विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी श्री मोहन भाई डी. पटेल ‘आचार्य
परशरम्’ ज्योतिष के क्षेत्र के भीष्म पितामह कहे जाते हैं। ये
पिछले 30 साल से ज्योतिष की श्रेष्ठ गुजराती मासिक पत्रिका भविष्य निदान
अनवरत प्रकाशित कर रहे हैं। इन्होंने ज्योतिषशास्त्र के गुजराती भाषा में
विश्व में सबसे ज्यादा ग्रंथों की रचना की है और अपने अनेक शिष्यों को
ज्योतिष ग्रंथों की रचना में मार्गदर्शन किया है।
आप बृहद गुजरात एस्ट्रोलॉजिकल सोसाइटी के संस्थापक व अध्यक्ष हैं और पिछले
25 वर्षो से ऑल इंडिया एस्ट्रोलॉजिकल फेडरेशन के अध्यक्ष पद से
ज्योतिषशास्त्र की सेवा में लगे हैं। इनके मार्गदर्शन तले, 10,000
ज्योतिषियों ने शिक्षा प्राप्त की है। ज्योतिषशास्त्र का कोई विषय हो;
जैसे-हस्तरेखा शास्त्र, वास्तुशास्त्र, फेंग-शुई या योगशास्त्र हो, ऐसे
सभी विषयों पर इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जो ज्योतिष रसिकों
में अत्यंत लोकप्रिय हैं और जीवन के वास्तविक सत्यता से जुड़ी हैं।
मेरी नजर में श्री मोहन भाई डी. पटेल ‘आचार्य
पराशरम्’ को अत्यंत ईश्वरीय प्रेरणाओं से युक्त, संपूर्ण
अंतर्सूझ से प्रगल्भ और जीवन के सत्यों-सातत्यों को पचाने वाला एक अद्भुत
व्यक्ति मानता हूं। पिछले चार दशक से हम दोनों की मित्रता विकसित होती रही
है। मैं इनको इस सदी का महान् ज्योतिषी मानता हूं।
अर्थः त्रिभुवन के दीपक समान तथा प्राणीमात्र
के विषय में शुभ और अशुभ
बताने वाले विख्यात सर्वतोभद्रचक्र के विषय में कहता हूं...(1)
विवरणः निरयन ज्योतिष में सर्वतोभद्रचक्र को त्रिभुवन (आकाश-पाताल-पृथ्वी)
के लिए ज्ञान को तेजजोमय दीपक का रुप माना जाता है, जो चक्र प्राणीमात्र
के लिए उनके जीवन में बनी, बननेवाली घटनाओं के विषय में सचोट ख्याल देने
वाला एक मात्र समर्थ चक्र माना गया है, इस विषय में मैं विवेचन करूंगा।
ऊर्ध्वगा दश विन्यस्य तिर्यगेखाम्तधादश।
एकाशीतिपदं चक्रं जायते नात्र संशयः।।
अर्थः दस रेखाएं खड़ी बनाकर उस पर दस लेटी
रेखाएं बनाने पर यह चक्र
बनेगा....(2)
अ
कृ
रो
मृ
आ
पु
पु
श्र्ले
आ
भ
उ
अ
व
क
ह
ड
उ
म
अ
ल
लृ
वृ
मि
क
लृ
म
पू
रे
च
म
ओ
11 सुं.मं.6
औ
सिं
ट
उ
उ
द
मि
9 सु.4,14
10 श.5,15
7 चर
12 बु.
क
प
ह
पू
स
कुं
14 अः
13 गु.
