यह पुस्तक एक महान प्रयास है। इसे हिंदी का बृहत् कोश कहना उपयुक्त होगा।
इसमें पाठक को हिंदी संबंधी अनेक विषयों पर चर्चा मिलेगी। संपूर्ण
सामग्री प्रामाणिक और अधुनातन है। पुस्तक में व्यावहारिक हिंदी,कार्यालयीन
हिंदी और अनुवाद जैसे अनेक उपयोगी विषयों पर भी सुविस्तृत चर्चा समाविष्ट
की गई है। पुस्तक के तीसरे भाग में पाठक संचार क्रांति और सामाजिक जीवन पर
इसके प्रभाव,इलेक्ट्रॉनिक माध्यम बनाम प्रिंट,माध्यम,विदेशी चैनलों
द्वारा भारतीय संस्कृति को झकझोरने वाले विषयों की समीक्षा पढ़ सकते हैं।
अंत में लेखक पाठकों को अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर ले जाते हैं और उन्हें
विभिन्न देशों में हिंदी की स्थिति से परिचित कराते हैं। इतना ही
नहीं, इससे भी वे आगे जाते हैं और हिंदी के भावी, विकास की दिशाओं का आभास
कराते हैं।
विशेष आभार
मैं प्रो. तारकनाथ बाली का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिनके मार्गदर्शन और
सहयोग के बिना यह पुस्तक इस रूप में पूरी न हो पाती।
कन्हैया लाल गांधी
दो शब्द
पुस्तक के विषय-वस्तु को चार भागों में प्रस्तुत किया गया है।
पहले भाग में राजभाषा समस्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। अन्य
विषयों के अतिरिक्त, इस भाग में राजभाषा संबंधी संविधान सभा के निर्णय,
संसद् द्वारा पारित अधिनियमों राजनीतिक दलों की भूमिका और व्यवस्था के
कार्य की समीक्षा की गई है।
दूसरे भाग में हिंदी, भाषा के संबंधित कुछ अन्य विषयों पर चर्चा की गई है,
जैसे त्रिभाषा सूत्र, अनुवाद, विशेष प्रयोजन की हिंदी, संविधान की धारा
351 तथा राष्ट्रीय एकता और भाषा समस्या का समाधान।
तीसरे भाग में पत्रकारिता से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों को विचाराधीन
लिया गया है। सूचना विस्फोट ने हिंदी भाषा और भारतीयों के मानस को गंभीर
रूप से प्रभावित किया है। अब शिक्षा जगत् में हिंदी पत्रकारिता तथा संचार
से जुड़े पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं, इसलिए सूचना और संचार क्रांति, हिंदी
पत्रकारिता प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का सामाजिक प्रभाव तथा हिंदी
पत्रकारिता की विभिन्न प्रवृत्तियों पर बहस करने की कोशिश की गई है।
पुस्तक के चौथे भाग में हिंदी के अंतरराष्ट्रीय रूप और इसके विकास की नई
दिशाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है।
यह कोई रहस्य नहीं है कि जिस अर्थ में आज हिंदी भाषी, अहिंदी भाषी, उत्तर
दक्षिण एवं आर्य और द्रविड़ शब्दावली का प्रयोग होने लगा है, उससे राष्ट्र
में अलगाववादी प्रवृत्तियों का प्रसार हुआ है। वैसे भी, तथ्यों के आधार पर
हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी प्रांत शब्दावली गलत है। 1948 के भाषावार
प्रांतों के बारे में संस्तुति करनेवाले आयोग के शब्द इस कथन की पुष्टि
करते हैं। आयोग ने लिखा है।
कहीं भी ऐसे भाषाई प्रांत का निर्माण करना मुमकिन नहीं होगा, जिसमें सत्तर
से अस्सी प्रतिशत से अधिक एक ही भाषा के बोलनेवाले लोग हों। इस प्रकार
प्रत्येक प्रांत में कम से कम बीस प्रतिशत लोगों की अल्पसंख्या रह जाएगी,
जो अन्य भाषाई होगी।’
इस कथन को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषी, तमिल भाषी, बँगला भाषी प्रांत
शब्दावली तर्कसंगत नहीं है। इस तथ्य को एक और दृष्टि से भी देखना
न्यायसंगत होगा। यह सर्वविदित है कि हिंदी भाषा के प्रचार में स्वामी
दयानंद सरस्वती और राष्ट्रपति महात्मा गांधी का बड़ा योगदान है। इन
महापुरुषों ने स्वयं हिंदी सीखी और इसके प्रसार के लिए ज़ोरदार आवाज भी
बुलंद की। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में सबसे पहले हिंदी में
भाषण देनेवाले बंगाल के भूदेव मुखर्जी थे-यह 1919 बात है। हिंदी
पत्रकारिता की जन्मभूमि बंगाल है, उत्तरप्रदेश या दिल्ली नहीं। तो क्या
बंगाल के भूदेव मुखर्जी या फिर स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी को अहिंदी
भाषी कहना उचित होगा ?
