आजकल के नवशिक्षित प्रायः कहते सुने जाते हैं कि नाड़ी पर हाथ रखकर रोग या
रोगी की परीक्षा करना केवल ढकोसला मात्र है। इसी प्रकार कुछ कहते हैं कि
आयुर्वेद की वृद्धात्रयी चरक-सुश्रुत-वाग्भट्ट में नाड़ी-का कहीं
नामोनिशान नहीं है। फिर भी इस नाड़ी-विज्ञान की चर्चा शार्गंधर आदि में
कैसे और कहाँ से आयी है ? कुछ समझ नहीं पड़ता। आदि आदि।
सम्यक्तया अवलोकन करने से निश्चय होता है कि हमारे आयुर्वेद की
भित्ति अनेक दर्शनशास्त्रों समन्वयाधार पर स्थित है। न्याय सांख्य,
वैशेषिक, योग, वेदान्त आदि दर्शनों का आयुर्वेद में यत्र-तत्र उपयोग किया
गया है। इसका पता सम्यग्रूपेण चरक तथैव शुश्रुत के सूत्र, शारीर, विमानादि
स्थानों का अवलोकन करने से लगता है। यद्यपि वृद्धत्रयी में स्पष्टरूपेण
नाड़ी-परीक्षा की बातें शार्गंधरादि नाड़ीज्ञान विषयक पुस्तकों की तरह
नहीं मिलती तथापि इनके ‘‘दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः
परीक्षेताथ
रोगिणम्’’ इस सूत्रकथित स्पर्शन से नाड़ी का भी संकेत
किया
गया है। इसके अतिरिक्त ‘‘इत्यष्टविधमाख्यातं
योगिनामैश्वरं
बलम्’’ आदि कथनों से स्पष्ट है कि चरक में योगशास्त्र
का
अच्छा उपयोग किया गया है।
‘‘श्वासोच्छ्वासप्रवर्तिनी
सुषुम्णा’’ अर्थात वस्तुतः नाड़ी
‘श्वासोच्छ्वासप्रवर्तिनी सुषुम्णा’’ है,
यह अन्यत्र
कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि सुषुम्णाकाण्ड मुख्य स्थान रहते हुए भी
सुषुम्णा सर्व शरीर के रोम-रोम में व्याप्त है। इसी से सर्व देह का संविद्
ज्ञान होता है। श्वासोच्छ्वास की प्रवृत्ति होती है। रोम-रोम में व्याप्त
सुषुम्णा यह नारी का ही पर्याय है। इसीलिए कहा गया है कि नाड़ी के द्वारा
शरीरव्यापी सुख-दुःख का ज्ञान पण्डितों को प्राप्त करना चाहिए। सुषुम्णा
आदि नाड़ियों का पूरा ज्ञान योगशास्त्र से प्राप्त होता है। इसलिए सन्
1930 ई. बीकानेर में हुए राजपूताना प्रान्तीय तृतीय वैद्य सम्मेलन के
अध्यक्षीय भाषण में मैंने कहा था कि यह नाड़ीज्ञान का विषय हमारे आयुर्वेद
में योगशास्त्र से ही आया हुआ है।
जो कुछ हो, कहीं से ही आया हो, नाड़ी ज्ञान परमोदय है। महात्मा रावण,
कणाद, भूधर एवं बसवराज आदि का यह कथन नितान्त ठीक है कि दीपक के सामने
जैसे सब पदार्थ स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसी प्रकार स्त्री, पुरुष,
बाल-वृद्ध मूक उन्मत्तादि किसी भी अवस्था में क्यों न हो, नाड़ी इसके
व्यस्त-समस्त-द्वन्द्वादि दोषों का पूरा ज्ञान करा देती है। मैंने अपनी
अस्सी साल की अवस्था में उत्तरोत्तर अनुभव किया है कि यह कथन बिल्कुल ठीक
