।
पात्र अदृश्य है, वह आपको अपना परिचय देना नहीं चाहता, परन्तु मैं उसकी
परिस्थितियों से आपको परिचित करा रही हूं। शायद आप भी इन से ही जूझ रहे
हों या जूझने वाले हों या जूझकर, थककर निराश हो चुके हों।
पात्र के पास बैंक की नौकरी थी। मोटी तन्ख्याह और तरक्की की चाह भी थी।
अत: वह प्रात: खाना खाकर दस बजे बैंक पहुंच जाता था। बड़ी तन्मयता से काम
करता, मीठा बोलता और अपनी कुरसी पर बैठा-बैठा हर समय उपभोक्ताओं के लिए
तत्पर रहता। आज का कल पर न टालने के उच्च आदर्श से बंधा हुआ शाम को सात
बजे तक व्यस्त रहता। आफ़ीसर, सहयोगी, उपभोक्ता सभी उससे प्रसन्न थे।
पात्र को काम करना तो आता था, परन्तु विश्राम की सहज विधियों से वह
नितान्त अपरिचित था। व्यस्तता में भी निर्लिप्तता, बैठने की सहज-सुखद विधि
का भी उसे पता न था। थोड़े से शब्दों में कहूं- कार्य, लोगों के
मनोविज्ञान, विभागीय जानकारी आदि सभी का वह अच्छा जानकार था। यदि कुछ न
जानता था, तो वह था,-अपने आपके बारे में।
श्रम, विधि और विश्राम के इस असन्तुलन ने कब्ज़ का मरीज़ बना दिया। कब्ज़
कोई घातक बीमारी तो है नहीं, जिसकी बहुत चिन्ता की जाये। गली-गली में,
मुफ़्त ही गले पड़ जाने वाले जानकार और सलाहकारों ने उसे भी उपकृत किया और
कोई भी लेग्ज़ेटिव्ह या जुलाब की गोली लेकर, तत्काल छुटकारे की राह बता दी।
अब तो चाहे जब जुलाबों का दौर चलने लगा और आंतें शिथिल होती गयीं। अनचाही
कमज़ोरी भी गले पड़ गयी। आंतों में यत्र-तत्र कब्ज़ा जमाये हुए मल और आंत
की दीवार के बीच कीटाणुओं की स्थायी झोपड़पट्टियां बस गयीं। अब कभी-कभी
पेंट में ऐंठन और मल में म्यूकस आने लगा। डॉक्टरों ने
‘एमियोबायसिस’ रोग बताकर चिकित्सा प्रारम्भ कर दी।
कीटाणु कुछ
शान्त हो गये, परन्तु मैदान छोड़कर भागे नहीं।
इलाज चलता ही रहा और रोग भी पनपता रहा। अन्त में पुन: जांच हुई, निष्कर्ष
ढूंढ़ा गया। इस बार मेरा पात्र म्यूकसकोलाइटिस का मरीज़ था, अर्थात् उसकी
आंतों में सूजन आ चुकी थी। बड़ी आंत को ‘कोलन’ कहते
हैं, इसकी
सूजन को कोलाइटिस।
अब रोग भी पुराना हो गया था। दैनिक परेशानियां बढ़ गयीं थीं। दही, चावल,
और अत्यन्त सादा भोजन ही मेरे पात्र का सहारा था। स्वास्थ्य गिर ही रहा
था। अत: इलाज़ जरा और भी गंभीरता से चला। डॉक्टर पर डॉक्टर बदले गये। अनेक
महानगरों के विशेषज्ञों की सलाह ली गयी। आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी,
एलोपैथी, टोने-टोटके सब कुछ आज़माये गये, परन्तु मेरा पात्र न जाने किस
मिट्टी का बना था कि उसे कोई भी ठीक न कर पाया। इसी बीच रोग ने भी उन्नति
की और अल्सरेटिव्ह कोलाइटिस में ढल गया।
सिग्मास्कोप, बेरियम, एक्स-रे और न जाने कितनी पीड़ाएं पहुंचाकर, मेरे
पात्र की जांचें की गयीं। नि:संदेह इन सबके लिए लम्बी-तगड़ी फ़ीस चुकायी
गयीं। वर्षों तक लम्बा निरन्तर चलने वाला महंगा इलाज चला। जानते हैं इन
सबका परिणाम क्या निकला ? अब मेरा पात्र कैंसरिक घोषित किया जाकर, लगभग आठ
इंच बड़ी आंत कटवाने की स्थिति में पहुंच चुका था। शल्य-चिकित्सा आवश्यक
थी।
उन दिनों कैंसर एक भयानक नाम था। निश्चित मृत्यु इससे जुड़ी थी। अत:
स्वाभाविक था कि मेरा पात्र आतंकित हो जाता। फिर भी धैर्य से काम लेते हुए
उसने डॉक्टर से पूछा था-‘‘बड़ी आंत काटकर डिसकनेक्ट
हो
जायेगी, तब मल-विसर्जन की क्या व्यवस्था होगी ?’’
