लोहिया एक फ़िजा थे, साथ ही एक अनोखी व गर्म फ़िजा के निर्माता भी। वह
फिजा कैसी थी ?
सम्पूर्ण आजादी, समता, सम्पन्नता, अन्याय के विरुद्ध जेहाद और समाजवाद की
फ़िजा।
आज वह फ़िजा भी नहीं है, लोहिया भी नहीं है।
लेकिन दूसरों के लिए जीने वाला कभी मरता नहीं। लोहिया आज भी अपने विचारों
में जीवित है। लगन, ओजस्विता और उग्रता–प्रखरता को जब तक गुण
माना
जायेगा, लोहिया के विचार अमर रहेंगे।
मूलतः लोहिया राजनीतिक विचारक, चिंतक और स्वप्नद्रष्टा थे, लेकिन उनका
चिन्तन राजनीति तक ही कभी सीमित नहीं रहा। व्यापक दृष्टिकोण, दूरदर्शिता
उनकी चिन्तन-धारा की विशेषता थी। राजनीति के साथ-साथ संस्कृति, दर्शन
साहित्य, इतिहास, भाषा आदि के बारे में भी उनके मौलिक विचार थे।
लोहिया की चिन्तन-धारा कभी देश-काल की सीमा की बन्दी नहीं रही। विश्व की
रचना और विकास के बारे में उनकी अनोखी व अद्वितीय दृष्टि थी। इसलिए
उन्होंने सदा ही विश्व-नागरिकता का सपना देखा था। वे मानव-मात्र को किसी
देश का नहीं बल्कि विश्व नागरिकता का सपना देखा था। वे मानव-मात्र को किसी
देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। उनकी चाह थी कि एक से दूसरे
देश में आने जाने के लिए किसी तरह की भी कानूनी रुकावट न हो और सम्पूर्ण
पृथ्वी के किसी भी अंश को अपना मानकर कोई भी कहीं आ-जा सकने के लिए पूरी
तरह आजाद हो।
लोहिया एक नयी सभ्यता और संस्कृति के द्रष्टा और निर्माता थे। लेकिन
आधुनिक युग जहाँ उनके दर्शन की उपेक्षा नहीं कर सका, वहीं उन्हें पूरी तरह
आत्मसात भी नहीं कर सका। अपनी प्रखरता, ओजस्विता, मौलिकता, विस्तार और
व्यापक गुणों के कारण वे अधिकांश में लोगों की पकड़ से बाहर रहे। इसका एक
कारण है-जो लोग लोहिया के विचारों को ऊपरी सतही ढंग से ग्रहण करना चाहते
हैं, उनके लिए लोहिया बहुत भारी पड़ते हैं। गहरी दृष्टि से ही लोहिया के
विचारों, कथनों और कर्मों के भीतर के उस सूत्र को पकड़ा जा सकता है, जो
सूत्र लोहिया-विचार की विशेषता है, वही सूत्र ही तो उनकी विचार-पद्धति है।
लोहिया गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के अखण्ड समर्थक थे, लेकिन गाँधीवाद
को वे अधूरा दर्शन मानते थे: वे समाजवादी थे, लेकिन मार्क्स को एकांगी
मानते थे: वे राष्ट्रवादी थे, लेकिन विश्व-सरकार का सपना देखते थे: वे
आधुनिकतम विद्रोही तथा क्रान्तिकारी थे, लेकिन शांति व अहिंसा के अनूठे
उपासक थे।
लोहिया मानते थे कि पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों एक-दूसरे के विरोधी होकर
भी दोनों एकांगी और हेय हैं। इन दोनों से समाजवाद ही छुटकारा दे सकता है।
फिर वे समाजवाद को भी प्रजातन्त्र के बिना अधूरा मानते थे। उनकी दृष्टि
में प्रजातन्त्र और समाजवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक-दूसरे के
बिना दोनों अधूरे व बेमतलब हैं।
लोहिया ने मार्क्सवाद और गांधीवाद को मूल रूप में समझा और दोनों को अधूरा
पाया, क्योंकि इतिहास की गति ने दोनों को छोड़ दिया है। दोनों का महत्त्व
मात्र-युगीन है। लोहिया की दृष्टि में मार्क्स पश्चिम के तथा गांधी पूर्व
के प्रतीक हैं और लोहिया पश्चिम-पूर्व की खाई पाटना चाहते थे। मानवता के
दृष्टिकोण से वे पूर्व-पश्चिम, काले-गोरे, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े राष्ट्र
नर-नारी के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे।
लोहिया की विचार-पद्धति रचनात्मक है। वे पूर्णता व समग्रता के
लिए
प्रयास करते थे। लोहिया ने लिखा है- ‘‘जैसे ही मनुष्य
अपने
प्रति सचेत होता है, चाहे जिस स्तर पर यह चेतना आए और पूर्ण से अपने अलगाव
के प्रति संताप व दुख की भावना जागे, साथ ही अपने अस्तित्व के प्रति संतोष
