प्रेमचन्द हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार हैं और उनकी अनेक रचनाओं की गणना कालजयी साहित्य के अन्तर्गत की जाती है। ‘गोदान’ तो उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है ही, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘सेवा सदन’ तथा अनेकों कहानियाँ हिन्दी साहित्य का अमर अंग बन गई हैं। इनके अनुवाद भी भारत की सभी प्रमुख तथा अनेक विदेशी भाषाओं में हुए हैं। इन रचनाओं में उन्होंने जो समस्याएँ उठाईं तथा स्त्री-पुरूषों के चरित्र खींचे, वे आज भी उसी प्रकार सार्थक हैं जैसे वे अपने समय थे और भविष्य में बने रहेंगे। भारतीय समाज के सभी वर्गों का चित्रण बहुत मार्मिक है विशेषकर ग्रामीण किसानों का, जिनके साथ वे एक प्रकार से आत्मसात ही हो गये थे।
‘गोदान’ प्रेमचन्द का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसमें ग्रामीण समाज के अतिरिक्त नगरों के समाज और उनकी समस्याओं का उन्होंने बहुत मार्मिक चित्रण किया है।
होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा-गोबर
को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूं। जरा मेरी लाठी दे दो।
धनिया के हाथ गोबर से भरे थे। उपले थापकर आयी थी। बोली-अरे, कुछ-रस पानी
तो कर लो। जल्दी क्या है ?
होरी ने अपनी झुर्रियों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा-तुझे रस-पानी की
पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गई तो मालिक से भेंट न होगी।
असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घण्टो बैठे बीत जायेगा।
‘इसी से तो कहती हूं कि कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन
हरज होगा ! अभी तो परसों गये थे।’
‘तू जो बात नहीं समझती उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई ! मेरी लाठी
दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है, नहीं कहीं पता न लगता किधर गये। गाँव में इतने आदमी तो हैं,
किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँव-तले
अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पावों को सहलाने में ही कुशल है !’
धनिया इतनी व्यवहार-कुशल न थी। उसका विचार था कि हमने जमींदार के खेत जोते
हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे
क्यों सहलाएँ। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी
तरह अनुभव हो गया कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो,
चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो ; मगर लगान बेबाक होना मुश्किल है। फिर
वह भी हार न मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम
छिड़ा रहता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन जिन्दा हैं, एक लड़का
गोबर कोई सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की।
तीन लड़के बचपन ही में मर गए। उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवादारू होती तो वे बच जाते ; पर वह एक धेले की दवा भी न मँगवा सकी थी। उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाँ ही साल तो था ; पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गई थीं। सारी देह ढल गई थी, वह सुन्दर गेहुँआ रंग सँवला
गया था, और आँखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो।
कभी तो जीवन का सुख न मिला। इस चिरस्थाई जीर्णावस्था ने उसके आत्मसम्मान
को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी में पेट की रोटियाँ भी न
मिलें, उसके लिए इतनी खुशामद क्यों ? इस परिस्थिति में उसका मन बराबर
विद्रोह किया करता था, औऱ दो-चार घुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का
ज्ञान होता था।
उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर
सामने पटक दिए। होरी ने उसकी ओर आँखें तेरकर कहा-क्या ससुराल जाना है, जो
पाँचों पोसाक लायी है ? ससुराल में भी तो जवान साली-सरहज नहीं बैठी है,
जिसे जाकर दिखाऊँ।
होरी के गहरे साँवले पिचके हुए चेहरे पर मुस्कुराहट की मृदुता झलक पड़ी।
धनिया ने लजाते हुए कहा-ऐसे ही तो बड़ी सजीले जवान हो कि साली-सरहज
तुम्हें देखकर रीझ जायँगी।
होरी फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा-तो
क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया ? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द
साठे पर पाठे होते हैं।
‘जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते।
दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे ! तुम्हारी दशा
देख-देखकर तो मैं औऱ भी सूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा ?
किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?’
होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गई। लकड़ी
सँभालता हुआ बोला-साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पाएगी धनिया ! इसके पहले
ही चल देंगे।
धनिया ने तिरस्कार किया-अच्छा रहने दो, मत अशुभ मुँह से निकालो। तुमसे कोई
अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।
होरी कन्धे पर लाठी रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर ख़ड़ी उसे देर तक
देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाए हुए ह्रदय में
आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और
व्रत से अपनी पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों
का ब्यूह-सा निकलकर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था। विपन्नता के इस
अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही
थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी, मानो झटका देकर उसके
हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा, बल्कि यथार्थ के निकट होने के
कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गई थी। काना कहने से काने को दुःख होता
है, वह क्या दो आँखों वाले आदमी को हो सकता है ?
