Ek Dil Hazar Afsane - A Hindi Book by - Amritlal Nagar - एक दिल हजार अफसाने - अमृतलाल नागर
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Ek Dil Hazar Afsane

एक दिल हजार अफसाने

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अमृतलाल नागर<<आपका कार्ट
मूल्य$ 30.95  
प्रकाशकराजपाल एंड सन्स
आईएसबीएन9788170286271
प्रकाशितअप्रैल १९, २०१०
पुस्तक क्रं:1424
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Ek Dil Hazar Afsane

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘एक दिल हजार अफसाने’ सुख्यात कथाकार अमृतलाल नागर की 75 मर्मस्पर्शी और सशक्त कहानियों का संग्रह है। इस संग्रह में एक विशिष्टता यह है कि इसमें रचनाकार की सारी कहानियाँ एक साथ प्रस्तुत हैं।

भूमिका

बचपन का ज़माना था। एक था मैं और एक था मेरा अकेलापन। मैं तो नासमझी के आकाश में समझ की पतंग उड़ाना सीख रहा था और मेरा अकेलापन तरह-तरह से अपने सूने खानों से भरकर अपना जी बहला रहा था। मेरे पितामह बैंक के मैनेजर थे। कोठी के पिछले हिस्से में बैंक था आगे वाले भाग में हमारा निवास। बड़ों से भरा घर, दिन भर आने-जाने वाले लोगों की बड़ी उम्रों के, कोठी के सामने की चलती सड़क और कोठी के निचले भाग में बनी सब्जी बेचने वाले कबड़ियों की दुकानें, कबड़ियों की आपसी लड़ाइयों का सिलसिला तो चलता ही रहता था, सबेरे ग्रहकों के साथ उनकी कहा सुनी भी मेरे अकेले पन को अक्सर ऐसी लुभाती थी कि मैं उसके बहकावे में आकर अपनी आरम्भिक शिक्षा का होमवर्क (जिसमें रटाई ही विशेष होती थी) छोड़कर छज्जे पर जा खड़ा होता, जिसकी वजह से अक्सर कान भी खींचे जाते। मेरा अकेलापन एक ऐसा बैंक बन गया था जिसमें तरह-तरह की चाल-ढाल, बोलचाल के लहजे, मुहावरे, गालियां, असंख्य दृश्य और अनबूझी-सी अनुभूतियां, चेहरे और आवाजें जमा होती रहती थी। नित्य रात को दादी से राजा–रानियों की कहानियां तो सौभाग्य से कई वर्षों तक सुनीं, लेकिन कल्पना शक्ति को बढ़ावा देने का श्रेय ठाकुर चौकीदार से सुनी हुई कहानियों को दूँगा, जिनकी लड़ाइयों की कल्पनायें करते-करते इतना तन्मय हो जाता था कि प्रायः रातों की नींद ही गायब हो जाती थी।

बैंक की कोठी के सामने सड़क के पार बने विशाल कंपनी बाग में रात के समय सियार बहुत बोलते थे। उनकी ‘हुक्का हुआ’ के सम्बन्ध में बूढ़े नौकर मातादीन से सुना कि वहां पहले चांदी बाज़ार था। इस्माइल खां का बाज़ार था, लाल मण्डी की घनी आबादी थी। गदर में अंग्रेजों ने सबके घर खुदवा दिए। जो मरे उनके परेत हुंकारते हैं यह सियारों का हुक्का हुआ नहीं वरन् शहीदों की हुंकारे हैं—इस बात ने मेरी कल्पनाशक्ति और अकेलेपन को बहुत भरा। पहले मेरा अकेलापन अपने मन बहलाव के लिए देखी-सुनी बातों या लोगों की चाल-ढाल की नकलें ही कर पाता था, लेकिन बाद में गदर की काल्पनिक मार-काट और वीरता भरे कारनामों की नकलें भी करने लगा।

