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मैं ही हूँ
मैं- वाह रे मैं, वाह। मैं तो बस मैं ही हूं- मेरे मुकाबले में भला तू
क्या है ! इस मैं और तू को लेकर हमारे सन्तों और बुधजनों ने शब्दों की
खासी खाल-खिंचाई भी की है। कबीर साहब का एक दोहा है कि
‘‘जब मैं था तब तू नहीं, जब तू हैं मैं नायं।
प्रेम गली अति साकरी तामैं दो न समायं।’’
ऐसे ही किसी
कवि का एक और दोहा भी मुझे याद आ रहा है। वो कहते हैं कि-
मैना जो ‘मैं-ना’ कहे दूध-भात नित खाय।
बकरी जो ‘मैं-मैं’ कहे उल्टी खाल खिंचाय।।
इस तरह के
बहुत-से दोहे और उपदेश वाक्य हरदम मैं-मैं करने वालों के खिलाफ
आपको खोजे से मिल जाएंगे, मगर फिर भी मैं तो मैं ही है। हम चुनी दीगरे
नेस्त। हम चौड़े बाजार सकड़ा। मैं की शान में भी कुछ कम कसीदे नहीं कहे गए।
अच्छा, अगर एक
मिनट के लिए अपने आध्यात्मिक दृष्टिबिन्दु को बलायेताक रखकर
हम मैं वालों की दुनियावी शान-शौकत को देखे तो यह मानना ही पड़ेगा कि मैं
मैं ही है। आपको एक आंखों देखा हाल सुनाता हूं।
कई
बरस पहले पच्छुं के एक छोटे-से नगर में मुझे एक फिल्म लेखन
और निर्देशन के निमित्त कुछ महीनों तक रहना पड़ा था। वहां एक बंगले के आधे
हिस्से को किराये पर लेकर रहता था। आधे में मकान-मालिक स्वयं सपरिवार रहते
थे। बेचारे बड़े ही शरीफ थे। दो पीढ़ियों पहले उनके बाप-दादे खासी
शान-शौकत वाले थे, मगर हमारे मालिक-मकान के बचपन में वह पुरानी शान-शौकत
धूल में मिल चुकी थी। बेचारे एक मिल में मजदूरी करके सड़क के लैम्प-पोस्ट
के नीचे पढ़े और बाद में अंग्रेज़ सरकार की नौकरी पाकर धीरे-धीरे फिर अपने
पैरों पर खड़े हुए। एक बंगला बनवा लिया और बुढ़ापे में रिटायर होकर
बाइज़्ज़त रहने लगे। उनके दो लड़के थे। बड़ा साधारण हैसियत का ईमानदार था
मगर अपने-आप में खुशहाल था। छोटा लड़का सरकार में डिप्टी कलक्टर साहब का
पेशकार पी.ए. या ऐसे कुछ हो गया था। अजी साहब, बड़ी शान हो गई थी उसकी,
जमीन पर उसका पैर रखना मुहाल था, मिजाज आसमान में रहते थे। खैर,
मकान-मालिक के बड़े बेटे की लड़की का विवाह होने वाला था, अपनी पोती का
शुभ कारज करने का उनके मन में काफी हौसला भी था, अपने बहुत-से
नाते-रिश्तेदारों को आमंत्रित किया। छोटे साहबज़ादे भी स्वाभाविक रूप से
साग्रह बुलाए गए थे।
हमारे बूढ़े
मकान-मालिक बेचारे जब-तक शाम को मेरे पास आकर दो घड़ी बैठ
जाते और मनुष्य स्वभाव के अनुसार ही अपना जी खोल जाया करते थे। एक दिन आए,
कहने लगे, ‘‘नागर साहब, आपको दो-चार दिन के लिए कष्ट
देना चाहता हूं। मेरा छोटा लड़का सपरिवार आ रहा है। वो ज़रा इंगलिश स्टाइल
में स्वतंत्र रहने का आदि हो गया है, आप वाले हिस्से में उसे टिकाने की
आज्ञा चाहता हूं।’’ मैंने कहा,
‘‘हां, हां, खुशी से टिकाइए। मुझे कोई कष्ट न
होगा।’’ खैर, एक दिन शाम को जब स्टूड़ियो से घर आया
तो देखा कि एक साहब अपने नाइट गाउन और पजामे में बड़ी शान से बैठे हुए एक
स्त्री पर अंग्रेजी में गरमा रहे थे, ‘‘उन लोगों ने
मुझे समझ क्या रक्खा है। अगर मेरी उचित व्यवस्था नहीं कर सकते थे तो मुझे
बुलाने की क्या जरूरत थी ! आखिर बप्पा साहब को यह सोचना चाहिए था कि वो एक
वी.आई.पी. को अपने यहां बुला रहे हैं। मैंने अपने खाने-पीने-नाश्ते आदि का
समय और मीनू इसलिए पहले से भेज दिया था कि सब प्रबन्ध ठीक-ठीक
रहे।.........’’