होरी कदम बढ़ाये चला जाता था। पगडण्डी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती
हुई हरियाली देखकर उसने मन में कहा-भगवान् कहीं गौ से बरखा कर दें और
डाँड़ी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय जरूर लेगा। देशी गायें न दूध दें, न
उनके बछवे ही किसी के काम हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं,
वह पछाँईं गाय लेगा। उसकी खूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पांच सेर दूध
होगा। गोबर के लिए तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो
फिर कब खायेगा ? साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक हो जाय।
बछवे भी
अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की गोईं न होगी। फिर, गऊ से ही द्वार की
सोभा है। सबेरे-सबेरे गऊ के दर्शन हो जायँ तो क्या कहना ! न जाने कब यह
साध पूरी होगी, कब वह शुभ दिन आयेगा !
हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली
आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी। बैंक सूद
से चैन करके या जमीन खरीदने या महल बनवाने की विशाल आकांक्षाएँ उसके
नन्हें-से-हृदय में कैसे समातीं !
जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने
रजत-प्रताप से तेज प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गर्मी आने
लगी थी। दोनों ओर खेतों में काम करने वाले किसान उसे देखकर राम-राम करते
और सम्मान-भाव से चिलम पीने का निमन्त्रण देते थे ; पर होरी को इतना अवकाश
कहाँ था ? उसके अन्दर बैठी हुई सम्मान-लालसा ऐसा आदर पाकर उसके सूखे मुख
पर गर्व की झलक पैदा कर रही थी।
मालिकों से मिलते-जुलते रहने ही का तो यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते
हैं, नहीं उसे कौन पूछता ? पाँच बीघे के किसान की बिसात ही क्या ? यह कम
आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हलवाले महतो भी उसके सामने सिर झुकाते
हैं।
अब वह खेतों के बीच की पगडण्डी छोड़कर एक खलेटी में आ गया था, जहाँ बरसात
में पानी भर जाने के कारण तरी रहती थी और जेठ में कुछ हरियाली नजर आती थी।
आस-पास के गाँवों की गउएँ यहाँ चरने आया करती थीं। उस समय में भी यहाँ की
हवा में कुछ ताजगी और ठंडक थी। होरी ने दो-तीन साँसे जोर से लीं। उसके जी
में आया, कुछ देर यहीं बैठ जाय। दिन-भर तो लू-लपट में मरना है ही। कई
किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे। अच्छी रकम देते थे ; पर
ईश्वर भला करे राय साहब का जिन्होंने साफ कह दिया यह जमीन जानवरों की चराई
के लिए छोड़ दी गई है औऱ किसी दाम पर न उठायी जाएगी। कोई स्वार्थी जमींदार
होता, तो कहता गायें जायँ भाड़ में, हमें रुपये मिलते हैं, क्यों छोड़ें ?
पर राय साहब अभी तक पुरानी मर्यादा निभाते आते हैं। जो मालिक प्रजा को न
पाले, वह भी कोई आदमी है ?
सहसा उसने देखा, भोला अपनी गायें इसी तरफ आ रहा है। भोला इसी गाँव से मिले
हुए पुरवे का ग्वाला था और दूध-मक्खन का व्यवसाय करता था। अच्छा दाम मिल
जाने पर कभी-कभी किसानों के हाथ गायें बेच भी देता था। होरी का मन उन
गायों को देखकर ललचा गया। अगर भोला वह आगे वाली गाय उसे दे तो क्या कहना !
रुपये आगे-पीछे देता रहेगा। वह जानता था, घर में रुपये नहीं हैं। अभी तक
लगान नहीं चुकाया जा सका, बिसेसर साह का भी देना बाकी है, जिस पर आने
रुपये का सूद चढ़ रहा है ; लेकिन दरिद्रता में जो एक प्रकार की
अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तकाजे, गाली और मार से भी भयभीत
नहीं होती, उसने उसे प्रोत्साहित किया। बरसों से जो साध मन को आन्दोलित कर
रही थी, उसने उसे विचलित कर दिया। भोला के समीप जाकर
बोला—राम-राम
भोला भाई, कहो क्या रंग-ढंग हैं ? सुना है अबकी मेले से नयी गायें लाये हो?
