Bhartiya Sanskriti - A Hindi Book by - Shivdutt Gyani - भारतीय संस्कृति - शिवदत्त ज्ञानी
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Bhartiya Sanskriti

भारतीय संस्कृति

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मूल्य$ 16.95  
प्रकाशकराजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन81-7178-614-6
प्रकाशितमई १७, २००३
पुस्तक क्रं:2502
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Bhartiya Sanskriti a hindi book by Shivdutt Gyani -भारतीय संस्कृति - शिवदत्त ज्ञानी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विश्व में अनेक संस्कृतियाँ पनपी और मिट गई। आज उनका कहीं नामोंनिशान तक नहीं है, सिर्फ उनकी स्मृति बाकी है, लेकिन भारतीय संस्कृति में है ऐसा कुछ कि वह कुछ नहीं मिटा। उसे मिटाने के बहुत प्रयास हुए और यह सिलसिला आज भी जारी है, पर कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। भारतीय संस्कृति में आखिर क्या है, जो उसे हमेशा बचाए रखता है, जिसकी वजह से वह हजारों साल से विदेशी हमलावरों से लोहा लेती रही और इन दिनों इन पर जो हमले हो रहे हैं, उसका मुकाबला कर रही है ? आखिर कैसा है वह भारतीय संस्कृति का वह तंत्र, जिसे हमलावार संस्कृतियाँ छिन्न-भिन्न नहीं कर पातीं ? हर बार उन्हें लगता है कि इस बार वे इसे अवश्य पदाक्रांत कर लेंगी, पर हुआ हमेशा उलटा है, वे खुद ही पदाक्रांत होकर भारतीय संस्कृति में विलीन हो गईं, क्यों और कैसे ?

शिवदत्त ज्ञानी की प्रसिद्ध कृति भारतीय संस्कृति बहुत गहराई तक जाकर हमें बताती है कि हजारों साल तक क्यों और कैसे जीवित है भारतीय संस्कृति; क्या हैं इसके मूल तत्व, जो इसे नष्ट होने से हमेशा बचाते और विरोधी संस्कृतियों का मुकाबला करने की शक्ति देते रहे है; किन-किन संस्कृतियों ने कब-कब और किस-किस रूप में भारतीय संस्कृति पर हमले किये और कैसे तथा किस रूप में वे पराजित हुई; भारत में पनपी इस संस्कृति ने कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बड़े भूभाग को अपने प्रभाव में ले लिया! इन सारी बातों का विषद वर्णन शिवदत्त ज्ञानी ने अपनी इस कृति में किया है। वे हमें बताते हैं कि क्यों सिर्फ देह की शक्ति को महत्वपूर्ण मानने वाला स्पार्टा वीरों के लिए भले ही जाना गया, मगर विश्व की संस्कृतियों पर वह कोई प्रभाव नहीं डाल सका ! वहाँ मनुष्य के मन को भारतीय संस्कृति जितना महत्त्व नहीं दिया गया, शायद इसीलिए रोम, मिस्त्र और काबुल आदि की प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट हो गईं।

भारतीय संस्कृति पर फिर हमला हो रहा है और इस बार वह हमला बहुस्तरीय है-वह देह के स्तर पर तो है ही, मन के स्तर पर भी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा अनेक टी.वी. चैनलों के जरिए जो हमला किया जा रहा है, वह बेहद चतुराई और निर्लज्जता से भरा है, जिससे लड़ने का जो हमारा तंत्र है, इसके आगे स्वतः नतमस्तक हो गया है। प्लासी का युद्ध हम हारे नहीं थे, हमारे सेनापति विदेशियों से मिल गए और बिना लड़े ही हम गुलाम हो गए थे। यही खतरा आज भी हमारे सामने है। उस बार राज्य दे दिया गया था, लेकिन इस बार राज्य के साथ संस्कृति भी दाँव पर लगी हुई है।
भारतीय संस्कृति वस्तुतः आज गहरे संकट में है और यही संकट आज तक के इतिहास का सबसे बड़ा संकट है। इससे पहले भारतीय संस्कृति इस तरह सार्वदेशिक हमलों का शिकार कभी नहीं हुई। हमलावार आते रहे और भाग जाते रहे या फिर यहीं पर रच-पच जाते रहे, पर इस बार वे यहाँ आये नहीं है। इस बार हमारी संस्कृति पर वे हमारे अपनों से ही हमला करवा रहे हैं और हम अर्जुन की तरह विषाद में घिर गए हैं कि इन्हें कैसे मारें। हमारे सामने तो हमारे अपने ही खड़े हैं ऐसे ही कठिन समय के लिए शायद भारतीय मनीषा ने ‘श्रीमद्भगवत् गीता’ जैसे ग्रंथ की रचना की है, जिसके जरिये अर्जुन को धर्म का पालन और संस्कृति की रक्षा करने के लिए सन्नद्ध किया जा सकता है।