अंग्रेज़ उपनिवेशक ने अपने शासनकाल में मुसलिम और गैर मुसलिम जैसी
शब्दावली का जान बूझकर बार बार प्रयोग करके इस देश की एकता के साथ जो
खिलवाड़ किया, वह किसी से छिपा नहीं है और न ही उसके परिणाम छिपे हैं।
‘हिंदी भाषी’ और ‘गैर -हिंदी
भाषी’ जैसी शब्दावली
भी देश के लिए उसी प्रकार घातक हो सकती है।
इन विचारों को ध्यान में रखते हुए, पुस्तक में उद्धरणों को छोड़कर,
यत्र-तत्र हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी प्रांत की बजाय
‘बहुरदेहम’ क्षेत्र और ‘बहुरदेहम
इतर’ क्षेत्र
शब्दावली का प्रयोग किया गया है। ‘बहुरदेहम’ बिहार,
हरियाणा,
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल और मध्य प्रदेश का संक्षेपण है।
यद्यपि बहुरदेहम इतर क्षेत्र में ‘प्रायद्वीप’ के
अलावा अन्य
राज्य भी है परन्तु सुविधा की दृष्टि से इसके लिए प्रायदीप शब्द का प्रयोग
भी किया गया है। यदि सभी लोग इस शब्दावली को स्वीकार करेंगे तो अलगाव की
मानसिकता पैदा करनेवाली शब्दावली से छुटकारा पाया जा सकता है।
पुस्तक को लिखते समय मैंने अनेक स्त्रोतों से सामग्री ली है और उन
स्त्रोतों से मेरी लेखनी प्रभावित भी हुई है। स्थान की सीमा के कारण उन
सबका उल्लेख यहाँ पर संभव नहीं है। मेरे मित्रवर प्रोफेसर दिलीप सिंह और
प्रोफेसर जसवंत सिंह यादव ने इस पुस्तक को पढ़ा और कुछ मूल्यवान् सुझाव भी
दिए। जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
लेखक
आमुख
भारतीय समाज में भाषा एक ज्वलंत समस्या है। केवल शैक्षिक और बुद्धिजीवी
जगत् में ही इसकी चर्चा नहीं होती, देश के संचार माध्यमों में भी लगातार
भाषा के सवाल पर बहस होती रही है। आरंभिक दौर में इन बहसों के केंद्र में
केवल हिंदी और अंग्रेजी भाषाएँ हुआ करती थीं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से
भाषाओं और उनकी सामाजिक स्थिति पर होनेवाले विवादों में कई अन्य भारतीय
भाषाएँ भी शामिल हो गई हैं। नेपाली तथा मैथिली आदि भाषाओं को संविधान की
आठवीं सूची में शामिल करने का सवाल हो, भारतीय भाषाओ में उच्च शिक्षा के
प्रवाधान का प्रश्न हो या भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं में भारतीय
भाषाओं के माध्यम शामिल किए जाने की माँग करनेवाला आंदोलन हों, सभी में
हमें भारतीय समाज में भाषाई विवाद या बहस का दायरा बहुत विस्तृत होता
दिखलाई पड़ता है। आजादी के पचास वर्षं बाद भी ‘अंग्रेजी हटाओं
आंदोलन’ की आवश्यकता ही भाषा के सवाल का जीता जागता उदाहरण है।
भारतीय जन मानस को उद्वेलित करनेवाले ये सभी प्रश्न इस पुस्तक की
पृष्ठभूमि से झाँकते दिखाई पड़ते हैं। हिंदी संप्रेषण और भारतीय समाज को
इससे बेहतर चित्रित करने का कोई अन्य तरीका संभवतः नही हो सकता।
बीसवीं सदीके अंतिम दौर में वायुमंडलीय संचार परिवर्तन, विश्व परिदृश्य पर
पूरी तरह हावी हो रहा है। डिजिटल प्रणाली और फाइबर ऑप्टिक्स अब विभिन्न
तकनीकों और सेवाओं को संचार प्रणाली से जोड़कर उसे संगठित कर रही है। एक
विशाल अंत क्रियात्मक टी.वी. चैनल के पाँच सौ चैनल फाइबर स्पेस का
इलेक्ट्रॉनिक चमत्कार और हू ब हू यथार्थ संचार क्रांति की ही देन है।
तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो ये सब आज पहुँच के भीतर हैं। संक्षेप में,
सूचना क्रांति अभी बीच रास्ते में है और भारत इस मामले में पीछे नहीं है।
वह सूचना समाज बनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, जिसमें संचार एवं
संचार तकनीक एक प्रमुख शक्ति होगी। भारत काइलेक्ट्रॉनिक मीडिया नेटवर्क
विश्व के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्कों में से एक है। टी.वी. बीडियो,
रेडियो, समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रसारणशील उद्योग हैं। संचार के इस
परिदृश्य में भी भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और पुस्तक के लेखक ने एक
पूरा खंड इस विषय को समर्पित करके न केवल भाषा और संप्रेषण जैसे दो विषयों
के साथ न्याय किया है बल्कि हिंदी के इक्कीसवीं शताब्दी के रूप की ओर भी
पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।
ऐसे परिदृश्य में डॉ. कन्हैया लाल गांधी की यह पुस्तक बहुत ही सार्थक पहल
है। यह एक सार्थक पहल इसलिए भी है, क्योंकि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में
ऐसे विषयों पर अच्छी पुस्तकों का अभाव है इसमें हिंदी भाषा की उत्पत्ति से
लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक की गंभीरता से पड़ताल की गई है। हिंदी की
विकास यात्रा को संचार माध्यमो से जोड़कर उसकी और अधिक प्रयोजनमूलक छवि
उभारने की चेष्टा लेखक ने इस पुस्तक में की है। हिंदी को राजाभाषा बनाए
जाने के प्रसंग की विस्तार से चर्चा करते हुए लेखक ने आज के समाज में
प्रयुक्त होनेवाली कई भाषिक अभिव्यक्तियों पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं,
ताकि आधुनिक हिंदी समाज भाषा के प्रति एक स्वस्थ नजरिया अपना सके।
पाठकों के लिए और विशेषकर हिंदी और जनसंचार के विभिन्न क्षेत्रों में काम
करने के इच्छुक पत्रकारिता के प्रशिक्षार्थियों के लिए यह पुस्तक निश्चय
ही प्रासंगिक और लाभप्रद होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।