श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्घ है। जिस प्रकार एक
सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता
है और उसके पश्चात् जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है। उसी
प्रकार अर्जुन जो कि महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं
से भयभीत होकर जीवन और कर्मक्षेत्र से निराश हो गया है। अर्जुन की तरह ही
हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर
अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं। भारत वर्ष के
ऋषियों नें गहन विचार के पश्चात् जिस ज्ञान को आत्मसात् किया उसे उन्होंने
वेदों का नाम दिया। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव
जीवन की विशेषता मानव को प्राप्त बौद्धिक शक्ति है और उपनिषदों में निहित
ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था तो है ही, अपितु बुद्धि की
सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है यह हमारे उपनिषद् एक झलक दिखा
देते हैं। उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए
गीता में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है,
जो कि 11 उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक
आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके।
युधामन्युच्श्र विक्रान्त उत्तमौजाच्श्र वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाच्श्र सर्व एव महारथाः।।
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषोंवाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान
शूरवीर सात्यिक औप विराट तथा महारथी राजा दुपद्र, धृष्टकेतु और चेकितान
तथा बलवान् काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य,
पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं
द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।। 4-6।।
श्रेष्ट धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम् तथा राजा
विराट और अजेय सात्यिक, राजा द्रुपद एवं द्रुपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी
भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन् ! सब ओर से अलग-अलग
शंख्ङ बजाये।। 17-18।।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां ह्रदयानि व्यदारयत्।
नभश्र्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।।
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों के
अर्थात् आपके पक्षवालों के ह्रदय विदीर्ण कर दिये।। 19।।
हे राजन् ! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए
धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष
उठाकर ह्रषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत ! मेरे रथ को
दोनों सेनाओं के बीचमें खड़ा कीजिये।। 20-21।।
और जब तक कि मैं युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी
योद्धाओं को भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्धरूप व्यापार में मुझे किन-किन
के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिये।। 22।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति।।
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र ! अर्जुनद्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज
श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के
सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा
कि हे पार्थ ! युद्ध के लिये जुटे हुए इन कौरवों को देख।। 24-25।।
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचाको,
दादों-परदादोंको, गुरूओंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोको, पौत्रोंको तथा
मित्रोंको, ससुरोंको और सुह्रदोंको भी देखा।। 26।। और 27 वें का
पूर्वार्ध।।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयःसर्वान् बन्धूनवस्थितान्।।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त
करूणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।। 27वेंका उत्तरार्ध और
28वेंका पूर्वार्ध।।
अर्जुन उवाच
दृष्टेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्र्च शरीरे में रोमहर्षश्र्च जायते।।
अर्जुन बोले- हे कृष्ण ! युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस
स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अग्ङ शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा
है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमान्च हो रहा है।. 28 वेंका उत्तरार्ध और
29।।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्मते।
न च शक्रोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च में मनः।।
हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन
भ्रमित सा हो रहा है, इसलिए मै खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।। 30।।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।।
हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में
स्वजन-समुदायको मारकर कल्याण भी नहीं देखता।। 31।।
न काङक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।।
हे कृष्ण ! मै न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखोंको ही। हे गोविन्द
! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी
क्या लाभ है ? ।। 32।।
हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं
इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए कहना ही क्या है ? ।। 35।।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः।।
हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रोंको मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ?
इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा।। 36।।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव।।
अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम
योग्य नहीं हैं, क्योकिं अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ?
।। 37।।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्धिर्जनार्दन।।
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोषको और
मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुल के
नाशसे उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिये
क्यों नहीं विचार करना चाहिए ? ।। 38-39।।
हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो
जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंक्ङर
उत्पन्न होता है।। 41।
संक्ङरो नरकायैव कुलघ्रानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्वोषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।
वर्णसंक्ङर कुलघातियों को कुल को नरक में ले जाने के लिए हीहोता है। लुप्त
हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पणसे वञ्चित इनके
पितरलोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।। 42।।