ज्ञानीजी की इस कृति में हमारे तमाम सामाजिक सवालों के भी जवाब मौजूद हैं ऐसे अनेक दृष्टान्त, जिनसे हम अपने राष्ट्र की महत्ता और महानता से परिचित होते हैं और होते हैं सन्नद्ध, अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए। किसी भी कृति की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक को अर्जुन की तरह सन्नद्ध करे और अपसंस्कृति के विरूद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करे ताकि हमारी मनीषा का क्षेष्ठतम रूप प्रतिष्ठित हो और वह जन-जन के जीवन को नये उत्साह से भर दे।

भारत की स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित, काफी दिनों से अनुपलब्ध यह महत्त्वपूर्ण कृति, उम्मीद है कि पाठकों के बीच खूब-खूब पढ़ी और सराही जाएगी।
प्राक्कथन
ज्ञानजी की यह पुस्तक मेरी सूचना से लिखी गयी है। आर्य-संस्कृति का समग्र दिग्दर्शन एक ही पुस्तक में हो जाय, इसके उद्देश्य को लेकर लेखक ने यह पुस्तक लिखी है। ज्ञानीजी ने इस पुस्तक के लिए बहुत मेहनत उठायी है।
‘भारतीय विधाभवन’ का परम लक्ष्य है कि आर्य-संस्कृति को जागृत करें तथा उसे दृढ़ बनाए। इस कार्य में यह पुस्तक मदद करेगी, ऐसी मेरी हार्दिक इच्छा है। संस्कृति-संबंधी परीक्षाओं के लिए भी इसका पूरा उपयोग हो सकेगा।

बम्बई

क.मा. मुंशी

दो शब्द


प्रस्तुत पुस्तक पूज्य मुंशी जी की प्रेरणा का फल है। लेखक ने इस पुस्तक द्वारा जनसाधारण के सम्मुख भारत की प्राचीन संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को उपस्थित करने का प्रयत्न किया है। उक्त संस्कृति के आधारभूत सिद्धांतों का विवेचन करके उसने यह समझाने का प्रयत्न किया है कि प्राचीनकालीन अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा भारतीय संस्कृति अधिक सर्वतोमुखी, लोक-कल्याणकारी उपादेय है; क्योंकि वह सत्य-सनातन सिद्धांतों पर स्थित है।
भारतीय संस्कृति के सर्वांगीण विकास का विवेचन करते हुए लेखक को कितने ही विवादास्पद विषयों का विवेचन करना पड़ा है; यथा आर्यों का आदिम निवास-स्थान, वेदकाल-निर्णय, भारतीय संस्कृति का विश्वव्यापी प्रभाव आदि। ऐसे अवसर पर विभिन्न मतों को समझाते हुए लेखक ने अपना भी मत दिया है, किंतु उसका यह आग्रह कदापि नहीं रहा है, कि उसका मत ही ग्राह्य माना जाय। सुज्ञ पाठकों को स्वयं निर्णय का पूर्ण अधिकार तथा स्वातन्त्र्य है। लेखक की तो यही इच्छा रही है कि गुरुजनों की कृपा से जिस प्रकार उसने भारत माँ के प्राचीन गौरव के दर्शन किए हैं, उसी प्रकार जनसाधारण भी दर्शन करे।