भोला ने रुखाई से जवाब दिया। होरी के मन की बात उसने ताड़ ली
थी—हाँ, दो बछियें और दो गायें लाया। पहले वाली गायें सब सूख गई
थीं। बन्धी पर दूध न पहुँचे तो गुजर कैसे हो ?
होरी ने आगेवाली गाय के पुट्ठे पर हाथ रखकर कहा-दुधार तो मालूम होती है।
कितने में ली ?
भोला ने शान जमायी-अबकी बाजार बड़ा तेज रहा महतो- अस्सी रुपये देने पड़े।
आँखें निकल गईं। तीस-तीस रुपये तो दोनों कलोरों के दिये। तिस पर गाहक
रुपये का आठ सेर दूध माँगता है।
‘बड़ा भारी कलेजा है तुम लोगों का भाई, लेकिन फिर लाये भी तो वह
माल कि यहाँ कि दस-पाँच गावों में तो किसी के पास निकलेगी नहीं।’
भोला पर नशा चढ़ने लगा। बोला—राय साहब इसके सौ रुपये देते थे। दोनों
कलोरों के पचास-पचास रुपये, लेकिन हमने न दिये। भगवान् ने चाहा, तो सौ
रुपये तो इसी ब्यान में पीट लूँगा।
‘‘इसमें क्या सन्देह है भाई ! मालिक क्या खा के लेंगे?
नजराने में मिल जाय, तो भले ले लें। यह तुम ही लोगों का गुर्दा है कि
अँजुली-भर रुपये तकदीर के भरोसे लिख देते हो। यही जी चाहता है कि इसके
दरसन करता रहूँ। धन्य है तुम्हारा जीवन गउओं की इतनी सेवा करते हो ! हमें
तो गाय का गोबर भी मयस्सर नहीं। गिरस्त के घर में एक गाय भी न हो, तो
कितनी लज्जा की बात है। साल-के-साल बीत जाते हैं, गोरस के दरसन नहीं होते।
घरवाली बार-बार कहती है, भोला भैया से क्यों नहीं कहते ? मैं कह देता हूँ,
कभी मिलेंगे तो कहूँगा। तुम्हारे सुझाव से बड़ी परसन होती है। कहती है,
ऐसा मर्द ही नहीं देखा कि जब बातें करेंगे, नीची आंखें करके, कभी सिर नहीं
उठाते।’
भोला पर जो नशा चढ़ रहा था, उसे इस भरपूर प्याले ने और गहरा कर दिया।
बोला-आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट
किसी मेहरिया की तरफ ताके, उसे गोली मार देना चाहिए।
‘यह तुमने लाख रुपये की बात कह दी भाई ! बस सज्जन वही, जो
दूसरों की आबरू को अपनी आबरू समझे।’
‘जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत
के
मर जाने पर मर्द के हाथ-पाँव टूट जाते हैं। मेरा तो घर उजड़ गया महतो, कोई
एक लोटा पानी देने वाला भी नहीं।’
गत वर्ष भोला की स्त्री लू लग जाने से मर गई थी। यह होरी जानता था, लेकिन
पचास बरस का खंखल भोला भीतर से इतना स्निग्ध है, वह न जानता था। स्त्री की
लालसा उसकी आंखों में सजल हो गई। होरी को आसन मिल गया। उसकी व्यावहारिक
कृषक-बुद्धि सजग हो गई।
‘पुरानी मसल झूठी थोड़ी है-बिन घरनी का घर भूत का डेरा। कहीं
सगाई क्यों नहीं ठीक कर लेते ?’
‘ताक में हूँ महतो, पर कोई जल्दी फँसता नहीं। सौ-पचास खरच करने
को भी तैयार हूँ। जैसी भगवान की इच्छा।’
‘अब मैं फिकर में रहूँगा। भगवान् चाहेंगे , तो जल्दी घर बस
जायेगा।’
‘बस, यही समझ लो कि उबर जाऊँगा भैया ! घर में खाने को भगवान का
दिया
बहुत है। चार पसेरी दूध हो जाता है, लेकिन किस काम का ?’
