Sri Sirdi Sai (Bhajan Sanghrah) - A Hindi Book by - Sushila Devi - श्री शिरडी साई (भजन संग्रह) - सुशीला देवी
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Sri Sirdi Sai (Bhajan Sanghrah)

श्री शिरडी साई (भजन संग्रह)

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सुशीला देवी<<आपका कार्ट
मूल्य$ 6.95  
प्रकाशकडायमंड पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन000
प्रकाशितजनवरी ०१, २००२
पुस्तक क्रं:3670
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:
Shri Shirdi Saai-

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रात: काल की आरती
(1)

जोडूनियां कर चरणीं ठेविला माथा। परिसावी विनंती माझी सद्गुरुनाथा।।1।।
उसो नसोभाव आलों तूझिया ठाया। कृपादृष्टी पाहें मजकड़े सद्गुरुराया।।2।।
अखंडींत असावें ऐसें वाटतें पायी। सांडूनी संकोच ठाव थोडासा देंई।।3।।
तुका म्हणे देवा माझी वैडीवांकुडी। नामें भवपाश हाती आपुल्या तोड़ी।।4।।

(2)


उठा पांडुरंगा आतां प्रभातसमयो पातला, वैष्णवांचा मुळा गरुडपारी दाटला।।1।।
गरुडपारापासुनी महाद्वारा-पर्यंत सुरवांची मांदी उभी जोडूनियां हात।।2।।
शुक्र-सनकादिक नारद-तंबुर भक्लांच्या कोटी। त्रिशूल डमरू घेउनि उभा गिरिजेचा पती।।3।।
कलीयुगीचा भक्त नामा उभा कीर्तनीं। पाठीमागें उभी डोळा लावुनिया जनी।।4।।


(3)



उठा उठा श्रीसाईनाथ गुरु चरणकमल दावा। आधि व्याधि भवताप वारुनी तारा जडजीवा।।धृ.।।
गेली तुम्हा सोडुनियां भवतमरजनी विलया। परि ही अज्ञानासी तुमची भुलवि योगमाया। शक्ति न आम्हां यत्किचिंताहि तिजला सराया। तुम्हीच तीतें सारुनि दावा मुख जन ताराया।।चा.।।
भो साइनाथ महाराज भवतिमिरनाशक रवि। अज्ञानी आम्ह्मही किती तव वर्णावी थोरवी। ती वर्णितां भागले बहुवदनि शेष विधि कवि।।चा.।।
सकृप होउनि महिमा तमुचा तुम्हीच वदवावा ।।आधि.।।
उठा. ।।1।। भक्त मनी सद्भाव धरूनि जे तुम्हां अनुसरले। ध्यानस्था ते दर्शन तुमचे द्वारि उभे ठेले। ध्यानस्था तुम्हांस पाहुनी मन अमुचे धाले। परि त्वद्वचनामृत प्राशायाते आतुर झाले।।च.।। उघडूनी नेत्र कमळा। दीनबंधु रमाकांता। पाही बा कृपादृष्टी बालका जशी माता। रंजवी मधुरवाणी हरीं ताप साईनाथ।। चा.।। आम्हीच आपुले कार्यास्तव तुज कष्ठवितों देवा। सहन किरशिल तें ऐकुनि द्यावी भेट कृष्ण धांवा।। उठा उठा.।। आधिव्याधि ।।2।।

(4)


उठा पांडुरंगा आतां दर्शन द्या सकळां। झाला अरुणोदय सरली निद्रेची वेळा।।1।।
संत साधू मुनी अवधे झालेती गोळा सोडा शेजे सुखें आतां बघुं द्या मुखकमळां।।2।।
रंगमंडपी मह्मद्वारी झालीसे दाटी। मन उतावीळ रूप पहावया दृष्टी ।।3।।
राही रखुमाबाई तुम्हां येऊं द्या दया। शेजे हालवुनी जागे करा देवराया। ।।4।।
गरुड हनुमंत उभे पाहती वाट। स्वंर्गीचे सुरवर घेउनि आले बोभाट।।5।।
झाले मुक्तद्वार लाभ झाला रोकडा। विष्णुदास नामा उभा घेऊनि कांकडा।।6।।