है। फिर भी मैं मानता हूँ कि-
रागी, पागी, पारखी, नाड़ीवैद्यरु न्याय।
इन सबका गुरु एक है, हीयातणा उपाय।
इस मारवाड़ी या गुजराती दोहा में कहा है कि, रागरागिनी का जानना या
प्राप्त करना, पदचिह्नों के पीछे-पीछे जाकर चोर को पकड़ लेना, रत्न को
देखते ही असली नकलीपन की परीक्षा करना, नाड़ी द्वारा रोग का परीक्षण,
न्याय करके अपराध आदि का निर्णय करना, इन सबका गुरु एक ही और वह है अपने
हृदय का मनोविज्ञान। यह बिल्कुल ठीक है कि वात-प्रकोप में नाड़ी जोंक या
सर्प की तरह चलती है तथा सन्निपात में नाड़ी की गति लवा, तीतर या बटेर की
चाल सी होती है। केवल यह कह देने मात्र से ही पता नहीं लगता परन्तु हमें
इन जोंक-सर्प-लावा-तीतर-बटेर की चाल का अनुभव प्रत्यक्ष देखकर करना होगा
या गुरु से प्रत्यक्ष जानना होगा। मुझे यह स्पष्ट कह देना उचित प्रतीत
होता है कि नाड़ी का ज्ञान तुरंत ही नहीं होता। किन्तु मनोयोगपूर्वक
उत्तरोत्तर धीरे-धीरे कई वर्षों के अभ्यास से नाड़ी का सम्यक ज्ञान मन में
स्थिर हो जाता है और हम उससे रोगी के रोग की परीक्षा ठीक कर सकते हैं।
महर्षि कणाद, महात्मा रावण, भूधर, बसवराज आदि ने नाड़ी के विषय में जो कुछ
कहा है उनकी पोथियाँ भी मिलती हैं, परन्तु केवल उनसे काम नहीं चलता। इस
विषय को समझने के लिए विशुद्ध हिन्दी में विषद वर्णन की आवश्यकता थी। हमें
वैद्यराज श्री ताराशंकर मिश्र को धन्यवाद देना चाहिए, इसलिए कि उन्होंने
चर, सुश्रुतादि तथैव आधुनिक साइन्स को लेते हुए इस विषय पर अच्छा प्रकाश
डाला है। इसमें नाड़ी की उपादेयता, नाड़ीशरीर, नाड़ी के पर्याय, नाड़ी की
गति, उनके दृष्टव्य स्थान नाड़ी से दोष-ज्ञान, नाड़ी पर रसों का प्रभाव,
दूष्यों का नाड़ी पर प्रभाव, इसी प्रकार नाड़ी के मिस अनेक शारीरिक
हृदयादि अंगों पर भी लिखा जो विचारणीय है। चित्र तक भी दिये गये हैं। अन्त
में कहना उचित प्रतीत होता है कि लेखक ने बड़े उल्लास से अच्छा परिश्रम
किया है। हमारा काम है हम इसे अपनावें, मनन करें ताकि लेखक उत्साहित होकर
अन्य भेंट भी हम सबके सामने रख सकें।
श्री गुरवे नम
आमुख
आस्तिकता की ओर-तब हम छात्र थे। एक आयुर्वेद-विद्यालय में। खुला मस्तिष्क
था हमारा। अन्धविश्वास, परम्परा और दबाव उस पर ताला नहीं बन्द कर सकते थे।
कुल मिलाकर बिना सोचे, समझे बिना देखे-भाले कुछ भी मानने को तैयार नहीं थे
हम ! नाड़ी-ज्ञान के लिए हमें केवल शार्गंधर संहिता के 5-7 श्लोक पढ़ाये
गये थे। पर हमारी बुद्धि में ठीक से उतर न सके। उधर पाश्चात्य-विज्ञान की
हिन्दी में लिखी पुस्तकें भी हम पढ़ते थे। उनकी छपाई, चित्र, सजावट और