मेरे पिता स्व. राजारामजी और उनके मित्रगण लखनऊ में शौकिया हिन्दी रंग मंच के नायकों में थे। उनके नाटकों से प्रेरणा से इन नक़लों में अकबक डायलॉग भी जुड़ने लगे। इसके बाद जब मैं प्राइमरी स्कूल में जाने लायक हुआ और घर में आने वाली ‘सरस्वती’ और ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिकाएं भी पढ़ने लगा तब मेरा अकेलापन संन्यास लेकर और अपने अनुभवों का गुप्त ख़जाना मेरे को विरासत में देकर दूर हुआ। मेरी अनाप-सनाप पढ़ाई ने कल्पना-पंछी को विचारों के अनाप-सनाप पंख लगाने की चेष्टाएं शुरू कर दीं। इस तरह मेरा रचनाकार भीतर दर भीतर तहों में ढलते-ढलते उस अवसर की तलाश में गूंगे जैसी चुप्पी साधे रहा जब उसे बेबस हो खुद ब खुद बंद कली की तरह फूट कर खिलना पड़ता था। यह कली चिटकी लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में निकले उस विशाल जुलूस में, जिसके अगुवा उस समय के ‘युवा हृदय सम्राट’ जवाहर लाल नेहरू और पं. गोविन्दवल्लभ पंत थे। रचना के बिरवे में पहली कली चिटकी तो तुकबंदी के रूप में ही।

और यह तुकों और मात्राओं की कवायद साल-छह महीने आगे तक चलती भी रही, परन्तु जल्द ही मेरा कवि कहानीकार बन कर असली रूप पा गया। इसमें मेरी कलप्ना-शक्ति और रचनात्मक वृत्ति को दौड़ना अधिक सुहाया। इस तरह मैंने अपने कहानीकार को जाना। कहानियां पढ़ने की ललक भी बढ़ी। तब तक हिन्दी और बंगला तथा अंग्रेजी कहानियों के हिन्दी अनुवाद ही पढ़े थे, मगर अब अंग्रेजी भी पढ़ना शुरू किया। शरद बाबू और प्रेमचंदजी के दो वाक्य मेरे लिए मंत्र बन गये। शरद बाबू ने कहा, जो लिखो, वह अनुभव से लिखो।’ प्रेमचन्दजी ने मेरी शुरू की कहानियां देख कर लिखा कि तुमसे रियलिस्टिक कहानियां चाहता हूं। अनुभवों को पहचानने और रियलिज्म यानी यथार्थ की समझ पाने के मनोसंघर्ष में मेरी बेतहासा दौड़ती हुई नौजवान कलम ने लम्बी चुप्पी साध ली। अचनाक पढ़ते समय तोल्सतोय (जिन्हें अंग्रेज़ी जमाने में सब टालस्टाय कहते थे) का एक वाक्य जो शायद इस प्रकार था कि—‘‘पहले यह मानना बन्द कर दो कि कला महज आनन्द देने के साधन हैं। इसे इंसानी जीवन की एक शर्त मानो। इस बात ने मेरे 18-20 वर्षों से मड़ते-घुमड़ते नाबालिग कहानीकार को सहसा बालिग बना दिया।

तोल्सतोय़ मानते थे कि कला एक इंसानी क्रिया है। एक जागरुक कलाकर अपने जीवन की अनुभूतियों को दूसरों तक पहुंचाता है और अपने ही जैसा उसे भी प्रभावित करता है। कहानी, उपन्यास या नाट्य लेखन की कलायें पंडिताऊ शास्त्र नहीं, भले ही इन ललित कलाओं पर शास्त्र लिखा जा सकता हो। इस तरह मैंने यह समझ पाई कि कहानी को धनुष बनाकर अपनी बात का तीर इस तरह चलाना चाहिये कि दिल की बात दिल में जा चुभे।
एक साधारण सी बात भी कभी किसी रचनाकार की संवेदना के झीने से झीने परदे तक हिला जाती है। वह उन्हें लिखने बैठ जाता है। उन अनुभूतियों को जहां तक संभव हो उसी ताजगी के साथ अंकित कर देना मेरी दृष्टि में कहानीकार का खास काम है। यही रचनाकार की वह मानवीय प्रक्रिया है जो लेखक से पाठकों के दिलों को जोड़ती है। मैं छोटी कहानी लिखूं या बड़ी अथवा उपन्यास, कहानी के ढांचे को मुख्यतः उसके चरित्रों के नातों से आगे बढ़ाता हूं। पात्र आपसी रिश्तों के कारण ही कहानी की घटनाएं बनाते हैं, घटनाएं बाहर की भी होती हैं और मन के भीतर की भी। चरित्र चित्रण के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाता हुआ इन घटनाभूतियों के क्रम को मैं स्वंय चरित्रों के मनोनुकूल होकर ही आगे बढ़ाता हूँ, अपनी कल्पनात्मक सनकों को चरित्रों पर आरोपित नहीं करता।