अपने सोनेवाले
कमरे में जाने के लिए ड्राइंग रूप में घुसा। उन दोनों ने
मुझे देखा, साहब ने कुछ त्योरियां चढ़ाकर देखा; मगर मैं उन्हें उचटती
दृष्टि से देखता हुआ कमरे का ताला खोलकर अन्दर चला गया। साहब की आवाज
कानों में आती रही। वे कह कह रहे थे, ‘‘ये चाय आई या
गुड़ का गरम पानी था ? और मैंने लिख दिया था कि शाम के नाश्ते में आमलेट
और पकौड़े ही खाता हूं, घर पर इंतजान न हो सके तो किसी अच्छे
होटल-रेस्तरां से प्रबन्ध कर लिया जाए।’’
‘‘अच्छा,
अच्छा, अब शान्त हो जाओ। चार दिन के लिए
किसी के घर आए हो-’’
नारी-स्वर कटा
साहब-स्वर भड़का। वे गरजकर बोले, ‘‘चार
दिनों से क्या मतलब है जी। मैं तुमकों यहां क्यों लाया ? तुम तो चार दिनों
के लिए मेरे जीवन में नहीं आईं। तुम्हें तो मालूम हैं कि मैं क्या चाहता
हूं और क्या नहीं चाहता।’’
‘‘अरे, तो पराये घर में मैं कर ही क्या सकती हूं?’’
पराया नहीं, ये मेरा घर है। मैं आधे हिस्से का हकदार
हूं.......’’ वगैरह-वगैरह। लगभग दस-बारह मिनटों तक
साहबोवाच चलता रहा। इतने में ही मेरा नौकर ट्रे में चाय लेकर मेरे कमरे
में आने के लिए ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। साहब की आवाज़ आई,
‘‘एऽ ! चाय इधर लाओ।’’
मेरे नौकर ने कहा, ‘‘जी, ये साहब के लिए है।’’
‘‘साहब?’’ मेरे सिवा कौन साहब है यहां ?’’
‘‘अपने साहब के वास्ते लाया हूं।’’ कहता हुआ वो कमरे में दाखिल हुआ। पीछे साहब का
बड़बड़ाना सुनाई पड़ता रहा। हम समझ गए कि हमारे मकान-मालिक के ये पी.ए.
पुत्तर ‘हम चुनी दीगरे नेस्त’ वाली गोत के हैं। चार
दिनों में उन्होंने चार सौ बीस नाटक दिखला दिए। घर में चाहे कोई काम हो या
न हो, घरातियों, बारातियों, समघी-दामाद की खातिर में उन्नीस-बीस की कसर
बाकी रहे तो भले ही रह जाए मगर पी.ए. साहब की सेवा में कोई कसर न रहे।
दिन-भर अपनी पत्नी, नौकर, बड़े भाई की पत्नी, बड़े भाई, उनके बच्चों यहां
तक कि अपने बाप तक पर गरमाते ही रहते थे। बस, एक मेरा नौकर ही ऐसा था जो
उनकी हुक्म-उदूली करके उसकी साहबी को भड़का देता था एक दिन मेरे स्टूड़ियो
जाने के बाद उन्होंने मेरे नौकर से मेरी आराम कुर्सी बाहर निकाल देने को
कहा। उसने कह दिया, कुर्सी पर मेरे साहब शाम को आराम करते हैं। बस, पी.ए.
