Hindi Cinema ke Sau Varsh - A Hindi Book by - Dilchasp - हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष - दिलचस्प
Hindi / English

शब्द का अर्थ खोजें

पुस्तक विषय
नई पुस्तकें
कहानी संग्रह
कविता संग्रह
उपन्यास
नाटक-एकाँकी
लेख-निबंध
हास्य-व्यंग्य
व्यवहारिक मार्गदर्शिका
गजलें और शायरी
संस्मरण
बाल एवं युवा साहित्य
जीवनी/आत्मकथा
यात्रा वृत्तांत
भाषा एवं साहित्य
प्रवासी लेखक
संस्कृति
धर्म एवं दर्शन
नारी विमर्श
कला-संगीत
स्वास्थ्य-चिकित्सा
योग
बोलती पुस्तकें
इतिहास और राजनीति
खाना खजाना
कोश-संग्रह
अर्थशास्त्र
वास्तु एवं ज्योतिष
सिनेमा एवं मनोरंजन
विविध
पर्यावरण एवं विज्ञान
पत्र एवं पत्रकारिता
ई-पुस्तकें
अन्य भाषा

मूल्य रहित पुस्तकें
सुमन
पांच पापी
चन्द्रकान्ता
कृपया दायें चलिए
प्रेम पूर्णिमा

मार्च १८, २०१३
पुस्तकें भेजने का खर्च
पुस्तकें भेजने के सामान्य डाक खर्च की जानकारी
आगे
Hindi Cinema ke Sau Varsh

हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष

<<खरीदें
दिलचस्प<<आपका कार्ट
मूल्य$ 20.95  
प्रकाशकभारतीय पुस्तक परिषद
आईएसबीएन978-81-908095-0
प्रकाशितजनवरी ०१, २००९
पुस्तक क्रं:7294
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:
Hindi Cinema ke Sau Varsh - A Hindi Book - by Dilchasp

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वरिष्ठ फिल्म विशेषज्ञ ‘दिलचस्प’ की यह अद्भुत विशेषता है कि वह कठिन से कठिन और लंबी कालावधि में फैले हुए विषय को भी पाठकों के लिए सुबोध बना देते हैं। हिन्दी सिनेमा में उनकी कलम दशकों से चलती रही है।
‘हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष’ में दिलचस्प जी ने जहाँ सन् 1896 से 2008 तक के सफर का सारांश प्रस्तुत किया है, वहीं फिल्मों का विषयगत अध्धयन भी किया है। उनकी दृष्टि मनोरंजक फिल्मों तक ही सीमित नहीं रही है, वह प्रेरक फिल्मों पर भी गंभीर विमर्श करते हैं।
प्रायः फिल्मों पर चर्चा करते समय गीतों को दरकिनार कर दिया जाता है, लेकिन इस पुस्तक के लेखक ने फिल्मी गानों पर अनेक अध्यायों में विचार किया है। उनके लिए फिल्मी दुनिया में गीतकार भी महत्त्वपूर्ण है और गायक भी। वह जहाँ फिल्म की अद्वितीय सुंदरियों पर बात करते नजर आते हैं, वहीं महिला निर्माता-निर्देशकों पर भी गंभीरता से चर्चा करते हैं। वह यह स्वीकार करते हैं कि फिल्मों का प्रभाव क्षेत्र बड़ा व्यापक है। यही कारण है कि उनकी नजर सिनेमा और फिल्मी सितारों पर जारी किए गए डाक टिकटों तक भी गई है।
यह पुस्तक आम पाठकों को एक सदी से भी अधिक के फिल्मी सफर की सरल जानकारी देती है। इसे पढ़ना एक परंपरा से परिचित होना है।

लेखक के बारे में
दिलचस्प (नारायण सिंह राजावत)


चूरू, राजस्थान में सन् 1945 को पिता चंद्रसिंह राजावत एवं माता मगन कंवर के बेटे के रूप में जन्मे ‘दिलचल्प’ जी ने शिक्षा भले ही मैट्रिक तक पाई, लेकिन जीवन के विद्यालय में वह खूब पढ़ते रहे। सन् 1965 में ‘दिलचल्प’ के नाम से लेखन।
देश की प्रायः सभी स्तरीय पत्रिकाओं में अब तक विविध विधाओं की दो हजार से अधिक रचनाएं प्रकाशित। भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद।
प्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं ‘हरिवंश राय बच्चन : एक जीवनी’, ‘देह व्यापार : मस्ती या मजबूरी’, नव्यतम : ‘हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष’।


मुख्र्य पृष्ठ  

No reviews for this book..
Review Form
Your Name
Last Name
Email Address
Review
 

   

पुस्तक खोजें

चर्चित पुस्तकें


सोने का किला
    सत्यजित राय

कुरु कुरु स्वाहा
    मनोहर श्याम जोशी

अग्निव्यूह
    श्रीराम दूबे

अमली
    हृषीकेश सुलभ

तत सम
    राजी सेठ

लाल पसीना
    अभिमन्यु अनत

  आगे

समाचार और सूचनाऍ

मार्च १५, २०१२
हमारे संग्रह में ई पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। कुछ ई-पुस्तकें यहाँ देखें।
आगे...

Font :