यह आरोपण करने की वृत्ति लेखक की खोखली अहंमन्यता ही सिद्ध होती है जो उसके अपने कलात्मक सौन्दर्य की थाह लेने से रोक देती है। व्यक्ति का खोखला अहं स्वयं अपने ही सृजनात्मक अहं का शत्रु बन जाता है। जैसे मैं अपनी रचना प्रक्रिया में पाठकों को नहीं भुलाता वैसे ही स्वयं अपने को भी सही ढंग से बराबर याद रखने की कोशिश करता हूँ क्योंकि रचना केवल पाठक की अनुभूतियों को ही प्रभावित नहीं करती, वैसे उनका पहला प्रभाव स्वयं कहानी लेखक पर पड़ता है। इसलिए मैंने यह क्रमशः जाना कि कहानी रचना एक ऐसी मानवीय आवश्यकता है जो लेखक को पाठक से अलग नहीं रखती। मेरी दृष्टि में यह स्वान्तः सुखाय लेखन हो जाता है, क्योंकि इस रचना प्रक्रिया से मेरा रचनाकार विश्वात्मा से मेरा योग कराता है, वह उत्तरोत्तर विराट और व्यापक बनाता है। मेरी विनम्र मति के अनुसार किसी भी कला का यही उद्देश्य होना चाहि। मेरी यह मान्यता कहानी रचते-रचते ही बनी।

सन् ’36-37 के लगभग एक अफ़ीमची किस्सागो हफ्ते में दो बार मेरे यहां नियमित रूप से आते थे। वह और उनके पूर्वज पेशेवर किस्सागो थे। उर्दू न जाने की अपनी कमजोरी को मैं बूढ़े दोस्त नब्बू मियाँ की सहायता से दूर करने की कोशिश किया करता था। वह दिन के भरे उजाले में भी यह शेर पढ़कर अपना किस्सा आरम्भ करते थे कि—‘‘जागता है खुदा और सोता है आलम’’...उस कविता में वह यह भी कह देते थे कि सुनी हुई कह रहा हूं सच का गुमान नहीं है, मेरे शब्द भी मीठे नहीं हैं फिर भी किस्सा सच्चा और मीठा होता है। मैंने उनसे ‘अलिफलैला की कहानियां’ सुनीं, बाद में ‘तिलिस्म-स्होश रुबा’ सरशार की ‘फिसानए आज़ाद’, ‘सैर कोहसार’, ‘किस्सा गुल बकावली’, ‘जहरे इश्क’ और भी बहुत कुछ सुना। किस्सागोई के फन में सुनने वाले की रुचि का ख़याल बहुत किया जाता है। लेकिन यह रुचि केवल रईसों और नवाबों की रुचियां ही हुआ करती थीं, क्योंकि किस्से सुनाने की नौकरी उन्हीं से मिलती थी।