(5)


घेउनिया पंचारती। करूं बाबंसी आरती।। करू साईसी. ।।1।।
उठा उठा हो बांधव। ओंवाळूं हा रमाधव।।साईर.।। ओं ।।2।।
करूनीयां स्थिर मन। पाहूं गंभीर हे ध्यान।। साईचे हे.।। पा.।।3।।
कृष्णानाथा दत्तसाई। जडो चित्त तुझे पायीं।। साई तु.।। जडो.।।4।।


(6)



कांकडआरती करीतो साईनाथ देवा। चिमयरुप दाखवीं घेउनि बालक-लघुसेवा ।।धृ.।। काम क्रोध मद मत्सर आटुनी कांकडा केला। वैराग्याचे त्तूप घालुनि मी तो भिजवीला। साईनाथगुरुभक्तिज्वलनें तो मी पेटविला। तद् वत्ती दाळुनी गुरुनें प्रकाश पाडिला। द्वैत-तमा नासूनी मिळवी तत्स्वरुपीं जीवा ।।चि.।। ।।1।।
भू-खेचर व्यापूनी अवघे हतकमली राहसी। तोचि दत्तदेव तू शिरडीं राहुनी पावसी। राहुनि येथे अन्वत्रहि तू भक्तांस्तव धांवसी। निरसुनियां संकटा दासा अनुभव दाविसी। न कळे त्वल्लीलाही कोण्या देवा वा मानवा।।चि.।। ।।2।।
त्वद्यशदुदुंभीने सारे अंबर हें कोंदले। सगुण मूर्ति पाहण्या आतुर जन शिरडी आले। प्राशुनि त्वद्वचनामृत आमुचे देहभान हरपले। सोडूनियां दुराभिमान मानल त्वच्चरणीं वाहिले। कृपा करिनियां सांईमाउले दास पदरिं ध्यावा।।चि.।। कां. चि. ।।3।।


(7)



भकतीचिया पोटीं बोध कांकडा ज्योति। पंचप्राण जीवें भावे ओबाळूं आरती ।।1।।
ओवाळूं आरती माझया पंढरीनांथा। दोन्हीकर जोडोनी चरणी ठेविला माथा ।।धृ.।। काय महिमा वर्णू आतां सांगणे किती। कोटी ब्रम्हहत्या मुख पाहतां जाती ।।2।।
राही रखुमाबाई उभ्या दोधी दो बाही।। मयूरपिच्छ चामरे ढाळिति ठायींचे ठायीं।।3।।
तुका म्हणे दीप घेउनि उन्मनीत शोभा। विटेवरी उभा दिसे लावण्यगाभा।।4।। ओवाळू.।।


(8)



साईनाथगुरु माझे आई। मजला ठावद्यावा पायीं।।
दत्तराज दुरु माझे आई। मजला ठावद्यावा पायीं।।
श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु साईनाथ महाराजकी जय।।


(9)



