चीन में ज्योतिष का इतिहास पाँच हजार वर्ष से अधिक पुराना है। वहाँ के
मनीषियों ने अपनी ज्योतिष विद्या को पौर्वात्य देशों में विस्तारित किया
है। भारतीय जन-मानस को चीनी ज्योतिष के सरलतम अंश से परिचित कराने के
उद्देश्य से भारत की किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक की
सहायता से आप अपने मित्रों/ पत्नी/ प्रेमी/ प्रेमिका का चयन सरलता से कर
सकते हैं।
यह पुस्तक आपको जीवन के अनेक अनछुए, अनदेखे पक्षों को उभारकर आपको
गुण-दोषों का दिग्दर्शन करायेगी, जिसे जानकर आप अपने जीवन को अधिक सार्थक,
उपयोगी एवं लाभप्रद बना सकते हैं।
आमुख
मानव जीवन आदिकाल से एक ही चीज के पीछे भाग रहा है। जब से उसने सोचना
आरम्भ किया होगा, एक ही चीज उसे मथती रही है; एक ही प्रश्न कचोटता रहा है-
मैं कौन हूँ ? यहाँ, इस पृथ्वी पर क्यों जन्मा हूँ ? यह प्रश्न विचित्र तो
है, परन्तु जीवन के किसी स्तर पर यह प्रायः हरेक के सामने आ खड़ा होता है।
यह स्थिति आज ही नहीं है। यह स्थिति तब से ज्यों-की-त्यों बनी हुई है, जब
से मनुष्य को बुद्धि या चिन्तन-शक्ति प्राप्त हुई है। सारी-की-सारी
वैज्ञानिक उपलब्धियाँ सारे धर्म, समग्र दर्शन, समग्र चिन्तन इसी शक्ति के
परिणाम हैं, जिन पर खड़े होकर हम गर्व से सिर उठाकर कहते हैं, ज्ञान असीम
है। सब कुछ इसी का प्रतिफल है। आज का विश्व इसी ज्ञान का प्रतिफल है,
परन्तु जो कुछ हम पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं, क्या वही ज्ञान है ?
अष्टावक्र महागीता की व्याख्या करते हुए ओशो ने बहुत अच्छी, सारगर्भित बात
कही थी कि जिसको हम ज्ञान कहते हैं, वास्तव में वह ज्ञान नहीं है।
जानकारियाँ हैं, सूचनाएँ हैं, बिल्कुल समाचार-पत्र की तरह। जिस तरह
समाचार-पत्र सुबह ताजा रहता है और जैसे-जैसे दिन बीतता जाता है, शाम
गहराती है, समाचार-पत्र बासी हो जाता है। तब उसे कोई नहीं पढ़ता। उसी तरह
हमारा तथाकथित ज्ञान है, जो आज ताजा है, परन्तु कल वही ज्ञान कुछ और नयी
खोजो के साथ नया हो जाता है। जो नया है, कल पुराना हो जाता है, वह ज्ञान
नहीं है। ज्ञान कभी बासी नहीं होता, कभी पुराना नहीं होता। ज्ञान वही है,
जो शाश्वत् नित्य है। इसलिए अष्टवक्र ज्ञान का अर्थ केवल आत्म-ज्ञान से
लेते हैं। अष्टावक्र के अनुसार, आत्म-ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है।
आत्म-ज्ञान के अतिरिक्त इस संसार में जो कुछ भी ज्ञान के नाम पर है
विज्ञान है, विशिष्ट ज्ञान है, वास्तविक ज्ञान नहीं।
भारत ही नहीं, विश्व के अलग-अलग भू-भागों में मानव-सभ्यता और संस्कृति
समानान्तर रूप से साथ-साथ जन्मीं और विकसित हुई हैं। मानव-विकास की गाथा
अनबूझ रहस्यों की परतें खोलने कि दिशा में प्रेरित किया। रहस्य की
परत-दर-परत खोलते हुए मानव अतल गहराईयों में उतरता चला गया। फलस्वरूप
विकास और विज्ञान निरन्तर बढ़ता गया। तथाकथित ज्ञान बहुरूपों में प्रकट
हुआ। विश्व के किसी भी भू-भाग में जन्मने और विकसित होनेवाला चाहे धर्म
हो, योग हो, दर्शन-मनोविज्ञान हो,
वेद-वेदांग या ज्योतिष या अन्य कोई विधा
हो, उसका मूल्य उदेश्य आत्म-ज्ञान प्राप्त करना, उसकी दिशा में बढ़ना और
बढ़ते जाना ही रहा है।
अध्यात्म का लक्ष्य तो यही है। विधा कोई भी हो, ये
सब आत्मज्ञान की प्राप्ति हेतु मानव द्वारा किये गए शताब्दियों नहीं,
सहस्राब्दियों के ज्ञान-पिपासु प्रयासों के साक्षात् प्रमाण हैं।
चीनी ज्योतिष के अन्तर्गत ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’
भी इसी
मूल उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करता है। चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम आदि
देशों में यह बहुप्रचलित है। भारत में इसका प्रचलन तो दूर, इसके बारे में
भी बहुत कम लोग थोड़ा-बहुत जानते होंगे। तथा किसी भी भारतीय भाषा के लिए