लेकिन मेरा मालिक आम पाठक था जिसमें अमीर भी थे और गरीब भी, इसलिए किस्सागोई की रुचि को मैंने जन रुचि और जनहित का हिस्सा बनाकर ही पेश करने की कोशिश की है। प्रेमचन्द ने पुराने किस्सागोई के फन को आधुनिकता का जामा पहनाकर शायद यही काम किया और सफलता भी पाई। चेखोव की कहानियों और ओ. हेनरी की कुछ कहानियों ने भी मुझे प्रभावित किया और मैंने यह सीखा कि कला का विकास उसके अपने मूलभूत गुण और सौन्दर्य की दृष्टि से होना चाहिये, पर यह सब बातें मिलकर जब तक मानव के जीवन के सुख-दुख से नहीं जुड़ती तब तक पत्थर की मूर्तियों की तरह सुन्दर लग कर भी निष्प्राण ही रहती हैं। कहानी में पात्र और उसके परिवेश का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध मेरे मन में इसी प्रकार उद्घाटित हुआ और इसे मैंने आज तक न छोड़ा है और न घटाया ही है। व्यक्ति हो या देशकाल, अपने परिवेश से अलग रख कर उन्हें कदापि नहीं देखा जा सकता। व्यक्ति कितना ही व्यक्तिवादी क्यों न हो, उसकी भावनाओं, चिंतन और कर्मों पर समाज की छाप पड़े बिना रह नहीं सकती। सुप्रसिद्ध लेखक और मेरे आदरणीय अग्रज स्वर्गीय भगवताचरण जी वर्मा अकसर निःसंकोच भाव से यह कहा करते थे कि मुझे कहानी या उपन्यास लिखने की प्रेरणा तभी मिलती है जब कहीं से पैसा मिलता है। उनकी ईमानदारी के प्रति आदर होने के बावजूद मुझे यह बात कभी उचित नहीं लगी। लिखना सर्जक मन की अपनी मज़बूरी होती है। मैंने अपनी मनःतरंगों से मज़बूर होकर लिखा है और फिर उन्हें कहीं न कहीं छपवाकर पैसे भी कमाये हैं, साथ ही सम्पादकों के आग्रहवश यानी पैसे कमाई के लिए लोभ में आकर भी लिखा है।

जब लेखन ही जीविका का साधन बना लिया तो यह करना ही पड़ेगा। लेकिन दोनों प्रकार की मनःस्थितियों में लिखने बैठकर वस्तुतः मैं अपने मन की प्रेरणा से ही प्रेरित हुआ हूं। यह सच है कि मैं या कोई भी रचनाधर्मी कलाकार अकसर अपनी अभिव्यक्तियों को रूप देने में आलस्य करता है और उसे कोई न कोई लालच ही रचना करने के लिए मजबूर करता है। पैसा या आजीविका चूंकि एक बड़ा लालच है इसलिए उसकी मज़बूरी को तो मान्यता देनी ही होगी, परन्तु इस मज़बूरी के बावजूद उसकी रचनाधर्मिता की मज़बूरी को ही मुख्य मानता हूं। आजीविका और जीवन के प्रति उत्तरदायित्व इन दो बातों ने मेरी चिन्तन चक्की को खूब चला दिया यह स्वीकार करते हुए भी अपनी उस अनवरत चिन्तन क्रिया को ही महत्त दूंगा, वह चिंतन क्रिया ही विविध विषयों की रचना प्रक्रिया के पीछे शक्ति बनकर समाई है।

आज से 60-70 बरस पहले जमी-जमायी सरकारी नौकरी छोड़कर मुन्शी प्रेमचन्द ने स्वतन्त्र रूप से अपनी चिन्तन क्रिया और तद्विषयक रचना प्रक्रिया को निरन्तर जारुकता देने के लिये स्वतन्त्र लेखन कार्य आरंभ किया था। इसमें तनिक भी शक नहीं कि अपनी हर कहानी या उपन्यास से उन्होंने थोड़े या बहुत पैसे ज़रूर कमाये। एक मनुष्य के नाते परिवार के प्रति अपने उत्तदायित्व को स्वकर्म करते हुए ही निबाहा पर स्वर्गीय भगवतीबाबू, स्व. यशपाल जी और मैं तीनों ही स्वतन्त्र रचनाधर्मी रहे। अपने-अपने जीवनों के किसी न किसी समय को हमने बेहद तंगियों से गुज़ारा मगर जिस रचना धर्मिता ने ही अपनी आस्था और हठ देकर हमें जिलाया उस धर्म का पूरी तरह अर्थ प्राप्ति के लोभ के आधीन होना मैं गले-गले गंगा में खड़े होकर भी हरगिज़ नहीं मानूंगा। केवल ‘मेड टू आर्डर’ रचनाएं भी मैंने बेहद तंगहाली में अवश्य की हैं, परन्तु ऐसे रचनाएं मैंने इस संग्रह में प्रायः सम्मिलित नहीं की हैं। हां कुछ एक ऐसी रचनाएं, जिन्हें लिखा तो निश्चय ही अर्थप्राप्ति के लिए था किंतु जब लिखने बैठा तो पैसा मेरे ध्यान से गायब हो गया, मैंने इस संग्रह में अवश्य जोड़ी हैं। उदाहरणार्थ ‘डोल’- जिसके कुछ वाक्य किसी के मुख से सुनकर उन्हें कहानी में ढालने की इच्छा पहले ही हो चुकी थी परन्तु आलस्यवश उसे नहीं लिखा था, सहसा अर्थलाभ का आमंत्रण पाकर फूट पड़ा। ऐसी ही दो-चार रचनाएं इस संग्रह में और भी हैं।