समझाने की विधियों ने हमें आकृष्ट कर रक्खा था। पढ़ने में बड़े मीठे लगते
थे वे ! ठीक इसके विपरीत नाड़ी-विज्ञान का पक्ष उपस्थिति करने वाली
पुस्तकें ! ! एक दो फर्मे की, रद्दी कागज पर, सजावट और सौन्दर्य से विहीन
! उनकी ‘मक्षिकास्थाने मक्षिका’ वाली
टीकायें सब मिलकर
इस विज्ञान के प्रति अश्रद्दा उत्पन्न कर रही थीं। तिस पर भी नाड़ी
देखनेवाले अधिकांश चिकित्सकों द्वारा की गयी सामान्य त्रुटियाँ हमारी सरल
श्रद्धा को डण्डे मार रही थीं।
इसी अवस्था में एक दिन उसी आयुर्वेद विद्यालय के औषधालय में बैठा था
प्रधान वैध की गद्दी पर। रोगी आते थे, जाते थे, अधिकांश अच्छे होते थे।
विविध परीक्षाओं से उनके रोग का निदान कर चिकित्सा व्यवस्था कर देता था।
नाड़ी-ज्ञान की गम्भीर आवश्यकतओं का प्रश्न ही नहीं उठता था।
लक्षण-चिकित्सा-पद्धति अपना काम कर रही थी। सब काम दर्शन और प्रश्न से चल
जाता था। दोष-दूष्य विवेचना आदि बहुत दूर पड़ गये थे। कोई बिना हमारे कहे
हमें नाड़ी दिखाने का साहस नहीं करता था। परन्तु....! एक दिन एक रोगी ने
आकर बिना कुछ कहे हमारे सामने अपना हाथ नाड़ी देखने के लिए उपस्थिति कर
दिया। हम झल्ला उठे। उसका हाथ झटकरक नित्य की भाँति चिकित्सा व्यवस्था कर
दी। वह चला गया।
हमें क्या पता था ? वे महोदय विद्यालयीय प्रधान मन्त्री के स्वाजातीय थे
और दूसरे दिन मंत्री महोदय ने कार्यालय में हमें बुला भेजा। नाड़ी देखने
के लिए हाथ सामने किया। कल का चित्र हमारे सामने नाच उठा। हमने नाड़ी
देखने से अस्वीकार करते हुए कहा कि आपने यह पढ़ाया नहीं है। क्या पुस्तकों
में लिखा नहीं है ? छूटते ही उन्होंने कहा। ‘मैं
जासूसी
पुस्तकों को नहीं मानता’ हमारा उत्तर था।, मैं शार्गंधर को चरक
आदि
के आगे इससे अधिक नहीं मानता था। जाने क्यों मन्त्रीजी ने फिर पूछा न कहा
और आज तक कुछ न कहा।
पर इस घटना ने हमारी मान्यता को झकझोर दिया. जैसे वर्षों की नींद टूट गयी
हो। सोचने लगा, क्या युग-युग से चली आयी परम्परा असत्य है ? क्या
नाड़ी-विज्ञान की ये पुस्तकें रद्दी ही हैं। परिणामतः लगा मनन और अनुभव
करने। और तब ! एक दिन ज्ञान की आँखें खुल गयीं। रद्दी जासूसी टोकरी में
लाल मिलने लगे। विडम्बनाओं में वास्तविकता का दर्शन होने लगा। जैसे किसी
ने हृदय पर हथौड़ा मारकर कहा, इन्हीं रद्दी पुस्तकों और विडम्बनावाले
वैद्यों ने आयुर्वेद को आज तक जीवित रक्खा। यदि ये न होते तो तुम भी आज न
होते और न नाड़ी पर तुम्हें लेखनी उठाने की नौबत ही आती ! इस मार से हमारा
जीव रो उठा। हमारे अज्ञान ने एक विज्ञान पर इतना अत्याचार कर दिया और तब !