चीन का यह ज्ञान अपरिचित है। यह ज्ञान किसी भी भारतीय भाषा में पहली बार
पुस्तक रूप में प्रकाशित हो रहा है। आज से लगभग 22 वर्ष पूर्व, 1977 में
स्थानीय नक्खास बाजार में घूमते हुए कबाड़ में मुझे सुश्री सूजान ह्वाइट
और पाउला डेल्सल की दो पुस्तकें चाईनीज चांस’ तथा’
चाईनीज
ऐस्ट्रालॉजी’ दिखीं। उन्हें घर ले आया।
अध्ययन-मनन-चिन्तन और प्रयोग चलते रहे- सफलता भी मिली सन्तुष्ट भी हुए।
मेरा प्रयोग था व्यक्ति का चरित्र-विश्लेषण तो चीनी ज्योतिष के आधार पर
किया जाए और भविष्य के सम्बन्ध में भारतीय ज्योतिष का आश्रय लिया जाए। आप
विश्वास करें, यह प्रयोग सफल रहा। विगत 22 वर्षों में इस दिशा में बहुत
कार्य किया। उपर्युक्त पुस्तकों तथा
व्यक्तिगत विश्लेषणात्मक अनुभवों के
आधार पर लिखित यह पुस्तक भारतीय अध्येताओं और जनमानस को एक नयी दिशा दे
सकती दे सकती है- ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। किन्तु कहीं आशंका भी है- कुछ
लोग, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और नये ज्ञान-प्रकार को रोकने के के
खिड़िकियाँ बन्द कर चुके हैं, वे इस पुस्तक को पचा नहीं सकेंगे। ऐसे
पूर्वाग्रह-ग्रस्त लोगों से आप बहुत-कुछ पा सकते हैं। आपको बहुत-से चकित
कर देनेवाला तथ्य प्राप्त होंगे।
चीनी ज्योतिष के अन्तर्गत ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’
में बारह
राशियाँ हैं, जिन्हें चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में
‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’
के नाम से
पुकारते हैं। ऐसी धारणा है कि चीन में लगभग 2000 साल पूर्व एक दिन,
जिसे वियतनाम में ‘टेट’ कहा जाता है, चीन
को संकट से
उबारने के लिए भगवान् बुद्ध ने सभी जानवरों को आमन्त्रित किया,
किन्तु उस
दिन वहाँ पर केवल बारह पशु ही पहुँचे-चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन,
सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, श्वान् यानी कुत्ता और सुअर। भगवान् बुद्ध
ने, जिस क्रम से ये पशु वहाँ पहुँचे थे, उसी क्रम में उन्हें वर्ष का
अधिष्ठाता’ बना दिया; ये पशु-वर्ष हर बारह साल बाद पुनः
चाक्रिकक्रम
में वापस आ जाते हैं।
भारतीय जनमानस को ध्यान में रखकर हमने इन्हें इस
ग्रन्थ में ‘राशि’ संज्ञक नाम दिया है, जो सहज
ग्राह्य है और
आप सहज ही अपने जन्म-वर्ष के आधार अपनी पशु-राशि ज्ञात कर सकते हैं। इस
दृष्टि से सन् 2000 ड्रैगन वर्ष है, और 2001 सर्प वर्ष होगा।
भारतीय ज्योतिष की तरह इन एशियाई देशों की गणना चन्द्र-आधारित है। अन्तर
यह है कि हमारे यहाँ एक राशि में ढाई दिन रहता है जबकि चीन आदि देशों में
यह गणना चान्द्र-वर्ष पर आधृत है- एक चान्द्र-वर्ष में 12 कृष्ण-पक्ष होते
हैं 13वाँ बारह वर्ष बाद जुड़ता है- फलतः टेट का दिन कभी एक ही तारीख को
नहीं पड़ता। इन पशु-वर्षों पर ध्यान दें। यह चयन अकारण ही नहीं था हर पशु
अपनी विशिष्टता के अनुरूप हमारे,
चरित्र और भाग्य या नियति को प्रभावित
करता है। कदाचित् ये पशु प्रतीक रूप में चुने गए हैं। आगे के पृष्ठों में
ये प्रभाव अत्यंन्त सूक्ष्म ढंग से विश्लेषित किये गए हैं। इन पृष्ठों में
अंकित विवरण को यदि आप पूर्वाग्रह से मुक्त होकर पढ़ेंगे तो सम्पूर्ण
विवरण को रोचक, सही और चकित कर देनेवाला पायेंगे। परन्तु एक बात ध्यान
रखें- मौसम, माह, जन्म-समय और दिन गर्म या ठण्डा होने की स्थिति में जब
किसी का जन्म होता है, तो चरित्र में भारी अन्तर आ सकता है। इसलिए सावधानी
आवश्यक है। मैं इस सम्बन्ध में पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि, यह
ग्रन्थ आपको आपसे परिचित करायेगा, आपके गुण-दोषों एवं प्रतिभा के दर्शन
करायेगा और जीवन में सफलता के मार्ग को प्रशस्त करेगा-और क्या चहिए आपको ?