योग्य सम्पादक ने इन कहानियों को शैली और शिल्प के हिसाब से वर्गीकृत करके इस संग्रह में सम्मिलित किया है। उनके इस कार्य में मैंने भी अपनी राय की मोहर लगा दी। शायद यह बुरा नहीं हुआ। इस संग्रह की अधिकांश कहानियों ने पाठकों और सोध छात्रों के प्रशंसात्मक सर्टिफिकेट भी पाए हैं। मेरी कहानियां आमतौर से उस प्रकार की अधिक चर्चा का विषय नहीं बनीं जैसे मेरे उपन्यास बनें। सम्भव है संग्रह के कारण कोई परखैया इनका भी उचित मूल्यांकन कर सके।

अमृतलाल नागर

प्रायश्चित


जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन।
इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलुपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, और इस प्रकार अपने जीवन को दो कौड़ी का बनाकर पतन के खड्ड में गिर जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकाला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।

मणिधर सुन्दर युवक था। उसके (जेब) पर्स में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया—दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बाकीं झाकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यन्त निर्दयता के साथ गला घोंट डाला गया। बनावटी रूप के बाज़ार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया।
पिता से पैसा मांगता था वह, अनाथालयों में चन्दा देने के बहाने और उसे आंखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में।

ऐसी निराली थी उसकी लीला।
पंडित जी वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे।
किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे तथा नित्यप्रति पाठ सुनकर प्रत्येक को पारितोषिक प्रदान करते थे। बालिकाएं भी उनसे अत्यन्त हिल-मिल गई थीं। उनके संरक्षक गण भी पंडित जी की वात्सल्यता देख गद्गद्ग हो जाते थे। घरवालों के बाद पंडित जी ही अपनी छात्राओं के निरीक्षक थे, संरक्षक थे। बालिकाएं इनके घर जातीं, हारमोनियम बजातीं, गातीं, हंसतीं, खेलती, कूदतीं थीं। पंडितजी इससे गद्गद्ग हो जाते थे तथा बाहरवालों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुआ कहा करते, ‘‘इन्हीं लड़कियों के कारण मेरा बुढ़ापा कटता चला जा रहा है। अन्यथा अकेले तो इस संसार में मेरा एक दिवस भी काटना भारी पड़ जाता।’’
समस्त संसार पंडितजी की एक मुंह से प्रशंसा करता था।

बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुन्दर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परन्तु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। काम-वासना का पाठ पढ़ाकर भोली-भाली बालिकाओं का जीवन नष्ट कराकर दलाली खाने की चाल थी, टट्टी की आड़ में शिकार खेला जाता था। पंडित जी के आस-पास युनिवर्सिटी तथा कालेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आस पास मक्खियां।
विचित्र थे पंडितजी और अद्भुत् थी उनकी माया।

रायबहादुर डा. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊंचा था। सभा-सोसाइटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे वह। उनके थी एक कन्या –मुक्ता। वह हजारों में एक थी—सुन्दरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडित जी ने उसके निर्मल हृदय में अपने कुत्सित महामंत्र का बीजारोपण कर दिया था। अन्य युवती छात्राओं की भांति मुक्ता भी पंडित जी के यहां ‘हारमोनियम’ सीखने जाने लगी।

पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराये पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूंढ़ने लगे। अंत में मणिधर को आपने अपना पात्र चुन लिया। नई-नई कलियों की खोज में भटकने वाला मिलिन्द इस अपूर्व कली का मदपान करने के लिए आकुलित हो उठा। इस अवसर पर पंडितजी की मुट्ठी गर्म हो गई। दूसरे ही दिवस मणिधर को पंडित जी के यहां जाना था।
वह संध्या अत्यन्त ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यन्त प्रसन्न था। आज उसे पंडितजी के यहां जाना था।...वह लम्बे-लम्बे पग रखता हुआ चला जा रहा था पंडितजी के पापालय की ओर। आज उसे रुपयों की वेदी पर वासना-देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ानी थी।

मुक्ता पंडितजी के यहां बैठी हारमोनियम पर उंगलियां नचा रही थी, और पंडितजी उसे पुलकित नेत्रों से निहार रहे थे। वह बाजा बजाने में व्यस्त थी। साहसा मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ‘‘बेटी ! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।’’ परन्तु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। वह अपने स्थान पर अविचल खड़ी थी, उसके सुकोमल मनोहारी गाल लज्जावश ‘अंगूरी’ की भांति लाल हो रहे थे, अलकें आ-आकर उसका एक मधुर चुम्बन लेने की चेष्टा कर रही थीं। मणिधर उस पर मर मिटा था। वह उस समय बाह्य संसार में नहीं रह गया था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।

मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।’’
मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परन्तु फिर भी मौन थी।
मणिधर ने कहा—‘‘क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे...शुभे, मेरे समीप बैठ जाइये।’’
प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई।
‘‘आपका शुभ नाम ?’’ मणि ने ज़रा मुक्ता के निकट आते हुए कहा।
‘‘मुक्ता।’’ लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।

बातों का प्रवाह बड़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और..और !! थोड़ी देर के पश्चात-
मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी।


‘‘हिजाबे नौं उरुमा रहबरे शौहर नबी मानद,
अगर मानद शबे-मानद शबे दीगर नबीं मानद।’’


हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिन्द था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परन्तु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।

समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुँह दिखाने के योग्य न रह गए थे—ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरम्भ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए। उसने आंसुओं के बीच सिसकियों साथ-साथ समाज के सामने सम्पूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली—
पंडितजी का उसके भोले-भाले स्वच्छ हृदय में काम-वासना का बीजारोपण करना, तत्पश्चात उसका मणिधर से परिचय कराना आदि समस्त घटना उसने सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शान्त भाव से बैठा रहा।

पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हां में हां मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। ‘रायबहादुर के पिता की भी वही राय थी, जो पंचों की थी। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोषी करार दे दिया गया। केवल ‘अबला’ मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अन्त में अत्यन्त कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दोहाई दी—उसके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रय-हीना युवती को धक्के मार कर निकाल देने की अनुमति दे दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए हिन्दू समाज को वास्तव में पतन के खड्ड में गिराने वाले, नरराक्षस, खुशामदी टट्टू ‘पीर बवर्ची, भिस्ती, खर’ की कहावत को चरितार्थ करने वाले इस कलंक के सच्चे अपराधी पंडितजी तत्क्षण उठे उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे—अचानक आवाज आई ठहरो।

अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।’’ लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ‘‘हिन्दू समाज अन्धा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात् हमारे ‘माननीय’ पंचगण अनपढ़ हैं, गंवार हैं, और मूर्ख हैं। जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार ? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूं। इसका दण्ड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच हैं यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है—उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच समाज में देखा जाता है वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लम्पट है। सिंह की खाल ओढ़े हुए तुच्छ गीदड़ है-रंगा सियार है।’’

सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को सम्बोधित कर कहने लगा, ‘‘मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूं। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्यग कर तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूंगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं...चलो।’’
मणिधर मुक्ता का कर पकड़कर एक ओर चल दिया, और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की नाई इस दृश्य को देखती रह गयी।

1993)

