Nitya Stutui Aur Prathana -A Hindi Book by Swami Ramsukhdas - नित्य स्तुति और प्रार्थना - स्वामी रामसुखदास
प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
पञ्चामृत
हम भगवान के ही हैं।
हम जहाँ भी रहते हैं, भगवान् के ही दरबार में रहते हैं
हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान् का ही काम करते हैं।
शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाते हैं, भगवान का ही प्रसाद पाते है।
भगवान के दिये प्रसाद से भगवान् के ही जनों की सेवा करते हैं।
जो गज के मुख वालें हैं, भूतगण आदिके द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुन के
फलों का बड़े सुन्दर ढंग से भक्षण करनेवाले हैं, शोक का विनाश करनेवाले
हैं और भगवती उमाके पुत्र हैं, उन विघ्नेश्वर गणेशजी के चरणकमलों में मैं
प्रणाम करता हूँ।
कायरता के दोषसे उपहत स्वभाववाला और धर्म विषयमें मोहित। अन्तःकरणवाला मैं
आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो वह मेरे लिए कहिए। मैं आपका शिष्य
हूँ। आपके शरण हुए मेरे को शिक्षा दीजिये।
जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण
करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्य की तरह
प्रकाश-स्वरूप—ऐसे
अचिन्त्य स्वरूप का चिन्तन करता है।