Pravasi Panchhi - A Hindi Book by - Brajlal Handa - प्रवासी पंछी - बृजलाल हांडा
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Pravasi Panchhi

प्रवासी पंछी

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प्रकाशकसुयोग्य प्रकाशन
आईएसबीएन00000
प्रकाशितअप्रैल ०३, १९९७
पुस्तक क्रं:4016
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Pravasi Panchhi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


उसका समूचा जीवन एक विडम्बना बनकर रह गया था। माता-पिता असमय ही चल बसे। वह मामा-मामी के नीड़ में पलती रही। मामा के सेठ को वह भा गई तो उसे बहू बना लिया। सेठ चल बसे तो पति यह कहके विदेश चल दिया कि उसने तो मरणासन्न पिता की अंतिम इच्छा पूरी की थी; शादी एक नाटक था। कुँआरी बहू को विद्यालय के प्रिंसिपल ने संरक्षण में ले लिया। अभी वह भविष्य के निर्माण में संलग्न थी कि प्रिंसिपल को नौकरी छोड़ के पति के घर जाना पड़ा। वह फिर अकेली जूझने लगी। प्रिंसिपल ने उसे बेटी मानकर पढ़ाई के लिए विदेश भेज दिया। घर लौटी तो उसके नीड़ के सभी तिनके बिखर चुके थे। नये माता-पिता भी परलोक सिधार चुके थे।
बहुत प्यारी सूरत थी उसकी। बड़ा मोहक स्वभाव था उसका। उसके गुणों पर हर कोई रीझ उठता। उसे हर किसी ने चाहा, किंतु हर कोई उसे प्रवासिन बनाके चल दिया। ऐसे कई प्रवासी पंक्षियों के जीवन-संघर्षों से बुना यह उपन्यास केवल उपन्यास नहीं, एक महाकाव्य है।

प्रवासी पंछी
1


सेठ रोशनलाल की उस बात को राधिका कभी भी नहीं भूल पाती। मामा के साथ उसे देखकर बड़े प्यार से वे बोले थे, ‘‘यह कन्या बड़ी भाग्यशाली है। उसके चेहरे पर चाँदनी की स्निग्धता विद्यमान है। जिस घर की बहू बनेगी, वह घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा।’’
विनम्रता से उसके मामा ने उत्तर दिया था, ‘‘सेठ जी, यह बालिका मेरी स्वर्गवासी बहन की एकमात्र निशानी है। इसकी माँ तो बचपन में ही स्वर्ग सिधार गई थी। पिछले महीने हार्टफेल होने से इसके पिता भी दुनिया से चल बसे। न जाने इस बालिका के भाग्य में ईश्वर ने क्या लिखा है ?’’

कन्या को अपने बगल में बिठाते हुए सेठ रोशनलाल बोले, ‘‘बेटी, कितनी पढ़ी-लिखी हो ?’’
दुपट्टे का एक छोर मुँह में चबाते हुए धीमे स्वर में उसने उत्तर दिया, ‘‘हायर सेकण्ड्री में पढ़ती हूँ।’’
‘‘बेटी, अपनी पढ़ाई कभी अधूरी मत छोड़ना। शिक्षा से हमारे ज्ञान के क्षितिज का विस्तार होता है। शिक्षा से ही हमारी सुप्त क्षमताओं का प्रादुर्भाव भी होता है। ज्ञान से हमारे भीतर आत्मविश्वास पैदा होता है। घर की समृद्धि तथा खुशहाली के लिए युवतियों का शिक्षित होना आवश्यक है।’’
उत्तर में वह कुछ नहीं बोली। जमीन की ओर नजरें झुकाकर अपने दुपट्टे का एक छोर धीरे-धीरे चबा रही थी।
सेठ के घर से वापस आने पर मन ही मन उसने दृढ़ संकल्प किया कि वह अपनी पढ़ाई अवश्य जारी रखेगी। एक सरकारी मिडिल स्कूल में गणित पढ़ाने वाले उसके अध्यापक पिता बार-बार एक बात कहते थे, ‘बेटी, जिस इन्सान को जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचना होता है, प्रकृति उसकी तरह-तरह से परीक्षा लेती है। सुपात्र बनाने के लिए कई प्रकार के संघर्षों से जूझने हेतु विवश करती है।’