का अनुभव हो, तब यह विचार-प्रक्रिया होती है कि वह पूर्ण के साथ अपने को
कैसे मिलाए, उसी समय उद्देश्य की खोज शुरू होती है।’’
लोहिया अनेक सिद्धान्तों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक हैं। वे सभी
अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के पक्षपाती थे। उन्होंने एक साथ
सात क्रांतियों का आह्वान किया। वे सात क्रान्तियां थी।
1 नर-नारी की समानता के लिए,
2 चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के खिलाफ,
3 संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए,
4 परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए,
5 निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना
द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए,
6 निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतंत्री पद्धति के लिए,
7 अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ और सत्याग्रह के लिये।
इन सात क्रांतियों के सम्बन्ध में लोहिया ने कहा-‘मोटे तौर से
ये
हैं सात क्रांन्तियाँ। सातों क्रांतियां संसार में एक साथ चल रही हैं।
अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करना चाहिए। जितने लोगों को
भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए।
बढ़ाते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाये कि आज का इन्सान सब नाइन्साफियों के
खिलाफ लड़ता-जूझता ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये कि जिसमें आन्तरिक
शांति और बाहरी या भौतिक भरा-पूरा समाज बन पाये।’
कर्म के क्षेत्र में अखण्ड प्रयोग और वैचारिक क्षेत्र में निरन्तर संशोधन
द्वारा नव-निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील भी लोहिया का एक रूप है। जीवन का
कोई भी पहलू शायद ही बचा हो, जिसे लोहिया ने अपनी मौलिक प्रतिभा से स्पर्श
न किया हो। मानव-विकास के प्रत्येक क्षेत्र में उनकी विचारधारा सबसे भिन्न
और मौलिक रही है।
लोहिया के विचारों में अनेकता के दर्शन होते हैं। त्याग, बुद्धि और
प्रतिमा के साथ सूर्य की प्रखरता है तो वहीं चन्द्रमा की शीतलता भी है,
वज्र की कठोरता है तो फूल की कोमलता भी है।
लोहिया में सन्तुलन और सम्मिलन का समावेश है। उनका एक आदर्श
विश्व-संस्कृति की स्थापना का संकल्प था। वे हृदय से भौतिक, भौगोलिक,
राष्ट्रीय विश्व-संस्कृति की स्थापना का संकल्प था। वे हृदय से भौतिक,
भौगोलिक, राष्ट्रीय व राजकीय सीमाओं का बन्धन स्वीकार न करते थे, इसलिए
उन्होंने बिना पासपोर्ट ही संसार में घूमने की योजना बनाई थी और बिना
पासपोर्ट वर्मा घूम आये थे।
लोहिया को भारतीय संस्कृति से न केवल अगाध प्रेम था बल्कि देश की आत्मा को
उन जैसा हृदयंगम करने का दूसरा नमूना भी न मिलेगा। समाजवाद की यूरोपीय
सीमाओं और आध्यात्मिकता की राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़कर उन्होंने एक
विश्व-दृष्टि विकसित की। उनका विश्वास था कि पश्चिमी विज्ञान और भारतीय
अध्यात्म का असली व सच्चा मेल तभी हो सकता है जब दोनों को इस प्रकार
संशोधित किया जाय कि वे एक-दूसरे के पूरक बनने में समर्थ हो सकें।
भारतमाता से लोहिया की माँग थी-‘‘हे भारतमाता ! हमें
शिव का
मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से
रचो।’’
वास्तव में यह एक साथ एक विश्व-व्यक्तित्व की माँग है। इससे ही उनके
मस्तिष्क और हृदय को टटोला जा सकता है।
लोहिया का विश्वास था कि ‘सत्यम, शिवम् सुन्दरम के प्राचीन
आदर्श और
आधुनिक विश्व के ‘समाजवाद, स्वातंत्र्य और अहिंसा के तीन-सूत्री
आदर्श जीवन का सुन्दर सत्य होगा और उस सत्य को जीवन में प्रतिष्ठित करने
के लिए मर्यादा-अमर्यादा का, सीमा-असीमा का बहुत ध्यान रखना होगा। दुनिया