12
तु
र
चि
8,3
अं
श
ग
ऐ
म
ध
वृ
ए
न
स्वा
ध
ऋ
ख
ज
भ
य
न
ऋ
वि
ई
श्र
अ
उ
प
मू
ज्ये
अ
इ
विवरणः यहां दूसरे श्लोक में सर्वतोभद्रचक्र
बनाने का तरीका बताया गया है तथा उसका प्रभाव बताया गया है। आकृति (1) में
बताई गई दस लेटी रेखाएं बनाकर उस पर दस खड़ी रेखाएं बनाने पर प्रत्येक
खड़ी और लेटी लाइनों में नौ-नौ खाने होंगे। इस प्रकार कुल इक्कासी (81)
खानों का कोष्ठक तैयार होगा। इस चक्र में अब सोलह (16) स्वर किस क्रम में
रखे जाएंगे, इसे बाद में आने वाले श्लोक में समझा जा सकता है।
अर्थ: इस कोष्ठक में इशान आदि क्रम से बनने
वाले प्रत्येक कोनों में अ
कारादि सोलह स्वर लिखें....(3)
विवरण: हमने पिछले श्लोक में देखा कि इस सर्वतोभद्रचक्र में 81 खाने हैं,
अब उस चक्र में संस्कृत बाराक्षरी के सोलह स्वारों अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ऋ,
लृ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं और अः का किस क्रम और किस खाने में रखा जाएगा यह
बताया गया है।
यदि आप चक्र का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करेंगे तो मालूम पड़ेगा कि 9 ञ 9
खानों का एक बड़ा चौरस है। अब ईशान कोने में अर्थात् आपके हाथ बाय़ें हाथ
की ओर के ऊपरी खाने में अ रखें और दाहिने हाथ की ओर के कोने में आ रखें।
इसके बाद दाहिने हाथ के नीचे वाले कोने में हस्व इ रखें और बाईं ओर कोने
में बड़ी ई रखें। अब देखें कि बड़े चौरस के कोनों में भी ऊपर के
क्रमानुसार ही उ, ऋ, ऋ रखें। इसके पश्चात उसके अंदर 5 ञ 5 का चौरस दिखाई
देगा। इस चौरस के कोनों में भी उसी क्रम से लृ, लृ, ए, और ऐ बिठाएं, अब
अंतिम 3 ञ 3 का सबसे अंदर वाला छोटा चौरस रहा। इस चौरस के चार कोनों में
ओ, औ, अं और अः इसी क्रम से लगाएं।
अर्थ: अब पूर्व दिशा के क्रम से प्रत्येक ओर
सात-सात करके अट्ठाईस
नक्षत्रों को चौखटे में रखें....(4)
विवरण: सर्वतोभद्रचक्र में सोलह स्वर किस जगह रखें, यह श्लोक 3 में समझाया
गया है। अब कृत्तिका वगैरह अट्ठाईस नक्षत्र किस खाने में रखा जाएगा यह
बताएगें। चक्र में प्रत्येक नक्षत्र का मात्र पहला अक्षर ही रखे गए हैं,
इसी कारण सभी नक्षत्रों के नाम क्रमपूर्वक याद रखें जाएं यह आवश्यक है
क्योंकि अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशीर्ष, आर्द्रा, पुनर्वसु,
पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा,
स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा,
अभिजीत, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती।
चक्र में रखते समय कृत्तिका नक्षत्र से शुरूआत की जाती है और अश्विनी तथा
भरणी, इन दोनों नक्षत्रों को रेवती के बाद लिया गया है, इसे विशेष रूप से
याद रखें।
ऊपर के 22 नक्षत्रों को चार भागों में बांट दें कि जिससे प्रत्येक में
सात-सात नक्षत्र आएं। अब अ तथा आ इन दो स्वरों के बीच अ के पास के खाने से
शुरू करके कृत्तिका के लिए कृ, रोहिणी के लिए रो, इस प्रकार सात नक्षत्र
रखें। इसके बाद आ के नीचे के खाने से शुरू करके इ तक सात खानों में मघा से