जीवन में अप्रत्याशित रूप से आने वाले तूफान से हम सहम जाते हैं, विचलित हो उठते हैं। परन्तु तूफान की त्रासदी भोगना ही उसकी नियति हो, उसे फिर तूफान भय का पर्यायवाची नहीं लगता। अपने मन की बात मामा से कहते हुए वह बोली, ‘‘मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हूँ।’’
मामा ने उसके इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। उसके संकल्प को पूरा करने के लिए दूसरे दिन कन्या पाठशाला में उसका एडमीशन भी करा दिया।
एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो मामा बोले, ‘‘बेटी, सेठ रोशनलाल ने तुम्हें अपने घर बुलाया है।’’
‘‘पर क्यों ?’’
‘‘बेटी, तुम्हें पुत्रीतुल्य स्नेह करने लगे हैं। तुम्हारे बारे में सदा बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कहते हैं कि तुम जितना भी पढ़ना चाहो, तुम्हें पढ़ना चाहिए। बेटी, मेरी हैसियत तुमसे छिपी नहीं है। जितना मुझसे बन पड़ेगा, तुम्हारे लिए मैं अवश्य करूँगा।’’
उस सायंकाल जब वह सेठ के घर पहुँची तो बरामदे में रखे तख्तपोश पर बैठे-बैठे वे बहीखाते में हिसाब-किताब लिख रहे थे। उसे अपने सामने खड़े देखकर प्रसन्नता से उनका चेहरा खिल उठा। मुस्कराते हुए बोले, ‘‘बेटी, कुर्सी पर बैठ जाओ।’’
उसने आज्ञा का पालन किया।
‘‘तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई कैसी चल रही है ?’’

‘‘ठीक है।’’
‘‘बेटी, ठीक कहने से काम नहीं चलेगा। जीवन में सदा अपने समक्ष एक ऊँचा लक्ष्य रखो। पूरी तन्मयता से यह सोचकर पढ़ाई करो कि तुम्हें अपने स्कूल में ही नहीं बल्कि पूरे प्रान्त में फर्स्ट आना है।’’
उनका यह कथन सुनकर स्वतः ही उनके मुँह से निकला, ‘‘हम प्रयास ही तो कर रहे हैं। लक्ष्यपूर्ति होना या न होना, हमारे हाथ में नहीं है।’’
उस सुकुमार कन्या का यह कथन सुनकर वे चौंके। उसे समझाते हुए बोले, ‘‘बेटी, कोई भी लड़ाई सदा जीतने के लिए ही लड़ी जाती है। यह अलग बात है कि कई बार लड़ते-लड़ते हमें पीछे लौटने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रयास करना हमारे हाथ में है। प्रयास के साथ जब संकल्प का सूत्र भी जुड़ जाता है तो लक्ष्यसिद्धि की राह सरल बन जाती है।’’
उनका मन्तव्य जो कुछ भी रहा हो, पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित कुछ प्रश्न उन्होंने उससे पूछे। उसके उत्तर उनकी आशा के कहीं ज्यादा संतोषप्रद थे।
‘‘बेटी, तुम वास्तव में मेधावी छात्रा हो।’’
‘‘अंग्रेजी छोड़कर बाकी सभी विषयों में मेरे सदा बहुत अच्छे अंक आते हैं।’’
‘‘बेटी, अंग्रेजी का भी तुम्हें अभ्यास करना चाहिए। अंग्रेजी साहित्य भी काफी समृद्ध है। उसका अध्ययन तभी सम्भव है जब हमें इस भाषा का भली-भाँति ज्ञान हो।’’