शकीला की मां



केले और अमरूद के तीन-चार पेड़ों से घिरा आंगन। नवाबी युग की याद में मर्सिया पढ़ती हुई तीन-चार कोठरियां। एक में जमीलन, दूसरी में जमालिया, तीसरी में शकीला, शहज़ादी, मुहम्मदी। वह ‘उज़ड़े पर वालों’ के ठहरने की सराय थी।
एक दिन जमीलन की लड़की शकीला, दो घण्टे में अपनी मौसी के यहां से लौट आने की बात कह, किसी के साथ कहीं चल दी। इस पर घर में जो चख-चख और तोबा। तिल्ला मचा, उसे देखने में लोगों को बड़ा मज़ा आया। दिन-भरा बाज़ार में मनचले दुकानदारों की ज़बान पर शकीला की ही चर्चा रही, तीसरे दिन सबेरे, आश्चर्य-सी वह लौट भी आई। लोगों ने देखा—कानों में लाल-हरे नग-जड़े सोने के झुमके ‘धनुशबानी’ रंग की चुनरी, गोटा टंका रेशमी कुरता और लहंगा।
घर की चौखट पर पैर रखते ही पहले-पहल, मुहम्मदी ने थोड़ा मुस्कराकर, उसकी ठोड़ी को अपनी उंगलियों की चुटकी से दबाते हुए पूछा, ‘‘ओ-हो-री झको बीबी दो दिन कहां रहीं।’’

शकीला केवल मुस्कराकर आगे बढ़ गई।
झब्बन मियां की दाढ़ी में कितने बाल हैं, अथवा उनकी नुमायदी तोंद का वजन कितना है, यह तो आपको शहज़ादी ही बता सकेगी। हां, उनका सिन इस समय पचास-पचपन के करीब होगा, यह आसानी से जाना जा सकता है। एक दिन जब आप खुदा के नूर में खिजाब लगाकर शकीला से हंस-हंस कर कुछ फरमा रहे थे, तब शहजादी ने उनके जवान दिल पर कितनी बार थूका था, मुहम्मदी उसकी गवाह है।
चारपाई पर बैठे-बैठे पंखा झलते हुए झब्बन ने शकीला को देखा। दाढ़ी-मूछों के काले-सफेद बालों में एक बार बिजली-सी चमकी। फिर कहा, ‘‘आह-हाय, यह गज़ब। यह ठाट !! कहां चली गई थीं तुम ?’’
चुनरी से सिर को अच्छी तरह ढककर कनखियों से देखते हुए शकीला ने कहा, ‘‘कानपुर।’’
शहजादी ने वैसे ही कोठरी के बाहर आकर देखा, शकीला, मुँह बिचकाकर दोनों हाथों को सहज ढील पर छोड़ते हुए बोली, ‘‘ऊं-हूं ? अब तो बेदम साहिबा के कदम ज़मीन पर क्यों पड़ेंगे ? हां भई, यार लोग सलामत रहें, चलो अच्छा है। ....लेकिन कहे देती हूं, मेरे घर यह छिनाला नहीं चलेगा, हां !’’

शकीला पर जैसे गाज गिर गई। पत्थर की मूर्ति की तरह, जैसे खड़ी हुई थी, वैसे ही रह गयी।
शहज़ादी का अंग-अंग, उस समय, फड़क-फड़ककर एक अजीब दृश्य उपस्थित कर रहा था—हाथ कभी इधर, कभी उधर, आंखें कभी पृथ्वी पर और कभी आकाश की ओर। चालीस से कुछ ऊपर की सिन। घर की चहारदीवारी के अन्दर सिर पर दुपट्टा डाल लेने की कोई ज़रूरत ही नहीं। फिर झब्बन मियां को लुभाना भी न था—शायद इसीलिए वह बाड़ी नहीं पहनती और मैले कुरते के सब बटन खुले रहते हैं। पान के कत्थे से रंगीले होंठ रसीले हैं या नहीं, इसे झब्बन मियां बता तो सकते थे, परन्तु वे आज तक किसी अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे आदमी के पास बैठे तक नहीं। फिर भी, उन रसीले होंठों की बात करते हमेशा ‘पराग’ बिखरता है, इसे तो बहुत लोग जानते हैं। शहज़ादी कह रही थी, ‘‘ऐ, कभी हमारे भी जवानी के दिन थे, हमने भी ज़माना देखा है, लेकिन यह सिन और यह सितम—ऐसी जवानी पर खुदा की मार।’’