यही तो है आत्म-ज्ञान ! अपने को जानना !
‘चीनी ज्योतिष’ सम्बन्धी यह ज्ञान मुझे सूजान ह्वाइट
और पाउला
डेल्सल से प्राप्त हुआ है, जिसके लिए मैं इनका कृतज्ञ हूँ इनसे तथा
व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर प्राप्त ज्ञान को बाँटने का निश्चय तो मैं
सन् 1996 में ही कर चुका था, जिसके अनुसार यह ग्रन्थ भारत की प्रमुख
ज्योतिष (मासिक) पत्रिका ‘‘भारतीय
नक्षत्रवाणी’’
में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। देश भर से प्राप्त पत्रों ने
प्रोत्साहित किया,
जिसके फलस्वरूप यह ग्रन्थ श्री राजीव अग्रवाल द्वारा
भगवती पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। अपनी आगामी पुस्तक
‘‘काई चिंग का चीनी ज्योतिष’’
में चीन में
प्रचलित ज्योतिषशास्त्र के विशद् एवं गहन अध्ययन को प्रस्तुत कर रहा हूँ
किन्तु कहीं पर यह शंका अवश्य है कि अभी मार खानी होगी उन लोगों से, जो
अपनी रूढ़िवादिता के चलते नये को स्वीकार नहीं करना चाहते। अस्तु, मैं
प्रस्तुत हूँ।
चीनी सन्त लाओत्से ने एक बार अपने शिष्य के पूछने पर कहा था,
‘‘देवता वह होता है, जो देता है,- जो लेता है, वह
असुर होता
है।’’ यह सच है, और मैंने अनुभव भी किया है। देवता को
तो आप
नहीं देख सकते, परन्तु जो देता है, उसे तो देख ही सकते हैं। मेरे जीवन में
कुछ ऐसे ही देव-पुरुष आये हैं जिन्होंने सिर्फ मुझे दिया है, चाहा कुछ
नहीं, लिया कुछ नहीं। मेरे अग्रज तथा हिन्दी के वरिष्ठ नाटककार श्री
दयाप्रकाश सिन्हा ऐसे ही व्यक्ति हैं, जिन्होंने विगत दो वर्षों में मुझे
अयाचित बहुत कुछ दिया-उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की अखिल भारतीय
त्रैमासिक पत्रिका ‘छायानट’ का सम्पादक तो बनाया ही,
एक
पुस्तक ‘बेलौस ! यही तो है देवत्व ! इस ग्रन्थ के मूल में उनकी
प्रेरणा भी कहीं अन्तर्निहित है। इसी तरह एक अन्य देव-पुरुष पं. राधेश्यम
शास्त्री हैं, जिनकी प्रेरणा के फलस्वरूप ही यह पुस्तक ‘भारतीय
नक्षत्रवाणी’ में प्रकाशित हुई थी।
इस पुस्तक की रचना में मेरी अनुजा कुमुदलता श्रीवास्तव, मेरे अनुज
सुरेन्द्र लाथ बहोरे, सुभाष मिश्र, राजीव दीक्षित और हैदराबाद-निवासी मेरे
मित्र श्री विनय भण्डारी का बहुविध सहयोग रहा है। मैं इन सबके प्रति
कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। विश्वास है, यह पुस्तक भारतीय जनमानस को वैसे
ही प्रभावित करेगी, जैसा मेरी पूर्ववर्ती पुस्तकों ने किया है।