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अरुन्धति दर्शन न्याय

अरुन्धती न्याय

भारतीय विवाह में एक प्रथा न जाने कितने वर्षों से अपनाई जाती रही है, जिसे अरुन्धती दर्शन के नाम से जाना जाता है। आज के समय में, जब कि विवाह संक्षिप्त से संक्षिप्त होता जा रहा है, कई समुदायों में यह प्रथा लुप्त होती जा रही है। परंतु इस प्रथा का इतिहास और इसका प्रयोजन दोनों ही बड़े रोचक हैं।

पुराण और उपनिषद, दोनों मे इसे अरुन्धती दर्शन अथवा अरुन्धती दर्शन न्याय के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण और भागवत पुराण के अनुसार अरुन्धती सत्यनिष्ठा और पति प्रेम की सर्वोच्च प्रतिमा की तरह जानी जाती हैं। पुराणों के वर्णन से यह ज्ञात होता है कि अरुन्धती महर्षि वशिष्ठ की पत्नी थीं और उनका नाम अनुसूया, सीता और गार्गी की श्रेणी में लिया जाता है। यहाँ गार्गी और अरुन्धती दोनों ही न केवल अपने पति को समर्पित हैं, बल्कि पारिवारिक दायित्व को संभालने के साथ-साथ वे तत्त्व ज्ञान में भी रुचि रखती हैं। इस कारण नवविवाहिता स्त्रियों के लिए अरुन्धती की प्रेरणा एक सशक्त प्रोत्साहन का कार्य करती है।

अरुन्धती दर्शन की प्रथा विवाह की अधिकांश रीतियों के पूरी हो जाने के पश्चात् लगभग अंतिम चरण में अपनाई जाती है। किवदंतियों के अनुसार विवाह संपन्न करवाने वाला पुजारी नवविवाहित दंपति को किसी बड़े वृक्ष के समीप ले जाता है। वृक्ष के पास जाकर पुजारी दंपति का ध्यान पहले सबसे पहले वृक्ष की किसी बड़ी टहनी या कुछ पत्तियों की ओर आकृष्ट करता है। पुजारी सबसे पहले उनसे पूछता है, "क्या तुम वृक्ष की अमुक टहनी की ओर देख रहे हो?" जब वे टहनी को पहचान लेते हैं, तब वह उन्हें बताता है कि वह टहनी अरुन्धती नहीं है। तत्पश्चात् वह उन टहिनियों के बीच दिखने वाले कुछ नक्षत्रों अथवा तारों की ओर उनका ध्यान आकृष्ट करता है और उनसे पूछता है, "क्या आप अमुक तारे को देख रहे हो?" वह यह प्रश्न पति और पत्नी दोनों से अलग-अलग पूछता है। जब पति और पत्नी अमुक तारे को देखने की पुष्टि करते हैं, तब वह उन्हें बताता है कि जिस तारे को उन्होंने पहचाना है, वह अरुन्धती नहीं है। अब वह उनका ध्यान पुनः एक अन्य तारे की ओर आकृष्ट करता है।

इस प्रकार कई बार तारों को देखकर पुष्टि करवाते हुए धीरे-धीरे वास्तविक तारे की ओर ले जाता है। इस प्रथा में नेति-नेति (यह नहीं - यह नहीं) के नियम का प्रयोग करके वास्तविक तारे पर पहुँचता है। इस प्रक्रिया में अरुन्धती तारे को पहचानने में नव दंपित को समय तो लगता है, परंतु अंत में उस तारे को पहचानने में सफल हो ही जाते हैं। इस कठिन प्रक्रियो करने के पीछे दो कारण हैं। एक तो यह कि आकाश में असंख्य तारों के बीच में बिनी किसी दूरदर्शा यंत्र की सहायता के केवल आँखों से देखकर किसी एक विशेष तारे को पहचानने में तो देर लगती ही है, परंतु अरुन्धती तारा जो कि एक दूसरे तारे के समीप है परंतु उससे कम प्रकाशित है। वास्तव में यह तारा सप्तर्षि में से एक तो है, पर चमकता कम है इसलिए पहचानने में दिक्कत होती है।