पूज्य मुंशीजी के अतिरिक्त गुरुवर्य डॉ. अ.स. अलतेकर (काशी विश्वविद्यालय) भी हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं। अनेकों आवश्यकीय कार्य करते हुए भी आपने अपने शिष्य की प्रार्थना मानकर प्रस्तुत पुस्तक की हस्तलिपि-प्रति आदि से अंत तक पढ़कर कितनी ही बहुमूल्य बातें सुझायी थीं, जिनका लेखक ने पूरा-पूरा लाभ उठाया, यद्यपि कहीं-कहीं विचार भिन्नता के लिए भी स्थान था। गुरुवर्य डॉ. अलतेकर की इस कृपा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए लेखक के पास शब्द नहीं हैं।
सुज्ञ पाठकों के कर-कमलों में प्रस्तुत पुस्तक को रखते हुए लेखक को आनन्द होता है। यदि यह पुस्तक पाठकों के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति सच्चा प्रेम व सच्ची लगन उत्पन्न करने में सफल हो सके तो लेखक अपने प्रयत्नों को कृतकृत्य समझेगा।

बम्बई भाद्रपद शुक्ल, 1, वि.सं. 2000

विनीत
शिवदत्त ज्ञानी

पुनश्च

परिवर्तित व संशोधित रूप में ‘भारतीय संस्कृति’ का द्वितीय संस्करण पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए लेखक को आनन्द होता है। इस संस्करण में पुस्तक का कलेवर कुछ कम कर दिया गया है, साथ ही कुछ नयी बातें भी जोड़ दी गयी हैं, तथा विषय का प्रतिपादन इस तरह किया गया है, जिससे विद्यार्थी और साधारण पाठक दोनों की समझ में सरलता से आ सके। अतएव इतिहास के क्षेत्र में विवादास्पद व कम महत्त्वपूर्ण बातों तथा टिप्पणियों को आवश्यकता से अधिक स्थान नहीं दिया गया है।

लेखक ‘भारती विद्याभवन’ बम्बई का कृतज्ञ है, जिसने उसे इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण पाठकों को भेंट करने का अवसर प्रदान किया है।
आशा है, सुज्ञ पाठक इस संशोधित संस्करण का स्वागत कर तथा प्राचीन भारतीय संस्कृति के तत्त्वों को अपने जीवन में अनुवादित कर विश्व-शान्ति का मार्ग ढूँढ़ने में अग्रसर होंगे। इसी में लेखक के प्रयास व प्रयत्न की कृतकृत्यता है।

बराणपुर, वि.सं. 2008

विनीत
शिवदत्त ज्ञानी

1
भौगोलिक विवेचन


विस्तार व सीमा-यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से भारतवर्ष हिन्दुस्तान व पाकिस्तान ऐसे दो भागों में विभाजित किया गया है, तथापि भौगोलिक व सांस्कृतिक दृष्टि से इस विभाजन का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। अतएव भौगोलिक विवेचन में इस विभाजन का कोई स्थान नहीं है।
भौगोलिक दृष्टि से भारतवर्ष एक छोटा महाद्वीप ही है। यूरोप में से यदि रूस निकाल लिया जाये तो क्षेत्रफल में यूरोप के बराबर हो जायेगा। इसका क्षेत्रफल 10,00,000 वर्गमील है, उत्तर से दक्षिण तक इसकी लम्बाई लगभग 2000 मील है व ब्रह्म देश को सम्मिलित करने पर पूर्व से पश्चिम तक इसकी चौड़ाई 2500 मील है।

इसके उत्तर में पर्वतराज हिमालय है, जो हमेशा बर्फ़ से ढका रहता है। उत्तरी छोर पर वह एक सिरे से दूसरे सिरे तक चला गया है। आजकल की परिभाषा में ब्रह्मपुत्र और सिन्धु नदियों के दक्षिणी मोड़ों को उसकी पूर्वी व पश्चिमी सीमा माना जाता है। हिमालय शब्द मुख्यतः उन दोनों के बीच सनातन हिम से ढकी उस परम्परा के लिए प्रयुक्त किया जाता है जिसमें नाँगा, नुनकुन, बन्दरपूँछ, केदारनाथ, नन्दादेवी, धौलागिरि, गोसाईथान, गौरीशंकर, काञ्चनचंगा, चुमलारी आदि प्रसिद्ध पहाड़ हैं। उत्तर भारतीय मैदान व उसके बीच के पहाड़-पहाड़ियों को और दो श्रृंखलाओं में बाँटा गया है जिन्हें क्रमश: भीतरी या छोटी हिमालय-श्रृंखला और बाहरी या उपत्यका-श्रृंखला कहते हैं, और जिन्हें असली हिमालय की निचली सीढ़ियाँ कहना चाहिए। भीतरी श्रृंखला का नमूना कश्मीर की पीरपञ्चाल-श्रृंखला, काँगड़ा कुल्लू की धौलाधार आदि हैं। उपत्यका-श्रृंखला का नमूना शिवालक पहाड़ियाँ हैं। यह हिमालय कम-से-कम 1400 मील लम्बाई में है और लगभग 19,000 फुट ऊँचाई में है। इसकी चोटियाँ 25,000 से 29,000 फुट ऊँची हैं। इस पर्वतमाला में से कहीं-कहीं उत्तर की ओर जाने का मार्ग भी है, जैसे गिलगिट से पामीर, लेह से तिब्बत आदि जाने का रास्ता।