के सभी क्षेत्रों की परम्पराओं द्वारा प्राप्त स्थल-कालबद्ध अर्द्धसत्यों
को सम्पूर्ण बनाने की दृष्टि से संशोधन की चेष्टा लोहिया के जीवन भरी
साधना रही है। आज की दुनियाँ की दो-तिहाई आबादी का दर्द और गरीबी व
विपन्नता को जड़ से मिटाने और समस्त विश्व को युद्ध और विनाश की बीमारी से
मुक्त करने का निदान लोहिया ने बताया। साथ ही वे यह भी जानते थे कि निदान
सही होने पर भी संसार में फैला स्वार्थ और लोभ उसे मंजूर न करेगा। क्योंकि
सौ फीसदी लाभ करने वाली दवा के पथ्य और कायदे-कानून बड़े निर्मम व कठोर
होते हैं। लेकिन लोहिया ने इसकी भी कभी चिन्ता न की और उन्हें जो कुछ सत्य
प्रतीत हुआ उसी का प्रचार करते रहे। उनका विश्वास था कि सही बात यदि
बार-बार और बराबर कही जाय, तो धीरे-धीरे लोगों को उसे सुनने की आदत पड़ती
जाएगी। इसीलिए दूसरों को अजीबोगरीब लगने वाली अपनी बातें वे निरन्तर,
जीवनपर्यन्त कहते रहे।
लोहिया में विचार, प्रतिभा और कर्मठता का अनोखा मेल था।
राजनीतिक कर्मयोगी
के रूप में उनकी देन का मूल्याकन अभी सम्भव नहीं है। शायद उसका अभी समय भी
नहीं आया है, परन्तु जहाँ तक उनके विचारों व सिद्धान्तों की बात है, उनके
साथ भी वही हुआ, जो विश्व की लगभग सभी महान प्रतिभाओं के साथ होता चला आया
है। ऐसे लोग, जो भी विचार और कल्पनाएँ पेश करते हैं, साधारण लोगों में
उनके महत्त्व का प्रचार व ज्ञान होने में समय लगता ही है, परन्तु आश्चर्य
होता है, जब समकालीन राजनीतिक व विचारक भी बहुधा उनके विचारों का सही
मूल्यांकन सही समय पर नहीं कर पाते और बाद में पछतावे की बारी आती है।
उदाहरण के रूप में यदि सन् 1954 में लोहिया के कहने पर केरल के समाजवादी
मन्त्रिमण्डल ने इस्तीफा दे दिया होता तो आज इस देश में समाजवादी आन्दोलन
तो आदर्श बनता ही, साथ ही, दुनिया में भी एक नए आदर्श का निर्माण हुआ
होता। इस तरह के अनेक अवसर पाए, जब लोहिया के बहुतेरे निकटतम साथी भी
लोहिया द्वारा उठाए गए महत्त्वपूर्ण सवालों का मर्म नहीं समझ सके और चूके
और पछताए।
लोहिया की आत्मा विद्रोही थी। अन्याय का तीव्रतम प्रतिकार उनके कर्मों व
सिद्धान्तों की बुनियाद रही है। प्रबल इच्छाशक्ति के साथ-साथ उनके पास
असीम धैर्य और संयम भी रहा है। बार-बार जेल जाने-अपमान सहने के अप्रिय
अनुभवों के बावजूद भी अन्याय के लिए अपनी दृढ़ता के कारण वे फिर-फिर ऐसे
कटु अनुभवों को आमंत्रित कर के अंगीकार करते रहे। लोहिया ने खुद लिखा
है-‘‘मुझे कभी-कभी ताज्जुब होता है कि एक तरह के
निराधार
अभियोग एक ही आदमी के विरुद्ध लगातार क्यों लगाए जाते हैं ? मेरे ऊपर दोष
लगाने वालों की ताकत यही है कि वे भारतीय शासक वर्ग के खयालों के साथ हैं
और मैं उसके बिल्कुल विरुद्ध। इसके अलावा मैंने भारतीय समाज की पुरानी
बुनियादों के खिलाफ आवाज उठाई है और उन पर हमला किया है। जिसका नतीजा है
कि मुझे देश की सभी स्थिर स्वार्थवाली और प्रभावशाली शक्तियों के क्रोध का
शिकार बनना पड़ता है।’’
शायद लीक पर चलना लोहिया के स्वभाव में न था। साथ ही वे प्रवाह के साथ भी
कभी बने नहीं, बल्कि प्रचलित प्रवाह के उलटे तैरने के प्रयोग में उनके
विचारों को प्रचार के लिए देश के अखबारों का भी सहयोग कभी नहीं मिला।
उपेक्षा, भ्रामक प्रचार और मिथ्या लेखन द्वारा लोहिया के विचारों को दबाने
की सदा कोशिश की गई, पर क्या यह संभव था कि इस प्रकार उनके विचारों को
नष्ट किया जा सकता ? उनकी महान कृतियों को जब भुलाना असंभव हो जाता था तभी
आंशिक रूप में उन्हें प्रकाशन मिलता था- सो भी कभी कभी सही रूप में नहीं,
बल्कि तोड़-मरोड़ कर, अर्थ को अनर्थ करके। दूसरी ओर हर झूठ का बराबर खण्डन
करते रहना तथा सफाई देना स्वाभिमानी लोहिया के स्वभाव के खिलाफ तो था ही,















