झारखंड (भारत) की राजधानी रांची में जन्म। उर्सुलाइन कान्वेण्ट, रांची से प्रथम श्रेणी में सेकेण्डरी, सन्त जेवियर्स कॉलेज, रांची से प्रथम श्रेणी में आई. एस. सी. और बी.एस-सी ऑनर्स(भौतिकी) तथा रांची विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एम.एस.सी(भौतिकी)।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग से पी.एच.डी (माइक्रो-इलेक्ट्रानिक्स) तथा आई.आई.टी मुम्बई में सी.एस. आई. आर. की शोधवृत्ति पर शोध परियोजना के अन्तर्गत कुछ वर्षों तक कार्य।
राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं में अनेक शोधपत्र प्रकाशित। छात्र जीवन में काव्य-लेखन की शुरुआत। प्रारम्भ में कॉलेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।
वैज्ञानिक शोधकार्य के दिनों में लेखन-क्षमता भी पल्लवित होती रही। पहली कहानी "इस कहानी का अन्त नहीं" जनसत्ता (दिल्ली) में प्रकाशित। बाद में हिन्दी की बेब पत्रिकाओं में अनेक कहानियाँ और कविताएं प्रकाशित।
सम्प्रति: टॉमबाल कॉलेज, ह्यूस्टन, यू.एस.ए. में भौतिकी एवं गणित का अध्यापन।
धूप का टुकड़ा इला प्रसाद का पहला ही कविता संग्रह है, जो विदेश की धरती के अनुभवों से निकल कर अपनी देसी स्वाभाविक जमीन पा लेता है। गणित और भौतिकी की दुनिया में रहकर भी इला प्रसाद ने अपना निजत्व, प्रेम, दुःख, घर-बार गिरात्री का स्वाद, अकेलापन, स्त्रीत्व बचा रखा है। उनका अनुभव लोक इतना निजी नहीं है कि अपना स्पेस न पा सके। गीतात्मकता से परहेज न हो पर इला प्रसाद को बखूबी पका है कि गद्य ही आज की कविता का नियामक तत्त्व है।
इला प्रसाद की कविताएँ हमारे हाइ-टेक समय में भूमण्डलीकरण, बाजारवाद, तकनीकी विडम्बनाएं पहचानती हुई भी काव्यत्त्व बचाए रख सकी हैं।
इला प्रसाद की कविताओं का पहला संग्रह "धूप का टुकड़ा" हमारे समय के स्त्री विमर्श में कुछ नया जोड़ता है और फिर भी स्त्रीवाद या स्त्री की मिथ्यता मुक्ति की अवधारणा से इन्कार करता है। अमरीकी कवि एमिली डिकिन्सन के शब्दों में कहा जाये- तो ऐसी कविताएँ प्यार की आवाज बन कर प्रकृति के दृश्व्य का हिस्सा बन जाती हैं।
कविता की दुनिया में इला प्रसाद एक नई लौ की तरह हैं। वे अपनी दुनिया के प्रति जितनी ही उत्सुक रहेंगी, काव्यत्त्व उतनी ही उनका स्वायत्त क्षेत्र होगा।