‘मेरे ससुराल में एक मेहरिया है। तीन-चार साल हुए, उसका आदमी
उसे
छोड़ कलकत्ता चला गया। बेचारी पिसाई करके गुजर कर रही है। बाल-बच्चा भी
कोई नहीं। देखने-सुनने में अच्छी है। बस, लक्ष्मी समझ लो।’
भोला का सिकुड़ा हुआ चेहरा चिकना हो गया। आशा में कितनी सुधा है ! बोला अब
तो तुम्हारा ही आसरा है महतो ! छुट्टी हो तो चलो एक दिन देख आयें।
‘मैं ठीक-ठाक करके तब तुमसे कहूंगा। बहुत उतावली करने से काम
बिगड़ जाता है।’
जब तुम्हारी इच्छा हो तब चलो। उतावली काहे की ? इस कबरी पर मन ललचाया हो,
तो ले लो।’
‘यह गाय मेरे मान की नहीं है दादा। मैं, तुम्हें नुकसान नहीं
पहुँचाना चाहता। अपना धरम यह नहीं कि मित्रों का गला दबाएँ। जैसे इतने दिन
बीते हैं, वैसे और भी बीत जाएँगे।’
‘तुम तो ऐसी बातें करते हो होरी, जैसे हम-तुम दो हैं। तुम गाय
ले
जाओ, दाम जो चाहे देना। जैसे मेरे घर रही, वैसे तुम्हारे घर रही। अस्सी
रुपये में ली थी, तुम अस्सी रुपये ही देना। जाओ।’
‘लेकिन मेरे पास नगद नहीं हैं दादा समझ लो।’
‘ तो तुमसे नगद माँगता कौन है भाई ?’
होरी की छाती गज-भर की हो गई। अस्सी रुपये में गाय मँहगी न थी। ऐसा अच्छा
डील-डौल, दोनों जून में छ:-सात सेर दूध, सीधी ऐसी कि बच्चा भी दुह ले।
इसका तो एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा। द्वार पर बँधेगी तो द्वार की शोभा बढ़
जायेगी। उसे अभी कोई चार सौ रुपये देने थे ; लेकिन उधार को वह एक तरह से
मुफ्त समझता था ! कहीं भोला की सगाई ठीक हो गई, तो साल-दो-साल तो वह
बोलेगा भी नहीं। सगाई न भी हुई, तो होरी का क्या बिगड़ता है। यही तो होगा,
भोला बार-बार तगादा करने आयेगा, बिगड़ेगा, गालियाँ देगा। लेकिन होरी को
इसकी ज्यादा शर्म न थी। इस व्यवहार का वह आदी थी। कृषक के जीवन का तो यह
प्रसाद है। भोला के साथ वह छल कर रहा था और यह व्यापार उसकी मर्यादा के
अनुकूल था। अब भी लेन-देन में उसके लिए लिखा-पढ़ी होने और न होने में कोई
अन्तर न था। सूखे बूड़े की विपदाएँ उसके मन को भीरु बनाये रहती थीं। ईश्वर
का रौद्र रूप सदैव उसके सामने रहता था। पर यह छल उसकी नीति में छल न था।
यह केवल स्वार्थ-सिद्धि थी और यह कोई बुरी बात न थी। इस तरह का छल वह
दिन-रात करता रहता था। घर में दो-चार रुपये पड़े रहने पर भी महाजन के
सामने कसमें खा जाता था कि एक पाई भी नहीं है। सन को कुछ गीला कर देना और
रुई में कुछ बिनौले भर देना उसकी नीति में जायज था। औऱ यहाँ तो केवल
स्वार्थ न था, थोड़ा-सा मनोरंजन भी था। बुड्ढों का बुढ़भस हास्यास्पद
वस्तु है और ऐसे बुड्ढों से अगर कुछ ऐंठ भी लिया जाए, तो कोई दोष-पाप नहीं।
भोला ने गाय की पगहिया होरी के हाथ में देते हुए कहा- ले जाओ महतो, तुम भी
याद करोगे। ब्याते ही छ:सेर दूध ले लेना। चलो, मैं तुम्हारे घर तक पहुँचा
दूँ। साइत तुम्हें अनजान समझकर रास्ते में कुछ दिक करे। अब तुमसे सच कहता
हूँ, मालिक नब्बे रुपये देते थे, पर उनके यहाँ गउओं की क्या कदर। मुझसे
लेकर हाकिम-हुक्काम को दे देते। हाकिमों को गऊ की सेवा से मतलब ? वह तो