‘‘अपनी तरफ से मैं पूरा प्रयास करूँगी परन्तु फिर भी....।’’
उसकी मनःस्थिति समझने में उन्हें किंचित भी देर नहीं लगी। उसका उत्साहवर्द्धन करने हेतु बोले, ‘‘कल से ही मैं तुम्हारे लिए इंग्लिश ट्यूटर का प्रबंध करता हूँ।’’
‘‘इसकी आवश्यकता नहीं है।’’
प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्होंने उसकी ओर देखा।
‘‘मेरे विचार से तुम्हें इसकी आवश्यकता है। क्या मैं तुम्हारी अनिच्छा का कारण जान सकता हूँ ?’’
पलभर के लिए वह मौन रही। उसकी समझ में नहीं आया कि उत्तर में वह क्या कहे ?
‘‘बेटी, निस्संकोच होकर अपने मन की बात कहो।’’
‘‘मैं मामा की माली हालत से भली-भाँति अवगत हूँ। मैं उन पर बोझ नहीं बनना चाहती।’’
‘‘वह मेरे यहाँ काम करता है। मैं उसकी पगार बढ़ा दूँगा। तो यह समस्या हल हो जाएगी।’’
‘‘यह समस्या का उचित समाधान नहीं होगा।’’

‘‘परन्तु क्यों ?’’
‘‘आप उनकी पगार मेरी अवस्था पर दया करके बढ़ाएँगे, उनका काम देखकर नहीं। इस जीवन में किसी भी दया के सहारे न तो मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ और न ही जीना चाहती हूँ।’’
‘‘क्या एक-दूसरे की सहायता करना दया की परिधि में आता है।’’
‘‘सदा नहीं। इस स्थिति में अवश्य ही आता है।’’
उस युवती का यह उत्तर सुनकर उनके मन को न जाने क्यों संतोष हुआ। जिज्ञासा व्यक्त करते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘तुम इस समस्या का निराकरण कैसे करोगी ?’’
‘‘जितना मेरे वश में है, उतना प्रयास अवश्य करूँगी। शेष वक्त पर छोड़ दूँगी।’’’
‘‘भँवर में उलझने पर अपनी नियति को लहरों के बहाव पर छोड़ देना क्या बुद्धिमानी है ?’’
‘‘यह सब मैं नहीं जानती।’’
दुकान पर शायद आढ़ती लोग आए थे। नौकर द्वारा यह सूचना मिलने पर वे दुकान में चले गए।
घर जाकर उसने सारी बातें अपने मामा को बता दीं। इससे पूर्व की मामा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते, क्रोध से आग-बबूला होकर मामी बोली, ‘‘तुम्हें ट्यूशन नहीं पढ़नी थी तो मत पढ़ती। वेतन में वृद्धि होने पर कुछ तो आर्शिक मदद मिलती। मैं ही जानती हूँ कि मैं कैसे घर चला रही हूँ।’’

‘‘मामी, मैंने जो उचित समझा कह दिया। एक बात और बता दूँ कि मैं सदा के लिए आप पर बोझ बनकर यहाँ रहने के लिए नहीं आई हूँ। कुछ महीनों के पश्चात् मेरी परीक्षाएँ हो जाएँगी। कहीं न कहीं मैं अपने लिए नौकरी ढूँढ़ लूँगी।’’
‘‘नौकरी पेड़ पर उगे फलों की तरह नहीं मिलती। जब जी में आए, तोड़ लिया।’’
‘‘जिस ईश्वर ने हमें इस दुनिया ने भेजा है, उसने पेट भरने करे लिए कोई न कोई उपाय भी तो किया होगा।’’
‘‘अपनी इन किताबों को अपने पास रखे रहो। जब घर चलाना पड़ता है तो छठी का दूध याद आ जाता है।’’
मामी से बेकार में उलझना उसने उचित नहीं समझा। चुपचाप अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गई। उस रात मामा के कहने पर भी उसने खाना नहीं खाया। मामी तो पहले से ही जली-भुनी बैठी थी। रात भर न जाने क्या-क्या गालियाँ बुदबुदाती रही !