वैद्यों, अवैद्यों, छात्रों और अध्यापकों द्वारा आयुर्वेद पर हुए
अत्याचार के स्मरण से हृदय चीत्कार कर उठा है, उसे अन्धकार में
फेंका जा रहा है।
इसी चीत्कार ने नाड़ी पर हिन्दी भाषा में अत्यन्त सुबोध पुस्तकें लिखने की
प्रेरणा दी, जिससे सुकुमारमति छात्र भी इस अगम्य ज्ञान को प्राप्त कर
सकें, नास्तिक जन जानकर सरलता से उसका अभ्यास कर सकें, उस पर हुए आक्षेपों
का निराकरण हो सके। अन्ततः सोचते-समझते और परखते हुए यह पुस्तक आपकी सेवा
में प्रस्तुत है। इसका परिणाम आज के युग में क्या होगा ? यह नहीं जानता।
केवल अपनी बात कह देना जानता हूँ, समझना न समझना आपका काम है। लोगों कि
मिथ्या धारणाओं का भी निराकरण करने का प्रयत्न करूँगा।
नाड़ी-परीक्षा आर्ष है-कुछ लोग आये दिन कह दिया करते हैं-नाड़ी ज्ञान
चरक-सुश्रुत आदि आर्ष संहिताओं में नहीं लिखा है। अतः वह मान्य नहीं। उनके
कहने से ऐसा लगता है-जैसे वे चरक-सुश्रुत पर जान ही दे देते हैं और उनके
अतिरिक्त कुछ सुनना ही नहीं चाहते। लेकिन हमारा अनुभव है कि जिस प्रकार
नाड़ी-ज्ञान के विरुद्ध वे तर्क उपस्थिति करते हुए आर्ष संहिता की मान्यता
स्वीकार करते हैं उसी प्रकार चरक सुश्रुतादि का भी विरोध करते हुए अन्य
अगुणित तर्क उपस्थित करते रहते हैं। इस प्रकार जो विरोध के लिए विरोध करता
है, उसे समझाने से काम न चलेगा ! जो समझने के लिए तैयार हैं उनसे निवेदन
है कि चरक-सुश्रुत में रस-चिकित्सा भी अत्यन्त सूक्ष्म या नहीं के बराबर
लिखी गयी है, अन्य तन्त्रों में उसका विस्तार हुआ और जग ने उसे शिरोधार्य
किया। उसी प्रकार नाड़ी-परीक्षा का सूत्र स्पर्श-परीक्षा चरक-सुश्रुतादि
में लिखा है। स्पर्श-परीक्षा में नाडी-परीक्षा भी है। यह बात स्पष्ट है कि
‘‘तस्य चेन्मन्ये न स्पन्देयातां परिमृश्यमानेतदा तं
परासुरिति विद्यात्’’ (चरक इन्द्रिय स्थान अ. 3) में
मान्या-स्पन्दन नाड़ी का ही स्पन्दन है। प्रचलित नाड़ी-परीक्षा के स्थानो
में मान्या भी एक स्थान है। इसके अतिरिक्त चरक में, सुश्रुत में और सभी
आर्ष संहिताओं में जगह-जगह हृद्ग्रह, हृदत्स और हृद्द्रव आदि शब्द प्राप्त
होते हैं जो वस्तुतः हृदय अथवा नाड़ी-परीक्षा द्वारा ही जाने जा सकते हैं।
चरक संहिता की परम्परा के प्रवर्त्तक महर्षि भारद्वाज ने तो स्पष्ट कहा
हैः-
यहाँ स्वर परीक्षा का तात्पर्य सभी प्रकार के यथा-नासा वाणी, फुस्फुस,
हृदय, अन्त्र आदि में स्वतः उत्पन्न की गयी ध्वनियों से है। स्वर नासिका
से निकली वायु को भी कहते हैं। यदि वह शीतल हो तो रोगी की स्थिति
संकटापन्न होती है यदि स्वाभाविक उष्ण है तो निराकार होती है।
दाहिने-बायें स्वर के प्रभाव पर भी अध्ययन अपेक्षित है।
1, आहूतादिवचनैः के स्थान पर द्दूतादिबचनैः पाठान्तर भी मिलता है जो
महत्त्वपूर्ण है।
‘प्रयोग चिन्तामणि’ में उल्लिखित महर्षि मारकण्डेय,
वशिष्ट
एवं गौतम के नाड़ी-परीक्षा समबन्धी वचनों से एतत्सम्बन्धी उनके ग्रन्थों