खून-चूसना-भर जानते हैं। जब तक दूध देती, रखते, फिर किसी के हाथ बेच देते।
किसके पल्ले पड़ती, कौन जाने। रुपया ही सब कुछ नहीं है भैया, कुछ अपना धरम
भी तो है। तुम्हारे घर आराम से रहेगी तो। यह न होगा कि तुम आप खाकर सो रहो
और गऊ भूखी खड़ी रहे। उसकी सेवा करोगे, चुमकारोगे। गऊ हमें आसिरवाद देगी।
तुमसे क्या कहूँ भैया, घर में चंगुल-भर भूसा नहीं रहा। रुपये सब बाजार में
निकल गए। सोचा था, महाजन से कुछ भूसा ले लेंगे ; लेकिन महाजन का पहला ही न
चुका। उसने इनकार कर दिया। इतने जानवरों को क्या खिलाएँ, यही चिन्ता मारे
डालती है। चुटकी-चुटकी-भर खिलाऊँ, तो मन-भर रोज का खरच है। भगवान ही पार
लगाएँ तो लगे।
होरी ने सहानुभूति के स्वर में कहा-तुमने हमसे पहले क्यों नहीं कहा ? हमने
एक गाड़ी भूसा बेच दिया।
भोला ने माथा ठोककर कहा-इसीलिए नहीं कहा भैया, कि सबसे अपना दुःख क्यों
रोऊँ। बाँटता कोई नहीं, हँसते सब हैं। जो गायें सूख गई हैं, उनका गम नहीं,
पत्ती-पत्ती खिलाकर जिला लूँगा ; लेकिन अब यह तो रातिब बिना नहीं रह सकती।
हो सके, तो दस-बीस रुपये भूसे के लिए दे दो।
किसान पक्का स्वार्थी होता है, इसमें सन्देह नहीं। उसकी गाँठ से रिश्वत के
पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते हैं, भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज
की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घंटों चिरौरी करता है, जब तक
पक्का विश्वास न हो जाए, वह किसी के फुसलाने में नहीं आता, लेकिन उसका
सम्पूर्ण जीवन प्रकृति में स्थायी सहयोग है। वृक्षों में फल लगते हैं,
उन्हें जनता खाती है ; खेती में अनाज होता है, वह संसार के काम आता है ;
गाय के थन में दूध होता है, वह खुद पीने नहीं जाती, दूसरे ही पीते हैं ;
मेघों से वर्षा होती है, उससे पृथ्वी तृप्त होती है। ऐसी संगति में
कुत्सित स्वार्थ के लिए कहाँ स्थान ? होरी किसान था और किसी के जलते हुए
हाथ में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था।
भोला की संकट-कथा सुनते ही उसकी मनोवृत्ति बदल गई। पगहिया को भोला के हाथ
में लौटाता हुआ बोला-रुपये तो दादा मेरे पास नहीं हैं। हाँ, थोड़ा-सा भूसा
बचा है, वह तुम्हें दूँगा। चलकर उठवा लो। भूसे के लिए तुम गाय बेचोगे, और
मैं लूँगा ! मेरे हाथ न कट जाएँगे ?
भोला ने आर्द्र कंठ से कहा-तुम्हारे बैल भूखों न मरेंगे ! तुम्हारे पास भी
ऐसा कौन-सा भूसा रखा है।
‘नहीं दादा, अबकी भूसा अच्छा हो गया था।’
‘मैंने तुमसे नाहक भूसे की चर्चा की।’
‘तुम न कहते और पीछे से मुझे मालूम होता, तो मुझे बड़ा रंज होता
कि
तुमने मुझे इतना गैर समझ लिया। अवसर पड़ने पर भाई की मदद भाई भी न करे, तो
काम कैसे चले !’
‘मुदा यह गाय तो लेते जाओ।’
‘अभी नहीं दादा, फिर ले लूँगा।’
‘तो भूसे के दाम दूध में कटवा लेना।’
होरी ने दुःखित स्वर में कहा-दाम-कौड़ी की इसमें कौन बात है दादा, मैं एक
दो जून तुम्हारे घर खा लूँ तो तुम मुझसे दाम माँगोगे ?
‘लेकिन तुम्हारे बैल भूखों मरेंगे कि नहीं ?’
