1434 Ek Nayi Baat - A Hindi Book by - Swami Ramsukhadas - एक नयी बात - स्वामी रामसुखदास
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1434 Ek Nayi Baat

एक नयी बात

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मूल्य$ 1  
प्रकाशकगीताप्रेस गोरखपुर
आईएसबीएन00000
प्रकाशितसितम्बर २३, २००४
पुस्तक क्रं:1094
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:
Ek Nayi Baat-A Hindi Book by Swami Ramsukhdas - एक नयी बात स्वामी रामसुखदास

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जिससे क्रिया की सिद्धि होती है, जो क्रिया को उत्पन्न करनेवाला है, उसको ‘कारक’ कहते हैं। कारकों में कर्ता मुख्य होता है; क्योंकि सब क्रियाएं कर्ता के अधीन होती हैं। अन्य कारक तो क्रिया की सिद्धि में सहायक होते हैं, पर कर्ता स्वतन्त्र होता है। कर्ता में चेतन का आभास होता है; परन्तु वास्तव में चेतन कर्ता नहीं होता। इसलिये गीता में जहाँ भगवान् ने कर्ममात्र की सिद्धि में अधिष्ठान, कर्ता, कारण, चेष्टा और दैव—ये पाँच हेतु बताये हैं, वहाँ शुद्ध आत्मा (चेतन)-को कर्ता माननेवाले की निन्दा की है—

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।
(18/16)

‘ऐसे पाँच हेतुओं के होनेपर जो भी कर्मों के विषय में केवल (शुद्ध) आत्मा को कर्ता देखता है, वह दुष्ट बुद्धिवाला ठीक नहीं देखता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है अर्थात् उसने विवेक को महत्त्व नहीं दिया है।’
गीता में भगवान् ने कहीं प्रकृति को, कहीं गुणों को और कहीं इन्द्रियों को कर्ता बताया है। प्रकृति का कार्य गुण है, और गुणों का कार्य इन्द्रियाँ हैं। अतः वास्तव में कर्तृत्व नहीं है। भगवान् ने कहा है—

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः
अहंकारविमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।
(3/27)
तत्त्ववितु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।
(3/28)
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।
(14/19)
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।
(5/9)
प्राकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।।
(13/29)


भगवान्ने अपने में भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व का निषेध किया है; जैसे—


चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।
(गीता 4 /13-14)

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