विशाखा तक के नक्षत्रों के लिए म, पू, उ, ह, च, स्वा, और वि लिखें, अब इ
से उलटे चल कर ई तक के सात नीचे वाले खानों में अनुराधा से श्रवण तक के और
अंत में ई से ऊपर की ओर जाने वाली खड़ी लाइनों में सात खानों में ठीक नीचे
से आरम्भ करके घनिष्टा, शततारा, पूर्वाभद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती,
अश्वनी तथा भरणी नक्षत्र रखें।
कृत्तिका-आश्लेषा इन सात नक्षत्र पूर्व में मघा से विशाखा दक्षिण में
अनुराधा से श्रवण नीचे पश्चिम में और बाकी के उत्तर दिशा में रखे जाते
हैं।
अर्थ: नक्षत्रों की नीचे की पक्तियों में
अंदरूनी चक्र में अ, व, क, ह, ङ;
म, ट, प, र, त; न, य, भ, ज, ख; तथा ग, स, द, च, ल अक्षर रखें....(5)
विवरण: स्वर तथा नक्षत्र रखने के बाद के अक्षर कहां और कैसे क्रम में रखें
यह यहां बताया गया है।
नक्षत्र चक्र के रोहिणी नक्षत्र के नीचे के खानों में अ, और उसके बाद के
चार खानों में व, क, ह, और ड, रखें। यह हुई पूर्व दिशा की बात। उ और ऊ इन
दो स्वरों के बीच पाँच अक्षर रखे जा चुके हैं। अब ऊ औ ऋ के बीच दाहिनी ओर
खड़ी लाइन में भी पाँच खाने हैं उसमें ऊपर से नीचे म, ट, प, र और त लिखें।
इसके बाद ऋ और ऋ के बीच की लेटी लाइन के पाँच खानों में दाहिनी तरफ से
शुरू करके बांई ओर तक न, य, भ, ज और ख लिखें। अब ऋ और उ के बीच बाएं हाथ
की ओर की खड़ी लाइन में नीचे के खानों से शुरू करके ऊपर के खाने तक म, स,
द, च, और ल लिखें।
इस प्रकार ककावारी के अक्षर अपने चक्र में योग्य क्रम पूर्वक रखे जा सकते
हैं।
अर्थ: पूर्ण दिशा के आरंभ करके वृषभ से लेकर
मेष तक की तीन-तीन राशियों को
पक्तियों में रखें....(6)
विवरण: अक्षर पूर्व हुए अब राशियों की बारी आई। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क,
सिंह, कन्या तुला, वृश्चिक, धनु मकर, कुंभ और मीन। इस प्रकार ये बारह
राशियां हैं। अब भीतरी खाली चक्र में पूर्व दिशा में लृ औऱ लृ के बीच तीन
खाने खाली हैं, उनमें वृषभ, मिथुन और कर्क राशि के लिए अनुक्रमेष वृ, मि
तथा क अक्षर लिखें। इसके पश्चात दाहिने हाथ की खड़ी लाइन में लृ और ए के
बीच के तीन खानों में ऊपर से नीचे तक सिं, क, तु अक्षर लिखकर, सिंह कन्या
तथा तुला राशि दर्शाएं। इसके बाद ए और ऐ के बीच के नीचे के तीन खानों में
वश्चिक, धनु तथा मकर बताने के लिए दाहिनी तरफ वृ, ध तथा म लिखें। इसी
प्रकार ऐ और लृ के बीच बाएं हाथ की ओर खड़ी लाइन में नीचे से आरंभ कर के
ऊपर की ओर कुंभ, मीन और मेष राशि को रखने के लिए कुं, मी तथा मे लिखें।
अर्थ : बाकी के कोठों में नंदा आति तिथियों
की पांच जाड़ियों तथा मंगल से
आरंभ करके सातों बार क्रम से लिखें...(7)
विवरण: अब हमारे चक्र में जो पाँच खाने खाली रह गए हैं उनमें से सबसे ऊपर
खाने में नंदा तिथि अर्थात् प्रदीपदा, षष्ठी और एकादशी आए तथा उसके साथ
मंगलवार और रविवार आए। इसके लिए उस खाने में। 1, 6, 11, सू, मं लिखें। अब
दाहिने हाथ की ओर के खाने में भद्रा तिथि अर्थात् बीर सातम (7) और बारस
(12) तथा सोमवार च और बुधवार बु लिखें। इसके बाद के निचले खाने में जया