अपनी कोठरी के सामने वाले दालान में चारपाई पर बैठी हुई जमीलन रोटी खा रही थी, शहज़ादी के बखान से उसे शकीला के आने की सूचना मिल चुकी थी, फिर भी वह उठी नहीं, चुपचाप सुनती ही रही। और शहज़ादी बिना रुके कहे जा रही थी, ‘‘मुई के मिज़ाज तो देखो। ऊं-हूं, यह ठसका ! जैसे हज़ार-दो हज़ार कमा लाई हो। अल्लाह ने सूरत दी होती तो ज़मीन पर पैर ही न पड़ते। उफ री नज़ाकत !’’ मुंह बिचकाकर, गाल पर उंगली रख आंखें चढ़ाते हुए उसने इस अन्दाज़ में गर्दन मटकाई कि...खुदा की पनाह।

शहनशीलता की भी एक हद होती है। यह ठीक है कि शकीला के भाग जाने पर जमील ने ‘परवरदिगार’ से उसकी मौत मांगी थी, लेकिन आज, अपनी आंखों के सामने अपनी लड़की के लिए इतनी तीखी बातें सुनने को वह हरगिज़ तैयार न थी। मुंह का कौर जो बहुत देर से दांतों का अत्याचार सहन कर रहा था, आधे लोटे पानी के सहारे पेट में पहुंच गया। जमीलन ने दालान के बाहर आकर आवाज़ दी, ‘शकीला ! चल इधर आ।’’
किसी स्वपन को देखते-देखते शकीला जैसे चौंक-सी उठी। मां की आवाज़ सुनकर उसने अपने को सम्भाला और फिर अपनी कोठरी में चली गई।

आग दोनों तरफ बराबर सुलग रही थी। शहज़ादी अभी कुछ और कहना चाहती थी, और जमीलन का दिल भी अन्दर ही अन्दर घुमड़ रहा था। आखिर जमीलन से रहा न गया। अपने-आप ही ‘किसी’ को सुनाकर कहने लगी, ‘‘ज़िन्दगी-भर दुअन्नी-चवन्नी पर कलमा पढ़ा की, अब किसी की बढ़ती देखकर आंखें फटती हैं। वाह रे ज़माना बुरा हो तेरा।’’
‘‘ऐ, तो ज़माने को क्यों कोसती हो ? मुझे कोसो, मुझे। है हिम्मत ?’ शहज़ादी फट पड़ी।
‘‘मैं किसी को क्यों कोसूं—मुझे गरज़ ? तुम्हें क्यों चिनगी लगती है ?’’
‘‘है-है, लगे नहीं। लेके कोस डाला-बुरा हो, बुरा हो-वाह !’’
और मेरी आंखों के सामने घंटा-भर से जो तुम मेरी लड़की को कोस रही थीं, वह कुछ नहीं...दिन भर बहन-बहन कहो, वह मौसी-मौसी रटे, और मौसी मुई जब देखो तब कोसी –काटी। ऐसी मौसी के मुंह में आग। बड़ी मौसी...
जमीलन की बात अभी पूरी न हो पायी थी कि शहज़ादी लपककर उसके पास जा खड़ी हुई, ‘‘ले, रख आग, ले रख, रख ना ? मुई छिनाल रंडी, बदज़ात...।’’

शहज़ादी हांफ रही थी।
‘और तुम कौन हो ? दूसरे को तो रंडी छिनाल, बदज़ात और आप बिचारी पाक-साफ है न ? वह दिन भूल गई बीबी, जब कम्पनीबाग में अपने चहेते के साथ पकड़ी गई थी ? रह तो आई हो तीन दिन तक हवालात में। मुई की कौड़ी के सिपाहियों ने दुर्गत कर तो दी थी...? नहीं अब वह भूल गई। अपनी वाली कैसे कहे ?’’
‘‘हां-हां मेरे तो दो कौड़ी सिपाही थे, तेरे यार तो बड़े लाट के बच्चे थे ?’’
‘‘थे ही, और ले ही आए मेरे ज़रा से इशारे पर तुझे छुड़ाकर। वरना मर जाती ज़िन्दगी-भर जेल में चक्की पीसते-पीसते।’’


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