इस प्रथा के मानने वाले यह मानते हैं कि जिस प्रकार अरुन्धती और वशिष्ठ ये दोनों तारे एक दूसरे की परिक्रमा अनादि काल से कर रहे हैं, उसी प्रकार नवविवाहित दंपति का दांपत्य जीवन भी अरुन्धती और वशिष्ठ के समान चिर काल तक चलेगा और वे एक दूसरे के साथ जीवन पर्यन्त रह सकेंगे। विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ये एक तारा युगल है जिसमें दोनों तारे एक दूसरे की परिक्रमा सदियों से कर रहे हैं और ये दोनों तारे बारी-बारी से समयानुसार अधिक चमकते हैं। इस प्रकार दोनों में से कोई एक तारा अधिक महत्वपूर्ण न होकर, बल्कि बराबर महत्व का है। पौराणिक कथा के अनुसार भी वशिष्ठ और अरुन्धती एक साथ मिलकर यज्ञ और साधना करते थे। इस प्रकार यह एक सफल ऋषि दंपति का भावी नवदंपतियों के लिए आशीर्वाद है।

परंतु इस पौराणिक कथा के पीछे एक गंभीर मनोवैज्ञानिक तथ्य भी छिपा है। हम सभी जानते हैं कि समाज द्वारा आयोजित विवाह में अधिकांश दंपति विवाह से पहले एक दूसरे को लगभग न के बराबर ही जानते हैं। वे विवाह के पश्चात् ही एक दूसरे को जानना आरंभ करते हैं। यह प्रथा उनके शारीरिक मिलन और साथ-साथ रहना आरंभ करने से पहले इसलिए करवाई जाती है ताकि उनके मन और बुद्धि एक दूसरे से सामञ्जस्य बनाने की प्रक्रिया आरंभ कर दें।

आप यह समझ ही सकते हैं कि यदि इस प्रथा में केवल पति अथवा पत्नी में से एक को ही अरुन्धती तारा दिखाया जाये, तो भी उसे सही तारे को पहचानने में देर लग सकती हैं। विशेषकर यदि उसे तारों और अंतरिक्ष का विशेष ज्ञान नहीं है, तब तो निश्चय ही दुष्कर कार्य है। अब यदि दोनों पति-पत्नी को सही तारे को पहचानना है, तब न केवल उन दोनों को अलग-अलग वह तारा पहचानना होगा, बल्कि एक साथ मिलकर भी उसी तारे को पहचानना होगा। यह एक तरह से आगे आने वाले वैवाहिक जीवन का पूर्वाभ्यास है, जब कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए उन्हें अपने जीवन में आने वाली अनेक बातों पर एक सम्मति बनानी होगी। मन और बुद्धि का आपसी सामञ्जस्य बनाना, वह भी आजीवन, कितनी टेढ़ी खीर है, इस बात को अधिकांश विवाहित लोग जानते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि यदि लोग इस बात को ठीक प्रकार से समझ लें तो कम-से-कम कठिन समय में एक दूसरे के साथ सहयोग कर सकने के लिए तैयार रह सकते हैं।

इस प्रकार इस साधारण सी दिखने वाली प्रथा में कितना गंभीर अभिप्राय छुपा है इसका अनुमान हम लगा सकते हैं। सामाजिक जीवन में इस प्रथा का क्या प्रभाव पड़ता है, यह तो हमने देख लिया, परंतु उपनिषदों में इसी विधि के द्वारा अर्थात् नेति-नेति के द्वारा व्यक्तिगत अहं और परमात्मा के बीच के अंतर को समझ कर सच्चिदानन्द परमात्मा को अनुभव करने का मार्ग दिखाया जाता है। उपनिषदों में इसे अरुन्धती दर्शन न कहकर अरुन्धती न्याय कहते हैं और इस न्याय को उच्च कोटि का न्याय या विधि माना जाता है।

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