का पता चलता है, जिसमें महर्षि मारकण्डेय प्रणीत नाड़ी-परीक्षा ग्रंथ
जर्मनी के एक पुस्तकागार में आज भी है। माण्डव्य एवं हारीत ऋषि
ने
भी नाड़ी-परीक्षा पर लेखनी उठायी थी, ऐसा पता चलता है।
चरक संहिता के उपदेष्टा महर्षि आत्रेय की नाड़ी-परीक्षा आज भी रॉयल
एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता के संग्रहालय में सुरक्षित है, महर्षि कणाद कृत
नाड़ी-विज्ञान तो प्रचिलित ही है। ऋषि-कुलोत्पन्न रावणकृत नाड़ी-परीक्षा
भी आज प्रकाशित है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि नाड़ी-विज्ञान
पूर्णतः आर्ष है। चरक में इसका सूत्र लिख दिये जाने पर भी वहाँ इसे
विस्तृत नहीं किया गया। इसका कारण यह है कि नाड़ी-विज्ञान और इसका शारीर
सब योगाशास्त्र का विषय है, जिसका संकेत मात्र ही इस संहिता में मिलता है।
विस्तार नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार शल्य और शालाक्य तन्त्र का।
अन्तत: इन दोनों तन्त्रों को भी पराधिकार समझकर अग्निवेश ने चरक में
विस्तार से नहीं लिखा। अन्य धन्वन्तरि भोज आदि ने इनके लिये अलग तन्त्र
विस्तार में लिख डाला। उसी प्रकार नाड़ी-परीक्षा और योग-शास्त्र पर अन्य
ऋषियों ने लेखनी उठायी जिसका संकेत स्पर्शन परीक्षा में चरक में कर दिया
गया है। इस विषय में हमारे जैसे जन का आग्रह उचित नहीं, विद्वानों का
ध्यान इस दिशा में खींचना मात्र उदेश्य रहा; जिससे वे आगे भी विचार कर
सकें।
असत्य और कठिन नहीं-कुछ लोग इसकी सच्चाई में सन्देह करते हैं। इसका एक
कारण-इसके सम्बन्ध की अतिशयोक्तियाँ भी हैं, जिनमें यहाँ तक कहा जाता है
कि ‘‘अमुक व्यक्ति के सूत में बँधी हुई नाड़ी को उसी
सूत के
किनारे बहुत दूर बैठकर देखा और सत्य निर्णय किया’’।
इन
अतिशयोक्तियों के विस्तार में हम न जाकर केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि
नाड़ी-ज्ञान के ग्रंथों के आधार पर रोगी की नाड़ी अपने हाथों में स्पर्श
कर वैद्य सत्य निर्णय दे सकता है। किसी विज्ञान पर जितना अधिक परिश्रम
होगा, परिणाम उतना ही सुन्दर होगा। इसी प्रकार नाड़ी विज्ञान पर सतत
अभ्यास के परिणामस्वरूप निर्णय की अद्भुत क्षमता प्राप्त हो सकती है।
परन्तु साधारण ज्ञान सम्पन्न वैद्यों को थोड़े अभ्यास से भी रोग-निर्णय की
क्षमता प्राप्त हो सकती है। आवश्यकता है सत्य समझ कर अभ्यास
करने की
! एकदम असत्य कहकर उदासीन होने से तो कुछ मिलेगा ही नहीं। हमने स्वयं इसके
सरल अभ्यास की ओर संकेत किया है। उसके अनुसार प्रयत्न करने पर भी काम चल
जाएगा। अन्ततः हम आपसे पूछना चाहते हैं कि चिकित्सा-शास्त्र पढ़ने के लिए
आपने साइन्स, संस्कृति और अंग्रेजी आदि न जाने किस-किस पर श्रम किया !
एनाटोमी, फीजियोलॉजी, बॉटनी, जुलाजी और न जाने कितनी
‘लॉजियों’ पर माथा-पच्ची की। तो कृपा कर थोड़ा सा
श्रम
आयुर्वेद अथवा नाड़ी- विज्ञान पर क्यों नहीं कर लेते ?