प्रभातसमयीं नभा शुभ रविप्रमा फांकली।
स्मरे गुरु सदा आशा समयिं त्या छले ना कली।।
म्हणोनि कर जोडूनी करूं अतां गुरुप्रार्थना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।1।।
तमा निरसि भानु हा गुरुहि नासि अज्ञानता।
परन्तु गुरुची करी न रविही कधीं साम्यता।।
पुन्हां तिमिर जन्म घे, गुरुकृपेनि अज्ञान ना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।2।।
रवि प्रगट होउनि त्वरित घालवी आलसा।
तसा गुरुहि सोडवी सकल दृष्कृतीलालसा।
हरोनि अभिमानही जडवि तत्पदीं भावना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।3।।
गुरुसि उपमा दिसे विधिहरीहरांची उणी।
कुठोनि मग येइ ती कवनि या उगी पाहुणी।।
तुझीच उपमा तुला बरवि शोभते सज्जना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।4।।
समाधि उतरोनियां गुरु चला मशीदीकडे।
त्वदीय वचनोक्ति ती मधुर वारिती साकड़ें।।
अजातरिपु सद्गुरो अखिलपातका भंजना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।5।।
अह्म सुसमयासि या गुरु उठोनियां बैसले।
विलोकुनि पदाश्रिता तदिय आपदे नासिलें।।
असां सुहितकारि या जगतिं कोणिही अन्य ना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।6।।
अस बहुत शाहणा परि न ज्या गुरुची कृपा।
न तत्वस्वहित त्या कळे करितसे रिकाम्या गपा।
जरी गुरुपदा धरी सुदृढ़ भक्तिने तो मना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।7।।
गुरो विनती मी करों हृदय मंदिरी या बसा।
समस्त जगत है गुरुस्वरूपची ठसो मानसा।।
घड़ो सतत सतृती मनिहि दे जगत्पावना।
समर्थ गुरु साईनाथ पुरवी मनोवासना।।8।।


स्त्रगधरा



प्रेमें या अष्टकासी पढुनि गुरुवरा प्रार्थिती जो प्रभातीं।
त्यांये चित्तासि देतों अखिल हरुनियां भ्रांति मी नित्य शांती।।
ऐसें हें साईनाथें कथुनी सुचविले जेविं या बालकासी।
तेवीं त्या कृष्णपायी नमुनि सविनये अर्पितो अष्टकासी।।9।।


(10)



साई रहम नजर करना, बच्चों का पालन करना ।।धृ.।।
जाना तुमने जगत्पसारा सबही झूठ जमाना।।साई।।1।।
मैं अंधा हूं बंदा आपका मुझसे प्रभु दिखलाना।।साई।।2।।
दासगनु कहे अब क्या बोलूं, थक गई मेरी रसना।।साई.।।3।।


(11)



रहम नजर करो, अब मोरे साई, तुमबिन नहीं मुझे मा-बापभाई।।धृ.।।
मैं अंधा हूं बंदा तुम्हारा।। मैं ना जानूं, अल्लाइलाही।।रहम.।।1।।
खाली जमाना मैंने गमाया, साथी आखरका किया न कोई।।रहम.।।2।।
अपने मशिदका झाडू गून है।। मालिक हमारे, तुम बाबा साई।।रहम.।।3।।


(12)



तजु काय दुऊं सावल्या मी खाया तरी
मी दुबळी बटिक नाम्याची जाण श्रीहरी।
उच्छिष्टे तला देणे ही गींष्ट ना बरी
तू जगन्नाथ, तुज देउ कशिरे भाकरी।

नको अत मदिय पाहूं सख्या भगवंता। श्रीकांता
माध्यान्हरात्र उलटोनि गेली ही आतां। आण चित्ता।
जा होईल तुझा रे कांकडा कीं राउळांतरी।
आणतील भक्त नैवेद्यहि नानापरी।।


(13)



श्रीसद्गुरु बाबासाई तुजवाचुनि आश्रय नाहीं, भुतलीं। ।धृ.।।
मी पापी पतित धीमंद। तारणें मला गुरुनाथा झडकारी।।1।।
तूं शातिक्षमेचा मेरू। तूं भवार्णवींचे तारूं, गुरुवरा।।2।।
गुरुवरा मजसि पामरा, अतां उद्धरा, त्वरित लवलाही,
मी बुडतो भवमय डोहीं उद्धरा।।श्री सद्गुरु.।।3।।
श्री सच्चिदानन्द समर्थ सद्गुरु साई नाथ महाराज की जय।


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