अगले दिन इंटरवल के समय उसे प्राचार्या का बुलावा आया। उनके ऑफिस में जाकर वह बोली, ‘‘मैडम, मेरा नाम राधिका है। क्या आपने मुझे बुलाया है ?’’
मैडम ने उसे सरसरी तौर पर नख से शिख तक देखा। तत्पश्चात् गम्भीर स्वर में बोलीं, ‘‘क्या तुम मेरे साथ मेरे घर में रह सकती हो ?’’
‘‘मैडम, मैं तो अपने मामा के यहाँ रहती हूँ।’’
‘‘आई नो दैट। मैंने तुम्हारी पिछली रिपोर्ट देखी है। तुम प्रतिभाशाली छात्रा हो। घर का काम करने के लिए आया है। तुम उसकी थोड़ी-बहुत सहायता कर दिया करना। मैं तुम्हें इंग्लिश में कोच कर दूँगी।’’
निर्णय लेने में उसने पलभर की भी देरी नहीं की। विनम्रता से उसने उत्तर दया, ‘‘मैडम, मैं आज सायंकाल से ही आपके घर में रहना प्रारम्भ कर दूँगी।’’
‘‘दैट्स फाइन।’’

यह कहकर प्राचार्या अपने सामने रखी फाइल पढ़ने में व्यस्त हो गई। मैडम को विश करने के उपरान्त वह क्लासरूम में चली आई। कौतूहल से उसकी क्लासमेट ने पूछा, ‘‘प्रिंसिपल ने तुम्हें क्यों बुलाया था ?’’
कोई खास बात नहीं थी।’ टालने की गरज से उसने कहा।
‘‘खास बात नहीं थी तो आम बात रही होगी। ह्वाट इज़ दैट ?’’
‘‘मेरी पिछली प्रोग्रेस रिपोर्ट से वे बहुत प्रभावित हैं। इंग्लिश में मेरे बहुत अच्छे मार्क्स नहीं हैं।’’
‘‘अंग्रेज तो यह देश छोड़कर सात समुद्र पार जाकर मिट गए परन्तु अपनी दुम अंग्रेजी पीछे छोड़ गए। अब तो हमारा देश स्वतन्त्र है। हमारी अपनी राष्ट्रभाषा है। फिर भी न जाने क्यों अंग्रेजी हम पर थोपी जा रही है।’’
‘‘कोई भी भाषा सीखना बेकार नहीं होता। इससे हमारे ज्ञान का क्षितिज विस्तृत होता है।’’
‘‘अंग्रेजी के अलावा भी सीखने के लिए अन्य कई भाषाएँ हैं।
‘‘अंग्रेजी भाषा के पीछे एक परम्परा है...’’

बात अधूरी रह गई। छुट्टी की घंटी बजने पर किताब-कापियाँ समेटकर छात्राएँ क्लासरूम से बाहर निकल आईं।
प्रिंसिपल मैडम ने उसे इस प्रकार अपने ऑफिस में क्यों बुलाया ? अपने-आप उसे इंग्लिश में कोच करने का विचार उन्हें नहीं आ सकता था। हो न हो, सेठ रोशनलाल ने ही उनसे यह बात की हो !’’
उसके मन में यह विचार आया। शीघ्र ही उसके इस विचार की पुष्टि भी हो गई। जब वह उनकी दुकान के सामने से गुजरी तो गद्दी पर बैठकर वे अखबार पढ़ रहे थे। उसे देखकर मुस्कराते हुए बोले, ‘‘राधिका बेटी, क्या प्रिंसिपल से तुम्हारी कोई बात हुई ?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘अब तो तुम्हारी समस्या का सम्मानजनक हल निकल आया। क्या तुम इस निर्णय से संतुष्ट हो ?’’
‘‘हाँ।’’
घर पहुँचने पर उसने अपने कपड़े समेटने शुरू किए। मामी न जाने किस बात पर जली भुनी बैठी थी। व्यंग्य-भरे स्वर में बोली, ‘‘महारानी जी कहाँ जाने की तैयारी कर रही हैं ?’’
‘‘मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ।’’