तिथि 3, 2, 13 तथा गुरुवार का गु लिखें। बाएं हाथ की तरफ के खाली खाने में
रिक्ता तिथि 4, 9, 14 और गुरुवार का शु लिखें और बीत के खाने में पूर्ण
तिथि 5, 10, 15 तथा शनिवार का श लिखें। अब बाद वाले श्लोक में किस वार का
निश्चित खाने में इसकी स्पष्टता की गई है।
अर्थ: नन्दा तिथि के खाने में रवि तथा मंगल,
भद्रा के खाने में चंद्र तथा
बुद्ध, जया के खाने में गुरु, रिक्ता के खाने में शुक्र और पूर्णा के खाने
में शनिवार के ही रूप में निश्चितता से इस चक्र में सभी गजहों पर लिखें।
इस प्रकार से सर्वतोभचद्र चक्र का विस्तार बताया गया है...(2,9)
विवरण: तिथियां तथा वार किस क्रम में और कौन से खाने में रखे जाएं यह हमने
उपरोक्त अर्थ में देख लिया है। उपरोक्त दो श्लोकों में ग्रंथकार ने वही
बात स्पष्टता करते हुए कही है कि नन्दा तिथि के खाने में रवि तथा मंगलवार
लिखें, भद्रा तिथि के खाने में सोमवार तथा बुधवार लिखें, जया तिथि के खाने
में गुरुवार, रिक्ता के खाने में शुक्रवार और पूर्णा तिथि के खाने में
शनिवार लिखें।
हमें यह याद रखना चाहिए कि नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा यह
तिथियों के विशेष नाम हैं। किसी भी पक्ष की एकम, छठ और ग्यारस को नन्दा
तिथि कहा जाता है, किसी भी पक्ष की तीज, आठम और तेरस को जया तिथि कहा जाता
है, किसी भी पक्ष की दूज, सातम औऱ बारस को भद्रा तिथि कहा जाता है, किसी
भी पक्ष की चौथ, नौम, चौदस रिक्ता कहलाती हैं तथा किसी भी पक्ष की पंचम
और दशम शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की अमावस यह चारों तिथियां
पूर्णा तिथि कहलाती हैं। इन सभी स्थितियों को चक्र में देखें जाएंगे तो
तमाम वस्तुएं स्पष्ट होती जाएगी।
2
ग्रह दृष्टि तथा वेध
ऊर्ध्वदृष्टि च भौमौकी केकरौ बुधभार्गवौ।।
समदृष्टि च जीवेन्दू शनिराहु अधोदृशो।।
अर्थ: मंगल और सूर्य की ऊर्ध्वदृष्टि है, बुध
और शुक्र की तिर्थक दृष्टि
है। गुरु तथा चंद्र की समदृष्टि है और शनि तथा राहु की अधोदृष्टि है...(10)
विवरण: किस ग्रह की दृष्टि किस प्रकार होती है, यहां यह बताया गया है।
सर्वतोभद्रचक्र के ऊपर से फल कथन करने के लिए इन दृष्टियों का बहुत
महत्त्व है इसी कारण पाठकों को इन दृष्टियों को याद रखना बहुत अनिवार्य
है। विशेष ध्यान दें कि सूर्य और मंगल उर्ध्व दृष्टि वाले अर्थात ऊंची
दृष्टि से देखने वाले ग्रह हैं। बुध तथा शुक्र तिर्यक अर्थात टेढ़ी नजर से
(तिरछी नजर से) देखने वाले हैं। चंद्र और गुरु समान दृष्टि से अर्थात सीधी
नजर से देखते हैं, जबकि शनि और राहु सदा अधोदृष्टि अर्थात् नीची नजर से
देखने वाले ग्रह हैं।
अर्थ: नीचस्थान में रहनेवाला ऊर्ध्वदृष्टि से
देखे तथा उच्च में रहने वाला
अधोदृष्टि से देखें और सम हो तो पार्श्वदृष्टि से देखे, इस तरह तीन प्रकार
की दृष्टि कहलाई जाती है....(11)
विवरण: ग्रहों की उच्च नीच आदि भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। अब ऐसी किसी
भी स्थिति में रहने वाला ग्रह किसी दृष्टि से देखें, इसका यहां वर्णन किया
गया है। जो ग्रह अपनी नीच राशि में होगा वह ग्रह ऊर्ध्वदृष्टि से देखेगा।