‘भगवान कोई-न-कोई सबील निकालेंगे ही। आसाढ़ सिर पर है। कड़वी बो
लूँगा।’
‘मगर यह गाय तुम्हारी हो गई जिस दिन इच्छा हो, आकर ले
जाना।’
‘किसी भाई का नीलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है, वह इस
समय तुम्हारी गाय लेने में है।’
होरी में बाल की खाल निकालने की शक्ति होती, तो वह खुशी से गाय लेकर घर की
राह लेता। भोला जब नकद रुपये नहीं माँगता, तो स्पष्ट था कि वह भूसे के लिए
गाय नहीं बेच रहा है, बल्कि इसका कुछ और आशय है ; लेकिन जैसे पत्तों के
खड़कने पर घोड़ा अकारण ही ठिठक जाता है और मारने पर भी आगे कदम नहीं
उठाता, वही दशा होरी की थी। संकट की चीज लेना पाप है, यह बात
जनम-जन्मांतरों से उसकी आत्मा का अंश बन गई थी।
भोला ने गद्गद कंठ से कहा-तो किसी को भेज दूँ भूसे के लिए ?
होरी ने जवाब दिया-अभी मैं राय साहब की ड्योढ़ी पर जा रहा हूँ। वहाँ से
घड़ी-भर में लौटूँगा, तभी किसी को भेजना।
भोला की आँखों में आँसू भर आये। बोला-तुमने आज मुझे उबार लिया होरी भाई !
मुझे अब मालूम हुआ कि मैं संसार में अकेला नहीं हूँ। मेरा भी कोई हितू है।
एक क्षण के बाद उसने फिर कहा-उस बात को भूल न जाना।
होरी आगे बढ़ा, तो उसका चित्त प्रसन्न था। मन में एक विचित्र स्फूर्ति हो
रही थी। क्या हुआ, दस-पाँच मन भूसा चला जायेगा, बेचारे को संकट में पड़कर
अपनी गाय तो न बेचनी पड़ेगी। जब मेरे पास चारा हो जायेगा, तब गाय खोल
लाऊंगा। भगवान करें, मुझे कोई मेहरिया मिल जाए। फिर तो कोई बात ही नहीं।
उसने पीछे फिरकर देखा। कबरी गाय पूँछ से मक्खियाँ उड़ाती, सिर हिलाती,
मस्तानी, मन्द-गति से झूमती चली जाती थी, जैसे बाँदियों के बीच में कोई
रानी हो। कैसा शुभ होगा वह दिन जब यह कामधेनु उसके द्वार बँधेगी !
सेमरी और बेलारी, दोनों अवध-प्रान्त के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की
कोई जरूरत नहीं। होरी बिलारी में रहता है, रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में।
दोनों गाँव में केवल पाँच मील का अन्तर है। पिछले सत्याग्रह संग्रम में
रायसाहब ने बड़ा यश कमाया था। कौंसिल की मेम्बरी छोड़कर गाँव चले गये थे।
तब से उनके इलाके में असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गई थी। यह नहीं कि
उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और
बेगार की कड़ाई कुछ कम हो ; मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी।
रायसाहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था। वह बेचारे तो उसी व्यवस्था
के गुलाम थे। जाब्ते का काम तो जैसा होता चला आया है, वैसा ही होगा।
रायसाहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी, इसलिए आमदनी और अधिकार
में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था। असामियों से
वह हँसकर बोल लेते थे। यही क्या कम है ? सिंह का काम तो शिकार करना है ;
अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे
मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में भटकना न पड़ता।
राय साहब राष्ट्रवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाये रखते थे। उनकी
नजरें और डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियाँ जैसी की तैसी चली आती थीं।
साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौकीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे
लेखक, अच्छे निशानेबाज। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे ! मगर
दूसरी शादी न की थी। हँस-बोलकर अपने विधुर जीवन को बहलाते थे।
होरी ड्योढ़ी पर पहुँचा तो देखा, जेठ के दशहरे के अवसर पर होनेवाले धनुष
यज्ञ की बड़ी जोरों से तैयारियाँ हो रही हैं ; कहीं रंग-मंच बन रहा था,
कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्यगृह, कहीं दूकानदारों के लिए दुकानें।
धूप तेज हो गई थी ; पर राय साहब खुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से
सम्पत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पाई थी और धनुष-यज्ञ को
नाटक का रूप देकर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था। इस अवसर पर उनके
यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमन्त्रित होते थे। और दो-तीन दिन इलाके
में बड़ी चहल-पहल रहती थी। राय साहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ
सरदार एक साथ भोजन करते थे। कई चचा थे। दरजनों चचेरे भाई, कई सगे भाई,