उसका कथन सुनकर चौंकते हुए मामा बोले, ‘‘तुम कहाँ जा रही हो, बेटी ?’’
‘‘प्रिंसिपल ने मुझे अपने घर में रहने हेतु कहा है।’
‘‘परन्तु क्यों ?’’
‘‘मैं उनके घर का छोटा-मोटा काम कर दिया करूँगी। बदले में वे पढ़ाई में मेरी सहायता करेंगी।’’
‘‘बेटी, तुम्हारे घर छोड़ने पर मुझे दुःख अवश्य होगा। मेरे लिए यह संतोष की बात है कि वहाँ जाकर तुम अपना भविष्य सँवार सकती हो।’’
‘‘यह क्यों नही कहती कि वहाँ जाकर नौकरानी की तरह काम करोगी ? अपने-बेगाने यह सुनकर हम पर थू-थू नहीं करेंगे ? सभी कहेंगे कि शायद हम इसे रोटी नहीं दे सके।’’
‘‘मामी मैं दूसरों की परवाह नहीं करती।’’
थोड़ी देर में उसने अपना सामान समेट लिया। बस-स्टैण्ड से मामा एक कुली बुला लाए। घर छोड़ने से पहले वह अपनी मामी से बोली, ‘‘मामी, गलती के लिए क्षमा करना। मैं तुम्हारा घर छोड़कर जा रही हूँ, दिल से मुझे मत निकाल देना। आप लोगों को छोड़कर इस दुनिया में मेरा और कौन है ?’’

उत्तर में मामी ने कुछ भी नहीं कहा। चुपचाप कमरे के भीतर चली गई।
प्रिंसिपल के घर में वह मामा के साथ पहुँची। उसके मामा को संबोधित करते हुए वे बोलीं, ‘‘राधिका होनहार युवती है। इसके उज्जवल भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि यह पूर्ण तन्मयता से अपना अध्ययन करे। आप लोगों का लाड़-प्यार इसके रास्ते में अवरोध बन सकता है।’’
‘‘मैडम, यह मेरी स्वर्गीय बहन की एकमात्र निशानी है। इसके सुखद भविष्य के अलावा हमारी कोई कामना नहीं है। पूर्ण विश्वास से हम इसको आपकी शरण में सौंपते हैं।’’
यह कहकर मामा लौट गए। एक बार भी पीछे मुड़कर उन्होंने नहीं देखा। उनकी आँखों में छलके आँसू राधिका की दृष्टि से नहीं छिप सके। पलभर के लिए वह भावुक हो गई। अपने संकल्प का ध्यान आते ही उसने अपने जी को कड़ा कर लिया।
अपने कथानक को पूर्ण करने के लिए प्रकृति तदनुसार परिस्थितियाँ निर्मित करती है। पिता की मौत के उपरान्त मामा ही उसके एकमात्र सहारा थे। विधि की मंशा के अनुरूप उसे एक अन्य सुरक्षित नीड़ मिल गया।

प्रिंसिपल मैडम संदीप बड़ी सलीकेदार स्त्री थी। उसके पति आर्मी में कर्नल थे। न जाने क्या सोचकर उन्होंने शादी के पश्चात् सर्विस नहीं छोड़ी। छुट्टियों में ही एक-दूसरे से मिलना-जुलना होता था। आर्मी में होने के पश्चात् भी उसके पति अक्खड़ तथा लापरवाह स्वभाव के इन्सान थे। वह स्वयं अनुशासन के मामले में बड़ी सख्त थीं। चाहे घर हो या स्कूल, उनका हर काम बड़े अनुशासनबद्ध तरीके से होता था। मैनर्स तथा एटीकेट के मामले में वे बड़ी सतर्क थीं। छात्राओं तथा अन्य टीचर्स से बड़े-नपे तुले शब्दों में अपनी बात कहतीं। उन्हें किसी ने भी आज तक क्रोधित होते नहीं देखा था। फिर भी उनका दबदबा सब पर इस कदर हावी था कि उनके सामने डींगे हाँकने या लम्बी-चौड़ी बातें करने का दुस्साहस कोई भी नहीं कर सकता था।