भारतवर्ष के पश्चिमोत्तर में भी हिन्दकुश, सुलेमान आदि पर्वत-श्रेणियाँ हैं। इन्हीं में खैबर, कुर्रम, बोलन आदि प्रसिद्ध घाटियाँ हैं, जिनके द्वारा कितने ही विदेशी व आक्रमणकारी भारत में आकर बसे थे व उन्होंने यहाँ के राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में उथल-पुथल मचाई थी। कहा जाता है कि ये घाटियाँ पहले नदियाँ थीं।
पूर्व की ओर भी भारत घने जंगलों में नाँगा, पतकुई, आराकन आदि पर्वतों के कारण दुर्गम है, अतएव सुरक्षित है। साधारण आवागमन के लिए इनमें मार्ग अवश्य हैं, किन्तु इनसे बड़ी-बड़ी सेनाएँ नहीं आ सकतीं। यही कारण है कि इस दिशा में भारत पर कोई भी आक्रमण नहीं हुआ।

दक्षिण में पूर्व व पश्चिम की ओर झुकता हुआ समुद्र है। ठीक दक्षिण में हिन्द महासागर लहराता है तथा पूर्व व पश्चिम में क्रमश: बंगाल की खाड़ी व अरब का समुद्र है। इस प्रकार दक्षिण भारत भौगोलिक दृष्टि से प्रायद्वीप कहा जा सकता है। यह भाग भी प्राचीन काल में विदेशियों के आक्रमणों से सुरक्षित ही था; किन्तु व्यापार आदि के लिए विदेशियों को नौका द्वारा आना-जाना प्राचीन काल से ही जारी था। समुद्र के किनारे रहनेवाले भारतीय अत्यन्त प्राचीन काल से दूर-दूर के देशों से व्यापार करते थे।

जलवायु, पर्वत, नदी आदि-यहाँ की जलवायु उष्ण है, क्योंकि भूमध्य-रेखा इसके पास से ही जाती है व उष्ण-कटिबन्ध इसके दो त्रिकोण बनाता है। समुद्र-तटवर्ती प्रदेशों की जलवायु समशीतोष्ण व हिमालय-निकटवर्ती की अत्यन्त ही शीत है। इस प्रकार यहाँ हर प्रकार के जलवायु का अनुभव किया जा सकता है। पर्वत व नदियों के कारण भी जलवायु पर प्रभाव पड़ता है। पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश साधारणतया शीत-प्रधान रहते हैं।

यहाँ कितने ही छोटे पर्वत हैं। मध्य में विन्ध्य है, जो भारत के दो भाग करता है, यथा : उत्तर भारत व दक्षिण भारत जो कि प्राचीन काल में क्रमश: उत्तरापथ व दक्षिणापथ कहलाते थे। इसके दक्षिण में सतपुड़ाल पर्वत है, जो दखन-उच्चसमभूमि पर फैला हुआ है। पश्चिम में राजपूताने के मध्य में अरावली पर्वत है। पश्चिमोत्तर व उत्तर-पूर्व के पर्वतों का उल्लेख तो पहले ही कर दिया गया है। दक्षिण में दोनों किनारों पर पूर्वी घाट व पश्चिम घाट (सह्याद्रि) पर्वत स्थित हैं। मैसूर के दक्षिण में नीलगिरि पर्वत है।...

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