जब स्टेथिस्कोप और ठेपन-परीक्षा द्वारा हृदय का शब्द सुनकर रोग-निर्णय हो
सकता है तो नाड़ी द्वारा हृदय की ही गति पहचान कर क्यों नहीं रोग-निर्णय
करना न तो कठिन है और न असत्य ही कठिन है आपका इस ओर झुकाव ! जिसे आप ही
सरल कर सकते हैं।
त्रिदोष-ज्ञान की अपेक्षा- हाँ नाड़ी-ज्ञान के पूर्व इतना करना होगा,
जिसमें त्रिदोष की जानकारी आपको हो सके। यह समझ लीजिए, आयुर्वेद की मूल
भित्ति त्रिदोष पर ही निर्भर है इसका इतना ही गम्भीर ज्ञान होगा, आयुर्वेद
पढ़ने में उतना ही आनन्द आयेगा। यद्यपि आयुर्वेद-विद्यालयों में इस विषय
की पढ़ाई पर उपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है उतना नाड़ी परीक्षा के
कामचलाऊ ज्ञान के लिये कम नहीं है।
मैं आपसे कहूँगा कि थोड़ा ध्यान देकर इस विषय को पढ़ें। जब तक आपकी
प्रत्येक जिज्ञासा का उत्तर न मिल जाए तब तक प्रयास करें। हमने
प्रस्तुत पुस्तक में कुछ निवेदन किया है इसके लिए स्वतन्त्र रूप से
त्रिदोष की पुस्तकों का अध्ययन अवश्य कर लीजिये।
अगणित ग्रंथ और उनके मतान्तर – नाड़ी-ज्ञान के सम्बन्ध में
अगणित
पुस्तके हैं। उन सबमें लगभग एक ही श्लोक या एक ही मत के वाक्य मिलते हैं
पर कुछ अत्यन्त असंगत मत भी मिल जाते हैं। उनमें थोड़ी-सी परेशानी होती
है, थोड़ा-सा विचार कर लेने से वह समाप्त हो जाती है। जहाँ तक हो सका है,
सब मतों का सामंजस्य करके यहाँ अधिकतम संगत पाठ दिया गया है। आवश्यक
मतान्तर का भी उल्लेख कर दिया गया है। जिससे वाचकों को विचारने में
असुविधा न हो।
बहुत से अशुद्ध पाठ भी मिलते हैं, उनको भी केवल देखने के दृष्टिकोण से उसी
सम्बन्ध में दिया है, जिससे उनके परिमार्जन में वाचकों से सहायता मिल सके
!
सुबोध-पुस्तक लिखने का दृष्टिकोण था-छात्रों को, साधारण जनता को और उन
सबको जो आयुर्वेद या नाड़ी-ज्ञान की गम्भीरता से घबड़ाते हैं; नाड़ी-ज्ञान
समझाने का ! इसी हेतु बहुत सी बातें जिनसे पुस्तक सुबोधगम्य हो, छोड़ दी
गयी है। जैसे नाड़ी के दोष की अंशांश-कल्पना-विषों और बहुत-सी मानसिक
परिस्थितियों एवं व्याधि के मूल या पीड़ित स्थान का निर्णय इत्यादि।
परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विद्वान् वाचकों के लिए यह उपेक्षणीय
है। इसके संकेतो में वे नाड़ी विज्ञान के मानसरोवर में राजहंस की भाँति
अवगाहन कर सकते हैं। विवेचन में कही यदि दुविधा हो तो उसके निराकरण के
लिये उनके मूल पाठ टिप्पणी में दे दिये गये हैं। उनसे जो भी संकेत मिले,
उसकी दिशा में वे चल सकते हैं।
क्षेत्र- यह याद रक्खें, कारणों से नाड़ी परीक्षा तद्वधि आविष्कृत
आयुर्वेदीय कायचिकित्सा पर अधिक सटीक लागू होती है। क्योंकि उसी ओर उसके
मूल त्रिदोष अथवा कारण द्रव्यों तक ही नाड़ी-परीक्षा के तत्कालीन
विशेषज्ञों ने ध्यान दिया है। इस मौलिक आधार पर आज विस्तार के दृष्टिकोण
से विचार करने की अधिक आवश्यकता है।, इस आवश्यकता की पूर्ति जिस क्रम से
होगी उसी क्रम से नाड़ी-परीक्षा युगानुरूप सन्दर्भ में परिपक्व और
चमत्कारिणी परिणाम उपस्थित करेगी। शल्य-शालाक्य-अगदतन्त्र और भूत विद्या
के क्षेत्र में कई कारणों से आयुर्वेदीय नाड़ी-परीक्षा में कम ध्यान दिया
गया है यद्यपि नाड़ी-परीक्षा के मूल आधार त्रिदोष एवं द्रव्य उक्त क्षेत्र
पर भी छापे हुए हैं। यद्यपि पराधिकार होने से कायाचिकित्सा के विशेषज्ञों
ने अनिवार्य संकेत देकर शेष उसके लिए छोड़ दिया है, जो उस
क्षेत्र पर अधिकार का दावा करते हैं। वे आगे बढें, अनुसन्धानकर्ता आगे
बढें और अपने उत्तरदायित्व को समझें। स्वयं कुछ न करना, असमंजसताओं-अभावों
के लिये प्राचीन पर व्यंग्य या आक्षेप करना नैतिक अपराध है।