इस कड़े अनुशासन के बीच स्कूल तथा घर में राधिका की पढ़ाई होने लगी। घर में मैडम उससे अंग्रेजी में बातें करती थीं। प्रारम्भिक संकोच के उपरान्त धीरे-धीरे राधिका के मन में आत्मविश्वास का भाव बढ़ने लगा। अंग्रेजी बोलने के साथ-साथ वह टेबल-मैनर्स तथा एटीकेट में भी पारंगत होने लगी। अब वह पहले की तरह खुलकर नहीं हँसती थी। प्रसन्न होने पर धीरे से मुस्करा देती। पलभर में ही पुनः गम्भीर हो जाती।
एक दिन मैडम उससे बोली, ‘‘यू नो, फेस इज़ दि बेस्ट इन्डेक्स ऑफ माइंड।’
‘‘यस मैडम !’’
‘‘अपने को इस लक्ष्मण रेखा से मुक्त होना है अपने आचार-व्यवहार पर हमें इस कदर नियंत्रण होना चाहिए कि हमारा चेहरा देखकर हमारे मन के भावों को पढ़ने में कोई सक्षम न हो सके।’’
मैडम का हर कथन, हर सीख उसके लिए पत्थर की लकीर थी, आखिरी सत्य था। उससे सहमत होने के साथ-साथ वह तत्काल उसका अनुसरण करना भी प्रारम्भ कर देती थी। परिणामस्वरूप उसके व्यक्तित्व में एक अलग ही निखार आने लगा।

वार्षिक परीक्षा के उपरांत स्कूल में एनुएल लीव हो गई। मैडम को अपने पति के पास जाना था।
‘‘मैडम, आपके वापस आने तक मैं अपने मामा के घर में रह लूँगी।’’
‘‘नो, यू विल नॉट लिव इन दैट हाउस। जो कुछ तुमने अभी तक यहाँ सीखा है, वहाँ जाकर सभी कुछ तत्काल भूल जाओगी।’’
मैडम अपने पति के पास चली गईं और उसकी इच्छा के अनुरूप छुट्टियों में भी वह मैडम के घर में ही रहने लगी। दो कमरों को लॉक करने के अलावा सारा घर वह उसके लिए खुला छोड़ गई थी।
एक सायंकाल लॉन में बैठे हुए वह एक पुस्तक पढ़ने में तल्लीन थी कि उसके मामा वहाँ आकर बोले, ‘‘बेटी, सेठ जी की तबीयत ठीक नहीं है। उन्होंने तुम्हें बुलाया है।’’

‘‘परन्तु क्यों ?’’
‘‘कारण मैं नहीं जानता। मुझे तो इतना मालूम है कि वे तुम्हें पुत्रीवत् प्यार करते हैं।’’
पलभर के लिए वह निर्णय नहीं कर पाई कि उसे क्या करना चाहिए। असमंजसता का यह भाव क्षणिक ही था। घर को ताला लगाने के पश्चात् वह मामा के साथ चल दी।
उसको सामने खड़े देखकर सेठ के रुग्ण चेहरे पर प्रसन्नता व्याप्त हो गई। कोमल स्वर में वह बोला, ‘‘बेटी, खड़ी क्यों हो ? बैठ जाओ।’’
उसने उनकी आज्ञा का पालन किया। फिर पूछा, ‘‘आपकी तबीयत कैसी है ?’’
बोले, ‘‘जब जीने की चाह नहीं रह जाती, तबीयत स्वयं खराब हो जाती है।’’
‘‘आपको इस तरह निराशाजनक बातें नहीं करनी चाहिएँ। ईश्वर का दिया हुआ सभी कुछ तो है आपके पास।’’
‘‘तुम ठीक कहती हो कि ईश्वर का दिया हुआ सभी कुछ तो है मेरे पास। नौकर-चाकर, बंगला, कार, बैंक-बैलेंस तथा समाज में भी अच्छी-खासी प्रतिष्ठा है। मेरे पास एक ही कमी है और वह है मन कि शांति की।’’
इस समस्या के निराकरण का न तो उसे कोई अनुभव था और न ही वह निदान के बारे में कुछ जानती थी। चुपचाप अपने स्थान पर बैठी रही।
‘‘बेटी, तुम्हारा अंग्रेजी का अभ्यास कैसा चल रहा है ?’’