तब उसे शायद बताया गया था कि पेट के साइड़ में एक चीरा लगाकर प्लास्टिक की
एक नली बाहर निकाल दी जायेगी। इसके बाहरी सिरे पर पॉलीथीन की एक थैली
बांधी जा सकेगी। पेट के अन्दर का सिरा छोटी आँत से जोड़ दिया जायेगा, ताकि
मल निकल कर थैली में इकट्ठा होता रहे। जब भी आवश्यक समझो, थैली फेंक दो और
दूसरी बांध लो।
मेरे पात्र की मानसिक स्थिति के बारे में अनुमान लगाइये। वह इस व्यवस्था
से कितना भयभीत रहा होगा ? कैंसर का भूत उसे कितना आतंकित किये होगा ?
उसके परिवार के लोग, पत्नी-पुत्र कितने चिन्तित होंगे ?
मेरे पास जब वह आया था, तब वह कृशकाय हो चुका था। चेहरे पर पीलापन और
मुर्दनी छायी थी। आवाज़ कम्पित थी। फिर भी वह बड़ी आशा लेकर मेरे पास आया
था। ऑपरेशन के लिए उसके पास मात्र एक माह का ही समय शेष था। ऐसे में वह
मुझसे गारण्टी चाहता था कि वह स्वस्थ हो जायेगा। यही उसका चैलेंज था।
मैंने उसके चैलेंज को तो अस्वीकृत कर दिया, परन्तु यह अभय उसे अवश्य दे
दिया कि जब तक भी वह तन्मयतापूर्वक योग की शरण में रहेगा, तब तक उसका रोग
रंचमात्र भी आगे न बढ़ सकेगा। यदि वह स्वस्थ न भी हुआ, तो इससे बदतर
स्थिति में तो कदापि न जा सकेगा और तब भी ऑपरेशन के लिए उसके पास एक माह
का समय अवशेष रहेगा। वह मुझसे आश्वस्त था। अत: मैंने अपने पात्र को
प्रतिदिन प्रात: हलके-फुलके योगासन कराये। धीरे-धीरे कुछ कठिन योगासन और
प्राणायाम भी वह करने लगा। सिर्फ तीन माह बाद ही उसके अन्य सहयोगी
योगाभ्यासी, उसके चेहरे पर बढ़ती हुई लालिमा और फुर्ती की प्रशंसा करने
लगे। तब एक दिन मैंने उससे उसके खान-पान के बारे में जानकारी चाही। वह
बेचारा अब भी दही-चावल और एक आध सूखी रोटी ही खा रहा था। मैंने उसके
स्वास्थ्य के समय का सबसे रुचिकर भोजन पूछा। उसने बताया कि उसे फ्राई की
हुई भिण्डी पसन्द थी। मैंने उसे यही खाने का आदेश दिया। दूसरे दिन उससे
अपनी रिपोर्ट देने को भी कहा। जब दूसरे दिन उससे पूछा गया कि उसने भिण्डी
खायी थी ? कितनी खायी थी ? बेचारा वर्षों से डरा हुआ मरीज अनुमति मिलने पर
भी भिण्डी न खा सका था। उसने फिर भी बड़े गर्व और भोलेपन से उत्तर दिया
था-‘‘खायी थी। दो क़तरे खायी
थी।’’
मुझे उस पर बहुत दया आयी। मैंने कहा-‘‘पागल ! तुझसे
खाने को
कहा गया था और तू इतना कंजूस निकला कि सिर्फ चखकर ही खुश हो रहा है ? आज
फिर से भर-पेट खाना, चाहे जैसे खाना, पर खाना ज़रूर।’’
मेरे पात्र ने निर्भय होकर, वर्षों बाद भरपेट पूड़ी भिण्डी खायी, परन्तु
मैंने दूसरे दिन, जानबूझकर उससे कुछ न पूछा। तीन-चार दिन तक तो मेरी ओर
प्रश्नवाचक दृष्टि से ताकता रहा, परन्तु मेरी अनदेशी ताड़कर खुद ही
बोला-‘‘गुरुजी, आपने मुझसे भरपेट भिण्डी खाने की बात
क्यों
नहीं पूछी ?’’
मैंने उससे कहा कि मेरी रुचि अपने खाने-पीने से है। तुम्हारे खाने-पीने से
नहीं है, फिर मैं मतलब ही क्यों रखूं ? मेरा हास्य-स्वर उसे उत्साहित कर
गया और उसने सब कुछ बताया कि पूड़ी-भिण्डी खाने का भी उस पर कोई कष्टकर
प्रभाव नहीं पड़ा है। उसकी भूख भी बढ़ी है तथा मल से आंव की मात्रा भी कम
हुई है। आजकल बड़ी गहरी नींद आ रही है। दिन-भर के कामों की थकान भी
मामूली-सी ही प्रतीत होती है।
उसने मुझसे ही प्रश्न कर दिया-बिना जांच कैसे पता लगे कि मैं स्वस्थ हूं ?
तब मैंने उससे कहा कि स्वस्थ होने की बात तो अपने डॉक्टरों से ही पूछो।
हां, जब तक शौच में आंव आती है, खून गिरता है, पेट में दर्द बना रहता है,
गैस बनती है, तब तक तुम अस्वस्थ हो। योगाभ्यास जारी रखो। एक साल बाद ही
अपने डॉक्टरों से पुन: जाँच कराना।