साहब बारुद हो गए। उसी दिन घर में बारात आई थी। सबको बारातियों के
स्वागत-सत्कार की चिन्ता थी और पी.ए. साहब को आराम कुर्सी न मिलना ही
परेशान कर रहा था। अपने बाप तक पर गर्मा उठे, अपनी पत्नी को बिस्तर बांधने
और तुरन्त लौट चलने का आदेश दे दिया। उनका भतीजा किराये की आराम कुर्सी
लाने के लिए फर्नीचर की दुकानों पर भटका, पर न मिल सकी। हारकर वह लड़का
मेरे स्टूड़ियो पहुंचा और रोने लगा: ‘‘काका ने आराम
कुर्सी के लिए आफत जोत रक्खी है।’’ मैंने नौकर के लिए
एक हुक्मनामा लिखकर दिया तब कहीं जाकर मामला थमा।
मेरे कहने का
मतलब है कि ऐसे भी बहुत-से ‘मैं’ वादी
घमंड़ी होते हैं जो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं, अपने घर वालों तक
को अपना तुच्छ गुलाम समझते हैं।
अब एक दूसरी
कहावत और उसका एक दृष्टान्त भी सुनिए। कहावत है:‘‘मैं और मेरा मन्सुगआ, तीजे का मुँह
झुलसुआ।’’ यही कहावत थोड़े रूपान्तर के साथ भी मैंने
सुनी है जो इस प्रकार है :‘‘मैं और मेरा भतार बाकी सब
दाढ़ीदार।’’ इस कहावत की मिसालें तो खूब मिलती हैं,
जहां चार औरतें मिलीं नहीं कि ‘हम और हमारे साहब’ की
भागवत बंकने लगती है। ‘‘हम ऐसे और हमारे साहब ऐसे !
हमारे साहब को ये पसन्द है और हमारे साहब को ये नापसन्द
है।’’ चार औरते बैठी हों तो चारों अपनी ही सुनाएंगी।
कोई किसी से कम नहीं, ‘‘मैं भी रानी तू भी रानी,
कौन भरे कूयें से पानी’’ वाली कहावत
अक्षरश: चरितार्थ होने लगती है। सबको अपनी ही शान-गुमान की चिन्ता रहती
है- हमारे बच्चे बच्चे, औरों के लुच्चे। अपना पूत पराया धतिंगड़। मज़ा तब
आता है जब फलानी ढिमाकी के बच्चों को बुरा बतलाती है और ढिमाकी फलानी के
बच्चों को। इस दूसरी कोटि के ‘मैं’ वादियों में पहली
कोटि के गुमानियों से बस इतना ही अंतर होता है कि वह केवल अपने ही को उच्च
मानता है और यह लोग अपनी उच्चता में अपने साथ-साथ अपने पतियों या पत्नियों
और बाल-बच्चों को भी शामिल कर लेते हैं।
घमंडियों की
एक तीसरी कोटि और भी होती है- ये लोग अपनी या अपनों की
बुराइयों को भी बड़ी बड़ाई के रूप में पेश करते हैं। हिन्दी में एक कहावत
है जो शर्तिया किसी सपूत की मां से अपने लाड़ले के सत्संगियों की प्रशंसा
सुनकर किसी कपूत मां के बखानों पर बनी होगी। कहावत है, ‘मेरे
लाल के सौ-सौ यार चोर जुआरी और कलार।’ अब बोलिए, दाद दीजिए इस
‘मैं’ की शान की, जो अपने बेटे के बुरेपन तो भी शान
से बखानती है।
इन
‘‘मैं’’ वादी घमंड़ियों की एक
कोटि वह भी होती है जो अपनी दीन स्थिति को नजर अंदाज करके अपने पुरखों का
वैभव बखानकर अपनी शान जतलाते हैं। ऐसों पर भी एक कहावत हिन्दी में बहुत
उम्दा है। कहते हैं ‘‘मेरे बाप ने घी खाया था सूंघो
मेरा हाथ।’’ अब बोलिए, इस शान पर भला आप क्या कहिएगा।
ऐसे मैं-मैं करने वाले लोग अपने मुंह मियां मिट्ठू भले ही बन लें पर दूसरे
उनकी इज्जत दिल से कभी नहीं कर पाते। यह काहवत बिल्कुल सच है कि खुदी और
खुदाई में बैर है। जहां इतना संकीर्ण आत्मप्रेम होता है वहां परमात्म भाव
कभी उपज ही नहीं सकता। घमण्डी का सिर कभी न कभी नीचा होकर ही रहता है।
इसलिए यह मैं-मैं पन हमें तो नहीं सुहाता, हम तो उस साधुवाणी के कायल हैं
जो कहती हैं :
हम वासी वहि देश के जाति वरण कुल नाहिं,
शब्द मिलावा होत है, अंग मिलावा नाहिं।।
इस भाव में तो
मुक्त मन से सानन्द कह सकता हूं कि मैं ही हूं। मैं
सर्वव्यापी हूं। इसलिए सब तज, मैं भज। गीता में भी यही लिखा है। |