‘‘ठीक है।’’
‘‘मेरी लाइब्रेरी में हिंदी तथा अंग्रेजी की कई अच्छी पुस्तकें हैं। अगर तुम चाहो तो पढ़ने के लिए ले सकती हो।’’
उसकी जिज्ञासा भाँपकर उन्होंने एक कमरे की तरफ इशारा कर दिया। कमरे के भीतर जाकर उसने रैक पर ढेरों किताबें देखीं। उन पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक चुनना कठिन कार्य था। बड़ी-सोच-समझ के पश्चात् उसने ‘महान पुरुषों की जीवनियाँ’ नाम की किताब उठा ली। सेठ जी के पास जाकर बोली, ‘‘मामा जी ने मुझे बताया है कि आपका पुत्र बम्बई में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा है। कुछ दिनों के लिए उसे अपने पास बुला लीजिए, आपका अकेलापन समाप्त हो जाएगा। कई बार अनवरत अकेला रहने से भी हमारे भीतर उदासी का भाव उत्पन्न हो जाता है।’
‘‘बेटी कहने को राहुल मेरा बेटा अवश्य है परन्तु कभी-कभी वह मुझे अजनबी लगने लगता है।’’
‘‘वह किस तरह ?’’

‘‘हम दोनों बाप-बेटे आपस में अपनत्व के अहसास से जुड़े हैं, वरना हम दोनों के बीच बहुत दूरियाँ हैं।’’
‘‘किस तरह की दूरियाँ ?’’
‘‘उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं, अपना एक अलग ही संसार है। जीवन में वह सफलता की पराकाष्ठा पर पहुँचना चाहता है। उसकी मान्यता है कि इस पिछड़ी जगह में रहकर वह जीवन में प्रगति नहीं कर पाएगा। मेरे व्यापार में उसे कोई रुचि नहीं है।’’

बाप-बेटे की इस मानसिकता के संबंध में कोई टीका-टिप्पणी करना उसने उचित नहीं समझा। कुछ देर मौन रहने के पश्चात् सेठ पुनः बोले, ‘‘संध्या की मौत के उपरान्त मैं टूट गया हूँ।’’
उनका यह कथन सुनकर प्रश्नवाचक दृष्टि से उसने उनकी ओर देखा। अपनी बात का खुलासा करते हुए सेठ बोले, ‘संध्या मेरी पत्नी का नाम है। दो वर्ष पहले मुझे अकेला छोड़कर वह इस दुनिया से चली गई। जीवन में जो आया है, एक न एक दिन अवश्य ही जाएगा। परन्तु बुढ़ापे में पुरुष को अपनी पत्नी की बहुत आवश्यकता होती है। बच्चे अपने-अपने घर-संसार में रम जाते हैं, लीन हो जाते हैं। दुःख-सुख का हाल सुनाने के लिए कोई तो पास होना चाहिए।’’
शायद उनका माथा दुख रहा था। हल्के हाथों से वह उनके माथे पर बाम मलने लगी।
‘‘आप अपने बेटे को तार कर अपने पास बुला लीजिए।’’

‘‘इससे क्या होगा ?’’
‘‘आपकी तन्हाई दूर हो जाएगी।’’
‘‘बेटी मान लो कि वह कुछ दिनों के लिए मेरे पास आ जाता है। कुछ दिनों पश्चात् वापस लौटने की व्यग्रता उसके हृदय को सालने लगेगी। उसके जाने के पश्चात् यह तन्हाई और ज्यादा खाने को दौड़ेगी।’’
‘आप उसकी शादी क्यों नहीं कर देते ?’’


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