उच्च राशि में रहने वाला ग्रह अधोदृष्टि से देखेगा और सम रहने वाला ग्रह
पार्श्वदृष्टि अर्थात तिरछी नजर से देखेगा।
अर्थ: शानि, सूर्य, राहु केतु और मंगल क्रूर
ग्रह हैं। बाकि के ग्रह शुभ
ग्रह हैं। क्रूर युक्त बुध तथा क्षीण चंद्र क्रूर है...(12)
विवरण: अब यहां पर बताया गया है कि कौन से ग्रह क्रूर अथवा पाप ग्रह और
कौन से ग्रह सौम्य अथवा शुभ ग्रह माने जाएंगे। ग्रंथकार कहते हैं कि
सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि-ये पाँच ग्रह सदा क्रूर अथवा खराब ग्रह
हैं। इन्हें पाप ग्रह भी कहा जाता है। शुक्र और गुरु सदा के लिए शुभ अथवा
सौम्य ग्रह माने जाते हैं। यूं तो चंद्र भी शुभ ग्रह है, किन्तु कृष्ण
पक्ष का चंद्र क्षीण माना जाता है और उस समय उसे क्रूर माना जाता है। इसी
तरह बुध भी शुक्र ग्रह है किन्तु जब वह क्रूर ग्रह के साथ हो तो तब उसे भी
अशुभ अथवा क्रूर ग्रह माना जाता है।
अर्थ: ग्रह, नक्षत्र पर हो, वहां से उस ग्रह
की दृष्टि के अनुसार वाम,
दक्षिण और सन्मुख इस प्रकार तीन वेध होते हैं....(13)
विवरण: ग्रह किसी भी नक्षत्र पर बैठा हो, वहां से वह ग्रह तीन प्रकार के
वेध खड़े कर सकता है। दाहिनी ओर, बाईं ओर और सामने, इन तीन प्रकारों के
वेध हो सकते हैं। जिस ग्रह की दृष्टि हो, उस प्रकार का वेध, उस ग्रह से
उत्पन्न होता है।
अर्थ: क्रूर ग्रह से युक्त, भोज्य, युक्त या
बेधे गए नक्षत्र प्रत्येक शुभ
तथा अशुभ कार्यों में प्रयत्नपूर्वक वर्ज्य करें....(14)
विवरण: किसी भी अच्छे या बुरे, शुभ या अशुभ कार्य का आरंभ करते समय किस
नक्षत्र का त्याग करना चाहिए, इसके बारे में ग्रंथकार ने इस श्लोक में
समझाया है।
ग्रंथकार कहते हैं कि जो नक्षत्र क्रूर ग्रह से वेधे हों उनका शुभ तथा
अशुभ कामों में त्याग करें। क्रूर ग्रह, जो नक्षत्र भोग चुका हो उसे भी न
लें। क्रूर ग्रह जिस नक्षत्र में बैठा हो और जिस नक्षत्र में आने वाला हो,
उन नक्षत्रों में भी शुभाशुभ कार्य नहीं करें क्योंकि इस प्रकार के क्रूर
ग्रह के साथ वाला नक्षत्र अशुभ माने जाते हैं और उनका फल भी खराब होता है।
यहां कही गई बात भी पाठकों को विशेष रूप से ध्यान में रखनी पड़ेगी, क्यों
फल देखने के लिए यह बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
वक्रगे दक्षिणा दृष्टि वम्दिष्टिश्व
शीघ्रगे।।
मध्यचारे तथा मध्या ज्ञेयाभौमादि पंचके।।
अर्थ: मंगल आदि पाँच ग्रहों के लिए इतना याद
रखना चाहिए कि यदि ग्रह वक्री
हो तो दक्षिण दृष्टि, शीघ्र गति का हो तो वाम दृष्टि और मध्य गति का हो तो
मध्य दृष्टि करता है....(15)
विवरण: वक्री अथवा उलटी गतिवाले ग्रह सदा दक्षिण दृष्टि अर्थात् अपनी
दाहिनी ओर दृष्टि करते हैं, शीघ्र गति के अर्थात् सामान्य से अधिक गतिवाला
अतिचारी ग्रह अपनी बाईं ओर अर्थात् वाम दृष्टि करता है, और अपनी मध्यम गति
जितनी ही गति से चलनेवाला ग्रह सम्मुखदृष्टि माना जाता है। यहां सूर्य और
चंद्र एक ही जैसी गति रखते हैं तथा राहु-केतु सदा वक्री हैं, मंगल से शनि
तक के पाँच ग्रहों का ही यहां उल्लेख किया गया है।