बीसियों नाते के भाई। एक चचा साहब राधा के अनन्य उपासक थे और बराबर
वृंन्दावन में रहते थे। भक्ति-रस के कितने ही कवित्त रच डाले थे और
समय-समय पर उन्हें छपवाकर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चचा था,
जो राम के परम भक्त थे और फारसी भाषा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे।
रियासत से सबके वसीके बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की जरूरत न थी।
होरी मंडप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा
रायसाहब उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले-अरे ! तू आ गया होरी, मैं तो
तुझे बुलानेवाला था। देख, अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। समझ
गया न, जिस वक्त श्री जानकी जी मन्दिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक्त
तू एक गुलदस्ता लिए खड़ा रहेगा और जानकीजी को भेंट करेगा, गलती न करना
देख, असामियों से ताकीद करके कह देना कि सब-के-सब शगुन करने आएँ। मेरे साथ
कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।
वह आगे-आगे कोठी की ओऱ चले, होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की
छाया में एक कुर्सी पर बैठ गये और होरी को जमीन पर बैठने का इशारा करके
बोले-समझ गया, मैंने क्या कहा। कारकुन को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही
; लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन नहीं सुनता।
हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हजार का प्रबन्ध करना है। कैसे होगा,
समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना
दुखड़ा ले बैठे। किससे अपने मन की कहूँ ? न जाने क्यों, तुम्हारे ऊपर
विश्वास होता है। इतना जानता हूँ कि तुम मन में मुझ पर हँसोगे नहीं। और
हँसो भी, तो तुम्हारी हँसी मैं बरदाश्त कर सकूँगा। नहीं सह सकता उनकी
हँसी, जो अपने बराबर के हैं, क्योंकि उनकी हँसी में ईर्ष्या, व्यंग और जलन
है। औऱ वे क्यों न हँसगे ? मैं भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर
हँसता हूँ, दिल खोलकर, तालियाँ बजाकर। सम्पत्ति सह्रदयता में बैर है।
हम
भी दान देते हैं, धर्म करते हैं। लेकिन जानते हो ? क्यों ? केवल अपने
बराबरवालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है,
विशुद्ध अहंकार। हममें से किसी पर डिग्री हो जाए, कुर्की आ जाए, बकाया
मालगुजारी की इल्लत में हवालात हो जाए, किसी का जवान बेटा मर जाए, किसी की
विधवा बहू निकल जाए, किसी के घर में आग लग जाए, कोई वैश्या के हाथों उल्लू
बन जाए, या अपने असामियों के हाथों पिट जाए, तो उसके और सभी भाई उस पर
हँसेंगे, बगलें बजाएँगे, मानो सारे संसार की सम्पदा मिल गई है। और मिलेंगे
तो इतने प्रेम से, जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हैं। अरे,
और तो औऱ, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत
मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर कर रहे हैं और जुए खेल रहे हैं, शराब पी रहे
हैं और ऐयाशी कर रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, आज मर जाऊं तो घी के
चिराग जलाएँ। मेरे दुःख को दुःख समझने वाला कोई नहीं। उनकी नजरों में मुझे
दुखी होने का कोई अधिकार ही नहीं है। मैं अगर होता हूँ, तो दुःख की हँसी
उड़ाता हूँ। अगर मैं बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है। मैं अगर अफना
ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता, तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है ; अगर
ब्याह कर लूँ, तो वह विलासांधता होगी। अगर शराब नहीं पीता तो मेरी कंजूसी
है। शराब पीने लगूँ, तो वह प्रजा का रक्त होगा। अगर ऐयाशी नहीं करता, तो
अरसिक हूँ, ऐयाशी करने लगूँ, तो फिर कहना ही क्या ! इन लोगों ने मुझे
भोग-विलास में फँसाने के लिए कम चालें नहीं चलीं और अब तक चलते हैं। उनकी
यही इच्छा है कि मैं अन्धा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म
यह है कि सब कुछ देखकर भी कुछ न देखूँ। सब कुछ जानकर भी गधा बना रहूँ।
राय साहब ने गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दो बीड़े पान खाए और होरी के मुँह
की ओर ताकने लगे, जैसे उसके मनोभावों को पढ़ना चाहते हों।
होरी ने साहस बटोरकर कहा-हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती
हैं, पर जान पड़ता है, बड़े आदमियों में भी उनकी कमी नहीं है।















